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'दबंग' अजय राय को यूपी कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे रणनीति क्या है?
- Author, अनंत झणाणें
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से
उत्तर प्रदेश के पिछले चुनाव में कांग्रेस पार्टी का वोट शेयर 2.33 फ़ीसद रहा तो राज्य के कुल 403 विधायकों में उसके केवल दो ही हैं, वहीं लोकसभा के 80 सांसदों में उसकी हिस्सेदारी भी केवल एक सांसद पर सिमट गई है.
सांसदों के लिहाज़ से देश के इस सबसे बड़े राज्य में कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले 'दबंग' छवि वाले अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है.
आपको याद होगा कि ये वही चेहरा हैं जो 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में बनारस से नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ कांग्रेस प्रत्याशी थे.
अजय राय पांच बार विधायक रह चुके हैं.
बीते महीने अजय राय के बड़े भाई अवधेश राय की हत्या के मामले में माफ़िया नेता मुख़्तार अंसारी को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी.
शुक्रवार को अजय राय ने यूपी कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बाद कहा, "2024 के चुनाव में राहुल गांधी अमेठी से मैदान में होंगे. प्रियंका गांधी अगर बनारस से उतरना चाहें या कहीं और से, हमारा एक एक कार्यकर्ता उनकी जीत के लिए जान लगा देगा."
तो चलिए जानते हैं अजय राय के राजनीतिक जीवन को और क्या वे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को फिर से जीवंत करने की क्षमता रखते हैं?
कौन हैं अजय राय, जानें उनका राजनीतिक सफ़र
अजय राय ग़ाज़ीपुर के भूमिहार परिवार से हैं. पूर्वांचल के बनारस, मऊ, ग़ाज़ीपुर और बलिया क्षेत्रों के राजनीति पर भूमिहार परिवारों का प्रभाव रहा है.
अजय राय ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता युवा मोर्चा से की.
1996: सीपीआई (एम) के 8 बार विधायक रहे उदल को हराकर अजय राय पहली बार विधायक बने.
1996 से 2007: वाराणसी की कोलअसला सीट से तीन बार बीजेपी के विधायक रहे. वे बीजेपी और बसपा की मिली-जुली सरकार में राज्य मंत्री भी थे.
2009: बनारस से लोकसभा का टिकट डॉ मुरली मनोहर जोशी को मिलने से नाराज़ हुए. सपा के टिकट पर चुनाव में उतरे और हारे, तीसरे स्थान पर रहना पड़ा.
2009: उसी साल विधानसभा चुनाव में कोलअसला से उतरे और जीते.
2012: पिंडरा विधान सभा सीट से कांग्रेस के विधायक बने.
2014: नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा. केवल 75,000 वोट मिले. तीसरे स्थान पर रहे. ज़मानत ज़ब्त हुई.
2017: पिंडरा सीट से विधानसभा चुनाव में बीजेपी के डॉ अवधेश सिंह से हारे.
2019: एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी के ख़िलाफ़ वाराणसी सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी बने. 1 लाख 52 हज़ार वोट मिले और तीसरे स्थान पर रहे.
2022: पिंडरा सीट से विधानसभा चुनाव फिर से बीजेपी के डॉ. अवधेश सिंह से हारे. अजय राय को 21 प्रतिशत वोट मिले.
अब 53 साल की उम्र में कांग्रेस ने उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है.
आपराधिक इतिहास
अजय राय के ख़िलाफ़ बनारस के थाना सिगरा, थाना चेतगंज, थाना बड़ागांव, थाना दशाश्वमेघ, थाना कोतवाली, थाना जैतपुर, थाना बनारस कैंट, थाना फूलपुर, ज़िला भदोही के थाना कोइरौना और लखनऊ के थाना हज़रतगंज में कुल 16 मुक़दमे दर्ज हैं. इनमें गैंगस्टर एक्ट के तहत एक मामला तो हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराओं में भी दो मुक़दमे दर्ज हैं.
अजय राय के ऊपर बनारस के पूर्व डिप्टी मेयर अनिल सिंह पर एके-47 से जानलेवा हमला करने का भी आरोप था लेकिन वो बाद में बरी हो गए.
13 अक्टूबर 2015 को अजय राय रासुका के तहत गिरफ़्तार करके जेल भेजे गए थे. क़रीब 7 महीने जेल में रहने के बाद हाई कोर्ट से उन्हें ज़मानत मिली.
हालांकि अजय राय अब तक किसी भी मामले में दोषी नहीं पाए गए हैं.
अजय राय के बाहुबली नेता बृजेश सिंह से भी संबंध बताए जाते हैं.
बृजेश सिंह की पत्नी अन्नपूर्णा सिंह 2022 में बनारस से बीजेपी के प्रत्याशी को हराकर एमएलसी चुनी गई थीं.
बनारस के वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह कहते हैं, "अब तो बृजेश सिंह 'माननीय' नेता हो गए हैं लेकिन जिस समय वो माफ़िया डॉन हुआ करते थे तब उनके शरणदाताओं की सूची में अजय राय का नाम भी था."
अजय राय क्यों बनाए गए प्रदेश अध्यक्ष?
उत्तर प्रदेश की वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता इसके कई कारण गिनाती हैं.
वे कहती हैं, "कांग्रेस को एक जुझारू व्यक्ति चाहिए था. कांग्रेस के पूर्व के प्रदेश अध्यक्ष जुझारू तो थे, लेकिन वो नेता नहीं कार्यकर्ता जैसे थे."
साथ ही वे पूछती हैं, "कांग्रेस के पास है ही कौन?"
सुमन गुप्ता कहती हैं, "अजय राय दबंग छवि वाले व्यक्ति हैं. बनारस में वो राजनीतिक और आर्थिक तौर पर सक्षम हैं और एक बार निर्दलीय चुनाव जीत चुके हैं. कांग्रेस को लगा कि अजय राय जैसा व्यक्ति खुल के पार्टी के लिए काम कर सकता है. कांग्रेस में कोई और युवा नेता नहीं है. उसे ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो भले ही चुनाव में उसकी नैया पार न लगा पाए लेकिन दम ख़म वाला हो."
क्या बीजेपी 16 आपराधिक मुक़दमों में अभियुक्त अजय राय की छवि को मुद्दा नहीं बनाएगी?
इस पर वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं, "आज के यूपी के मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्रियों के ख़िलाफ़ क्या पहले मुकदमे नहीं थे? उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. जनता जानती है कि राजनीति में व्यक्ति सड़क पर जाएगा तो उसके ख़िलाफ़ 10 तरीक़े के मुक़दमे दर्ज होंगे ही. पब्लिक में अजय राय की यह भी छवि है कि जब वो नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ लड़े तो उन्हें वोट मिला."
2019 के लोकसभा चुनाव में बनारस की सीट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 6,74,664 वोट मिले थे. समाजवादी पार्टी की शालिनी यादव को 1,95,159 वोट और अजय राय को 1,52,548 मत प्राप्त हुए थे.
बीजेपी से कैसे बढ़ी दूरियां, गिरा राजनीतिक ग्राफ़
कभी बीजेपी के नेता रहे अजय राय के राजनीतिक सफ़र को क़रीब से देखने वाले बनारस के वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह बताते हैं कि अजय राय का करियर ग्राफ़ लगातार ढलान की ओर बढ़ता गया.
वे कहते हैं, "इसकी शुरुआत 2009 के चुनाव से हुई. तब डॉ मुरली मनोहर जोशी इलाहाबाद से बनारस की सीट पर लड़ने पहुंचे थे और अजय राय को टिकट नहीं दिया गया था."
पवन सिंह कहते हैं, "असल मोड़ तो तब आया जब वे पहली बार 2014 और फिर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़े. उन्होंने रही सही कसर भी पूरी कर दी."
वे कहते हैं, "पिंडरा विधानसभा सीट पर भी अजय राय का ग्राफ़ गिरता नज़र आ रहा है. जिस सीट को वो निर्दलीय जीत चुके हैं उस सीट पर कांग्रेस के टिकट से 2022 में वो तीसरे नंबर पर थे."
तो फिर अजय राय में कांग्रेस आलाकमान को क्या फ़ायदे नज़र आ रहे हैं?
पवन सिंह कहते हैं, "अजय राय की गांधी परिवार से निकटता है. प्रियंका गांधी से भी निकटता है. लेकिन मुझे नहीं लगता है कि वो कोई परिवर्तन ला पाएंगे. जो उत्तर प्रदेश के नए वोटर हैं उन्होंने 1989 के पहले का कांग्रेस का ज़माना नहीं देखा है जब पार्टी उत्तर प्रदेश में शासन किया करती थी."
पवन सिंह अजय राय की छवि के बारे में कहते हैं, "इनसे जुड़ेगा कौन? कभी यह सॉफ्ट हिंदुत्व की बात करते हैं. कभी जनेऊधारी बनते हैं. कभी एंग्री यंग पॉलिटिशियन बनते हैं. लेकिन किसी भी प्रयोग से कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है."
अजय राय भूमिहार बिरादरी के हैं. तो पूर्वांचल के भूमिहारों पर उनका कितना प्रभाव है?
पवन सिंह कहते हैं, "भूमिहारों में विकासपुरुष के नाम पर बीजेपी नेता और जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का कद बड़ा है. लेकिन वो ख़ुद ग़ाज़ीपुर लोकसभा सीट अफ़ज़ाल अंसारी से हार गए थे. भूमिहार कोई बाहुल्य वाली जाति नहीं है. पूर्वांचल में जातिगत आधार पर भी दो-तीन प्रतिशत से ज़्यादा भूमिहार नहीं हैं. पूर्वांचल में ओबीसी ज़्यादा निर्णायक हैं."
क्या अजय राय कांग्रेस को यूपी में खड़ा कर पाएंगे?
2024 के चुनावों में महज़ 6 से 7 महीने का ही समय बचा है.
ऐसे में पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता हिलाल नक़वी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के संगठन को पुनर्जीवित करना एक बड़ी चुनौती है.
हालांकि वे यह भी मानते हैं कि अजय राय अपने आप में एक डायनामिक नेता हैं और रहे हैं.
वे कहते हैं, "बनारस और आसपास के इलाके में यह असरदार हैं. कांग्रेस को उम्मीद है कि अजय राय के आने से कम से कम पूर्वांचल में तो सकारात्मक नतीजे मिलने ही चाहिए."
हिलाल नक़वी यह भी याद दिलाते हैं कि, "जब-जब अजय राय ने बनारस से चुनाव लड़ा है तब तब ख़ुद राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने उनके लिए रोड शो निकाले हैं और काफ़ी प्रचार किया है."
वे कहते हैं, "इससे साबित होता है की केंद्रीय नेतृत्व को इन पर भरोसा है."
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