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भारतीय हॉकी को नई ऊंचाइयां दिलाने वाले हरमनप्रीत सिंह
- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ड्रेग फ्लिकरों में शुमार हरमनप्रीत सिंह को मौजूदा भारतीय हॉकी टीम का स्तंभ माना जाता है. इसकी प्रमुख वजह भारतीय टीम की सारी उम्मीदें उनके प्रदर्शन पर टिकी रहना है.
भारतीय टीम के मौजूदा कप्तान की सबसे बड़ी खूबी चेहरे पर हमेशा हल्की सी मुस्कान रखना है.
हम आजकल चेन्नई में चल रही एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी को ही लें तो इसमें भारत के राउंड रोबिन लीग में शिखर पर रखने में हरमनप्रीत के गोलों की भूमिका अहम रही है.
वो इसमें सात गोल जमाकर नंबर एक पर रहे.
हरमनप्रीत सिंह इकलौते भारतीय खिलाड़ी हैं, जिसने दो बार एफआईएच का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया है.
इस तरह वह नीदरलैंड्स के तेउन डि नूइर, ऑस्ट्रेलिया के जेमी ड्वेयर और बेल्जियम के आर्थर वान डोरेन की जमात में शामिल हो गए हैं. इन सभी ने यह सम्मान दो-दो बार हासिल किया है.
इस भारतीय ड्रेग फ्लिकर को दूसरी बार यह सम्मान 2021-22 की एफआईएच प्रो लीग और 2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में शानदार प्रदर्शन के लिए मिला.
उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में 9 गोल जमाकर भारत को रजत पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी और प्रो लीग में 16 मैचों में 18 गोल जमाकर पहले स्थान पर रहे थे.
इस सम्मान को पाने के समय उन्होंने कहा था, "मेरे लिए एफआईएच का यह सम्मान पाना बहुत मायने रखता है. मैंने हमेशा अपना बेस्ट देकर टीम की सफलता में योगदान करने का प्रयास किया है. उस समय बहुत अच्छा लगता है, जब आपकी कड़ी मेहनत को एफआईएच इस पुरस्कार के माध्यम से मान्यता देता है."
कप्तानी की बोहनी रही खराब
हरमनप्रीत सिंह को इस साल जनवरी माह में भुवनेश्वर और राउरकेला में हुए हॉकी विश्व कप में भारतीय टीम की कमान सौंपी गई थी.
घर में आयोजन होने पर सभी को पोडियम पर चढ़ने की उम्मीद थी.
पर हरमनप्रीत सिंह के रंगत में नहीं होने का भारत को खामियाजा भुगतना पड़ा और भारत नौवें स्थान पर रहा.
हरमनप्रीत सिंह इस विश्व कप में छह मैचों में सिर्फ चार गोल ही जमा सके.
उनके रंगत में नहीं होने का बाकी भारतीय खिलाड़ियों के मनोबल पर भी असर पड़ा और पूरी टीम उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी.
पर सही मायनों में हरमनप्रीत सिंह भारतीय डिफेंस का भरोसा बन गए हैं. वो कमाल के ड्रेग फ्लिकर तो हैं ही, साथ ही बचाव भी पूरे भरोसे के साथ करते हैं.
कई बार वह आगे निकलकर अपने फारवर्डों को ऐसे सटीक पास देते हैं कि सामने वाली टीम पर गोल से बचाव का कोई मौका ही नहीं रहता है.
टोक्यो ओलंपिक की सफलता सबसे अहम
हरमनप्रीत सिंह के करियर की सफलताओं की अगर बात की जाए तो 2020 के टोक्यो ओलंपिक में भारत को 41 साल बाद कांस्य के रूप में कोई पदक दिलाना सबसे अहम है.
भारत को पोडियम पर चढ़ाने में उनके जमाए छह गोलों की बहुत अहमियत है.
भारत जब कांस्य पदक के प्लेऑफ मुकाबले में जर्मनी से पिछड़ रहा था, उस समय हरमनप्रीत द्वारा जमाए बराबरी के गोल को कौन भूल सकता है.
सही मायनों में इस गोल ने ही टेंपो बनाया था और बाद में भारत रूपिंदर पाल और सिमरनजीत सिंह के गोलों से विजय पाने में सफल हो गया था.
हरमनप्रीत सिंह ने तो बेल्जियम के खिलाफ सेमीफाइनल में भी पेनल्टी कॉर्नर पर गोल जमा दिया था.
पर भारतीय टीम इस मुकाबले में पूरी क्षमता से नहीं खेल पाने की वजह से फाइनल में स्थान बनाने से वंचित हो गई थी.
ड्रेग फ्लिकर बनने की दिलचस्प कहानी
अमृतसर के जंडियाला गुरु बस्ती गांव में किसान परिवार में जन्मे हरमनप्रीत सिंह के ड्रेग फ्लिकर बनने की कहानी भी दिलचस्प है.
वह बचपन में अपने घर वालों के साथ खेती-बाड़ी में हाथ बंटाते थे. करीब दस साल की उम्र तक पहुंचते उन्हें खेतों पर मौजूद हैवी व्हीकल्स को चलाने का शौक लगा.
वह पिता की देखरेख में गाड़ी चलाया करते थे. पर उनके सामने सबसे बड़ी समस्या इन गाड़ियों के सख्त गियर लगाने में आती थी.
पर लगातार प्रयास करने से उनके हाथों में मजबूती आती चली गई और उन्होंने इस मजबूती का ड्रेग फ्लिकर बनने में इस्तेमाल किया.
हरमनप्रीत के 15 साल की उम्र में पहुंचने पर पिता ने उनके हॉकी के शौक को दिशा देने के लिए जालंधर स्थित सुरजीत हॉकी अकादमी में भर्ती करा दिया.
इस अकादमी में कोच गगनप्रीत सिंह और सुखजीत सिंह भी पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ रहे थे, उन्होंने हरमनप्रीत सिंह के हाथों की ताकत को ड्रेग फ्लिक में इस्तेमाल करने में विशेषज्ञ बनाया.
इसके लिए वह सामान्य से ज्यादा वजन वाली गेंदों से हरमनप्रीत को अभ्यास कराते थे.
हरेंद्र सिंह को हो गया था आभास
भारतीय जूनियर हॉकी टीम के सफल भारतीय कोचों में शुमार हरेंद्र सिंह ने हरमनप्रीत के शुरुआती दिनों में ही कह दिया था कि वह दो सालों में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ड्रेग फ्लिकर के रूप में नज़र आएंगे.
यह बात उन्होंने 2014 में सुल्तान जोहोर कप में उनके शानदार प्रदर्शन को देखकर कही थी.
इस जूनियर टूर्नामेंट में वह सर्वाधिक 9 गोल जमाकर प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट बने थे.
वैसे वह इस टूर्नामेंट में 2011 में भी खेल चुके थे और उस समय वह अपना प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो सके थे.
सही मायनों में 2014 में जोहोर कप की सफलता ने ही उनके ग्रेजुएशन में अहम भूमिका निभाई और वह लगातार अच्छा प्रदर्शन करने का इनाम 2015 में सीनियर टीम में शामिल होने के रूप में पा गए.
उन्हें जापान के खिलाफ तीन टेस्ट की सीरीज के लिए भारतीय टीम में चुना गया.
हरमनप्रीत सीनियर टीम का हिस्सा बनने के बाद भी जूनियर टीम में भी खेलते रहे और 2015 के जूनियर एशिया कप में अपने झंडे गाड़ने में सफल रहे.
इसमें उन्होंने 14 गोल जमाकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा दिया.
आसान नहीं रही राह
यह सही है कि हरमनप्रीत को 2016 तक सीनियर टीम में खेलने के मौके मिलने लगे थे. इस साल अजलन शाह में किए प्रदर्शन के दम पर वह इसी साल हुए रियो ओलंपिक की टीम में जगह पाने में सफल हो गए.
पर वह ओलंपिक में खेलने के दबाव से अपने को नहीं बचा सके और उनका प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा.
इसका नतीजा यह रहा कि इसके बाद हुई एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी में भाग लेने वाली टीम में उन्हें शामिल नहीं किया गया.
इसके बाद कुछ अन्य टूर्नामेंटों में भी उनकी अनदेखी की जाती रही.
लेकिन इसी साल लखनऊ में हुए जूनियर विश्व कप में किए प्रदर्शन ने उनकी किस्मत को फिर चमका दिया.
इसमें किए प्रदर्शन से वह सीनियर टीम में फिर से स्थान पा गए.
एफआईएच प्रो लीग ने दी नई ऊंचाइयां
एफआईएच प्रो लीग के 2021-22 के सत्र ने हरमनप्रीत सिंह के करियर को नई उड़ान दी.
इस लीग में वह सबसे ज्यादा 18 गोल जमाने में सफल रहे.
इस प्रदर्शन ने भारत को दुनिया की दिग्गज टीमों के बीच तीसरा स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई.
वह 2022-23 की लीग में भी 18 गोल जमाकर पहले स्थान पर रहे.
इस बार भी भारतीय टीम काफी समय तक टॉप पर बनी रही. पर बाद वाले मैचों में उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाने से चौथे स्थान पर पिछड़ गई.
हालांकि भारत ने तीसरे स्थान पर रही बेल्जियम के बराबर ही 30 अंक बनाए थे पर अपने ऊपर ज्यादा गोल पड़ने के कारण वह तीसरा स्थान नहीं पा सकी.
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