जेआरडी टाटा और जवाहरलाल नेहरू में कभी दोस्ती तो कभी तीखे मतभेद

जेआरडी टाटा और जवाहरलाल नेहरू

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इमेज कैप्शन, आर्थिक नीतियों पर जेआरडी टाटा और जवाहरलाल नेहरू एक-दूसरे का सम्मान करते थे लेकिन आर्थिक नीतियों पर दोनों में गहरे मतभेद थे
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी

एक अगस्त 1953. उस दिन जेआरडी टाटा का मूड बहुत ख़राब था. इस दिन संसद ने नौ निजी एयरलाइंस का राष्ट्रीयकरण करके उन्हें दो सरकारी एयरलाइनों में बदल दिया था.

एयर इंडिया इंटरनेशनल और इंडियन एयरलाइंस.

इन नौ एयरलाइंस में दो की स्थापना जेआरडी ने की थी. इनमें से एक एयरलाइंस के मालिक घनश्याम दास बिड़ला थे.

बिड़ला को शायद इस बात का इतना मलाल नहीं था कि उनकी भारत एयरवेज़ को सरकार ने ले लिया था लेकिन जेआरडी उस दिन बहुत तकलीफ़ में थे.

उन्होंने टाटा एटरलाइंस को शुरुआत से बनाने में बहुत मेहनत की थी. उसे सरकारी नियंत्रण बचाने के लिए उन्होंने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया था.

उनका मानना था कि नौकरशाहों को दूर-दूर तक इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि एयरलाइंस किस तरह चलाई जानी चाहिए.

बार-बार उनके साथी कहा करते थे, 'आप टिस्को, टेल्को और टाटा साम्राज्य की 50 दूसरी टाटा कंपनियों की तुलना में एयरलाइंस को अपना कुछ ज़्यादा ही समय दे रहे हैं.'

अब उसी कंपनी का सरकार अधिग्रहण करने जा रही थी. बार-बार दिल्ली जाकर कंपनी को बचाने की उनकी सारी कोशिश नाकाम हो गई थी.

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गीता पीरामल अपनी किताब 'बिज़नेस लीजेंड्स' में लिखती हैं, "पहले रफ़ी अहमद क़िदवई, फिर जगजीवन राम और यहाँ तक कि जवाहरलाल नेहरू ने टाटा को धोखा दिया था. पूरा मंत्रिमंडल उनके ख़िलाफ़ एकजुट हो गया था.''

''तसल्ली की सिर्फ़ एक बात थी कि नेहरू ने सुनिश्चित कर दिया था कि जेआरडी को विमानन से पूरी तरह से अलग-थलग न किया जाए. उनको एयर इंडिया का चेयरमैन और इंडियन एयरलाइंस का निदेशक बनाया गया था लेकिन इसके बावजूद जेआरडी और नेहरू के बीच संबंध हमेशा के लिए ख़राब हो चुके थे."

नेहरू और टाटा के संदेश

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समाप्त

जवाहरलाल नेहरू ने टाटा को सरकार का रुख़ समझाने की भरपूर कोशिश की थी.

राष्ट्रीयकरण से कुछ महीनों पहले उन्होंने जेआरडी को पत्र लिखा था, "जब तुम दिन के खाने पर आए थे तो मुझे तुम्हारी तकलीफ़ देख कर बहुत दुख हुआ. जहां तक टाटा की बात है, तुम्हें पता है कि इस कंपनी के लिए मेरे मन में कितनी इज़्ज़त है लेकिन तुम्हारे आरोप ने मुझे अचंभे में डाल दिया है कि टाटा को योजनाबद्ध तरीक़े से दबाने की कोशिश की जा रही है.''

''मेरा मानना है कि नीतिगत रूप से यातायात से संबंधित सभी सेवाओं पर सरकार का नियंत्रण होना चाहिए. ये बहुत पहले हो जाता लेकिन हमारे पास इसके लिए पैसे नहीं थे. इस सबके बावजूद हम एयर इंडिया इंटरनेशनल को छूना नहीं चाहते थे.''

''हमने इस पर विचार करने के लिए मंत्रिमंडल की एक समिति बनाई थी. उनकी सिफ़ारिश थी कि राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया से एयर इंडिया इंटरनेशनल को अलग रखना मुश्किल होगा. इस मामले मे हम तुम्हारी मदद चाहते हैं. ये सोचना कि इसके पीछे कोई और मक़सद होगा एक ग़लत सोच है. तुम्हारे जैसे पुराने दोस्त से इस तरह का आभास मिलने ने मुझे बहुत व्यथित किया है."

नेहरू ने ये पत्र 10 नवंबर, 1952 को लिखा था. जैसे ही टाटा को ये पत्र मिला उन्होंने नेहरू को तार से जवाब दिया, "अगर आप ये सोचते हैं कि मैंने अपनी परेशानी में किसी के साथ अन्याय किया है तो मुझे इस बात का दुख है. आपसे साफ़-साफ़ बात करने के पीछे मेरी मंशा यही थी कि मैं आपको यातायात उद्योग में सरकार के फ़ैसलों के बारे में अपनी स्पष्ट राय से अवगत करा सकूं."

इसके नौ महीने बाद सरकार ने सभी निजी एयरलाइंस का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. जहां घनश्याम दास बिड़ला कांग्रेस नेतृत्व के बहुत क़रीब थे, जेआरडी ने जान-बूझकर अपनी कंपनी को कांग्रेस से दूर रखा था.

जेआपडी टाटा का कोट

कई सालों बाद जेआरडी ने एक भाषण में स्वीकार किया था, "आज़ादी से पहले जवाहरलाल नेहरू मेरे हीरो हुआ करते थे. मेरे मन में उनके प्रति प्यार और निष्ठा में आख़िर तक कोई कमी नहीं आई लेकिन जब वह सत्ता में आए तो उनके और मेरे विचारों में फ़र्क साफ़ दिखाई देने लगा.''

''नेहरू को पता था कि उनकी अधिकतर आर्थिक और विदेश नीतियों से मैं सहमत नहीं था. मुझे याद है कि एक बार नेहरू से मेरी तीखी झड़प हुई थी. नेहरू ने मुझसे कहा था कि मुझे 'प्रॉफ़िट' शब्द से नफ़रत है. मैंने जवाब दिया था, 'जवाहरलाल मैं पब्लिक सेक्टर के प्रॉफ़िट कमाने की बात कर रहा था.' इस पर नेहरू ने कहा था, 'मेरे सामने कभी भी 'प्रॉफ़िट' शब्द का इस्तेमाल मत करना. ये एक गंदा शब्द है'."

नेहरू से अपने संबंधों को सुलझाने की बजाय जेआरडी ने अपने-आपको देश की राजनीति से अलग-थलग कर लिया.

सन 1948 में नेहरू ने पेरिस में होने वाले संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में जेआरडी को प्रतिनिधि बनाने की पेशकश की.

उस साल तो जेआरडी ने नेहरू का प्रस्ताव मान लिया लेकिन अगले साल जब नेहरू ने दोबारा टाटा को आमंत्रित किया तो उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया.

उन्होंने नेहरू को लिखे पत्र में कहा, "भारत में ही करने के लिए इतना कुछ है. बाहर जाकर लंबे भाषणों को सुनना समय की बर्बादी है."

जब नेहरू ने उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी इंडियन रेयर अर्थ का अध्यक्ष बनाने की पेशकश की तब भी उन्होंने उनकी पेशकश को स्वीकार नहीं किया.

गीता पीरामल ने लिखा, "यह शायद जेआरडी की दूरदर्शिता नहीं थी. उन्हें इन प्रतिष्ठित प्रस्तावों को अस्वीकार करने के छवि पर पड़ने वाले असर और इससे जाने वाले संकेतों का अंदाज़ा नहीं था. बाद में टाटा ने खुद स्वीकार किया कि ऐसा करके उन्होंने ग़लती तो नहीं कर दी."

टीटी कृष्णामचारी थे टाटा के ख़ैर-ख़्वाह

जेआरडी टाटा जब कराची से पहली बार बंबई विमान उड़ाकर लाए थे तब की तस्वीर में वह अपने छोटे विमान के आगे खड़े दिख रहे हैं. उनके साथ कुछ और लोग भी हैं

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इमेज कैप्शन, टाटा जब कराची से पहली बार बंबई विमान उड़ाकर लाए थे

सन 1953 में एयर इंडिया के राष्ट्रीयकरण के बाद जेआरडी को एक और झटका लगा जब सन 1956 में सरकार ने उनकी कंपनी के बीमा उद्योग का भी राष्ट्रीकरण कर दिया.

उसी साल सरकार ने कुछ ऊर्जा कंपनियों का भी राष्ट्रीयकरण किया लेकिन टाटा की पावर कंपनियों को छोड़ दिया गया.

जब बिहार भूमि सुधार अधिनियम पारित हुआ तो उसमें जमशेदपुर को शामिल नहीं किया गया और टिस्को टाउनशिप टाटा के ही नियंत्रण में रही.

जेआरडी ने टिस्को की क्षमता को दोगुना कर दिया और उनकी कंपनी ट्रक भी बनाने लगी.

नेहरू और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों से जेआरडी को मोहभंग हो जाने के बावजूद नेहरू के मंत्रिमंडल में एक शख़्स की जेआरडी हमेशा इज़्ज़त करते रहे. उनका नाम था टीटी कृष्णामचारी.

नेहरू ने सन 1955 में उन्हें इस्पात मंत्री बनाया था. जेआरडी ने बाद में याद किया, "टीटीके अक्खड़, बदमिजाज़ और अलोकतांत्रिक हो सकते थे लेकिन वह फ़ैसला लेने वाले शख़्स थे. मैंने उन जैसा आज़ाद ख़्याल व्यक्ति नहीं देखा. दूसरे कई मामलों में वह बहुत टेढ़े और दबंग व्यक्ति थे लेकिन उनका ही बूता था कि वह नेहरू मार्का समाजवाद का विरोध कर सकते थे.''

''शायद इसका यह भी कारण रहा हो कि एक समय में वह भी उद्योगपति रहे थे. जब वह इस्पात मंत्री थे तो उन्होंने मुझे बुला कर कहा था मैं चाहता हूँ कि तुम जमशेदपुर में अपना उत्पादन दोगुना कर दो. जब वह उद्योग मंत्री बने तो उन्होंने हमें ट्रक बनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया."

जेआरडी स्वतंत्र पार्टी के पक्ष में उतरे

जेआपडी टाटा का कोट

सन 1961 में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने स्वतंत्र पार्टी बनाने की घोषणा की. उन्होंने जेआरडी से अपील की कि वह उसका समर्थन करें.

टाटा ग्रुप के अंदर मीनू मसानी स्वतंत्र पार्टी के पक्ष में थे जबकि नवल टाटा की सलाह थी कि वह खुलेआम राजाजी का समर्थन न करें क्योंकि हो सकता है कि इससे नेहरू नाराज़ हो जाएं.

जेआरडी ने पूरे दो महीने तक इस प्रस्ताव पर विचार किया. 15 जुलाई को उन्होंने राजाजी को पत्र लिख कर कहा, "हमने भी पाया है कि कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस का एकमात्र विकल्प नहीं है. भारत लोकतंत्र की राह पर तभी चल पाएगा जब यहां एक से ज़्यादा विपक्षी दल हों जो न धुर दक्षिणपंथी हो और न धुर वामपंथी.''

''जेआरडी ने राजाजी को अपने समर्थन का आश्वासन दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि वह कांग्रेस का भी समर्थन करना जारी रखेंगे क्योंकि उसने देश को राजनीतिक स्थायित्व दिया है."

स्वतंत्र पार्टी को समर्थन देने के बारे में टाटा ने इतना समय इसलिए लिया क्योंकि वह पारदर्शिता में विश्वास रखते थे.

जेआरडी ने सोचा कि बेहतर ये होगा कि नेहरू उनके इस फ़ैसले के बारे में किसी दूसरे से सुनने की बजाय ख़ुद उनके मुंह से सुनें. नेहरू ये सुनकर नाराज़ हो गए, उन्होंने जेआरडी को पत्र लिखकर कहा, 'आपको यह करने का कोई हक़ नहीं है.'

जवाहरलाल नेहरू का कोट

आरएम लाला जेआरडी की जीवनी 'बियॉन्ड द लास्ट ब्लू माउंटेन' में लिखते हैं, "जेआरडी यह मानकर चल रहे थे कि नेहरू को उनका ये फ़ैसला पसंद नहीं आएगा लेकिन उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि नेहरू इस हद तक नाराज़ हो जाएंगे.''

''16 अगस्त, 1961 को नेहरू को पत्र लिखकर जेआरडी ने सफ़ाई दी कि स्वतंत्र पार्टी को समर्थन देने का ये मतलब नहीं है कि उन्होंने कांग्रेस को समर्थन देना बंद कर दिया है. हालांकि कांग्रेस और सरकार की आर्थिक नीतियों से मैं सहमत नहीं हूँ. मैं उन कुछ लोगों में से एक हूँ जिनका मानना है कि आज़ादी के बाद जिस तरह हम एक दलीय शासन के अंतर्गत रहे हैं, वह देश के लिए अच्छा नहीं है.''

''किसी एक पार्टी में कांग्रेस का विकल्प बनने की संभावना है तो वह स्वतंत्र पार्टी है. और वैसे भी इस पार्टी में ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा कांग्रेस में बिताया है.''

''हमारे विचारों और मक़सद के बारे में आपके मन में कोई शक-ओ-शुबहा नहीं होना चाहिए. निजी तौर पर आपके प्रति मेरी भावनाओं में कोई फ़र्क़ नहीं आएगा और आपके प्रति मेरी निष्ठा बनी रहेगी. कृपया इस पत्र का जवाब देने की ज़हमत मत उठाइएगा."

लेकिन उसके बावजूद नेहरू ने इस पत्र का जवाब देते हुए लिखा था, "आप जिस तरह चाहें स्वतंत्र पार्टी की मदद करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन मैं नहीं समझता कि स्वतंत्र पार्टी एक मज़बूत विपक्षी पार्टी बनने की आपकी उम्मीदों पर खरी उतरेगी. मैं समझता हूं कि अगले चुनाव के परिणामों के बाद आपको अपने फ़ैसले पर निराशा होगी."

इंदिरा की टाटा के प्रति उदासीनता

जेआरडी टाटा और इंदिरा गांधी एक तस्वीर में साथ दिखाई दे रहे हैं

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इमेज कैप्शन, जेआरडी टाटा ने इमरजेंसी का समर्थन किया था

नेहरू सही थे. सिर्फ़ एक दशक के अंदर स्वतंत्र पार्टी का पतन होना शुरू हो गया. नेहरू की तरह इंदिरा गांधी की भी जेआरडी टाटा से दोस्ती थी लेकिन उन दोनों में आपसी विश्वास का अभाव था.

आरएम लाला लिखते हैं, "जब भी जेआरडी आर्थिक नीतियों पर इंदिरा गांधी से बातचीत करने की कोशिश करते, कुछ मिनटों बाद वह या तो कागज़ पर कोई चित्र बनाने लगतीं या पत्रों के लिफ़ाफ़े खोलने लगतीं.''

''जेआरडी ने मुझे बताया था कि एक बार जब उन्होंने ऐसा किया तो अपने साथ गए शरोख़ साबवाला से फ़ुसफ़ुसाकर इतनी ज़ोर से कहा कि इंदिरा गांधी सुन लें, 'इनको हमारी बातों में दिलचस्पी नहीं हैं. हम इन्हें बोर कर रहे हैं.' इंदिरा गांधी अपनी नज़रें उठा कर बोलीं, 'नहीं, नहीं, मैं बोर नहीं हो रही हूँ. मैं सुन रही हूं'."

लेकिन जेआरडी ने इमरजेंसी का समर्थन किया. एक समाचार पत्र को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "इमरजेंसी से देश में अनुशासन आया है." बहुत से लोगों को टाटा का इंदिरा गांधी को दिया गया सार्वजनिक समर्थन पसंद नहीं आया.

मोरारजी देसाई ने जेआरडी को हटाया

जेआरडी टाटा

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इमेज कैप्शन, 1977 में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने जेआरडी को परमाणु ऊर्जा आयोग से हटा दिया

जब 1977 में कांग्रेस की हार के बाद मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने पहला काम जेआरडी को परमाणु ऊर्जा आयोग से हटाने का किया.

मोरारजी देसाई के एक हस्ताक्षर भर से भारतीय परमाणु कार्यक्रम और टाटा का 1948 से कायम संबंध टूट गया.

टाटा के लिए अगला धक्का था, जब तीन फ़रवरी, 1978 को उन्हीं की इंडियन ट्यूब कंपनी के प्रमुख और पूर्व वायुसेना अध्यक्ष एयर मार्शल पीसी लाल ने उन्हें सूचित किया कि उनसे कहा गया है कि वह एयर इंडिया के अध्यक्ष का कार्यभार संभाल लें.

जेआरडी को अपनी बर्ख़ास्तगी की ख़बर शाम को पौने नौ बजे के आकाशवाणी समाचारों से मिली. एयरलाइंस के प्रबंध निदेशक केजी अप्पूस्वामी और उनके डिप्टी नारी दस्तूर ने विरोधस्वरूप इस्तीफ़ा दे दिया. दोनों एयरलाइंसों के मज़दूर संगठनों ने सरकार के इस फ़ैसले का ज़ोरदार विरोध किया.

सात फ़रवरी को मोरारजी देसाई ने टाटा को पत्र लिखकर कहा, "हमने पीसी लाल को एयर इंडिया का अध्यक्ष बनाने का फ़ैसला किया है. आप पीसी लाल को बहुत अच्छी तरह जानते हैं. मुझे उम्मीद है कि आप हमारे चयन से सहमत होंगे लेकिन मैं आपको बता दूं कि आपको एयर इंडिया के अध्यक्ष पद से हटाने का हमें बहुत दुख है."

टाटा ने पत्र का जवाब देते हुए लिखा, "अभी दो हफ़्ते पहले ही मेरी आपसे मुलाकात हुई थी. हमने बहुत सी बातों पर चर्चा की थी लेकिन आपने इस परिवर्तन का मुझसे ज़िक्र तक नहीं किया."

1992 में मिला भारत रत्न

सन 1992 में जेआरडी टाटा को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया

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इंदिरा गांधी ने सरकार के इस फ़ैसले पर सवाल उठाते हुए जेआरडी को पत्र लिख कर कहा "एयर इंडिया के विकास में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा."

जब इंदिरा गांधी सन 1980 में दोबारा सत्ता में आईं तो जेआरडी उनसे मिलने गए.

उन्होंने इंदिरा से कहा, "यह मेरी समझ के बाहर है कि पूरी ईमानदारी से देश की सेवा करने और सरकार से सहयोग करने के बावजूद लगातार दो सरकारों ने उनके साथ अवांछित व्यक्ति जैसा व्यवहार किया."

उन्होंने उन्हें याद दिलाया कि उनके दादा मोतीलाल नेहरू तक के वह बहुत क़रीबी थे. जवाहरलाल नेहरू से उनकी दोस्ती थी और उनकी मृत्यु के बाद उनका सारा स्नेह इंदिरा गांधी की तरफ़ स्थानांतरित हो गया था जो आज भी बरक़रार है. मुझे इस बात का बहुत दुख है कि उनका मेरे और मेरी कंपनी के प्रति रवैया बेरुख़ी का है.

इंदिरा का जवाब था, "अब ऐसी बात नहीं है."

कुछ ही दिनों बाद जेआरडी टाटा को एक बार फिर एयर इंडिया के बोर्ड का सदस्य बना दिया गया.

सन 1992 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया. उस समय नरसिम्हा राव भारत के प्रधानमंत्री थे.

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