दुनिया के 10 सबसे ज़हरीले और ख़तरनाक सांप कौन से?

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- Author, भरत शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के मुताबिक सांपों के काटने से हर साल दुनिया में 81,410 से लेकर 1,37,880 लोग मारे जाते हैं.
इसके अलावा साल 2000 से 2019 के बीच भारत में सांपों के काटने से 12 लाख लोगों की मौत हुई. औसत के हिसाब से हर साल 58,000.
हर साल दुनिया भर में सांप काटने की 50 लाख घटनाएं होती हैं. 4 लाख मामलों में शरीर का कोई हिस्सा काटना पड़ता है या परमानेंट डिसएबिलिटी होती है.
ये सारे आंकड़े डरावने हैं. हैं ना? और इन सबकी वजह है एक- सांप.
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दुनिया की कई सभ्यताओं और संस्कृतियों में सांप एक अहम किरदार है. कुछ समाज इसे पूजते हैं, कुछ इससे डरते हैं.
कुछ वाक़ई में बेहद ख़तरनाक होते हैं और कुछ आपको किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुँचा सकते.
कुछ नूडल्स जितने पतले होते हैं, कुछ इतने लंबे होते हैं कि जिराफ़ के कद को पीछे छोड़ दें और पूरी बकरी या सुअर निगल जाएं.
बीबीसी अर्थ में सोफ़िया क्वाग्लिया लिखती हैं कि ऐसा माना जाता है कि क़रीब 17 करोड़ साल पहले सांप, प्राचीन छिपकलियों से अलग हुए और फिर उन्होंने अपने पैर गंवा दिए.
जेनेटिक रिसर्च बताती है कि सांप के वास्तविक पूर्वज लंबी, पतली छिपकली रही होगी, जिसके पीछे छोटे पैर और उंगलियां भी थीं. ये जानवर लॉरेशिया के गर्म जंगलों में रहा करता था. ये वही महाद्वीप है, जो आज उत्तरी अमेरिका, ग्रीनलैंड, यूरोप और एशिया में बंटा हुआ है.
दुनिया भर में सांपों की क़रीब 3900 प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन इनमें से केवल 725 ही ज़हरीली होती हैं. और इनमें से 250 प्रजातियां ऐसी हैं, जिनके सांप एक बार काटने से इंसान की जान ले सकते हैं. जो सांप ज़हरीले नहीं होते, वो भी इंसानों की जान ले सकते हैं, लेकिन ऐसे मामले विरले ही होते हैं. सालाना एक या दो मौतें. मसलन, पाइथन जो अपने शिकार के चारों ओर लिपटकर उसका दम घोंटकर मार सकता है.
दुनिया के सबसे ख़तरनाक 10 सांप

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जब हम ज़हरीले सांपों की बात करते हैं तो इसके दो अर्थ हो सकते हैं.
पहला, वो सांप जो सबसे ज़्यादा इंसानों को मारता है, या फिर वो सांप जो सबसे ज़्यादा टॉक्सिक है, यानी जो सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है. ये दोनों बातें अलग-अलग हैं.
मुमकिन है कि सबसे ज़्यादा ज़हरीला या मारक ज़हर रखने वाला सांप इंसानों के क़रीब या बीच ना रहता हो या फिर आक्रामक ना हो.
मौतों के अलावा सांप काटने से टिश्यू नेक्रोसिस जैसे ज़ख़्म भी होते हैं, जिसमें शरीर का कोई हिस्सा काटकर अलग करना पड़ता है. एनिमल बिहेवियर रिसर्चर और साइंस राइटर लियोमा विलियम्स बीबीसी वाइल्डलाइफ़ मैगज़ीन डिस्कवर वाइल्डलाइफ़ में दुनिया के दस सबसे ख़तरनाक और ज़हरीले सांपों की सूची कुछ इस तरह बताती हैं:
1. सॉ-स्कैल्ड वाइपर

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सॉ स्कैल्ड वाइपर मिडल ईस्ट और मध्य एशिया में पाया जाने वाला सांप है और ये काफ़ी आक्रामक होता है.
सालाना सबसे ज़्यादा लोगों को मारने के लिए ज़िम्मेदार माने जाने वाला ये सांप घनी आबादी वाले इलाकों में मिलता है, जिसकी वजह से ये इंसानों के लिए ज़्यादा ख़तरनाक हो जाता है.
भारत में ये सांप हर साल क़रीब पांच हज़ार मौतों की वजह बनता है.
2. इनलैंड टाइपन

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जब बात सबसे ज़्यादा ज़हरीले सांप की आती है, तो इनलैंड टाइपन सबसे आगे है. मध्य एशिया और ऑस्ट्रेलिया में मिलने वाला ये सांप ख़ासकर चूहों का शिकार करता है.
ऐसा कहा जाता है कि इस सांप के एक बार काटने से सौ इंसानों की जान जा सकती है. हालांकि सॉ स्कैल्ड वाइपर की तरह ये मौतों के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
ऐसा इसलिए, क्योंकि ये इंसानी बस्तियों से दूर दूरदराज के इलाकों और ज़मीन के नीचे ज़्यादा रहता है.
3. ब्लैक माम्बा

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ब्लैक माम्बा ऐसा सांप है, जिसके आगे जंगल का राजा शेर भी हार मान जाता है. सब-सहारा अफ्रीका में मिलने वाला ये सांप टाइपन से अलग बहुत ज़्यादा आक्रामक होता है.
आम तौर पर इंसानों से दूर रहने वाला ये सांप ख़तरा महसूस होने पर ऊंचा उठता है, और बिजली की गति से अटैक करता है. इलाज ना मिलने पर इसके काटने के आधे घंटे में इंसान की मौत हो सकती है.
4. रसल वाइपर

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इंडियन कोबरा, कॉमन क्रेट और सॉ स्कैल्ड वाइपर के साथ मिलकर रसल वाइपर 'बिग फोर' बनाते हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे ज़्यादा मौतों के लिए यही चार सांप ज़िम्मेदार हैं.
रसल वाइपर जब काटता है तो भीषण दर्द होता है. इसे काफ़ी आक्रामक और तेज़-तर्रार बताया जाता है. भारत में सांप काटने की 43% घटनाओं के पीछे यही सांप होता है.
5. कॉमन करैत

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बिग फोर का सदस्य ये सांप काफ़ी ज़हरीला है और इसके काटने पर मरने के चांस 80% होते हैं.
इसके ज़हर में ऐसे न्यूरोटॉक्सिन होते हैं, जो मसल्स पैरालाइसिस, रेस्पिरेटरी फेलियर और मौत तक की वजह बन सकते हैं.
ये दूसरे सांप, चूहे और मेंढक खाता है. इंसानों से इस सांप का आमना-सामना कम ही होता है लेकिन अंधेरे में इस पर पैर रखा तो ये ज़रूर अटैक करता है.
6. इंडियन कोबरा

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भारत में जो सांप सबसे ख़तरनाक माने जाते हैं, उनमें इंडियन कोबरा भी शामिल है. भारत में पहले सपेरे इसी सांप को लेकर गली-गली में लेकर घूमा करते थे.
ये सांप ज़हरीला भी होता है और आक्रामक भी. साथ ही ये इंसानी बस्तियों में या क़रीब ही रहता है क्योंकि इसका मुख्य शिकार चूहा है, जो इन्हीं बस्तियों में ज़्यादा मिलता है. इसलिए इंसानों से इसका सामना ख़ूब होता है.
7. पफ़ एडर

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भारतीय उपमहाद्वीप से दूर अफ्रीका में बड़ा और डरावना पफ़ एडर मिलता है. वाइपर प्रजाति से आने वाला ये सांप दूसरे सभी अफ्रीकी सांपों की तुलना में सबसे ज़्यादा जान लेता है.
डराने पर ये भागने के बजाय सामना करता है. और अक्सर वहीं आराम करता मिलता है, जहां से लोग गुज़रते हैं.
ये अटैक करने से पहले चेतावनी भी देता है. अपने शरीर को फुलाता है और हिस की आवाज़ निकालता है.
8. कॉमन डेथ एडर

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ये सांप ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में पाया जाता है. ये ख़ुद को पत्तियों के बीच छिपा लेता है और शिकार आने पर हमला करता है.
ऐसे में ख़ास तौर पर उन इंसानों के लिए ख़तरनाक हो जाता है, जो गलती से ऐसे इलाकों में घूमते समय इस पर पैर रख देते हैं. इसका ज़हर जान के लिए काफ़ी है और 60% मामलों में मौत हो जाती है.
9. किंग कोबरा

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चार मीटर की औसत लंबाई वाला ये सांप 5.85 मीटर का रिकॉर्ड बना चुका है. इंडियन कोबरा की तरह किंग कोबरा की भारतीय उपमहाद्वीप में ख़ासी सांस्कृतिक अहमियत है.
इंसान इसके इलाकों पर अतिक्रमण कर रहा है और पारंपरिक चीनी दवाओं में इस्तेमाल की वजह से इसका शिकार भी होता है. भारत में किंग कोबरा मारने पर क़ैद की सज़ा का प्रावधान है.
10. ईस्टर्न डायमंडबैक रैटलस्नैक

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ये उत्तरी अमेरिका का सबसे ख़तरनाक सांप है. हालांकि, एशिया के सांपों की तुलना में ये कम ख़तरनाक लगता है और हर साल अमेरिका में पांच लोगों की जान लेने की वजह बनता है.
ये काफ़ी बड़ा और वज़नदार सांप है. इसका वज़न 15 किलोग्राम से ज़्यादा हो सकता है. इसके ज़हर में हेमोटॉक्सिन होता है, जो रेड ब्लड सेल्स पर अटैक करता है.
इन दस के अलावा टाइगर स्नैक, कोस्टल टाइपन और ईस्टर्न ब्राउन स्नैक को ख़तरनाक सांपों में गिना जाता है.
सांपों का ज़हर अलग-अलग होता है?

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सांपों में दो तरह का ज़हर पाया जाता है. न्यूरोटॉक्सिक ज़हर शरीर के नर्वस सिस्टम पर असर डालता है जिससे पैरालाइसिस हो सकता है, जबकि हेमोटॉक्सिक ज़हर सर्कुलेटरी सिस्टम पर हमला करता है, जिससे ब्लड पर असर पड़ता है और टिश्यू डैमेज होता है.
कोबरा, माम्बा और करैत न्यूरोटॉक्सिक ज़हर रखते हैं, जबकि रैटलस्नैक और एडर जैसे वाइपर सांपों में हेमोटॉक्सिक ज़हर पाया जाता है. हालांकि, कुछ अपवाद भी होते हैं और कुछ सांपों के ज़हर शरीर पर मिश्रित असर भी करते हैं. कुछ वाइपर सांपों में न्यूरोटॉक्सिक ज़हर के कम्पोनेंट मिलते हैं, जबकि दूसरे सांपों में मिक्स्ड वेनम हो सकता है.
अब सवाल उठता है कि भारत में सांप काटने से इतनी ज़्यादा मौत क्यों होती हैं, इसके जवाब में स्नेकबाइट हीलिंग एंड एजुकेशन सोसाइटी की प्रेसिडेंट और फाउंडर प्रियंका कदम बताती हैं कि भारत में बायोडाइवर्सिटी बहुत समृद्ध है और इंसान की आबादी भी ज़्यादा है, ऐसे में सांपों के काटने से मौतें भी सबसे ज़्यादा यहीं होती हैं.
प्रियंका ने बीबीसी को बताया, "वाइपर प्रजाति का ज़हर हेमोटॉक्सिक होता है, जो ख़ून पर असर करता है. इससे ख़ून पतला हो जाता है, इंटरनल ब्लीडिंग होती है, इसे इंटरनल हेमरेज कहते हैं. ब्लड कैपलरी फटने लगती है. किडनी पर असर होता है. वाइपर की बाइट से इंसान तुरंत नहीं मरता, लेकिन उसकी वजह से जटिलताएं कहीं ज़्यादा होंगी. हेमोटॉक्सिक ज़हर शरीर में जाने पर इंसान बच सकता है, लेकिन किडनी ख़राब हो सकती है, इंटरनल दिक्कतें हो सकती हैं, ऑर्गन पर असर पड़ सकता है."
उन्होंने बताया कि इनके अलावा करैत और कोबरा जैसे सांपों में न्यूरोटॉक्सिक ज़हर होता है. ये ज़हर नर्वस सिस्टम पर असर डालता है, जिसके बाद मसल्स काम करना बंद कर देती हैं. न्यूरोलॉजिकल सिस्टम को पैरालाइज़ करने वाला ये ज़हर इस कदर मार करता है कि इंसान के लिए सांस लेना नामुमकिन हो जाता है.
यही वजह है कि ऐसे सांपों के काटने पर अगर इलाज जल्द ना मिला तो मौत की आशंका कहीं ज़्यादा होती है.
क्या एंटी वेनम ना होना भी बड़ी दिक्कत है, इस पर प्रिंयका कदम का कहना है कि भारत में एंटी वेनम भी बिग फोर को फोकस करते हुए तैयार किए जाते हैं, जबकि हमारे देश में, ख़ास तौर से नॉर्थ ईस्ट में अलग-अलग तरह के सांप मिलते हैं, बंगाल में ग्रेटर ब्लैक क्रेट, लेसर ब्लैक क्रेट, जैसे दूसरी प्रजातियों के सांप भी हैं. लेकिन जब ये काटते हैं तो सही समय पर सही एंटी वेनम उपलब्ध नहीं होता, जिससे जान जाने का ख़तरा कहीं ज़्यादा बढ़ जाता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















