'जैसलमेर रियासत' को मराठा साम्राज्य का हिस्सा बताने पर विवाद, इतिहासकार क्या कहते हैं?

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- Author, विनायक होगाडे
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
मराठा साम्राज्य के इतिहास को लेकर हाल के दिनों में एक नया विवाद सामने आया है.
यह विवाद इसलिए उठा क्योंकि एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की किताब में छपे नक्शे में जैसलमेर रियासत को मराठा साम्राज्य का हिस्सा दिखाया गया है.
जैसलमेर रियासत के वंशजों और नागपुर के भोसले परिवार के वंशजों ने इस नक्शे को लेकर परस्पर विरोधी दावे किए हैं.
अभी एनसीईआरटी ने इस मामले में एक समिति बनाने की घोषणा की है.
एनसीईआरटी ने कहा है, "इस तरह के मामलों में अगर हमें सुझाव मिलते हैं तो हम विशेषज्ञों की एक समिति के माध्यम से उचित कार्रवाई करते हैं."
जैसलमेर को मराठों के अधीन बताने को लेकर इतिहासकारों की राय भी बंटी हुई है. आइए देखते हैं कि उनकी नज़र में वास्तविक स्थिति क्या थी.
क्या है विवाद?
एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब के तीसरे अध्याय में एक मानचित्र छपा है. इसमें 1759 में मराठा साम्राज्य की सीमा दर्शाई गई है.
इस मानचित्र के अनुसार, मराठा साम्राज्य मध्य महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्सों से लेकर उत्तर भारत तक फैला हुआ था. इसमें पाकिस्तान के अटक और पेशावर तक का क्षेत्र भी शामिल दिखाया गया है.
जैसलमेर राजपरिवार के वंशज चैतन्य राज सिंह ने इस मानचित्र पर आपत्ति जताई है.
उन्होंने 4 अगस्त को इस नक्शे की तस्वीर साझा करते हुए एक्स पर लिखा, "कक्षा 8 की एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान विषय की पाठ्यपुस्तक (यूनिट 3, पृष्ठ संख्या 71) में दर्शाए गए मानचित्र में जैसलमेर को तत्कालीन मराठा साम्राज्य का हिस्सा दिखाया गया है, जो ऐतिहासिक रूप से भ्रामक, तथ्यहीन और गंभीर रूप से आपत्तिजनक है."
उन्होंने आगे कहा, "इस प्रकार की अपुष्ट और ऐतिहासिक साक्ष्यविहीन जानकारी न केवल एनसीईआरटी जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है, बल्कि हमारे गौरवशाली इतिहास और जनभावनाओं को भी आघात पहुंचाती है. यह केवल एक पाठ्यपुस्तक की त्रुटि नहीं है, बल्कि हमारे पूर्वजों के बलिदान, संप्रभुता और शौर्यगाथा को धूमिल करने का प्रयास प्रतीत होता है."
उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की.
इसके बाद 9 अगस्त को नागपुर के भोसले परिवार के वंशज राजे मुधोजी भोसले ने इस मानचित्र के समर्थन में ट्वीट किया.
उन्होंने लिखा, "राजस्थान के कुछ राजपरिवार मराठा साम्राज्य के इस नक्शे को स्वीकार करने से इनकार कर रहे हैं. इसे कभी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. महाराष्ट्र के वीर मराठों ने अपना खून बहाकर इतिहास रचा है. हम मराठा साम्राज्य का विरोध करने वालों की निंदा करते हैं."
उन्होंने आगे दावा किया, "अटक से कटक तक था मराठा साम्राज्य."
एनसीईआरटी ने क्या कहा है?

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एनसीईआरटी ने इस मामले पर 7 अगस्त 2025 को एक बयान जारी किया. हालांकि इस बयान में सीधे तौर पर विवाद का जिक्र नहीं किया गया, लेकिन कुछ पाठ्यपुस्तकों के पाठों की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने की घोषणा की गई है.
एनसीईआरटी ने कहा, "इन पाठ्यक्रमों के बारे में विभिन्न चैनलों से नियमित रूप से सुझाव मिलते हैं."
संस्थान ने बताया कि ऐसे मामलों में पाठ्यक्रम विभागाध्यक्ष के अधीन एक समीक्षा समिति गठित की जाती है, जिसमें संबंधित विषय के वरिष्ठ विशेषज्ञ शामिल होते हैं.
एनसीईआरटी ने अपने बयान में कहा, "यह समिति उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्राप्त सुझावों की जांच करेगी और सिफारिशें देगी."
मराठा साम्राज्य कहां तक फैला था?

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इस मानचित्र ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राजस्थान के राजपूत राजा मराठा शासकों के अधीन थे? इसका उत्तर देने के लिए मराठा साम्राज्य की वास्तविक स्थिति को समझना होगा.
इससे राजपूत राजाओं और मराठों के बीच राजनीतिक और आर्थिक संबंधों का भी पता चलता है.
बीबीसी मराठी ने इस विषय पर सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के सहायक प्रोफ़ेसर राहुल मगर से बात की.
उन्होंने कहा, "18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य दो प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित था, 'कामाविशी' और 'सरंजामी'. शिवाजी महाराज का मूल स्वराज्य 'कामाविशी' क्षेत्र के अंतर्गत आता है. इसमें पुणे, पश्चिमी महाराष्ट्र और कर्नाटक का एक छोटा-सा हिस्सा शामिल था."
वह कहते हैं, "दूसरा भाग 'सरंजामी' (सामंती) क्षेत्र था. इसमें शिंदे, होल्कर, गायकवाड़, भोसले जैसे सरदारों के नियंत्रण वाले इलाक़े शामिल थे. ये क्षेत्र पेशवाओं के अधिकार क्षेत्र में आते थे. इनमें से किसी भी प्रशासनिक क्षेत्र में राजपूतों का पूर्ण रूप से निवास नहीं था."
उन्होंने यह भी कहा, "हालांकि यह एक तथ्य है कि इस अवधि में मराठों के बराबर कोई अन्य राजनीतिक और सैन्य शक्ति नहीं थी."
इस विषय पर हमने दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसर अनिरुद्ध देशपांडे से भी बात की.
उन्होंने कहा, "मराठा चौथ और सरदेशमुखी नाम के कर वसूलते थे. पुणे, इंदौर, ग्वालियर, बड़ौदा और नागपुर के विपरीत, मराठों ने राजस्थान पर कभी शासन नहीं किया."
देशपांडे बताते हैं, "उपलब्ध जानकारियों में यह भी साफ़ उल्लेख है कि मल्हारराव होल्कर और उनके जैसे अन्य मराठा सरदारों को मारवाड़ के राजपूतों ने अपने आंतरिक विवादों में हस्तक्षेप करने के लिए भाड़े के सैनिकों के रूप में आमंत्रित किया था."

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दूसरी ओर, वरिष्ठ इतिहासकार जयसिंहराव पवार अलग राय रखते हैं.
वह कहते हैं, "मराठों के पास भले ही एक-दो रियासतें न रही हों, लेकिन उन्होंने राजपूतों पर शासन किया. उस समय मराठों के पास इतनी शक्ति थी. पेशवा प्रमुख होल्कर और शिंदे ने राजस्थान पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया था. वे मुग़ल सम्राट से हुए समझौते के तहत ऐसा कर रहे थे."
वह आगे कहते हैं, "ऐसे कई दस्तावेज़ उपलब्ध हैं जो बताते हैं कि मराठों ने राजस्थान पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था और 'ट्रिब्यूट' (एक प्रकार का कर) वसूला था. शिंदे और होल्करों ने राजस्थान पर कई आक्रमण किए. काग़ज़ों पर तो ये सभी राजपूत राजा मुग़लों के अधीन थे, लेकिन असल में मराठे ही मुग़लों की तरफ़ से शासन कर रहे थे."
राजपूत राजाओं और मराठों के बीच कैसे संबंध थे?

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राजपूत राजाओं और मराठा शासकों के बीच आर्थिक संबंधों की प्रकृति 1752 में मुग़लों और मराठों के बीच हुई 'अहमदनामा' संधि पर आधारित थी. चौथ और सरदेशमुखी जैसे कर, मराठों के राजनीतिक प्रभुत्व का सबूत माने जाते हैं.
प्रोफ़ेसर राहुल मगर कहते हैं, "ये राजपूत राजा खुद को स्वतंत्र और स्वायत्त मानते थे. उनमें से कुछ मराठों को चौथ और सरदेशमुखी के रूप में धन या सामान देते थे."
जयसिंहराव पवार कहते हैं, "कई बार वे (राजपूत राजा) आधिपत्य स्वीकार करते, कर देते और फिर विद्रोह कर देते. यह सब चलता रहता. इसलिए यह ठीक-ठीक कहना मुश्किल है कि कितने राज्य कितने वर्षों तक मराठों के अधीन रहे."
वह आगे कहते हैं, "अगर हम दस्तावेज़ों को देखें, तो पूरा राजस्थान मुग़ल बादशाह के अधीन था. मराठों ने मुग़ल बादशाह के शासन की ज़िम्मेदारी स्वीकार की. इसलिए उन्होंने राजस्थान पर आक्रमण किया और कर वसूला. कई बार उन्हें इसे वसूलने के लिए हमले भी करने पड़े."
वहीं, अनिरुद्ध देशपांडे कहते हैं, "दरअसल, 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़लों की शक्ति तेज़ी से घट रही थी. उन्होंने मराठों को 'ट्रिब्यूट' वसूलने का अधिकार दे दिया था."
जैसलमेर रियासत ने 'चौथ' दिया या नहीं?

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प्रोफ़ेसर अनिरुद्ध देशपांडे कहते हैं, "जैसलमेर और बीकानेर कभी भी तथाकथित मराठा साम्राज्य का हिस्सा नहीं थे."
वह आगे कहते हैं, "अन्य राजपूत राज्य स्वतंत्र थे, लेकिन कभी-कभी मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए वे मराठा सरदारों को एक प्रकार की 'सुरक्षा राशि' के रूप में मांगी गई धनराशि दे देते थे."
इन संबंधों के बारे में बोलते हुए जयसिंहराव पवार ने कहा, "राजपूत राजा चौथ दे रहे थे, जिसका अर्थ था कि वे मराठों की सर्वोच्चता स्वीकार करते थे. उदाहरण के लिए, ब्रिटिश शासन के दौरान भी ये रियासतें स्वतंत्र थीं, लेकिन उनकी स्वतंत्रता केवल नाममात्र की थी."
वह आगे बताते हैं कि राजपूताना की किन रियासतों ने कर नहीं दिया, यह शोध का विषय है.
राहुल मगर कहते हैं, "क्या जैसलमेर ने कभी मराठों को चौथ या सरदेशमुखी दी थी? इसका उत्तर है—नहीं."
वह आगे कहते हैं, "अहमदनामा के अनुसार मुग़लों ने राजपूतों की ओर से सहमति जताई थी कि हम एक चौथाई हिस्सा देंगे. लेकिन सहमति राजपूतों ने नहीं बल्कि मुग़लों ने दी थी. सभी राजपूत इस पर सहमत नहीं थे. कुछ दे रहे थे, कुछ नहीं दे रहे थे. इनमें जैसलमेर ने कभी नहीं दिया. इसलिए वह राजवंश जो कह रहा है, वह तथ्यात्मक रूप से सही है. बाकी राजपूतों ने दिया, लेकिन वह भी हमेशा आसानी से नहीं दिया जाता था. अक्सर शिंदे और होल्करों को अपनी सेना लेकर जाना पड़ता था और फिर उसे वसूल करना पड़ता था."
एनसीईआरटी की किताब में दिया नक्शा क्या भ्रामक है?

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यह विवाद एनसीईआरटी की किताब में दिए गए एक नक्शे को लेकर शुरू हुआ है. इस नक्शे में जिन इलाक़ों को मराठों के अधीन दिखाया गया है, वे उनके राजाओं के बीच प्रशासनिक और आर्थिक संबंधों की प्रकृति को स्पष्ट रूप से नहीं दर्शाते.
मानचित्र में इन क्षेत्रों को 'मराठा साम्राज्य (सहायक राज्यों सहित)' बताया गया है. इतिहासकारों का कहना है कि इस मानचित्र में वे क्षेत्र दर्शाए गए हैं, जहाँ से ट्रिब्यूट यानी एक तरह का कर वसूला जाता था. इसके अलावा, मानचित्र के नीचे लिखा है- '1759 में मराठा साम्राज्य का विस्तार'.
पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 में हुआ, जिसमें अहमदशाह अब्दाली ने मराठों को पराजित किया. इसलिए माना जा सकता है कि इस युद्ध से पहले का दौर बहुत जटिल और गतिशील रहा होगा.
राहुल मगर कहते हैं, "कई राजनीतिक आंदोलन चल रहे थे. अगर यह दिखाना संभव होता कि मराठों का सीधा शासन कहाँ था, उनका प्रभाव क्षेत्र कितना था और कहाँ से उन्हें कर मिल रहा था, तो ये आपत्तियाँ नहीं उठतीं. अगर ये बारीकियाँ दिखाई गई होतीं, तो विवाद नहीं होता."
अनिरुद्ध देशपांडे कहते हैं, "एनसीईआरटी ने जो मानचित्र तैयार किया है, वह भ्रामक लगता है. इससे यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती कि वास्तव में मराठों के अधीन कितना क्षेत्र था."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















