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बदलेगी भागलपुर की मंजूषा कला की तक़दीर!
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिहार की मधुबनी पेंटिंग को दुनिया भर में पहचान मिल चुकी है लेकिन मंजूषा कला अभी यह मक़ाम हासिल नहीं कर पाई है.
बीते कुछ समय से प्रशासन और भागलपुर शहर के कुछ प्रमुख मंजूषा चित्रकार इसे लोकप्रिय बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं. चित्रकारों की मांग पर ज़िला प्रशासन ने ऐतिहासिक 'सिल्क सिटी' की प्रमुख इमारतों को इस पेंटिंग से सजाया है. इनमें ज़िलाधिकारी कार्यालय, सर्किट हाउस जैसे शहर के कुछ प्रमुख सरकारी भवन शामिल हैं.
शहर स्थित हेलिपैड, पार्क सैंडिस कंपाउंड और शहर के बग़ल से गुज़रने वाली गंगा नदी पर बने विक्रमशिला सेतु को भी इस चित्रकला से सजाया गया है. जुलाई-अगस्त में प्रसिद्ध श्रावणी मेले के दौरान धार्मिक क़स्बे सुल्तानगंज में भी प्रशासन ने इस चित्रकारी को प्रमोट किया था. प्रशासनिक स्तर पर इसे आगे बढ़ाने में भागलपुर के सदर एसडीओ कुमार अनुज की अहम भूमिक मानी जाती है. कुमार अनुज कहते हैं कि शायद यह दुनिया का पहला कथाचित्र है.
ज़िला प्रशासन की तैयारी इस चित्रकला के लिए स्थानीय स्तर पर ही बाज़ार उपलब्ध कराने की भी है. कुमार अनुज के मुताबिक स्थानीय बाज़ार समिति में मंजूषा हाट तैयार किया गया है जहां इस पेंटिंग पर आधारित तैयार चीज़ों की मार्केटिंग का इंतज़ाम किया जाएगा.
दूसरी ओर चित्रकार भी अब इसके विस्तार के लिए परंपरा तोड़ कर आगे भी बढ़ रहे हैं. वे 'बिहुला-विषहरी' की लोक गाथा से अलग दूसरे विषयों को भी इस शैली के ज़रिए चित्रित कर रहे हैं. भागलपुर स्थित आर्ट कॉलेज कला केंद्र के प्रिंसिपल रामलखन सिंह उर्फ़ गुरुजी ने हाल के दिनों में इस पेंटिंग के ज़रिए महात्मा गांधी, रानी लक्ष्मीबाई, मनरेगा कार्यस्थल जैसे पात्रों और विषयों को चित्रित किया है.
चित्रकार राहुल का कहना है कि इस चित्रकला फलने-फूलने के लिए ज़रूरी है कि बिहुला-विषहरी' की लोकगाथा के अलावा अंग क्षेत्र की जीवनशैली, संस्कृति और मान्यताओं को इस चित्र शैली में जोड़ा जाए. ऐसा करने से इस चित्रकला का प्रवाह बना रहेगा.
कुछ चित्रकार इसे परिधानों पर भी उतार रहे हैं. चित्रकार मनोज कुमार पंडित कहते हैं, ''मुझे लगा कि लोग जब माइकल जैक्सन की तस्वीर वाले, ड्रैगन छपे कपड़े पहन सकते हैं तो कपड़ों पर 'बिहुला-विषहरी' की लोक गाथा पर आधारित डिज़ायन को पहनना भी पसंद करेंगे. इसके बाद मैंने इसे कपड़ों पर उतारना शुरू किया. आज लोग इसे धीरे-धीरे पसंद कर रहे हैं.''
दिवंगत चक्रवती देवी इस लोककला की वरिष्ठ चित्रकार मानी जाती हैं. एक ओर जहां अब धीरे-धीरे इस लोककला का फैलाव हो रहा है, चित्रकार इसे नए-नए कैनवस पर उतार रहे हैं. वहीं चक्रवती देवी का परिवार अब भी केवल इस लोककथा पर आधरित पारंपरिक मंजूषा बनाने का ही काम कर रहा है.
इस मंजूषा का इस्तेमाल पूजा-अनुष्ठान में होता है. चक्रवती देवी के पोते रवींद्र प्रसाद मालाकार के मुताबिक़ उनकी या उनके बच्चों की ज्यादा रुचि इस चित्रकला में नहीं है.
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