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एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए तैयार कैसे हो गए?
- Author, हिमांशु दुबे
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
"मैंने कभी भी अपने आप को मुख्यमंत्री नहीं समझा, मैंने हमेशा एक आम आदमी की तरह काम किया है. मेरे लिए सीएम का मतलब है कॉमन मैन."
यह बात महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे ने 27 नवंबर, 2024 को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही थी.
इस बीच, महाराष्ट्र में बीजेपी ने देवेंद्र फडणवीस को महाराष्ट्र का नया मुख्यमंत्री चुनकर इस सवाल पर विराम लगा दिया है कि 'महायुति' की ओर से कौन राज्य की बागडोर संभालेगा.
अब सवाल ये उठ रहा है कि 'महायुति' में शामिल शिवसेना (शिंदे) के प्रमुख एकनाथ शिंदे सीएम पद छोड़ने के लिए राजी कैसे हो गए? महाराष्ट्र की राजनीति में अब एकनाथ शिंदे और उनकी पार्टी का सियासी भविष्य क्या होगा?
इन सवालों के जवाब ढूंढने के लिए बीबीसी हिंदी ने कुछ विशेषज्ञों से बातचीत की.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
महाराष्ट्र की राजनीति पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक़ पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे के पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था और उनके गुट के लिए बहुत ज़रूरी है कि वो राज्य की सत्ता में बना रहे.
बीबीसी मराठी के संपादक अभिजीत कांबले कहते हैं, ''शिंदे के सामने और कोई चारा नहीं था. शिंदे को किसी भी हालत में, बीजेपी जो भी कहे, वो मानना ही पड़ता, क्योंकि बीजेपी के विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा है.''
उन्होंने कहा, ''यदि बीजेपी के पास नंबर नहीं होते तो वो इस बात पर सोचती. ढाई साल पहले जब बीजेपी की राजनीतिक ज़रूरत थी, तब उन्होंने शिंदे को सीएम का पद दिया और देवेंद्र फडणवीस डिप्टी सीएम बने.”
''लेकिन अब बीजेपी की ऐसी मजबूरी नहीं थी कि शिंदे को सीएम बनाया जाए और इतने बड़े बहुमत से मिली जीत के बाद सीएम पद छोड़ दिया जाए.”
''दूसरी ओर, शिंदे के पास कोई ऐसा ऑप्शन नहीं था, जिसमें वो दूसरे गठबंधन के साथ जाते. यदि वो इनको छोड़कर जाते भी तो बीजेपी आराम से बहुमत जुटा लेती.''
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में इस बार बीजेपी की जीत का स्ट्राइक रेट 80 प्रतिशत से ज़्यादा रहा है. जबकि शिवसेना और एनसीपी का स्ट्राइक रेट 70 प्रतिशत के आसपास रहा.
एकनाथ शिंदे ने बीजेपी का मुख्यमंत्री बनाए जाने के फ़ैसले का समर्थन तो कर दिया है, बावजूद इसके राजनीतिक गलियारों में कई सवाल उठ रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार जयदेव डोले शिंदे के इस निर्णय को लेकर थोड़ी अलग राय रखते हैं.
जयदेव कहते हैं, '' शायद उन (शिंदे) पर कोई इमोशनल दबाव डाला गया होगा कि फडणवीस बन सकते हैं तो आप क्यों नहीं बन सकते.''
''दूसरा कारण यह हो सकता है कि आने वाले चुनावों में अगर शिवसेना को यानी शिंदे गुट को बहुमत से जीतना है तो उनको सत्ता में रहना ज़रूरी है.''
“क्योंकि सत्ता के बगैर वो संगठन नहीं चला सकते हैं. और दोनों शिवसेनाएं बूढ़ी हो चुकी हैं. शिवसैनिक जो हम देखते हैं, उनकी उम्र पचास-साठ साल के ऊपर है.''
“शिंदे ने प्रैक्टिकल सोच रखी होगी कि सत्ता में रहकर ही शिवसेना जीत सकती है.''
'महायुति' के लिए कैसा रहा चुनाव?
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 149 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इसमें पार्टी ने 132 सीटें जीतीं. एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 81 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इसमें पार्टी ने 57 सीटें जीतीं. अजीत पवार की एनसीपी ने 59 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें 41 सीटें जीतीं.
'महायुति' की जीत ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका कर रख दिया था. वहीं, विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी के लिए भी इस चुनाव के नतीजे अप्रत्याशित ही थे.
शिंदे गुट के लिए सत्ता क्यों ज़रूरी?
महाराष्ट्र की सत्ता में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. ऐसे में शिंदे और उनके गुट के सामने भी कुछ चुनौतियां और मजबूरियां सामने आ गई हैं. विशेषज्ञ इस पर कुछ ऐसी ही राय रखते हैं.
इस बारे में बीबीसी मराठी के संपादक अभिजीत कांबले ने कहा, ''शिंदे की पार्टी और उनके सदस्यों के लिए सत्ता में रहना ज़रूरी है.''
'' क्योंकि, शिवसेना से जो लोग अलग हुए, वो लोग वही थे, जिनका कहना था कि हमें सत्ता में रहना चाहिए ताकि हम अपने लिए फंड्स लाएं और अपनी विधानसभा क्षेत्रों में काम करके खुद को मज़बूत कर पाएं. महाराष्ट्र में जब एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस की सरकार थी तो उनको पूरा मौका नहीं मिल रहा था. इसलिए शिंदे उनको छोड़कर गए.''
''अब फिर से वही स्थिति आ गई है. लिहाजा उनके लिए सत्ता में बने रहना जरूरी है. शिंदे के साथ जितने भी विधायक हैं उनकी भी सोच यही है.''
उन्होंने कहा, ''अगर शिंदे सरकार से बाहर रहने का फैसला करते तो उनकी पार्टी के विधायकों में इस बात का असंतोष रहता.''
''जैसे एकनाथ शिंदे जब उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर जा रहे थे तो उद्धव ने उनको मनाने की कोशिश की थी. लेकिन शिंदे नहीं माने थे. उन्होंने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी.''
आज हालात अलग हैं. इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार जयदेव डोले कहते हैं, ''शिंदे गुट का जन्म ही सत्ता की वजह से है. वो हिंदुत्व की वजह से नहीं हुआ.''
''हिंदुत्व मुद्दा ही नहीं था इस चुनाव में. सत्ता हासिल करना अहम मकसद था. सत्ता न मिले तो शिंदे गुट का अस्तित्व ख़तरे में पड़ सकता है.''
“उद्धव की बात अलग है. उनके पास एक परंपरा है. उनका नज़रिया शिवसैनिक और शिवसेना प्रमुख के लिए है. शिंदे के पास ऐसी कोई परंपरा नहीं है. सत्ता के सिवा वो चल ही नहीं सकते.''
'' शिंदे मराठा जाति के हैं, लेकिन पूरी मराठा जाति उनके पीछे नहीं जा सकती है. चूंकि शिंदे को-ऑपरेटिव सेक्टर के लीडर नहीं हैं. इसलिए उनको सत्ता में रहकर ही अपना कारोबार चलाना होगा.''
यही वजह है कि शिंदे ने आख़िरकार बीजेपी का प्रस्ताव मान लिया है.
शिंदे के लिए क्या है चुनौती?
तो फिर एकनाथ शिंदे को यह तय करने में इतना वक़्त कैसे लग गया कि उनको बीजेपी का फ़ैसला मानना है या नहीं? क्या ऐसा करने से शिंदे के गुट पर गलत असर पड़ेगा?
इस सवाल के जवाब में बीबीसी मराठी के संपादक अभिजीत कांबले कहते हैं, ''शिंदे के लिए बात इतनी थी कि पहले वो सीएम थे तो तुरंत डिप्टी सीएम पद पर आना उनके लिए मुश्किल था.”
''दूसरा, शिंदे ने ढाई साल में सीएम पद का एक आभामंडल बनाया था. उससे भी इन्हें इस पद को छोड़ना मुश्किल हो रहा था,''
''एक बात ये भी है कि उन्हें कौन सा विभाग दिया जा रहा है. क्योंकि महाराष्ट्र समेत बाकी राज्यों में भी गृह को अहम पोर्टफोलियो माना जाता है. और ऐसी चर्चा है कि देवेंद्र फडणवीस होम पोर्टफोलियो छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. पोर्टफोलियो को लेकर शिंदे और बीजेपी में काफी खींचतान है.''
''ऐसे में शिंदे अब डिप्टी सीएम का पद लेंगे. कुछ महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो लेंगे और अपनी पार्टी को कमजोर होने से बचाएंगे.''
'' यही उनके सामने चैलेंज भी था. इसलिए वो सत्ता में भागीदारी के लिए तैयार हैं.''
तो क्या फिर अभी भी शिंदे और उनके गुट की समस्या ख़त्म नहीं हुई है? इस पर वरिष्ठ पत्रकार जयदेव डोले नया पहलू सामने रखते हैं.
वो कहते हैं, ''अगर ये तीनों (बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी) मिलकर राज्य में आने वाले चुनाव लड़ते हैं, तो वहां भी खींचतान होगी.''
“क्योंकि किसका प्रभाव क्षेत्र कहां है यह तो सभी जानते हैं. लेकिन कौन बीजेपी का नया नेता उभरकर आएगा और वो शिंदे गुट को कितनी तवज्जो देगा है ये देखना होगा.''
उन्होंने कहा, ''ये देखने वाली बात होगी कि शिंदे गुट के पास कितना साधन और सामग्री होगी क्योंकि कॉर्पोरेट सेक्टर तो फडणवीस और बीजेपी के पीछे चले जाएगा. ऐसे में अब कॉर्पोरेट सेक्टर शिंदे गुट को कितनी मदद करेगा यह देखना होगा.''
''इस बीच, अजित पवार ने अच्छी चाल चली कि वो शिंदे गुट को पीछे छोड़कर आगे चले गए. उन्होंने ऐसा मैसेज दिया कि मैं तो बीजेपी के मार्गदर्शन में आगे बढ़ूंगा. अजित पवार ने बीजेपी से नजदीकियां बढ़ा ली. और इस बीच शिंदे एक हफ्ते तक दूर बैठे रहे. बीजेपी को ऐसा लगा कि शायद वो बगावत कर सकते हैं.''
बहरहाल, अब यह बात सामने आ चुकी है कि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री बीजेपी से होगा. इस बात के लिए अजित पवार के साथ ही एकनाथ शिंदे भी राज़ी हो गए हैं.
महत्वपूर्ण राज्य क्यों है महाराष्ट्र?
दरअसल, राजनीति और आर्थिक नज़रिए से महाराष्ट्र एक महत्वपूर्ण राज्य है. राजनीति के लिहाज़ से महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 और राज्यसभा की 19 सीटें हैं.
वहीं, आर्थिक तौर पर देश की कुल जीडीपी में महाराष्ट्र क़रीब 14 प्रतिशत का योगदान देता है. इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरिंग में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 13.8 प्रतिशत है.
वित्त वर्ष 2024-25 की पहली तिमाही में महाराष्ट्र में एफ़डीआई 70,795 करोड़ रुपये का था. यह भी एक वजह है कि हर दल चाहता है कि मुख्यमंत्री उनकी पार्टी से हो.
यही बात अहम पोर्टफोलियो को लेकर भी लागू होती है. हर दल चाहता है कि उसको ज़्यादा से ज़्यादा अहम मंत्रालय मिले.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.