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पवन सिंह ने ख़ुद मैदान छोड़ा या बीजेपी को छोड़ने के लिए कहना पड़ा
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
भोजपुरी के लोकप्रिय चेहरा मनोज तिवारी, रवि किशन और दिनेश लाल यादव (निरहुआ) के बाद पवन सिंह को बीजेपी लोकसभा सांसद बनाने की तैयारी कर रही थी.
2024 के आम चुनाव के लिए बीजेपी की ओर से जारी की गई पहली लिस्ट में पवन सिंह का नाम भी शामिल था लेकिन पार्टी इसमें बुरी तरह से घिर गई. पवन सिंह के अतीत और उनकी पहचान ने बीजेपी पर कई सवाल खड़े किए. आख़िरकार पवन सिंह को ख़ुद ही आकर कहना पड़ा कि वह आसनसोल से चुनाव नहीं लड़ेंगे.
भाजपा ने पिछले हफ़्ते शनिवार को लोकसभा के उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची जारी की थी. इसमें पश्चिम बंगाल की 20 सीटों के उम्मीदवारों के भी नाम थे.
इस लिस्ट में सबसे दिलचस्प था, हिंदीभाषी बहुल आसनसोल सीट पर भोजपुरी गायक पवन सिंह का नाम. लेकिन इस सूची के सामने आते ही तृणमूल कांग्रेस नेताओं ने पवन सिंह के पुराने गीतों का हवाला देते हुए उनकी आलोचना शुरू कर दी.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी तक ने पवन सिंह की उम्मीदवारी को शर्मनाक बताया. लेकिन पवन सिंह की उम्मीदवारी को लेकर बीजेपी बंगाल में सबसे ज़्यादा घिरती दिख रही थी.
इन आलोचनाओं पर भाजपा प्रवक्ता शमीक भट्टाचार्य ने शनिवार रात कहा था, "साफ़ है कि तृणमूल कांग्रेस चुनाव से पहले ही आसनसोल सीट पर हार मान चुकी है. यह हमले उसकी हताशा का प्रतीक हैं."
लेकिन रविवार सुबह जब ख़ुद पवन सिंह ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का आभार जताते हुए चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया तो शमीक भट्टाचार्य के सुर बदल गए.
उनका कहना था, "फ़िलहाल विस्तार से कुछ पता नहीं है. पार्टी नेतृत्व उनसे इस बारे मे बात करेगा. उसके बाद ही असली वजह का पता चलेगा."
शनिवार शाम से राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे पर चर्चा का बाज़ार गर्म हो गया जो रविवार को पवन सिंह के चुनाव लड़ने से इनकार के बाद और तेज़ हो गया. अब उनके इनकार के पीछे की वजहों पर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं.
कौन हैं पवन सिंह
पवन सिंह एक लोकप्रिय भोजपुरी गायक हैं. उनके कुछ गीत तो बेहद हिट रहे हैं. उन्होंने 'प्रतिज्ञा', 'सत्या' और 'हर हर गंगे' जैसी फ़िल्मों में भी काम किया है.
भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री के वह लोकप्रिय चेहरा हैं. हालांकि उनके गीतों पर अश्लीलता के आरोप ही लगते रहे हैं. 'हम हसीना बंगाल के...' जैसे गीत के ज़रिए बंगाल की महिलाओं के प्रति अश्लील नज़रिया रखने के लिए पहले भी उनकी आलोचना होती रही है.
क़रीब दो दशक तक भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े पवन के राजनीतिक करियर की शुरुआत 2014 में तब हुई थी, जब भाजपा के तत्कालीन महासचिव अरुण सिंह ने उनको पार्टी में शामिल किया था.
आसनसोल का गणित
इस मुद्दे पर आगे चर्चा करने से पहले आसनसोल सीट का गणित समझना ज़रूरी है.
झारखंड से सटा कोयला खदान वाला यह इलाक़ा हिंदीभाषी बहुल है. यहां पंद्रह लाख से ज्यादा वोटरों में से क़रीब आधे हिंदी भाषी हैं.
ट्रेड यूनियन गतिविधियां मज़बूत होने के कारण 2014 के चुनाव से पहले सीपीएम लगातार 30 साल तक यहां से जीतती रही थी. लेकिन 2014 में भाजपा ने जाने-माने गायक बाबुल सुप्रियो को मैदान में उतार कर तमाम समीकरणों को ग़लत साबित करते हुए यह सीट जीत ली थी.
यही नहीं इलाक़े के वोटरों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए पार्टी ने पहली बार संसद में पहुंचने वाले बाबुल को मंत्री भी बना दिया. उसके बाद 2019 में भी बाबुल ने यहां जीत का सिलसिला बनाए रखा.
लेकिन 2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा को उम्मीद के मुताबिक़ कामयाबी नहीं मिलने के बाद बाबुल को केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटा दिया गया था.
इससे नाराज़ होकर उन्होंने कुछ दिनों बाद लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया और तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए.
इस ख़ाली सीट पर हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने सबको चौंकाते हुए बिहारी बाबू कहे जाने वाले अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को मैदान में उतारा था. उस उपचुनाव में बिहारी बाबू ने भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्रा पॉल को क़रीब तीन लाख वोटों के अंतर से हराया था.
यह भी दिलचस्प है कि तीन दशक तक वामपंथियों का गढ़ रहे इस लाल किले में सेंध लगाने के लिए भाजपा ने ही पहली बार बाबुल सुप्रियो के तौर पर स्टार पावर का इस्तेमाल कर कामयाबी हासिल की थी.
उसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने भी उसी की तर्ज़ पर बिहारी बाबू के सहारे इस पर कब्जा जमाया था. शायद इसी सोच के तहत पवन सिंह को दूसरे दावेदारों पर तरजीह दी गई.
पवन सिंह का विरोध
पवन सिंह को उम्मीदवार बनाए जाने की ख़बरें सामने आने के बाद ही राजनीतिक हलकों में उनके ख़िलाफ़ आरोपों की बाढ़ आ गई. सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम पोस्ट सामने आने लगीं, जिनमें पवन पर महिला विरोधी गीत गाने और बंगाल की महिलाओं के प्रति अश्लील नज़रिया अपनाने के आरोप लगाए गए.
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने अपने एक ट्वीट में आरोप लगाया कि पवन सिंह ने अपने भोजपुरी गीतों और वीडियो में बंगाल की महिलाओं के प्रति अश्लील नज़रिया दिखाया है.
आसनसोल के पूर्व भाजपा सांसद और राज्य के मंत्री बाबुल सुप्रियो ने अपने ट्वीट में लिखा, "आसनसोल को पवन सिंह मुबारक. एक कलाकार के तौर पर उनके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. लेकिन उनके गीतों के पोस्टर देखने से ही सब कुछ समझ में आ जाएगा. पवन सिंह की उम्मीदवारी से साफ़ है कि भाजपा बंगाल और यहाँ की महिलाओं के बारे में क्या सोचती है."
विपक्षी टीएमसी के अलावा ख़ुद भाजपा में भी पवन सिंह के उम्मीदवारी के ख़िलाफ़ आवाज उठने लगी. प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष तथागत रॉय ने अपनी एक पोस्ट में लिखा कि भाजपा तृणमूल कांग्रेस की तरह एक महिला की मर्ज़ी के मुताबिक उम्मीदवारों का चुनाव नहीं करती.
पार्टी तय मानदंडों के मुताबिक गहन विमर्श के बाद ऐसा करती है. लेकिन चयन करने वालों से भी ग़लती हो ही सकती है. आसनसोल के सवाल पर नए सिरे से विचार करना ज़रूरी है. उनका कहना था कि आसनसोल बिहार में नहीं है.
अब पवन सिंह के इनकार को तृणमूल कांग्रेस अपनी नैतिक जीत के तौर पर देख रही है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, पवन सिंह को शायद आभास हो गया होगा कि हालात उनके बेहद प्रतिकूल हैं.
साथ ही इस सीट पर हुए उपचुनाव का आंकड़ा भी उनके सामने होगा. इसलिए उन्होंने मैदान में उतरने से पहले ही हथियार डाल दिए.
टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने अपने एक ट्वीट में कहा, यह बंगाल के लोगों की अदम्य इच्छाशक्ति और विरोध की जीत है.
अब कौन होगा भाजपा का उम्मीदवार
दूसरी ओर, भाजपा का कोई नेता फ़िलहाल इस मुद्दे पर कुछ कहने को तैयार नहीं हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "इस सीट के लिए अग्निमित्रा पॉल के अलावा पवन सिंह के नाम पर चर्चा हो रही थी. लेकिन पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने पवन सिंह की स्टार पावर और कोयला खदानों के बिहारी मज़दूरों को ध्यान में रखते हुए शायद उनको तरजीह दी.''
''लेकिन पासा उलटा पड़ गया. अब केंद्रीय नेतृत्व पहले पवन सिंह से बात कर उनको मनाने का प्रयास करेगा. लेकिन वो अगर अपने फ़ैसले पर अड़े रहे तो किसी दूसरी उम्मीदवार का एलान किया जाएगा."
राजनीतिक विश्लेषकों प्रोफेसर समीरन पॉल कहते हैं, "पवन सिंह के साथ सिर मुंडाते ही ओले पड़ने वाली कहावत चरितार्थ हो गई. नाम के ऐलान के साथ ही उन पर हमले शुरू हो गए. इसके अलावा उनको इस सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार की जीत का अंतर भी ध्यान में होगा. इसलिए अपनी इज्जत बचाने के लिए उन्होंने सायद मैदान में उतरने से मना कर दिया है."
उनका कहना था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल में संकेत दिया था कि इस सीट पर शत्रुघ्न सिन्हा ही पार्टी के उम्मीदवार होंगे. शायद पवन सिंह को लगा होगा कि बिहारी बाबू उनकी (पवन की) स्टार पावर पर बीस साबित हो सकते हैं.
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