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हॉकी वर्ल्ड कप: क्या 47 साल के सूखे को ख़त्म कर पाएगी भारतीय टीम
- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
- भुवनेश्वर देश का इकलौता शहर है, जो 2018 के बाददूसरी बार विश्व कप का आयोजन कर रहा है.
- भारत ने आख़िरी बार 1975 में अजितपाल सिंह के नेतृत्व में स्वर्ण पदक जीता था.
- भारत के ग्रुप में इंग्लैंड और स्पेन जैसी मजबूत टीमें हैं.
- भारत के पास हरमनप्रीत के रूप अच्छा ड्रैग फ्लिकर. टीम को उनसे काफी उम्मीदें हैं.
- पिछले दो दशकों में सबसे दमदार प्रदर्शन करने वाली टीम में ऑस्ट्रेलिया शामिल.
- छले पांच सालों के दौरानबेल्जियमजैसा बेहतर प्रदर्शन किसी अन्य टीम का नहीं रहा है
ओडिशा के राउरकेला और भुवनेश्वर में 13 से 29 जनवरी तक 15वें हॉकी विश्व कप का आयोजन होने जा रहा है.
इस विश्व कप के लिए राउरकेला में ख़ासतौर से आदिवासी क्रांतिकारी बिरसा मुंडा के नाम पर स्टेडियम का निर्माण किया गया है.
विश्व कप के मैच शुरू होने से दो दिन पहले यानी 11 जनवरी को कटक के बाराबती स्टेडियम में उद्घाटन समारोह का आयोजन होगा.
इसमें बॉलीवुड स्टार रणबीर सिंह, दिशा पटानी, संगीतकार प्रीतम, गायिका नीति मोहन, गायक बेनी दयाल के साथ ब्लैकसन डांस ग्रुप प्रदर्शन करता नजर आएगा.
भुवनेश्वर देश का इकलौता शहर है, जो कि विश्व कप का दूसरी बार आयोजन कर रहा है. यहां 2018 के विश्व कप का भी आयोजन हुआ था.
भारत इससे पहले मुंबई, नई दिल्ली और भुवनेश्वर में विश्व कप का आयोजन कर चुका है. पर कोई भी मेजबानी उसे पोडियम पर चढ़ाने में कामयाब नहीं हो सकी है.
लेकिन इस बार भारत को 47 सालों से चला आ रहा पदक का सूखा ख़त्म होने का पूरा भरोसा है.
भारत को 1975 में मिली आख़िरी सफलता
भारत ने आख़िरी बार 1975 में अजितपाल सिंह के नेतृत्व में स्वर्ण पदक जीता था. इसके बाद से भारतीय टीम कभी भी पोडियम पर नहीं चढ़ सकी है.
इससे पहले 1971 में विश्व कप की शुरुआत होने पर भारत ने कांस्य और 1973 में रजत पदक जीता था. इस तरह भारत के पास विश्व कप के तीन ही पदक हैं. पर इस बार इसमें एक और पदक जुड़ने की उम्मीद की जा रही है.
टूर्नामेंट में भाग लेने वाली टीमों को चार-चार के चार ग्रुपों में बांटा गया है. भारत को स्पेन, वेल्स और इंग्लैंड के साथ ग्रुप डी में रखा गया है. ग्रुप ए में ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, फ्रांस और दक्षिण अफ्रीका को रखा गया है. ग्रुप बी में पिछली चैंपियन बेल्जियम, जर्मनी, दक्षिण कोरिया और जापान को, ग्रुप सी में नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, मलेशिया और चिली को रखा गया है.
भारत की राह है मुश्किल
भारत के सभी ग्रुप मैच राउरकेला में खेले जाने हैं. भारत 13 जनवरी को स्पेन के साथ खेलकर अपने अभियान की शुरुआत करेगा. इसके बाद उसे 15 जनवरी को इंग्लैंड से और 19 जनवरी को वेल्स से खेलना है.
इस विश्व कप के फॉर्मेट के हिसाब से ग्रुप में पहले स्थान पर रहने वाली टीमों को सीधे क्वार्टर फाइनल में स्थान मिलेगा. ग्रुप में दूसरे और तीसरे स्थान पर रहने वाली टीमें क्रॉसओवर मैचों को खेलकर क्वार्टर फ़ाइनल में स्थान बनाएंगी.
भारत के ग्रुप में इंग्लैंड और स्पेन जैसी मजबूत टीमों के होने से ग्रुप में पहला स्थान बनाना आसान नहीं है. इसके लिए सभी टीमों को फ़तह करना होगा.
भारत का अकेला ऐसा ग्रुप है जिसकी टॉप तीन टीमों की रैंकिंग में सिर्फ़ चार स्थानों का अंतर है. कुछ समय पहले तक भारत रैंकिंग में पांचवें स्थान पर था.
लेकिन अब उसकी जगह इंग्लैंड आ गई है और भारत छठे स्थान पर पिछड़ गया. वहीं स्पेन रैंकिंग में आठवें और वेल्स 15वें स्थान पर है.
भारत को घर में खेलने पर चहेते दर्शकों के समर्थन का लाभ मिलना तय है. असल में हॉकी में काफ़ी समय बाद मैच दर्शकों के बीच खेले जाने हैं.
दर्शक भारतीय टीम का समर्थन करने के लिए किस तरह पहुंचने वाले हैं, इसका अंदाजा स्पेन के साथ होने वाले पहले मैच के सभी टिकट बिकने से समझा जा सकता है.
स्पेन के कप्तान अलवारो इगलेशियस मैच के दौरान बनने वाली स्थिति से अच्छी तरह से वाक़िफ हैं.
उन्होंने राउरकेला पहुंचने पर कहा, "हम जानते हैं कि राउरकेला स्टेडियम बड़ा है और यहां दर्शक भी भरपूर आने वाले हैं. यहां मैच के दौरान इतना शोर रहने वाला है कि हमारे खिलाड़ियों को मैच में बात करने में दिक़्क़त होगी. यही नहीं रेफ़री के निर्देश सुनना भी मुश्किल होने वाला है. ''
''असल में दिक़्क़त पिछले कुछ सालों से टीमों का दर्शकों के बीच खेलने की आदत का छूट जाना है. इस माहौल में जो टीम जल्द अभ्यस्त हो जाएगी, उसे फ़ायदा मिलने वाला है."
स्पेन के अलावा इंग्लैंड ऐसी टीम है, जिससे पार पाना क़तई आसान नहीं है. बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में इन दोनों के बीच खेले गए मैचों की यादें अभी तक ताज़ा हैं.
दोनों देशों के बीच खेले मैच में एक समय भारतीय टीम ने 4-1 की बढ़त बना ली थी और लग रहा था कि वह मैच आसानी से जीते जा रहा है. पर इंग्लैंड की टीम 4-4 की बराबरी करने में सफल हो गई थी.
यहां तक स्पेन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन की बात है तो इस साल एफआईएच प्रो लीग में भारत ने उसके ख़िलाफ़ एक मैच हारा और दूसरा पेनल्टी शूटआउट में जीता.
असल में दोनों ही टीमें बराबरी वालीं हैं, दिन विशेष पर बेहतर प्रदर्शन करने वाली टीम मैच को अपने पक्ष में कर सकती है. भारत के ग्रुप की चौथी टीम वेल्स भी अप्रत्याशित परिणाम निकालने का माद्दा रखती है.
भारत की बढ़िया तैयारी
पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ हरमनप्रीत सिंह की अगुआई वाली भारतीय टीम ने इसकी तैयारी के लिए पिछले साल के आख़िर में विश्व की नंबर एक टीम ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया था.
इस दौरे पर भारतीय टीम पांच टेस्ट की सिरीज़ में एक जीत पाने में सफल रही. भारत को ऑस्ट्रेलिया पर छह साल बाद यह जीत मिली, जो कि मायने रखती है.
इस दौरे से टीम कॉमनवेल्थ गेम्स फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों मिली 7-0 की हार से टूटे मनोबल को जोड़ने में सफल रही.
यही नहीं भारतीय खिलाड़ियों ने उसके ऊपर पांच मैचों में 17 गोल जमाकर यह दिखाया कि उनमें भी गोल जमाने का माद्दा है.
भारत के पास हरमनप्रीत के रूप अच्छा ड्रैग फ्लिकर तो है पर कोई दूसरे उनका साथ निभाने वाला नहीं है.
हालांकि टीम में अमित रोहिदास और वरुण कुमार हैं. पर यह दोनों ही पेनल्टी कॉनरों को गोल में बदलने में महारत नहीं रखते हैं.
मौजूदा दौर में खिलाड़ियों की फ़िटनेस बनाए रखने के लिए खिलाड़ियों को जल्द अंदर बाहर किया जाता है, इस कारण हर समय एक ड्रैग फ्लिकर का मैदान पर रहना ज़रूरी है.
इस कमी को दूर करने के लिए बेंगलुरू के साई सेंटर में दिसंबर माह में लगे प्रशिक्षण शिविर में कोच ग्राम रीड ने 1990 के दशक में नीदरलैंड के पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ ब्राम लोमंस को बारीकियां सिखाने के लिए बुलाया. इसका निश्चय ही फ़ायदा देखने को मिलने वाला है.
इसी तरह भारतीय गोलकीपिंग में अब तक श्रीजेश के विकल्प नहीं मिल सका है. हालांकि कृष्ण बहादुर पाठक को भी लंबा अनुभव है पर बचाव में कई बार ग़लतियां करते दिखते हैं. इसके लिए डेनिस वान डि पॉल से बारीकियां सिखायी गई हैं.
बेल्जियम की दमदार चुनौती
हम यदि पिछले पांच सालों की बात करें तो बेल्ज़ियम से बेहतर प्रदर्शन किसी अन्य टीम का नहीं रहा है. उन्होंने इस दौरान टोक्यो ओलंपिक का और 2018 की विश्व चैंपियनशिप का गोल्ड ही नहीं जीता बल्कि 2019 की यूरोपीय चैंपियनशिप का खिताब भी उनके नाम है.
इसलिए उन्हें एक बार फिर खिताब जीतने का मजबूत दावेदार माना जा रहा है. असल में वह बहुत ही संतुलित टीम है और हमलावर खेल से किसी भी टीम को छितराने की क्षमता रखती है.
इस ग्रुप की अन्य टीमें जर्मनी, दक्षिण कोरिया और जापान हैं. बेल्ज़ियम को ग्रुप में पहले स्थान के लिए किसी टीम से तगड़ी चुनौती मिलने की उम्मीद है तो वह है जर्मनी.
यह सही है कि 2016 के रियो ओलंपिक के फ़ाइनल में अर्जेंटीना से हारने के अलावा वह हाल फ़िलहाल कोई दमदार प्रदर्शन नहीं कर सकी है. वैसे तो कोरिया और जापान भी उलटफ़ेर करने का माद्दा तो रखती हैं.
ऑस्ट्रेलिया भी किसी से कम नहीं
हम अगर पिछले दो दशकों में सबसे दमदार प्रदर्शन करने वाली टीम की बात करें तो वह है ऑस्ट्रेलिया. वह पिछले दो दशकों में विश्व कप में हमेशा ही टॉप चार टीमों में शामिल रही है. इस दौरान उन्होंने ओलंपिक, विश्व कप, एफआईएच प्रो लीग, कॉमनवेल्थ गेम्स सभी प्रमुख खिताबों पर कब्जा जमाया है.
टोक्यो ओलंपिक के फ़ाइनल में उसे बेल्ज़ियम से हारने पर रजत पदक से संतोष ज़रूर करना पड़ा था.
ऑस्ट्रेलिया के ग्रुप ए में 2016 की ओलंपिक चैंपियन अर्जेंटीना, फ्रांस और दक्षिण अफ्रीका की टीमें शामिल हैं.
ऑस्ट्रेलिया आजकल जिस तरह से खेल रही है, उससे तो नहीं लगता है कि इन टीमों में से किसी में उसे रोकने का माद्दा है.
पर फिर भी तीनों ही टीमें तेज़ हॉकी खेलने में विश्वास रखती हैं, इसलिए कुछ अप्रत्याशित कर भी सकती हैं. पर ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ओकेनडेन को इस बार खिताब जीतने का पूरा भरोसा है.
नीदरलैंड की टीम पिछले दो विश्व कपों से फ़ाइनल तक चुनौती तो पेश कर रही है पर खिताब पर कब्ज़ा नहीं जमा पा रही है.
वह पिछली बार फ़ाइनल में बेल्ज़ियम से पेनल्टी शूटआउट में हार गई थी. लेकिन उसे इस बार चौथा खिताब जीतने का पूरा भरोसा है.
नीदरलैंड ने पिछले कुछ सालों में युवा ब्रिगेड को लेकर टीम तैयार की है. पर उसे आख़िरी बार विश्व कप जीते 25 साल हो गए हैं.
वह क्षमतावान टीम तो है पर गोल्ड से दूरी वह ख़त्म कर पाएगी, कहना जरा मुश्किल है.
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