भारत में महिलाएं क्यों छिपाती हैं मेनोपॉज़?

मेनोपॉज को लेकर भारतीय महिलाओं में शर्म का भाव है
इमेज कैप्शन, मेनोपॉज़ को लेकर भारतीय महिलाओं में शर्म का भाव है
    • Author, अनघा पाठक
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

“मेरे पति चाहते थे कि मैं हमेशा तैयार और सज संवर कर रहूं, मैं माथे पर बड़ी बिंदी लगाती थी और काफी गहने पहना करती थी, और एक दिन यह सब कुछ ख़त्म हो गया.”

मेरठ की रहने वाली 60 वर्षीय अतुल शर्मा उस वक़्त को याद करती हैं जब उन्हें मेनोपॉज़ आया था.

वह कहती हैं कि आपको मालूम है लोग कहते हैं अगर कोई पुरुष 60 साल का भी है तो वह पुरुष है, लेकिन अगर कोई महिला जो 40-45 की है और उसे मेनोपॉज़ आ गया है तो समाज उसके साथ ऐसा व्यवहार करता है जैसे उसकी ज़िंदगी ख़त्म हो गई और उसका नारित्व ख़त्म हो गया है.

अतुल शर्मा ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए काम करती हैं.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
इमेज कैप्शन, बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
छोड़िए YouTube पोस्ट
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: बीबीसी दूसरी वेबसाइट्स की सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. YouTube सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त

मेनोपॉज़ एक महिला के जीवन में वह समय होता है जब उसका शरीर कई बदलावों से गुज़र रहा होता है. इस दौरान महिलाएं भावनात्मक उथल-पुथल से गुज़र रही होती हैं. महिलाएं डर, असुरक्षा और शर्म के बीच में फंस कर बिना किसी रास्ते के जीवन व्यतीत करती रहती हैं.

बहुत सी महिलाओं को लगता है कि मेनोपॉज़ की अवस्था में पहुंचने के बाद उनका जीवन समाप्त हो जाएगा.

अतुल शर्मा एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं
इमेज कैप्शन, अतुल शर्मा एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं

अतुल अपने अनुभव के बारे में बात करते हुए कहतीं हैं, "मुझे लगा था कि मेरे पति को अब मेरी ज़रूरत नहीं रहेगी और मुझे लगा कि वह किसी और महिला के पास चले जाएंगे. मैं अब उनकी और सेवा नहीं कर सकूंगी. मैं अब संपूर्ण महिला नहीं रही हूं. मुझे लगा था कि अब मेरे अंदर सेक्स करने की चाह ख़त्म हो जाएगी या मैं अब सेक्सुअली एक्टिव नहीं रहूंगी.”

“उसके बाद जब भी मेरे पति ने मेरे साथ सेक्स करने की कोशिश की मैंने कभी मना नहीं किया. सामान्य तौर पर मैं यह कहा करती थी कि अब हमारे बच्चे बड़े हो गए हैं और तुम इस तरह से बर्ताव क्यों कर रहे हो लेकिन मेनोपॉज़ के बाद मैंने अपने पति को कभी ना नहीं कहा. मैं यह दिखावा करती थी कि मुझे महीने में तीन दिन पीरियड्स होते हैं. इस दौरान मैं पैड्स का भी इस्तेमाल करती थी.”

अतुल शर्मा
इमेज कैप्शन, मेनोपॉज के वक्त को याद करते हुए अतुल शर्मा

अतुम शर्मा के दिमाग में एक अलग ही जंग चल रही थी. उनकी अपने आस पास की चीज़ों में रुची ख़त्म हो गई थी. उनको ऐसा महसूस होता था कि अब उनका कोई महत्व नहीं रह गया है.

अतुल कहती हैं, “मैं रातों को जागा करती थी मुझे इन सब चीज़ों से चिढ़ होती थी. अगर मेरी पायल से भी कोई आवाज़ आती थी तो मैं परेशान हो जाती थी. मैं सोचा करती थी कि अब मैं बूढ़ी हो रही हूं और मेरी पायल से आवाज़ आ रही है, यह कैसी बचकानी हरकत है. उसके बाद से मैंने सजना संवरना और तैयार होना बंद कर दिया था. कुछ वक़्त के बाद सब कुछ थम सा गया था.”

उन्होंने अपने मेनोपॉज़ की बात अपने पति से 5-6 साल तक छिपा कर रखी थी. हालांकि बाद में उनके पति को पता चल गया. उन्होंने अतुल को इस बात का यकीन दिलाया कि वह आज भी उनके जीवन में बहुत अधिक महत्व रखती हैं, जिससे अतुल को सामान्य होने में मदद मिली.

समाज में कितना मुश्किल है महिलाओं के लिए मेनोपॉज़

डॉक्टर रेणुका मलिक
इमेज कैप्शन, अन्य डॉक्टरों के साथ डॉक्टर रेणुका मलिका
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

महिलाओं में एक निश्चित उम्र के बाद मेनोपॉज़ की क्रिया होती है इस दौरान प्रजनन से जुड़े हार्मोन में प्राकृतिक रूप से कमी आती है. सरल भाषा में कहें तो महिलाओं को पीरियड्स आने बंद हो जाते हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि मेनोपॉज़ को महिलाओं को एक नए जीवन के शुरुआत के रूप में देखना चाहिए. महिलाओं को आज़ाद महसूस करना चाहिए और ज़िंदगी को खुलकर जीना चाहिए.

दिल्ली में स्थित राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मेनोपॉज़ क्लीनिक की प्रमुख डॉक्टर रेणुका मलिक कहती हैं, “भारत में मेनोपॉज़ से गुज़र रही महिलाओं की आबादी सबसे ज़्यादा है. हमें गैर प्रजनन से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं पर ध्यान देने की ज़रूरत है. महिलाओं में मेनोपॉज़ को लेकर खुशी होनी चाहिए कि अब वह आज़ाद हैं.”

लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष जहां महिलाओं को प्रताड़ित करने के लिए बहाने तलाशते रहते हैं उस समाज में फंसी हज़ारों महिलाओं के लिए मेनोपॉज़ आज़ादी लेकर नहीं आता है.

उत्तर प्रदेश के अमहेरा-आदिपुर गांव की निवासी संजोग जो घेरलू हिंसा की शिकार रही हैं उन्हें अपने मेनोपॉज़ को सालों तक छिपाना पड़ा था.

मेनोपॉज और घरेलू हिंसा
इमेज कैप्शन, मेनोपॉज को लेकर बात करती संजोग

संजोग कहती हैं, "मेरे पति मुझे प्रताड़ित करते थे. वह मेरे साथ मारपीट करते थे और मेरे साथ जबरन यौन संबंध बनाते थे. मेरे पति की मौत होने तक मैंने उनसे अपने मेनोपॉज़ की बात छिपा कर रखी थी. उससे बचने का पीरियड्स ही एकमात्र बहाना था. अगर वह या मेरे समाज का कोई और पुरुष यह बात जान जाता कि मेरा मेनोपॉज़ आ गया है और अब मैं मां नहीं बन सकती हूं तो निश्चित रूप से वह मेरे साथ दुष्कर्म करते."

"पुरुषों को बस एक ही बात का डर रहता है कि अगर हम महिलाओं से ज़बरदस्ती शारीरिक संबंध बनाएंगे और वे गर्भवती हो गईं तो क्या होगा. अगर उन्हें मालूम चल जाता कि मैं अब गर्भवती नहीं हो सकती हूं तो भगवान ही जानता है कि हमारे साथ क्या हुआ होता. मैंने अपने आसपास की महिलाओं के साथ ऐसी चीज़ें होती हुई देखी हैं."

पूरे विश्व में मेनोपॉज़ की औसत आयु 50 वर्ष है हालांकि भारतीय महिलाओं में यह आयु 46 से 47 साल है. डॉक्टरों का कहना है कि मेनोपॉज़ के दौरान महिलाओं को कई तरह के लक्षणों का समना करना पड़ता है.

ये भी पढ़ें

मेनोपॉज़ को लेकर लोगों में जागरूकता की कमी

मेनोपॉज को लेकर जागरूकता की कमी
इमेज कैप्शन, मेनोपॉज को लेकर भारत में जागरूकता की कमी है (प्रतीकात्मक तस्वीर)

कुछ मेट्रो शहरों जैसे दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में मेनोपॉज़ को लेकर विशेष रूप से क्लिनिक बनाए गए हैं लेकिन महिलाओं को इस बात की जानकारी नहीं है.

दिल्ली का राम मनोहर लोहिया अस्पताल ऐसा ही एक सरकारी अस्पताल है जहां मेनोपॉज़ को लेकर अलग से क्लिनिक की स्थापना की गई है.

राम मनोहर लोहिया अस्पताल में स्थित मेनोपॉज़ क्लिनिक के मरीज़ों की औसत आयु 40 से 46 साल के बीच है. जिनमें शायद ही किसी ने ही सीधे क्लिनिक में संपर्क किया होगा. हमेशा किसी की ओर से रेफर किए गए मरीज़ ही आते हैं.

उनमें से कुछ मरीज़ शुरू में राम मनोहर लोहिया अस्पताल के गायनोकोलॉजी विभाग में अपनी गर्भवती बेटियों को दिखाने आई थीं.

सरिता (बदला हुआ नाम) अपनी बेटी और उसकी नवजात बच्ची की देखभाल कर रही थीं इसी दौरान उन्होंने जोड़ों में दर्द होने की शिकायत की. जिस नर्स से वह बात कर रही थीं उसे लगा कि शायद सरिता को यह दर्द मेनोपॉज़ के गंभीर लक्षणों के कारण हो रहा है और उन्हें मेनोपॉज़ क्लिनिक के लिए रेफर कर दिया.

संगीता अस्पताल में सफाई का काम करती हैं
इमेज कैप्शन, अस्पताल में सफ़ाई का काम करने वाली संगीता

संगीता जो उसी अस्पताल में सफाई का काम करती हैं. उनको अभी तक इस क्लिनिक के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

उन्हें थकान रहती है, रातों को नींद नहीं आती है, कमर में और पेट में दर्द बना रहता है.

संगीता पिछले कुछ सालों से इन सारी चीज़ों से गुज़र रही हैं. उन्होंने बताया कि उनकी उम्र 42-43 वर्ष है और उन्हें दो साल पहले पीरियड्स हुए थे.

संगीता अपनी दिनचर्या की शुरुआत सुबह 4 बजे करती हैं और रात को 11 बजे समाप्त करती हैं. काम के बीच में संगीता अपने घरेलू कार्य करती हैं और बच्चों की देखभाल करती हैं और मेनोपॉज़ के लक्षणों को झेलती हैं.

संगीता हताशा के साथ कहती हैं कि “कभी कभी मुझे लगता है कि मेरी मौत के साथ ही मेरा दर्द खत्म होगा. इससे बेहतर है कि मैं मर जाऊं. इस तरह से जिए जाने का क्या मतलब है.”

अगर मेनोपॉज़ के लक्षणों का इलाज सही तरीके़ से नहीं किया गया तो जीवन को लेकर समस्याएं पैदा हो सकती हैं और कुछ मामलों में महिलाओं को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं जैसे कैंसर, दिल से जुड़ी समस्याएं और मांसपेशियों का कमज़ोर होने आदि का सामना करना पड़ता है.

डॉक्टरों का कहना है कि मेनोपॉज़ से जुड़े अधिकतर लक्षणों का इलाज संभव है.

डॉक्टर रेणुका कहती हैं कि 'तेज़ गर्मी लगने की समस्या समय के साथ ठीक हो जाती है. सही तरीके से खान पान और फ़ीज़ियोथैरेपी से शरीर के दर्द से आराम दिलाती है. गंभीर लक्षणों के इलाज के लिए हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (एचआरटी) मौजूद है. अगर सही से इलाज किया जाए तो समय के साथ मेनोपॉज़ से जुड़ी समस्याएं ठीक हो जाती हैं.'

मेनोपॉज़ के दौरान महिलाओं में एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन में गिरावट देखी जाती है. यह हारमोन महिलाओं में प्रजनन से जुड़े स्वास्थ्य, हड्डियों और दिमाग से जुड़े कार्यों को नियंत्रित करते हैं.

एचआरटी इन हार्मोन की भरपाई करता है जिससे मेनोपॉज़ के समय पैदा होने वाले लक्षणों से राहत मिलती है.

हालांकि यह इलाज काफ़ी मंहगा है इसलिए ग़रीब महिलाओं के लिए यह इलाज करा पाना संभव नहीं है.

संगीता महीने के 12 हज़ार रुपये ही कमाती हैं.

संगीता असहाय महसूस करते हुए कहती हैं, “अगर मैं अपने इलाज पर महीने के 2000 से 3000 रुपये ख़र्च करूंगी तो, मैं अपने बच्चों का पालन कैसे करूंगी? मेरे लिए यह इलाज कराना पाना संभव नहीं है.”

भारत में मेनोपॉज़ से जुड़े क्लिनिक और इलाज की है कमी

भारत में मेनोपॉज से जुड़े क्लिनिक की है कमी
इमेज कैप्शन, भारत में मेनोपॉज़ के इलाज के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की कोई विशेष व्यवस्था नहीं है

हर किसी के लिए मेनोपॉज़ क्लिनिक तक पहुंच पाना और इलाज कराना मुमकिन नहीं है. दिल्ली का राम मनोहर लोहिया अस्पताल एक सरकारी अस्पताल है जहां मेनोपॉज़ क्लिनिक का संचालन होता है. हालांकि भारत के मेट्रो शहरों में इस तरह के प्रयास सीमित हैं. भारत के ग्रामीण इलाकों में स्थित स्वास्थ्य केंद्रों में ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं के लिए इलाज की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है.

अतुल शर्मा कहती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में मेनोपॉज़ से गुज़र रही महिलाओं के लिए कोई सुविधा नहीं है. यहां तक की जो नर्स यहां पर आती है वो कहती हैं कि “अब इसके लिए भी दवाई मांगोगी” बस इसे सहन करो. ऐसा महिला के साथ होता है.

वो दावा करती हैं कि अगर ग्रामीणों क्षेत्रों में प्राथमिक चिकित्सा कर्मी महिलाओं की मदद करना भी चाहे तो उन्हें मेनोपॉज़ को लेकर कोई विशेष दवाइयां और प्रशिक्षण नहीं दिया गया है.

भारत में मेनोपॉज़ का सामना कर रही महिलाओं की आबादी बढ़ रही है. विश्व में मेनोपॉज़ को लेकर औसत आयु 50 साल है लेकिन भारत में यह आयु 46 से 47 साल है.

इंडियन मेनोपॉज़ सोसाइटी की अध्यक्ष डॉक्टर अंजु सोनी कहती हैं कि भारतीय महिलाओं की औसत जीवनप्रत्याशा 1947 में 32 साल थी. यह अब बढ़कर 70 साल हो गई है. इसका मतलब यह है कि भारतीय महिलाएं अपने जीवन का एक तिहाई हिस्सा मेनोपॉज़ के बाद जीती हैं.

डॉक्टर सोनी ने बताया कि 2011 की जनगणना के मुताबिक़ 9.6 करोड़ (96 मिलियन) महिलाओं की आयु 45 वर्ष से अधिक थी. 2026 तक यह यह अनुमान लगाया गया है कि यह संख्या कई गुना बढ़कर 400 मिलियन हो सकती है.

2030 तक पूरे विश्व में मेनोपॉज़ का सामना कर रही और मेनोपॉज़ की अवस्था को पार कर चुकी महिलाओं की आबादी 1.2 बिलियन होने का अनुमान है. जिसमें हर साल 47 मिलियन लोग शामिल होंगे.

विकसित देश मेनोपॉज़ को लेकर नीतियां बना रहे हैं

यूनाइटेड किंगडम का कहना है कि मेनोपॉज़ के लक्षणों से महिलाओं के कार्य करने की क्षमता पर दीर्घकालीन और पर्याप्त प्रभाव पड़ता है तो इन लक्षणों को विकलांगता माना जा सकता है.

यूके ने हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी के मुल्यों को भी घटाया है.

ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने इसी तरह के कदम उठाए हैं.

हालांकि भारत में मेनोपॉज़ को लेकर कोई नीति नहीं है.

2023 में तत्कालीन महिला और बाल विकास विभाग की मंत्री स्मृति इरानी ने लोकसभा में कहा था कि इस वक़्त भारत के निजी और सरकारी क्षेत्रों में नौकरीपेशा महिलाओं के लिए मेनोपॉज़ को लेकर कई नीति नहीं है. भारत सरकार के विभिन्न कार्यक्रमों की सहायता से और प्रचार-प्रसार के ज़रिए महिला स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों जैसे मेनोपॉज़ और शिक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाई जा रही है.

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रयास काफी नहीं हैं.

महिलाओं के प्रजनन से जुड़े स्वास्थ्य पर सरकार के ध्यान देने से मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आई है. लेकिन अब इससे आगे बढ़कर प्रयास करने की आवश्यकता है जिससे हर आयु वर्ग की महिलाओं की मदद की जा सके.

डॉक्टर अंजु सोनी कहती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार के पास पहले से ही स्वास्थ्य कर्मियों का नेटवर्क मौजूद है. आप गर्भवती महिलाओं को कैल्शियम और आयरन की गोलियां देते हैं और महिलाओं को आप पौष्टिक आहार और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराते हैं अब इसका उपयोग मेनोपॉज़ को लेकर करने की ज़रूरत है.

उनका मानना है कि एचआरटी इलाज में सब्सिडी देने से लाखों गरीब महिलाओं को मदद मिलेगी.

जब तक यह नहीं होता है, संगीता और उनकी जैसी कई महिलाओं को मेनोपॉज़ के दर्द और शर्म के साथ जीना होगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)