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कलकत्ता हाई कोर्ट के जज अभिजीत गंगोपाध्याय ने दिया इस्तीफ़ा, बीजेपी में होंगे शामिल
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, कोलकाता से
कलकत्ता हाई कोर्ट के जज अभिजीत गंगोपाध्यायने मंगलवार को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और सात मार्च को बीजेपी में शामिल होने की घोषणा की है.
इससे पहले सोमवार को दोपहर ठीक 2.47 बजे अपने लंबे न्यायिक करियर का आख़िरी फ़ैसला सुनाया था. इसके बाद वो अपने कक्ष से निकल गए थे.
उनका आख़िरी फ़ैसला ईस्ट मेदिनीपुर ज़िले के एक जज को बर्ख़ास्त करने करने से संबंधित था. उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से इस मामले पर विचार कर ऐसा करने की सिफ़ारिश की.
यह भी दिलचस्प संयोग है कि उन्होंने जिस मेदिनीपुर ज़िले से संबंधित फ़ैसला सुनाया, उसी ज़िले से उनकी नई राजनीतिक पारी शुरू होने के कयास लगाए जा रहे हैं.
अपने विभिन्न फ़ैसलों के दौरान सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और उसकी सरकार के ख़िलाफ़ कड़ी टिप्पणियों के लिए अक्सर सुर्ख़ियों में रहने वाले न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने रविवार को ही ऐलान किया था कि सोमवार को हाई कोर्ट के जज के तौर पर उनका आख़िरी दिन होगा.
तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने से इनकार
न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने रविवार को एक सवाल पर कहा था कि वे किसी भी स्थिति में तृणमूल कांग्रेस में शामिल नहीं होंगे.
इस बीच, बीजेपी के सूत्रों ने दावा किया कि न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय उनकी पार्टी का ही हाथ थामेंगे और उनको लोकसभा चुनाव में ईस्ट मेदिनीपुर की तमलुक सीट से टिकट दिया जाएगा.
इससे पहले विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया था कि सात मार्च को एक बड़ा नाम पार्टी में शामिल होगा. उसके ठीक पहले न्यायमूर्ति के ऐलान को राजनीतिक हलकों में इसी दावे से जोड़ कर देखा जा रहा है.
पिछली बार इस सीट पर शुभेंदु अधिकारी के भाई दिब्येंदु अधिकारी तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीते थे. लेकिन अधिकारी बंधुओं के साथ तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी का छत्तीस का आँकड़ा है.
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने फ़ेसबुक पर जारी एक ऑडियो क्लिप के ज़रिए दावा किया है कि न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय भाजपा में ही शामिल होंगे.
उस आडियो क्लिप में फोन पर बातचीत में शुभेंदु अधिकारी के पिता शिशिर अधिकारी ने कथित रूप से माना है कि तमलुक सीट से न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ही भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे.
बीबीसी इस ऑडियो क्लिप की सत्यता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है. वैसे, भाजपा ने औपचारिक तौर पर न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय के पार्टी में शामिल होने के सवाल पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को इस बारे में एक सवाल पर कहा, "पहले उनका इस्तीफ़ा स्वीकार हो जाए. उसके बाद ही कोई टिप्पणी करूंगा."
हालांकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार का कहना था, "वो चाहे किसी भी पार्टी में शामिल हों, राजनीति में न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय जैसे लोगों की ज़रूरत है. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में भाजपा ही उनकी स्वाभाविक पसंद होनी चाहिए."
फ़ैसलों की निष्पक्षता पर सवाल
न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय के भाजपा में शामिल होने का कयास तेज़ होते ही तृणमूल कांग्रेस उनके फ़ैसलों की निष्पक्षता पर सवाल उठाने लगी है.
पार्टी के प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा है, "अब जबकि भाजपा के टिकट पर न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय का चुनाव लड़ना लगभग तय है कि उनके हाल के फ़ैसलों की तटस्थता पर सवाल उठना लाजिमी है."
यहाँ इस बात का ज़िक्र प्रासंगिक है कि न्यायमूर्ति के फ़ैसलों की सत्तारूढ़ पार्टी अक्सर आलोचना करते रहे हैं. पार्टी के नेता कुणाल घोष तो यहां तक कह चुके हैं कि न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय को सीधे राजनीति में उतर जाना चाहिए.
रविवार को एक कार्यक्रम में न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय से मुलाक़ात के बाद घोष ने कहा था कि अब उनके राजनीति में उतरने के बाद हालिया फ़ैसलों और टिप्पणियों के राजनीतिक होने का सवाल तो उठेगा ही.
वहीं राज्य सरकार में मंत्री फिरहाद हकीम कहते हैं, "हम तो बार-बार कह रहे थे कि वे जिस कुर्सी पर बैठ कर जैसी टिप्पणियां करते थे, वैसा नहीं किया जा सकता. अब अगर वो किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल होते हैं तो लड़ाई राजनीतिक होगी. अगर वो जज की कुर्सी छोड़ने के बाद राजनीति में उतर कर चुनाव हार जाते हैं तो हमें भी ख़राब लगेगा. तमलुक सीट पर तृणमूल कांग्रेस की जीत तय है."
वैसे, राजनीतिक हलकों में न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय के इस्तीफ़े के फ़ैसले को हैरत भरी निगाह से ही देखा जा रहा है. 25 अप्रैल 2023 को उन्होंने अदालत के अपने कक्ष में कहा था, "यह प्रचार कौन कर रहा है कि मैं इस्तीफ़ा दे दूंगा? मैं इस्तीफ़ा नहीं दूंगा. यह लड़ाई जारी रहेगी."
लेकिन इसके क़रीब दस महीने के भीतर ही उनके इस्तीफ़ा देने की अटकलों ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है.
वे अपने कई फ़ैसलों के चलते सुर्ख़ियों में रहे. वह चाहे ममता बनर्जी के क़रीबी रहे पार्थ चटर्जी को सीबीआई के समक्ष हाज़िर होने का निर्देश हो या फिर तत्कालीन शिक्षा मंत्री की पुत्री को शिक्षक की नौकरी से बर्ख़ास्त कर उसकी जगह योग्य उम्मीदवार को नौकरी पर बहाल करने का फ़ैसला रहा हो, उनके इन फ़ैसलों की वजह से सत्तारूढ़ पार्टी के कई पूर्व मंत्री और विधायक फ़िलहाल जेल में हैं.
अभिजीत गंगोपाध्याय के अहम फ़ैसले
न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय की स्कूली पढ़ाई कोलकाता के मित्र इंस्टीट्यूशन से हुई. उन्होंने महानगर के ही हाजरा लॉ कॉलेज से क़ानून की पढ़ाई की. कॉलेज के दिनों में गंगोपाध्याय ने बांग्ला थिएटर में भी काम किया. उन्होंने साल 1986 में आख़िरी बार किसी नाटक में अभिनय किया था.
उन्होंने वेस्ट बंगाल सिविल सर्विस के एक-ग्रेड ऑफ़िसर के तौर अपना करियर शुरू किया था. उनकी पोस्टिंग उत्तर दिनाजपुर में ही थी. बाद में उन्होंने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और सरकारी वकील के तौर पर कलकत्ता हाई कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की.
न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने दो मई 2018 को अतिरिक्त जज के तौर पर कलकत्ता हाई कोर्ट में काम शुरू किया. 30 जुलाई 2020 को वो स्थायी जज बन गए.
न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय ने जज के तौर पर कई अहम फ़ैसले सुनाए हैं. जजों के बेहतरीन फैसलों के संकलन के तौर पर सितंबर, 2023 में छपी कलकत्ता हाई कोर्ट की पुस्तकाकार वार्षिक रिपोर्ट में न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय के एक फ़ैसले को सर्वश्रेष्ठ करार दिया गया था. वह था स्कूल में भर्ती घोटाले की केंद्रीय एजंसी से जांच का निर्देश.
कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति के तौर पर उन्होंने 14 मामलों की जांच सीबीआई को सौंपी थी. वो जून, 2021 से 30 जनवरी 2024 तक शिक्षक भर्ती घोटाले की लगातार सुनवाई करते रहे हैं.
18 मई 2022 को उन्होंने तत्कालीन मंत्री और मुख्यमंत्री ममता के नंबर दो रहे पार्थ चटर्जी को उस दिन शाम को छह बजे से पहले सीबीआई के समक्ष हाजिर होने का निर्देश दिया था. उसी आधार पर सीबीआई ने पार्थ से पूछताछ की थी.
इसके अगले दिन ही उन्होंने इस घोटाले से संबंधित मामले में पार्थ चटर्जी को भी शामिल करने का निर्देश दिया था. आख़िरकार 23 जुलाई को ही ईडी ने पार्थ को गिरफ़्तार कर लिया था.
न्यायमूर्ति ने इसी घोटाले के सिलसिले में 20 जून 2022 को टीएमसी नेता मानिक भट्टाचार्य को प्राथमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष पद से हटा दिया था.
उसके बाद 27 सितंबर को उन्होंने मानिक को रात आठ बजे तक सीबीआई के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया था. तब उन्होंने कहा था कि जांच में सहयोग नहीं करने की स्थिति में सीबीआई उनको हिरासत में ले सकती है. आख़िर में उसी साल अक्तूबर में ईडी ने मानिक को गिरफ्तार कर लिया था.
उस दिन न्यायमूर्ति ने कहा था, "मेरे विभिन्न फ़ैसलों के कारण कई चोर जेल में हैं. ऊपर से नीचे तक विभिन्न स्तर पर चोर भरे हैं. कुछ और लोग भी जेल जाएंगे." उन्होंने कई अयोग्य उम्मीदवारों को नौकरी से बर्ख़ास्त करने का भी फ़ैसला सुनाया था.
20 मई 2022 को उन्होंने तत्कालीन शिक्षा राज्य मंत्री परेश अधिकारी की बेटी अंकिता को शिक्षक पद से बर्ख़ास्त करते हुए उसे तमाम वेतन लौटाने का निर्देश दिया था.
न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने उसी साल 10 फरवरी को ग्रुप डी के करीब दो हज़ार कर्मचारियों, 10 मार्च को ग्रुप सी के 785 कर्मचारियों और 16 मई को 30 हज़ार से ज्यादा गैर-प्रशिक्षित शिक्षकों को बर्ख़ास्त कर दिया था.
शिक्षक भर्ती घोटाले में न्यायमूर्ति ने सीबीआई को भी नहीं बख़्शा था. उन्होंने दो फरवरी 2023 को उसके अधिकारियों से अदालत में अपनी संपत्ति का हलफ़नामा दायर करने का निर्देश दिया था.
क्या कोई जज इस्तीफा देकर चुनाव लड़ सकता है?
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कोई न्यायमूर्ति इस्तीफ़ा देकर राजनीति में उतर कर चुनाव लड़ सकता है या फिर इस्तीफ़ा देने से पहले ही इसका ऐलान कर सकता है?
कलकत्ता हाई कोर्ट के एडवोकेट सुनील रॉय कहते हैं, इसमें कोई क़ानूनी बाधा नहीं है. पश्चिम बंगाल में भले शायद यह अपनी किस्म का पहला मामला हो, देश के दूसरे हिस्सों में इसकी मिसाल मिल जाएगी. अपने करियर और भविष्य के बारे में फ़ैसला करना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है.
न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने अदालत के अपने कक्ष में एक बार कहा था, "मैं हमेशा तो यहां नहीं रहूंगा. लेकिन भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रहेगी."
अब आम लोगों के साथ ही राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें भी इस बात पर टिकी हैं कि अदालत से राजनीति के पिच पर उतरने के बाद न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई कैसे जारी रखेंगे?
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