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पश्चिम बंगाल का एसएससी घोटाला लगातार क्यों है सुर्ख़ियों में?
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए, कोलकाता से
पश्चिम बंगाल में स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) के ज़रिये शिक्षकों की नियुक्तियों में कथित तौर पर हुई धांधली और इस मामले में पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी का मामला गर्म है.
उनकी क़रीबी कही जाने वाली महिला अर्पिता मुखर्जी की गिरफ़्तारी और ख़ासकर अर्पिता के अलग-अलग फ़्लैटों से बड़े पैमाने पर बरामद होने वाली नक़दी और दूसरी बेशक़ीमती चीज़ें लगातार सुर्ख़ियां बटोर रही हैं.
ईडी के मुताबिक़, अर्पिता के दो फ्लैटों से अब तक 50 करोड़ से ज़्यादा नक़दी और करोड़ों के आभूषण और दूसरी वस्तुएं बरामद की जा चुकी हैं.
जांच एजेंसी का दावा है कि यह रक़म शिक्षक भर्ती घोटाले से जमा की गई है.
हालांकि बीबीसी इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सकता. लेकिन जिस तरह से इतनी बड़ी रक़म बरामद हो रही है उससे आम लोग हैरत में हैं.
अगर यह रक़म ईडी के दावे के मुताबिक़ सचमुच उक्त घोटाले के तहत कैश फॉर जॉब के तहत जमा की गई है तो इससे घोटाले के आकार का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है.
लेकिन आख़िर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नाक के नीचे इतना बड़ा घोटाला हुआ कैसे. ममता का दावा है कि उनको इस घोटाले या इसके एवज़ में जुटाई गई रक़म के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. उनका कहना था, अगर किसी ने मुझे जानकारी दी होती तो मैंने उसी समय कार्रवाई की होती.
वैसे, कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश पर इस कथित घोटाले के तहत नौकरी पाने वाली मौजूदा शिक्षा राज्य मंत्री परेश अधिकारी की पुत्री अंकिता अधिकारी को बर्ख़ास्त कर उनसे पूरा वेतन वापस ले लिया गया है और उनकी जगह उस बबीता सरकार को नियुक्ति दी गई है जो इसकी हक़दार थीं. लेकिन अब मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ़्तारी और उनकी मित्र अर्पिता के फ़्लैट से बरामद कैश को देख कर सबकी आंखें फटी रह गई हैं.
क्या है यह घोटाला ?
इसकी शुरुआत हुई थी वर्ष 2016 में बंगाल के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के तहत शिक्षण और ग़ैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती के लिए स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) की ओर से आयोजित परीक्षा से. लेकिन इस घोटाले की परतें उधड़ने का सिलसिला शुरू हुआ वर्ष 2018 से.
एसएससी की आयोजित उक्त परीक्षा का नतीजा आया 27 नवंबर 2017 को. नतीजों के आधार पर जो मेरिट लिस्ट तैयार की गई थी उसमें सिलीगुड़ी की रहने वाली बबीता सरकार 77 नंबर पाकर टॉप 20 में जगह बनाने में कामयाब रही थीं. लेकिन आयोग ने कुछ दिनों बाद किसी नामालूम वजह से इस मेरिट लिस्ट को रद्द कर दिया और दूसरी मेरिट लिस्ट तैयार की.
दिलचस्प बात यह है कि इस नई मेरिट लिस्ट में बबीता सरकार का नाम तो वेटिंग लिस्ट में चला गया. लेकिन तृणमूल कांग्रेस सरकार में मंत्री परेश अधिकारी की पुत्री अंकिता अधिकारी का नाम सूची में पहले नंबर पर आ गया. उससे भी दिलचस्प बात यह है कि अंकिता को बबीता के मुक़ाबले 16 नंबर कम मिले थे. उसके बाद ही धीरे-धीरे घोटाले से पर्दा उठने लगा.
बबीता सरकार के पिता ने कलकत्ता हाईकोर्ट में दुसरी मेरिट लिस्ट को चुनौती देते हुए कहा कि एसएससी परीक्षा में 77 नंबर हासिल करने के बावजूद उनकी पुत्री का नाम वेटिंग लिस्ट में है जबकि उससे 16 नंबर कम यानी 61 नंबर पाने वाली मंत्री की पुत्री अंकिता का नाम पहले नंबर पर आ गया और उसे नौकरी भी मिल गई.
शिक्षा राज्य मंत्री से हुई थी लंबी पूछताछ?
लंबे अरसे तक इस याचिका पर सुनवाई के बाद अदालत ने इस मामले की जांच के लिए न्यायमूर्ति (रिटायर्ड) रंजीत कुमार बाग की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया. समिति ने अपनी जांच रिपोर्ट में घोटाले में शामिल पांच तत्कालीन अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की सिफ़ारिश की. इस रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट ने इस मामले की सीबीआई जांच का आदेश दिया और उसने एफ़आईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी.
सीबीआई ने इस मामले में शिक्षा राज्य मंत्री परेश अधिकारी से भी लंबी पूछताछ की. कोलकाता हाईकोर्ट ने परेश अधिकारी की बेटी अंकिता अधिकारी की नियुक्ति को अवैध क़रार देते हुए उनसे 41 महीने का वेतन दो क़िस्तों में वसूलने का आदेश दे दिया. अदालत ने उनकी जगह बबीता सरकार को नौकरी देने का भी आदेश दिया.
इस घोटाले में आर्थिक लेनदेन की ख़बरें सामने आने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने इसकी जांच का काम अपने हाथों में लिया और उसके बाद तो राज्य में राजनीतिक भूचाल आ गया है.
कैसे हुआ घोटाला?
रंजीत बाग समिति की रिपोर्ट और सीबीआई और ईडी की अब तक की जांच से जो तथ्य सामने आए हैं उनके मुताबिक़, स्कूल सेवा आयोग के अधिकारियों ने इस घोटाले को बेहद चालाकी से अंजाम दिया था. इसके तहत उन अधिकारियों ने चुनिंदा उम्मीदवारों से अपनी ओएमआर उत्तर पुस्तिकाओं के बारे में सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जानकारी मांगने और पुनर्मूल्यांकन की अपील करने की सलाह दी.
उसके बाद अधिकारियों ने ओमआर शीट में ऐसे उम्मीदवारों के नंबर बढ़ा दिए, जिससे उनके नाम मेरिट लिस्ट में काफ़ी ऊपर आ गए. जबकि पहले बनी मेरिट लिस्ट में उनके नाम या तो नहीं थे या फिर वेटिंग लिस्ट में थे. जांचकर्ताओं की मानें तो कुछ उम्मीदवारों की उत्तर पुस्तिकाओं में अवैध तरीक़े से नंबर बढ़ाए गए. नंबर बढ़ा कर नई मेरिट लिस्ट जारी करने के बाद उन गड़बड़ी वाली उत्तर पुस्तिकाओं को नष्ट कर दिया गया ताकि धांधली के सबूत नहीं रहे.
इस घोटाले की जांच कर रही सीबीआई टीम के एक अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "यह मामला बेहद दिलचस्प है. इसमें धांधली और उम्मीदवारों के नंबर बढ़ाने के लिए आईटीआई को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया."
गलत ढंग से 1002 लोगों को दी गई नौकरियां
जांच एजेंसियों के मुताबिक़, इस घोटाले के तहत ऐसे 1002 लोगों को नौकरियां दी गई है जो इसके पात्र नहीं थे और जिन्होंने परीक्षा में पात्रता की शर्त पूरी नहीं की थी.
पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग के पूर्व सलाहकार डॉ. शांति प्रसाद सिन्हा के कहने पर कार्यक्रम अधिकारी समरजीत आचार्य ने ग्रुप सी के असफल उम्मीदवारों के लिए 381 अनुशंसा पत्र तैयार किए. इनमें से क़रीब 250 उम्मीदवार तो मेरिट लिस्ट में भी नहीं थे.
इसी तरह ग्रुप डी में 609 असफल उम्मीदवारों के पक्ष में नियमों की अनदेखी की गई.
सीबीआई ने जब इस घोटाले की जांच शुरू की तो रहस्य की परतें धीरे-धीरे उधड़ने लगीं. तमाम अधिकारियों ने ख़ुद को बचाते हुए दूसरों के कंधों पर रखकर बंदूक़ चलाने का प्रयास किया था.
सीबीआई ने इस मामले में पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी से भी कई बार पूछताछ की. चटर्जी को अब सभी मंत्री पद से हटा दिया गया है. पूछताछ से बचने के लिए पार्थ ने हाईकोर्ट की शरण ली थी. लेकिन अदालत ने उनको इस मामले में कोई राहत देने से इनकार कर दिया.
पार्थ की नजदीकी महिला के घर से करोड़ों बरामद
अब ईडी के शिकंजा कसने के बाद बंगाल में राजनीतिक भूचाल आ चुका है. मंत्री पार्थ चटर्जी और उनकी महिला मित्र अर्पिता ईडी की हिरासत में हैं. शिक्षा राज्य मंत्री परेश अधिकारी के घर भी बीते सप्ताह ईडी ने तलाशी अभियान चलाया था.
पार्थ की एक और महिला मित्र मोनालिसा दास भी ईडी की निगाह में हैं. इस मामले में पार्थ चटर्जी के पूर्व सहायक सुकांत आचार्य भी रडार पर हैं. उनसे और पूर्व सचिव मनीष जैन से भी पूछताछ हो चुकी है. ईडी सूत्रों का कहना है कि फ़िलहाल शिक्षा विभाग के किसी भी अधिकारी को क्लीन चिट नहीं दी जा सकती.
यह घोटाला और करोड़ की नक़दी बरामद होने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस फूंक-फूंक कर क़दम रख रही है. ममता पहले ही कह चुकी हैं कि इस मामले में दोषी को भले आजीवन कैद की सज़ा मिले, वे उसका बचाव नहीं करेंगी.
तृणमूल कांग्रेस ने भी इस पूरे मामले से ख़ुद को अलग कर लिया है और कहा है कि जिनके घर से रक़म बरामद हुई है वही इसके स्रोत के बारे में बता सकते हैं.
पूरे राज्य में विरोध-प्रदर्शन
इस घोटाले के सामने आने के बाद उम्मीदवारों ने राज्य भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू किया था. कई उम्मीदवार तो अब भी अनशन और धरने पर बैठे हैं. अब इस घोटाले के तक़रीबन ख़ुलासे के बाद उम्मीदवारों और विपक्षी राजनीतिक दलों ने मंत्री पार्थ चटर्जी की मंत्रिमंडल से निकालने और घोटाले में उनका साथ देने वाले दूसरी लोगों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई का दबाव बढ़ा रहे हैं. राजधानी कोलकाता समेत राज्य के तमाम हिस्सों में धरना और प्रदर्शन तेज़ हो रहे हैं.
मुख्यमंत्री ममता का कहना है, "इस मामले की जांच शीघ्र पूरी होनी चाहिए.जो दोषी हैं उनको सज़ा दी जानी चाहिए. ग़लती किसी से भी हो सकती है."
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष कहते हैं, "इस मामले को सारदा और नारदा चिटफ़ंड घोटालों को तरह लंबी खिंचने की बजाय त्वरित जांच की जानी चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके." अब ईडी और सीबीआई की जांच कब पूरी होगी और इसमें क्या सामने आता है, सबकी निगाहें इसी पर टिकी हैं.
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