दुनिया की सबसे तेज़ अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत का रुपया दबाव में, क्या हैं संकेत?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत सरकार ने हाल ही में बताया है कि वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी दर 8.2 प्रतिशत रही है.
एक तरफ़ भारत के आर्थिक विकास के ये आँकड़े हैं और दूसरी तरफ़ भारतीय रुपये में लगातार गिरावट जारी है. एक अमेरिकी डॉलर का भाव तकरीबन 90 रुपए पहुँचने ही वाला है.
सोमवार, 1 दिसंबर 2025 को भारतीय रुपया हल्की गिरावट के साथ डॉलर के मुक़ाबले 89.63 के स्तर पर था.
पिछले वित्तीय वर्ष में डॉलर के मुक़ाबले रुपए का निचला स्तर 84.22 रुपये प्रति डॉलर था, जबकि पाँच साल पहले जनवरी 2021 में रुपया डॉलर के मुक़ाबले 72 रुपए प्रति डॉलर के आसपास था.
पिछले पाँच साल से अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले भारतीय रुपया लगातार गिर रहा है जबकि इस दौरान भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर ठीक-ठाक और दुनिया के कई देशों के मुक़ाबले 'बेहतर' रही है.
पिछले दिनों जब भारत ने साल 2030 में अपना अनुमानित सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 7.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर बताया, तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने भारत की जीडीपी और नेशनल अकाउंट्स यानी आँकड़ों को 'सी' रेटिंग देकर भारतीय आँकड़ों की गुणवत्ता पर ही सवाल उठा दिए.
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बता दें कि आईएमएफ़ चार श्रेणियों में डेटा को विभाजित करता है. सी ग्रेड का मतलब है कि डेटा में कुछ कमियाँ हैं, जो निगरानी की प्रक्रिया को कुछ हद तक प्रभावित करती हैं.
26 नवंबर को जारी एक रिपोर्ट में आईएमएफ़ ने भारत को 'सी ग्रेड' दिया.
विश्लेषक इसे लेकर हैरान भी हैं कि 8.2 प्रतिशत की विकास दर का आँकड़ा आने के बाद भी शेयर बाज़ार में वो गर्मजोशी नहीं दिखाई दी, जिसकी उम्मीद की जा रही थी.
वहीं रुपए में कमज़ोरी का दौर जारी रहा.
रुपए में गिरावट का क्या असर?

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वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय रुपया डॉलर के मुक़ाबले 6.19 प्रतिशत गिर चुका है, जबकि पिछले एक महीने में ही यह गिरावट 1.35 प्रतिशत की रही है.
हाल के दिनों में रुपए में डॉलर के मुक़ाबले सबसे तेज़ गिरावट आई है. इस लिहाज़ से रुपया एशिया की सबसे कमज़ोर मुद्रा बन गया है.
जेएनयू में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का मानना है कि रुपए का कमज़ोर होना दर्शा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की साख कमज़ोर हो रही है.
व्यापार घाटा, विदेशी निवेश का बाहर जाना (आँकड़ों के मुताबिक़ 16 अरब डॉलर से अधिक का इक्विटी आउटफ़्लो) और अमेरिका-भारत व्यापार समझौते में देरी इसके कारण हैं.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, "रुपए की गिरावट भारत की अंतरराष्ट्रीय साख और आर्थिक स्थिति का संकेत है, जो निर्यात-आयात, पूँजी प्रवाह और अमेरिकी टैरिफ़ से प्रभावित होती है. ट्रंप के ऊँचे टैरिफ़ ने हमारे निर्यात को नुक़सान पहुँचाया है, जिससे करंट अकाउंट ख़राब हो रहा है और एफ़डीआई बाहर जा रहा है. ये सब मिलकर रुपए को कमज़ोर कर देते हैं."
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ाइनेंस की अर्थशास्त्री यामिनी अग्रवाल मानती हैं कि भारत की जीडीपी ग्रोथ और रुपए के कमज़ोर होने को एक साथ देखना सही आकलन नहीं है.

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यामिनी कहती हैं, "डॉलर के मुक़ाबले रुपए की क़ीमत अंतरराष्ट्रीय डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है. यह दिसंबर का महीना है और इस समय बैलेंस शीट को देखा जाता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह समय क्लोज़िंग का होता है. ऐसे में भारत में बहुत से विदेशी निवेशक और अन्य निवेशक मुनाफ़ा वसूली कर रहे हैं ताक़ि वे अपने देश में अपनी बैलेंस शीट को मज़बूत दिखा सके. इस महीने में ख़रीद फ़रोख़्त बहुत होती है, जिसका भी असर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में रुपए की क़ीमत पर दिख रहा है."
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं कि रुपए के कमज़ोर होने का असर भारत में घरेलू बाज़ार पर भी हो सकता है, "यह चिंता की बात इसलिए भी है क्योंकि रुपया गिरने से हमारा एक्सपोर्ट तो बढ़ेगा, लेकिन इंपोर्ट महंगा हो जाएगा, जिससे महंगाई बढ़ सकती है."
वह कहते हैं, "अगर भारत का कैपिटल, एफ़डीआई या एफ़आईआई वगैरह में है, तो इसका असर हमारी अर्थव्यवस्था और हमारे स्टॉक मार्केट पर पड़ेगा."
"बहुत कुछ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों पर निर्भर करता है. क्योंकि ट्रंप की नीतियाँ अंतरराष्ट्रीय कारोबार को प्रभावित कर रही हैं. उनसे अगर भारत के बैलेंस ऑफ़ पेमेंट पर असर होता है तो रुपए की क़ीमत और भी कम हो सकती है."
जीडीपी विकास दर बेहतर संकेत?

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भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्तीय वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में वास्तविक जीडीपी ग्रोथ 8.2% दर्ज की, जो अपेक्षाओं से कहीं अधिक रही.
इस मायने में भी कि पिछले साल इसी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ का आँकड़ा 5.6% था. ये पिछले छह महीने में विकास की सबसे तेज़ रफ़्तार है.
हालाँकि, इसी दौरान नॉमिनल जीडीपी दर 8.7 प्रतिशत रही. वास्तविक जीडीपी दर और नॉमिनल जीडीपी दर के बीच साल 2020 के बाद से यह सबसे कम अंतर है.
क्रिसिल (क्रेडिट रेटिंग इंफॉर्मेशन सर्विसेज ऑफ़ इंडिया लिमिटेड) के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी कहते हैं, "भारत की विकास दर दूसरी तिमाही में 8.2 प्रतिशत रही जो उम्मीद से काफ़ी बेहतर है. इसका मुख्य कारण निजी उपभोग का बढ़ना रहा है. खाद्य महंगाई कम हुई है जिसकी वजह से विवेकाधीन ख़र्च भी बढ़ रहा है."
क्रिसिल ने भारत की विकास दर के अपने अनुमान को 6.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है.
भारत के विकास के आँकड़े प्रभावशाली तो हैं, लेकिन इनकी विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, "आईएमएफ़ ने जीडीपी गणना की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है. भारत के असंगठित क्षेत्र का डेटा नहीं आता. इसका आधार 2011-12 है, जो पुराना है. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक भी अपडेटेड नहीं है. उत्पादन और व्यय विधि में महत्वपूर्ण असंगति है, साथ ही राज्यों और स्थानीय निकायों का समेकित डाटा 2019 के बाद नहीं मिला. इन वजहों से हमारे जीडीपी आँकड़ों की विश्वसनीयता कमज़ोर है. इसलिए 8.2% की विकास दर को कई लोग स्वीकार नहीं करते."
लेकिन यामिनी अग्रवाल 8.2 प्रतिशत विकास दर के आँकड़े को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत मानती हैं.
प्रोफ़ेसर अग्रवाल कहती हैं, "जीडीपी वृद्धि सभी आर्थिक संकेतकों को दर्शाती है कि भारत की अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन कर रही है. जीएसटी दरों में कमी ने इस तिमाही में सीधा सकारात्मक असर डाला. हालाँकि, निम्न मुद्रास्फ़ीति चिंताजनक है - जीएसटी और क़ीमतों में गिरावट से डिफ़्लेशन की स्थिति बन रही है, जिस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए."
वहीं डीके जोशी कहते हैं, "वास्तविक जीडीपी में बढ़ोतरी उत्साहवर्धक है लेकिन महंगाई में गिरावट की वजह से नाममात्र जीडीपी में मामूली बढ़ोतरी के कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















