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ममता बनर्जी ने बंगाल में एक भी सीट नहीं छोड़ी, इंडिया गठबंधन का क्या होगा
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल में इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच सीटों के बँटवारे पर जो कयास लगाए जा रहा था, आख़िर वे सच साबित हुए.
इस साल जनवरी से ही 'एकला चलो' का राग अलापने वाली मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने रविवार को 42 लोकसभा सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी.
ममता बनर्जी ने यह भी साफ़ कर दिया कि उनकी पार्टी राज्य में लोकसभा चुनाव में अकेले ही बीजेपी, कांग्रेस और सीपीएम का मुकाबला करेगी.
वहीं दूसरी ओर, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि ममता ने साबित कर दिया है कि देश की किसी राजनीतिक पार्टी को उन पर भरोसा नहीं करना चाहिए. चौधरी ने कहा कि ममता बनर्जी ने बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ख़ुश करने के लिए ऐसा किया है.
ममता ने अपनी सूची में कई युवा चेहरों को शामिल कर उन्होंने एक संदेश भी देने का प्रयास किया है. लेकिन सूची में सबसे चौंकाने वाला नाम रहा क्रिकेटर यूसुफ पठान का. उनको मुर्शिदाबाद ज़िले की बरहमपुर सीट से उम्मीदवार बनाया गया है.
यह कांग्रेस की पारंपरिक सीट रही है. अधीर रंजन चौधरी इस सीट पर लगातार पाँच बार जीत चुके हैं. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी से मिली कड़ी चुनौती के बावजूद वो अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे थे.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद कांग्रेस के साथ तालमेल के दरवाज़े संभवतः बंद हो चुके हैं.
ममता अधीर चौधरी के ख़िलाफ़ मैदान में उतरने वाले क्रिकेटर युसूफ पठान को किसी भी हालत में मैदान से हटने के लिए नहीं कहेंगी.
लेकिन बीते दिसंबर से ही कभी 'ना', कभी 'हां' के बावजूद कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के साथ सीटों पर तालमेल की बातचीत परवान क्यों नहीं चढ़ सकी?
राजनीति विज्ञान के पूर्व प्रोफ़ेसर समीरन पाल कहते हैं, "इसके लिए कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का ढुलमुल रवैया और प्रदेश नेतृत्व का अडियल रवैया ही काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार है. जहाँ तक ममता की बात है उन्होंने क़रीब डेढ़ महीने पहले ही राज्य में एकला चलो का ऐलान कर दिया था. लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से इस गतिरोध को सुलझाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई."
वो कहते हैं कि शायद कांग्रेस पर उसके सहयोगी सीपीएम का भी दबाव रहा होगा. सीपीएम कई बार साफ़ कर चुकी है कि वह तृणमूल कांग्रेस के साथ सीटों पर तालमेल की इच्छुक नहीं है.
तृणमूल कांग्रेस की सूची
तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार ब्रिगेड परेड मैदान से जारी उम्मीदवारों की सूची में कई युवा चेहरों को तरजीह दी है. पार्टी ने 12 ऐसे उम्मीदवारों को भी मैदान में उतारा है जो विधायक हैं.
अनुमान के मुताबिक़ दो अभिनेत्रियों, नुसरत जहां और मिमी चक्रवर्ती को टिकट नहीं दिए गए हैं. वैसे, मिमी ने पहले ही साफ़ कर दिया था कि वो चुनाव लड़ने की इच्छुक नहीं हैं.
पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 17 महिलाओं को टिकट दिया था, लेकिन इस बार महिलाओं की तादाद 12 ही है. हालांकि हाल में पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने कम से कम आधी सीटों पर महिला उम्मीदवारों को टिकट देने की बात कही थी.
आसनसोल सीट पर उपचुनाव जीतने वाले अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा पर पार्टी ने दोबारा भरोसा जताया है. लेकिन इस सूची में सबसे चौंकाने वाला नाम रहा क्रिकेटर यूसुफ पठान का.
उनको कांग्रेस और ख़ासकर अधीर चौधरी का गढ़ समझी जाने वाली मुर्शिदाबाद की बरहमपुर सीट से मैदान में उतारा गया है.
इसी तरह हाल में लोकसभा की सदस्यता से निष्कासित महुआ मोइत्रा को दोबारा उनकी पुरानी कृष्णनगर सीट से ही टिकट दिया गया है.
तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी से नाता तोड़कर पार्टी में शामिल होने वाले तीन नेताओं—विश्वजी और मुकुटमणि अधिकारी को क्रमशः बनगांव, रायगंज और रानाघाट सीट से टिकट दिया है.
भाजपा विधायक रहे मुकुटमणि तो दो दिन पहले ही तृणमूल में शामिल हुए थे. बांकुड़ा जिले की विष्णुपुर सीट पर पार्टी ने बीजेपी सांसद सौमित्र खां की पूर्व पत्नी सुजाता खां मंडल को अपना उम्मीदवार बनाया है.
ममता ने रविवार की रैली में कहा, "बंगाल में लड़ाई बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच होगी. हम कांग्रेस और सीपीएम का विरोध जारी रखेंगे. उत्तर प्रदेश में एक सीट पर लड़ने के लिए सपा नेता अखिलेश यादव के साथ बातचीत चल रही है."
ममता का कहना था कि कुछ लोगों को सूची में जगह नहीं दी गई है. उनको अगले विधानसभा चुनाव या संगठन में किसी भूमिका में खपाने का प्रयास किया जाएगा.
ममता के दरवाज़े 'इंडिया' के लिए बंद?
राज्य में विपक्षी गठबंधन के तीनों सहयोगी दलों तृणमूल कांग्रेस, वाममोर्चा और कांग्रेस के बीच तालमेल के मुद्दे पर खींचतान तो दिसंबर से ही चल रही थी. लेकिन अब ममता की घोषणा से राज्य में विपक्षी एकता के दरवाज़े बंद हो चुके हैं.
कांग्रेस ने जनवरी के पहले सप्ताह में ही साफ़ कह दिया था कि वह ममता की पार्टी के साथ कोई तालमेल नहीं करेगी.
उसने अपने सहयोगी वाममोर्चा के साथ मिल कर टीएमसी पर बीजेपी के साथ गोपनीय तालमेल का आरोप लगाया था. दिलचस्प बात यह है कि ममता भी इन दोनों पर यही आरोप लगाती रही हैं.
इसके साथ ही ममता शुरू से ही यह फार्मूला देती रही हैं कि देश के बाकी हिस्सों में इंडिया गठबंधन लड़े, लेकिन बंगाल में उनकी पार्टी ही बीजेपी से मुक़ाबला कर सकती है.
उन्होंने उसी समय पार्टी की एक आंतरिक बैठक में कहा था कि कांग्रेस और लेफ्ट के कथित अड़ियल रवैए के कारण अगर उनको सीटों के बँटवारे में अहमियत नहीं मिली तो पार्टी अकेले अपने बूते सभी 42 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन तीनों का यह अड़ियल रवैया इंडिया गठबंधन की राह की सबसे बड़ी बाधा के तौर पर उभरा है.
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर शुभोजित लाहिड़ी कहते हैं कि कांग्रेस नेता अधीर चौधरी का ममता का साथ शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है.
उन्होंने हाल के महीने ममता को 'मौक़ापरस्त' बताते हुए कई भड़काऊ टिप्पणियां की थीं. उन्होंने कहा था कि कांग्रेस बंगाल में अकेले अपने बूते ही आठ-नौ सीटों पर जीत सकती है.
ममता बनर्जी के क़दम पर कांग्रेस का तंज़
रविवार को ममता के एकतरफ़ा ऐलान के बाद मुर्शिदाबाद में पत्रकारों से बातचीत में अधीर ने कहा, "ममता ने साबित कर दिया कि किसी भी राजनीतिक पार्टी को उन पर भरोसा नहीं करना चाहिए. उन्होंने आम लोगों के ध्रुवीकरण और भाजपा की मदद करने के लिए ही मेरे ख़िलाफ़ युसूफ पठान को उतारा है."
कांग्रेस नेता के मुताबिक़, ममता को डर है कि अगर वो इंडिया गठबंधन में बनी रहीं तो प्रधानमंत्री नाराज़ हो जाएंगे. उन्होंने इंडिया गठबंधन से नाता तोड़ कर पीएमओ को संदेश भेजा है कि वो भाजपा से मुक़ाबला नहीं करना चाहतीं.
सीपीएम ने फ़िलहाल इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की है. वैसे, प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम पहले से ही तृणमूल पर भाजपा से गोपनीय समझौते का आरोप लगाते हुए उसके साथ मिल कर चुनाव लड़ने के प्रति अनिच्छा जताते रहे हैं.
लेकिन बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस की सूची पर कटाक्ष करते हुए उस पर चुनाव जीतने के लिए बाहरी उम्मीदवारों का सहारा लेने का आरोप लगाया है.
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने पत्रकारों से कहा, "तृणमूल कांग्रेस कीर्ति आज़ाद और युसूफ पठान जैसे बाहरी लोगों को यहां ले आ रही है. वह भाजपा के शीर्ष नेताओं को बाहरी बताती रही हैं. तो क्या पठान और आज़ाद बंगाली हैं?"
क्या ममता के अकेले लड़ने के फैसले से राज्य की चुनावी तस्वीर में बदलाव आएगा? वरिष्ठ पत्रकार तापस कुमार मुखर्जी कहते हैं, "ममता इस बार अपनी सीटों की तादाद बढ़ाना चाहती हैं. उनको लग रहा था कि कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने की स्थिति में उनके वोट बैंक में सेंध लग सकती है.''
''शायद इसी वजह से उन्होंने कई नए चेहरों को मैदान में उतारा है. वो बीते कुछ महीनों से सभी 42 सीटों पर अकेले लड़ने का एलान करती रही हैं. लेकिन शायद कांग्रेस की ओर से इस मामले में कुछ ढिलाई बरती गई है."
वह कहते हैं कि इससे तस्वीर कितनी बदलेगी, यह कहना मुश्किल है. बीते चुनाव में भी यही तीनों दावेदार मैदान में थे. कांग्रेस और सीपीएम मिल कर लड़े थे जबकि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस अकेले.
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