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ओडिशा ट्रेन दुर्घटना: शवगृह के बाहर अपने नाम की गुहार का इंतज़ार करते लोग - आंखों देखी
अमिताभ भट्टासाली
बीबीसी संवाददाता, बालासोर (ओडिशा) से
ओडिशा में बालासोर के ज़िला अस्पताल में शनिवार की दोपहर को जब मैं दाख़िल हुआ तो मैंने लोगों से पूछा कि अस्पताल का शवगृह कहां है?
जब मैं शवगृह की ओर बढ़ रहा था तब मैं पुरुषों, महिलाओं और युवाओं के चेहरों को देख सकता था जो शवगृह के अंदर से आवाज़ आने का इंतज़ार कर रहे थे.
इनमें से कुछ मृतकों की पहचान करने, तो कुछ शवों को घर लेने आए थे.
एक ऐसी आवाज़ के इंतज़ार में ये लोग थे जिसे वो सुनना नहीं चाहते थे, लेकिन वो जानते थे कि इसे टाला भी नहीं जा सकता है.
संतोष कुमार साहू के लिए शुक्रवार की रात आया एक फ़ोन कॉल बहुत अप्रत्याशित था. ये उनके ससुराल से आया था.
उनको ख़बर मिली कि उनके रिश्तेदार उसी बदक़िस्मत शालिमार-चेन्नई कोरोमंडल एक्सप्रेस ट्रेन में सफ़र कर रहे थे जो मालगाड़ी से टकराई थी. ये देश के सबसे भयानक रेल हादसों में से एक है.
'नहीं मिला कोई वाहन'
तीन ट्रेनों के चपेट में आने से यह भीषण हादसा हुआ जिसमें अभी तक 288 लोगों के मरने की पुष्टि हो चुकी है.
साहू कहते हैं, “मेरी पत्नी के भाई बालासोर में काम करते थे और हर वीकेंड जयपुर में अपने घर, पत्नी और दो बेटों से मिलने जाते थे. ये वो बीते कई सालों से कर रहे थे.”
साहू शुक्रवार की रात ख़ुद बालासोर ज़िला अस्पताल पहुंचना चाहते थे लेकिन उन्हें वहां जाने के लिए कोई ट्रांसपोर्ट की सुविधा नहीं मिली. उन्हें शनिवार की सुबह जाकर एक कार मिली जिसकी मदद से वे घटनास्थल पहुंचे. वो अपने रिश्तेदार का शव लेने के लिए शवगृह के बाहर खड़े हुए थे.
हालांकि, आशीष को ट्रांसपोर्ट को लेकर कोई दिक़्क़त नहीं हुई. वो शुक्रवार की रात को आठ बजे ही अस्पताल पहुंच गए थे क्योंकि वो अस्पताल के नज़दीक ही हॉस्टल में रहते थे.
साहू की तरह आशीष को भी अस्पताल से फ़ोन कॉल आया था, लेकिन उन्हें फोन करने के पीछे वजह कुछ अलग थी.
'वॉर्ड तक पहुंच पाना था मुश्किल'
आशीष और 100 से अधिक दूसरे मेडिकल के छात्रों को शुक्रवार की शाम ही आपात स्थिति में अस्पताल बुला लिया गया था.
बालासोर अस्पताल के इमरजेंसी वॉर्ड के सामने हम मेडिकल छात्र आशीष से बात कर रहे थे.
वो कहते हैं, “आप सोच भी नहीं सकते हैं कि 24 घंटों के अंदर यह जगह किस तरह की हो गई है. हम वॉर्ड की तरफ़ जा भी नहीं सकते थे क्योंकि वहां पर बहुत सारे घायल लेटे हुए थे."
"मैं एक घायल का इलाज करता था तो तुरंत दूसरे मरीज़ की तरफ़ से आवाज़ आ जाती थी. सभी छात्रों को ग्रुप में बांटकर अलग-अलग विभागों के सीनियर डॉक्टरों की मदद में लगा दिया गया था.”
पोस्ट ग्रेजुएट ट्रेनी, डॉक्टर, नर्स, वॉलंटियर्स, जो भी उपलब्ध थे, उन्हें कॉल करके या सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए बुला लिया गया था.
बालासोर डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल, एक ज़िला अस्पताल है जिसके कारण उसके पास बहुत सा इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है. ऐसी सूरत में उसके पास बड़ी संख्या में मरीज़ भी संभालने की ताक़त नहीं है.
वॉर्डों में बुनियादी सुविधाओं की कमी साफ नजर आ रही थी. ट्रेन हादसे के पीड़ित लोग फर्श पर पड़े थे. इनमें से कुछ बेहोश थे तो कुछ होश में थे. होश में जो लोग थे वे काफी दर्द में थे.
'होश आया तो मैंने ख़ुद को मलबे के नीचे पाया'
जब मैं अस्पताल के अंदर वॉर्ड में पहुंचा तो हमारी मुलाकात ऋत्विक पात्रा से हुई. वे दुर्घटनाग्रस्त शालीमार-चेन्नई कोरोमंडल एक्सप्रेस से चेन्नई जा रहे थे. बिस्तर पर लेटे ऋत्विक के माथे पर खून से सनी पट्टी और पैर में प्लास्टर लगा हुआ था. वे बेड पर ज़रूर थे लेकिन अन्य पीड़ित फर्श पर पड़े हुए थे.
पात्रा कहते हैं, “मैं बस याद कर सकता था कि एक बड़ा धमाका हुआ और हम पलट गए. हालांकि मैं होश में था. मैं मलबे के नीचे दब गया था. मलबे के नीचे मेरे जैसे और भी कई लोग थे.”
ऋत्विक पात्रा, दक्षिण भारत की यात्रा कर रहे थे तो दूसरी तरफ पंकज पासवान, दक्षिण भारत से अपने घर बिहार जा रहे थे.
पंकज, यशवंतपुर-हावड़ा एक्सप्रेस ये यात्रा कर रहे थे. उन्होंने कहा, “मुझे याद नहीं कि क्या हुआ. मैं खुद मलबे से बाहर आया. बाद मैं मैंने सुना कि हमारी ट्रेन, मालगाड़ी के साथ टकरा गई है.”
हमें जानकारी मिली कि कोरोमंडल एक्सप्रेस ट्रेन के कुछ डिब्बे अनारक्षित थे. जब किसी व्यक्ति को ऑन स्पॉट कहीं की यात्रा करनी होती है तो उन्हें इसी तरह के अनारक्षित डिब्बों में जगह मिलती है.
ओडिशा ट्रेन दुर्घटना: बालासोर में कैसे हुआ ट्रेन हादसा, किस ट्रेन ने किसे टक्कर मारी? - प्रेस रिव्यू
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04 जून 2023 दोपहर तक के बचाव कार्य का लेखा-जोखा
- हादसे की जगह से सभी घायलों और फंसे हुए लोगों के निकालने का काम पूरा हो चुका है.
- एनडीआरएफ़ की 9 टीमें, ओडीआरएफ़ की 5 टीमें, फ़ायर सर्विस की 24 टीमें बचाव कार्य में जुटी हुई हैं.
- रात में काम न रुके इसके लिए रात में भी टावर लाइट की व्यवस्था की गई है.
- ज़रूरी दवाओं के साथ 100 मेडिकल और पैरा-मेडिकल टीमें मौक़े पर तैनात हैं.
- मृतकों और घायलों को अस्पताल लाने के लिए 200 एंबुलेंस को काम पर लगाया गया है.
- अलग-अलग स्टेशनों पर फंसे लोगों के लिए खान और पीने के पानी की व्यवस्था की गई है.
- फंसे लोगों की मदद के लिए 30 बसों की व्यवस्था की गई है.
- 1175 घायलों को सोरो, बालासोर, भद्रक और कटक के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है. सरकारी और निजी अस्पतालों में इनका मुफ्त इलाज किया जा रहा है.
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आम लोगों ने भी बढ़ाया मदद का हाथ
इन डिब्बों में यात्रा करने वालों के नाम और उनका जानकारी रेलवे रिकॉर्ड में दर्ज नहीं की जाती. यही मुख्य वजह है कि 160 से ज्यादा लावारिस पड़े शवों की पहचान नहीं हो पाई है.
हादसे के वक्त घटनाओं का क्रम जो भी रहा हो लेकिन सभी को यकीन था कि बालासोर ज़िला अस्पताल में इतने मरीज़ों को संभालने के लिए बुनियादी ढांचा नहीं है.
ऐसे में पीड़ितों को बड़े और बेहतर सुविधाओं वाले अस्पतालों में शिफ्ट करने का फैसला लिया गया.
एनजीओ कार्यकर्ता समीर जठानिया शुक्रवार को ट्रेन दुर्घटना के बाद से अस्पताल में मरीजों की मदद कर रहे हैं.
वे कहते हैं, “गंभीर रूप से घायल मरीज़ों को शिफ्ट करने का फैसला बहुत अच्छा है. इस अस्पताल में इतनी मरीज़ों को इलाज देने के लिए बुनियादी ढांचा नहीं है.”
जठानिया ने बताया, “जैसे ही हमें हादसे के बारे में पता चला, आम लोग मदद के लिए आगे आने लगे. शुरुआत में हर तरफ अफरा-तफरी मची हुई थी. एक के बाद एक एंबुलेंस मरीज़ों को लेकर जा रही थी. पीड़ितों के रिश्तेदार इधर-उधर भाग रहे थे."
"कुछ ही घंटों के अंदर मदद करने के लिए वालंटियर आ गए थे. उन्होंने घायलों को खाने का सामान और पानी देना शुरू कर दिया. हम लोग दवाएं बांटने का काम कर रहे थे. करीब 300 लोग रक्तदान करने के लिए लाइन में खड़े थे.”
शनिवार, सुबह तीन बजे तक मरीजों को दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट करने का काम शुरू हो गया था.
मेडिकल छात्र आशीष और एनजीओ कार्यकर्ता समीर जठानिया ने कहा कि घायलों को कटक, भुवनेश्वर और कोलकाता भेजने का फैसला अच्छा था, क्योंकि इस अस्पताल में इलाज संभव नहीं था.
हालांकि गंभीर रूप से घायल मरीज़ों को बेहतर अस्पतालों में शिफ्ट कर दिया गया था लेकिन वीवीआईपी लोगों के आना का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है.
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