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लोकसभा चुनाव 2024: भागलपुर में क्या 40 साल बाद एक बार फिर जीत पाएगी कांग्रेस -ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भागलपुर, बिहार से
भागलपुर दंगों और 'मंडल' की राजनीति के उभार के बाद में बिहार में कांग्रेस के कमज़ोर पड़ने की शुरुआत हुई थी. लेकिन चार दशक बाद कांग्रेस इस सीट को फिर से जीतने की उम्मीद लगा रही है.
इस बार कांग्रेस नए दाँव आज़माती हुई दिख रही है. इस वजह से भागलपुर लोकसभा सीट पर चुनावी मुक़ाबला काफ़ी रोचक हो गया है.
भागलपुर के चुनावी रण में एक तरफ़ मौजूदा सांसद अजय मंडल हैं और दूसरी तरफ भागलपुर विधानसभा सीट के विधायक अजीत शर्मा.
पहली नज़र में ये मुक़ाबला मौजूदा सांसद और नगर सीट के एक विधायक के बीच में होता दिखता है. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि 40 साल बाद कांग्रेस इस सीट पर फिर से चुनावी जीत की रेस में है.
हालाँकि उसके लिए ये लड़ाई आसान नहीं मानी जा रही है. एनडीए ने इस सीट पर जेडीयू के मौजूदा सांसद अजय मंडल को एक बार फिर से चुनाव मैदान में उतारा है, जबकि विपक्ष की तरफ से कांग्रेस के अजीत शर्मा को टिकट दिया गया है.
अजीत शर्मा लगातार तीन बार से भागलपुर विधानसभा सीट से जीतते आ रहे हैं. माना जा रहा था इस सीट से अजीत शर्मा की बेटी नेहा शर्मा चुनाव लड़ सकती हैं.
नेहा शर्मा फ़िल्म अभिनेत्री हैं और पिछले विधानसभा चुनावों में अपने पिता के लिए चुनाव प्रचार भी किया था.
अजीत शर्मा ने बीबीसी को बताया, "मैं भी चाहता था कि मेरी बेटी चुनाव लड़े लेकिन इसके लिए उसे पाँच-छह महीने पहले पहल करनी थी. वो बॉलीवुड में अभिनेत्री है, फ़िल्में करती है. वो मेरे चुनाव प्रचार में आएगी."
क्या हैं भागलपुर के बड़े मुद्दे
ट्रैफिक जाम एक ऐसी समस्या है जिसे शहर के बहुत से लोग पीड़ित लगते हैं. उनकी राय में शहर में हर तरफ़ लगने वाला ट्रैफिक जाम यहां की सबसे बड़ी प्रॉबल्म है.
भागलपुर से प्राचीन विक्रमशिला विश्वविद्यालय के अवशेष देखने जाना हो या सुल्तानजंग की तरफ आना हो या फिर शहर से बाहर जाने वाली सड़कें हों, ज़्यादातर जगहों पर उबड़-खाबड़ है.
यहाँ सड़कों पर कई जगह निर्माण का काम चल रहा है. जिसकी वजह से शहर से बाहर की तरफ़ जाना एक बड़ी चुनौती लगता है.
स्थानीय निवासी अमित कौशिक कहते हैं, "भागलपुर बिहार सरकार का सौतेला बेटा नज़र आता है. यह लगातार पिछड़ता जा रहा है. नालंदा विश्वविद्यालय फिर से बन गया, विक्रमशिला फिर से क्यों नहीं बन सकता. आप बिहार के मुख्यमंत्री के इलाक़े की सड़क देखिए और यहाँ की सड़क देखिए."
आज के दौर में भागलपुर की सबसे बड़ी पहचान यहाँ का सिल्क उद्योग है. यहाँ के क़रीब 25 हज़ार परिवार सिल्क उद्योग से जुड़े कारोबार में हैं.
मधुबनी चित्रकला से लेकर आधुनिक मांग के मुताबिक़ कपड़े तैयार करने में भागलपुर के बुनकरों की ख़ासियत मानी जाती है.
भागलपुरी सिल्क की चादरों से लेकर साड़ियां, दुपट्टे, शॉल, कुर्ते, स्कार्फ और बाक़ी कपड़ों के शौकीन भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में मौजूद हैं.
यहाँ का सिल्क उद्योग दशकों से बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है. हमने भागलपुर के नाथनगर में कुछ बुनकरों से बात करने की भी कोशिश की.
मोहम्मद उबैदुल्ला ऐसे ही एक बुनकर हैं जो पहले कारीगरों से काम कराते थे, लेकिन अब ख़ुद ही मशीन चलाते हैं.
उनका कहना है, "पहले जिस साड़ी बनाने की मज़दूरी 150 रुपये थी, अब चालीस रुपये मिलते हैं. हमारे बिजली के बिल में राहत मिली है और तीन-चार हिस्से में एक हिस्सा चुकाना होता है. लेकिन बड़ी समस्या कच्चे माल और तैयार माल के लिए बाज़ार की है. हमें कच्चा माल आसानी से मिल जाए और हमारा माल बिक जाए."
भागलपुर की सांप्रदायिक हिंसा
माना जाता है कि भागलपुर के सिल्क उद्योग को सबसे बड़ा नुक़सान साल 1989 में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद हुआ है.
अर्थव्यवस्था के अलावा इस हिंसा ने शहर के सारे सामाजिक और राजनीतिक समीकरण भी बदल दिए.
भागलपुर हिंसा के बाद कांग्रेस कभी इस सीट को वापस जीत नहीं पाई जबकि यह कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था.
कांग्रेस नेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आज़ाद इस सीट से पाँच बार सांसद रह चुके थे.
साल 1984 में भागवत झा आज़ाद इस सीट से कांग्रेस के लिए अंतिम बार चुनाव जीते.
भागलपुर में अक्टूबर 1989 में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी और नवंबर में हुए लोकसभा चुनावों में उनको जनता दल के चुनचुन प्रसाद यादव भारी अंतर से हरा दिया था.
उसके बाद से कांग्रेस इस सीट को फिर कभी जीत नहीं पाई.
कौन हैं अजीत शर्मा
कांग्रेस ने भागलपुर सीट से इस बार शहर के मौजूदा विधायक अजीत शर्मा को टिकट दिया है.
अजीत शर्मा की गिनती शहर के बड़े व्यवसायियों में होती है. अजीत शर्मा भूमिहार बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं.
अजीत शर्मा दावा करते हैं, "भागलपुर ज़िले में आदरणीय मोदी जी ने कोई काम नहीं किया है. न एयरपोर्ट बना न बुनकरों की हालत सुधरी."
"मोदी जी ने कहा था दो करोड़ नौकरी देंगे. कहाँ है दस साल में बीस करोड़ नौकरी. 400 पार बोलने से जीत नहीं होती है, जनता वोट देती है तब होती है."
क्या कहते हैं आँकड़े
भागलपुर लोकसभा क्षेत्र में क़रीब 20 लाख़ वोटर हैं. माना जाता है कि यहाँ क़रीब पांच लाख़ सवर्ण और वैश्य वोटर हैं. इसके अलावा दो लाख़ महादलित, जबकि तीन लाख कोइरी, कुर्मी और धानुक वोटर हैं.
वहीं, इस सीट पर क़रीब चाढ़े चार लाख मुस्लिम और तीन लाख यादव वोटर हैं. वोटों से इसी समीकरण में कांग्रेस के हाथ से निकलने के बाद इस सीट पर जनता दल, कम्युनिस्ट पार्टी, बीजेपी और जेडीयू हर किसी को जीत मिल चुकी है.
भागलपुर सीट से ही बीजेपी के शाहनवाज़ हुसैन और सुशील मोदी भी सांसद रहे हैं.
सांसद अजय मंडल दावा करते हैं, "मेरे क्षेत्र में जनता का जो भी आदेश हुआ है वो सारा काम कराने का प्रयास मैंने किया है. मुझे लगता है कि जो भी बड़े काम यहाँ होने थे सब हो गया है या उस पर काम चल रहा है. इस सीट पर कोई टक्कर नहीं है, जनता जानती है कि मोदी जी ने और हमारे मुख्यमंत्री जी ने क्या किया है."
बिहार में साल 2020 में हुए विधानसभा चुनावों के लिहाज से बात करें तो भागलपुर की 6 विधानसभा सीटों में 3 पर बीजेपी का कब्ज़ा है. जबकि जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के पास एक-एक सीट है.
इस तरह से नीतीश के एनडीए में वापस जाने के बाद एनडीए के वोटों का समीकरण काफ़ी मज़बूत नज़र आता है. लेकिन एनडीए के साथ एंटी इनकंबेंसी का फ़ैक्टर भी हो सकता है, जो कांग्रेस उम्मीदवार के साथ नहीं होगा.
आँकड़े यह भी बताते हैं कि इस सीट पर जेडीयू के उम्मीदवार की जीत के लिए बीजेपी के वोटरों और समर्थकों का वोट काफ़ी अहम हो सकता है.
माना जाता है कि अगड़ी जातियों का बड़ा समर्थन बीजेपी को हासिल है और इसी वोट में सेंध लगाने के लिए कांग्रेस ने इस बार अजीत शर्मा को टिकट दिया है.
वहीं, अजीत शर्मा की बेटी नेहा शर्मा भी यहाँ चुनाव प्रचार के लिए आने वाली हैं. यानी इस सीट पर विधायक और सांसद की लड़ाई में फ़िल्मी चेहरे के कूदने की भी संभावना है, जो इस मुक़ाबले को और रोचक बना सकता है.
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)
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