चंगेज़ ख़ाँ दुनिया के बड़े हिस्से को जीतने के बावजूद भारत से क्यों लौट गया था?

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी

अब से तकरीबन 800 साल पहले एक मंगोल ख़ानाबदोश ने काले सागर से प्रशांत महासागर तक, एक विशाल साम्राज्य कायम किया था.

उसका नाम था तेमुजिन, जिसे बाद में पूरी दुनिया में चंगेज़ ख़ाँ के नाम से जाना गया.

सन 1162 में मशहूर बैकाल झील के पूर्व में एक ऊबड़-खाबड़ इलाक़े में एक दिलेर ख़ानाबदोश के यहाँ एक लड़के का जन्म हुआ.

'द सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ़ मंगोल' में ज़िक्र है कि जब उसका जन्म हुआ तो हथेली में ख़ून का एक थक्का था, जिसे उन लोगों ने एक महान विजेता होने की निशानी के रूप में देखा.

उसके पिता को दुश्मनों ने ज़हर देकर मार डाला था और वह बहुत कम उम्र में बेसहारा हो गया था.

नाम में ख़ाँ होने की वजह से कई लोग उसको मुसलमान समझ लेते हैं, ख़ाँ दरअसल एक आदरसूचक उपाधि है, वह मंगोल था और शामानी धर्म को मानता था, जिसमें आसमान की पूजा करने की परंपरा रही थी.

चंगेज़ ने अपना शुरुआती जीवन जहालत, शर्मिंदगी और ग़रीबी में बिताया.

50 साल की उम्र में जाकर उसने जीत का जो सिलसिला शुरू किया, उसने उसे दुनिया के महान योद्धाओं की श्रेणी में ला खड़ा किया.

उसके नेतृत्व में मंगोल राजवंश का उदय हुआ, जिसने पूरे चीन, मध्य एशिया, ईरान, पूर्वी यूरोप और रूस के एक बड़े हिस्से पर राज किया.

चंगेज़ के सैनिक ऑस्ट्रिया, फ़िनलैंड, क्रोएशिया, हंगरी, पोलैंड, वियतनाम, बर्मा, जापान और यहाँ तक कि इंडोनेशिया तक पहुंचे.

एफ़ ई क्राउज़ अपनी किताब 'इपॉक डिर मोंगोलेन' में लिखते हैं, "चंगेज़ का साम्राज्य एक करोड़ बीस लाख वर्ग मील में फैला हुआ था यानी अफ़्रीका महाद्वीप के बराबर और उत्तरी अमेरिका महाद्वीप से बड़ा इलाका. इसकी तुलना में रोमन साम्राज्य बहुत छोटा था."

सिकंदर महान के पास अपने पिता फ़िलिप की बनाई विशाल युद्ध मशीनरी थी. जूलियस सीज़र के पास 300 वर्ष पुराना रोमन सैनिक श्रेष्ठता का इतिहास था.

नेपोलियन फ़्रेंच क्रांति के बाद मिले जन समर्थन की बदौलत राज कर पाए थे. इनकी तुलना में चंगेज़ को अपनी परंपराएं ख़ुद ईजाद करनी पड़ी थीं. तमाम राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं से जूझते हुए उसने बहुत मुश्किल से अपने लिए जगह बनाई थी.

सौतेले भाई की हत्या

जवान होते ही उसने बाज़ों के साथ पक्षियों का शिकार करने की कला सीखनी शुरू कर दी थी. इसे उस ज़माने में भावी नेता के लिए एक आवश्यक गुण माना जाता था. चंगेज़ ने कभी भी लिखना और पढ़ना नहीं सीखा.

13 साल की उम्र में उसने अपने सौतेले भाई बेहतेर की हत्या कर दी.

फ़्रैंक मैकलिन अपनी किताब 'गैंगिस ख़ान द मैन हू कॉन्क्वर्ड द वर्ल्ड' में लिखते हैं, "इतनी कम उम्र में की गई हत्या बताती है कि चंगेज़ ख़ाँ में निर्दयता का पुट जन्मजात था. किशोरावस्था में ही उसमें भविष्य के बारे में सोचने की क्षमता विकसित हो गई थी. बेहतेर को वो अपना प्रतिद्वंदी मानता था, जिसका उसके पिता का वारिस बनने का दावा उससे अधिक था क्योंकि वो उसका सबसे बड़ा बेटा था."

धीरे-धीरे चंगेज़ ने एक युवा सिपहसालार के तौर पर अपनी जगह बनानी शुरू कर दी. चंगेज़ ने लगभग अपना पूरा जीवन तंबुओं और लड़ाई में बिताया. नागरिक प्रशासन पर ध्यान देने का उसे समय ही नहीं मिला.

मशहूर ईरानी इतिहासकार मिनहाज अल सिराज जुज़जानी ने लिखा है, "चंगेज़ बहुत बड़ी क्षमताओं वाला शख़्स था, जिसने अपनी सेना का ईश्वर की तरह नेतृत्व किया. जब वो ख़रासान आया था तो उसकी उम्र थी 65 वर्ष. वो लंबे और गठीले बदन का शख़्स था. उसके चेहरे पर बहुत कम बाल थे जो तब तक सफ़ेद हो चले थे. उसकी आँखे बिल्लियों की तरह थीं. उसके शरीर में ज़बरदस्त ऊर्जा थी. दुश्मनों के लिए उससे निर्दयी कोई नहीं हो सकता था."

ज़हरीले तीर से घायल हुआ

जमूगा के साथ हुई लड़ाई में चंगेज़ की गर्दन में एक ज़हरीला तीर आकर लगा था.

फ़्रैंक मैकलिन लिखते हैं, "उस ज़माने में तीरों पर साँप का ज़हर लगाया जाता था. ये दाँतदार तीर होते थे जो शरीर में एक बार घुसने के बाद अधिक देर तक रहते थे और ज़हर को तेज़ी से फैलने का मौक़ा देते थे. इसका इलाज होता था चोट को धोकर घायल व्यक्ति को दूध पिलाना लेकिन चंगेज़ की चोट गंभीर थी क्योंकि तीर से उसके गर्दन की एक नस कट गई थी और उसमें से तेज़ी से ख़ून बह रहा था. ऐसे समय में चंगेज़ के एक कमांडर जेल्मे ने उसकी जान बचाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी. जेल्मे खून का बहना तो नहीं रोक पाया लेकिन उसने चंगेज़ की गर्दन से विषाक्त ख़ून को चूसकर थूकना शुरु कर दिया."

थोड़ी देर में चंगेज़ को होश आ गया. जेल्मे ने उसके लिए दूध की व्यवस्था कर उसकी जान बचाई.

लेकिन चंगेज़ ने उसके साथ असभ्य व्यवहार करते हुए कहा था, 'क्या तुम उस ज़हरीले ख़ून को थोड़ी दूर नहीं थूक सकते थे?'

कई अवगुण थे चंगेज़ में

चंगेज़ की शख़्सियत के कई स्याह पहलू रहे हों लेकिन अधिकतर इतिहासकारों का मानना है कि उसके राजनीतिक कौशल के बारे में किसी को संदेह नहीं है.

रूस के इतिहास पर काम करने वाले जॉर्ज वेरनाड्स्की ने अपनी किताब 'मंगोल्स एंड रशा' में लिखा था, "चंगेज़ सैनिक रणनीति का बेजोड़ उस्ताद था लेकिन युद्ध के कमांडर के तौर पर वो उतना प्रभावशाली नहीं था. लोगों का दिमाग़ और मानव मनोविज्ञान पढ़ने की उसकी क्षमता ग़ज़ब की थी. उसकी कल्पनाशीलता भी प्रशंसनीय थी. वो कई निजी सदमों से उबर कर ऊपर आया था. वो दूरदर्शी, संयमित और चालाक व्यक्ति था. लेकिन उसमें निर्ममता, एहसानफ़रामोशी और प्रतिशोधी होने के अवगुण भी थे."

मर्किट के साथ लड़ाई में चंगेज़ की पत्नी बोर्ते का अपहरण कर लिया गया था. 'द सीक्रेट लाइफ़ ऑफ़ मंगोल' में चंगेज़ का आलोचना की गई है कि उसने अपनी पत्नी को मर्किट के हाथ पड़ जाने दिया जबकि दूसरी महिलाएं जिसमें उसकी माँ होएलुन भी शामिल थीं, मर्किट्स के चंगुल से बच निकली थीं.

इस किताब में इस बात का ज़िक्र है कि बोर्ते का इसलिए अपहरण हुआ क्योंकि चंगेज़ उसके घोड़े पर खुद सवार हो गया. चंगेज़ की माँ ने बेहतेर की हत्या के बाद उसे धिक्कारते हुए 'जानवर' और 'शैतान' तक कहा था.

चंगेज़ के बारे में कहा जाता है कि वो बहुत अधिक सतर्क और चौकस रहने में विश्वास करता था. सबसे आगे रहकर सेना का नेतृत्व करना उसकी फ़ितरत में नहीं था.

चंगेज़ का ख़तरनाक गुस्सा

चंगेज़ गुस्से में अक्सर अपना आपा खो बैठता था. 1220 के दशक में ट्रांजोक्सियाना पर कब्ज़ा करने के बाद उसने पश्चिम एशिया के मुस्लिम राजकुमारों से पत्र व्यवहार के लिए एक दुभाषिए और लिपिक की सेवाएं लीं.

मिनहाज सिराज जुज़दानी अपनी किताब 'तबाकत-ए-नासिरी' में लिखते हैं, "चंगेज़ को ख़बर मिली कि मोसुल का राजकुमार सीरिया पर हमला करने वाला है. उसने अपने लिपिक से उसे एक पत्र लिखवा कर कहा कि वो ऐसा करने की जुर्रत न करे. लिपिक ने कूटनीतिक समझ दिखाते हुए अपनी तरफ़ से उस पत्र की भाषा थोड़ी नर्म कर दी और मोसुल के राजकुमार के लिए इस्लामिक दुनिया में प्रचलित आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया. जब चंगेज़ ने उस पत्र का मंगोलियन भाषा में पढ़वाया तो वो आगबबूला हो गया. उसने काँपते हुए लिपिक से कहा, 'तुम ग़द्दार हो. मोसुल का राजकुमार तो ये पत्र पढ़कर और अहंकारी हो जाएगा."

उसने ताली बजाकर अपने एक सिपाही को बुला कर उसे जान से मारने का आदेश दे दिया.

क्रूरता के साथ दरियादिली भी

चंगेज़ की निर्दयता के और भी क़िस्से मशहूर हैं. उसके समय में किसी भी शहर पर कब्ज़ा करने के बाद युवाओं और शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्तियों को छोड़कर बाकी लोगों को मैदान में खड़ा करके तीर से मार देना आम बात होती थी.

जैकब एबट अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ़ गैंगिस ख़ाँ' में लिखते हैं, "एक बार एक बुज़ुर्ग महिला ने मंगोलों से उसकी जान बख़्श देने का अनुरोध किया. उसने वादा किया कि उसके बदले में वो उन्हें एक क़ीमती मोती देगी. चंगेज़ के सिपाहियों ने उससे पूछा कि वो मोती कहाँ है? महिला ने कहा कि उसने वो मोती निगल लिया है. मंगोलों ने मोती पाने के लिए अपनी तलवारों से उसका पेट चीर दिया. उन्हें वो मोती मिल गया. उस सफलता से उन्हें लगा कि दूसरी महिलाओं ने भी इसी तरह मोती निगल कर उन्हें छिपाने की कोशिश की होगी. नतीजा ये हुआ कि बहुमूल्य मोतियों की तलाश में उन्होंने कई महिलाओं के पेट चीर डाले."

चंगेज़ को अपने नाती-पोतों से बहुत प्यार था. पॉल राचनिउस्की अपनी किताब 'गैंगिस ख़ाँ हिज़ लाइफ़ एंड लेगेसी' में लिखते हैं, "एक बार जब उसका एक पोता बामियान की घेराबंदी के दौरान मारा गया था उसने उस इलाक़े में सबको मार डालने के आदेश दिए जिसमें कुत्ते, बिल्ली और मुर्गियाँ भी शामिल थीं."

लेकिन उसमें अचानक दरियादिली दिखाने की भी ग़ज़ब की क्षमता थी. एक बार जब उसने एक किसान को चिलचिलाती धूप में पसीना बहाते हुए देखा तो उसने उसके सारे कर माफ़ कर दिए और उसे बंधुआ मज़दूरी से आज़ाद कर दिया.

क्रूरता को ठहराया तर्कसंगत

सारे इतिहासकार क़रीब क़रीब एकमत हैं कि चंगेज़ ख़ाँ एक क्रूर, प्रतिशोधी और विश्वासघाती शख़्स था. कुछ इतिहासकार तो उसे मनोरोगी तक क़रार देते हैं, जिसने लोगों को मारने की अपनी हवस को तर्कसंगत होने का जामा पहनाते हुए हुए कहा कि उसने हमेशा ग़द्दार, कपटी और देशद्रोही लोगों के ही प्राण लिए.

वर्नाड्स्की लिखते हैं, "इस मामले में उसके समकक्ष उसे असाधारण नहीं मानते थे क्योंकि 21वीं सदी में हम जिन चीज़ों को अपराध मानते हैं, तेरहवीं सदीं में वो आम बात थीं और ईसाई आक्रमणकारी भी उससे अछूते नहीं रहे थे. क्रूरता में उसकी ख्याति 16वीं सदी के इंग्लैंड के हेनरी अष्टम से कम थी. क्रूरता में तैमूरलंग और यहाँ तक कि चीनी भी उससे बढ़ कर थे."

चंगेज़ ख़ाँ ने हमेशा दावा किया कि उसकी 'आत्मसमर्पण करो या मरो' की नीति ने हमेशा उसके दुश्मनों को अपनी जान बचाने का मौक़ा दिया. उसने उनके प्राण तभी लिए जब उन्होंने इस विकल्प का प्रयोग नहीं किया. चंगेज़ के बारे में कहा जाता है कि वो अपना साम्राज्य फैलाने में इतना व्यस्त रहा कि कभी घोड़े से नीचे नहीं उतरा. वो कभी आरामदेह बिस्तर पर नहीं सोया. वो आम तौर से भूखा रहा और उसे हमेशा अपनी मौत का डर सताता रहा.

भारत की सीमा से वापस लौटा चंगेज़

सन 1211 से लेकर 1216 तक का पाँच वर्ष का समय चंगेज़ ने मंगोलिया से दूर चीन को फ़तह करने के अपने लक्ष्य में लगाया. जलालउद्दीन का पीछा करते करते चंगेज़ भारत की सीमा तक पहुंच गया. चंगेज़ और जलाल की सेना के बीच आख़िरी लड़ाई सिंधु नदी के तट पर हुई.

चंगेज़ ने जलाल की सेना को तीन तरफ़ से घेर लिया. उसके पीठ के पीछे सिंधु नदी बह रही थी. विलहेल्म बारथोल्ड अपनी किताब 'तुर्किस्तान डाउन टु द मंगोल इनवेशन' में लिखते हैं, "जलाल ने अपनी सारी नौकाएं नष्ट करवा दीं ताकि उसके सैनिक लड़ाई के मैदान से भाग न सकें. चंगेज़ के पास उससे अधिक सैनिक थे. चंगेज़ के पहले हमले को जलाल ने नाकाम किया लेकिन चंगेज़ के साथ दिक्कत थी कि बहुत छोटे से इलाके में उसके सैनिक फैले हुए थे जिसकी वजह से उन्हें तीर चलाने में दिक्कत हो रही थी और तलवारों से लड़ना पड़ रहा था."

इस लड़ाई का वर्णन करते हुए मोहम्मद नेसावी लिखते हैं, "जब मंगोलों का दबाव बढ़ने लगा, जलालउद्दीन ने अपने घोड़े समेत 180 फ़ीट गहरी सिंधु नदी में छलाँग लगा दी. 250 ग़ज़ की चौड़ाई पार करते हुए जलाल नदी के दूसरे तट पर पहुंच गया. चंगेज़ ने जलालउद्दीन की दिलेरी देख अपने तीरंदाज़ों को उसका निशाना लेने से मना कर दिया लेकिन उसके दूसरे साथियों को उसने नहीं बख्शा, चंगेज़ के तीरंदाज़ों ने सटीक निशाना लेते हुए उनमें से अधिकतर को मार डाला. जलाल के सभी बेटों और पुरुष रिश्तेदारों को चंगेज़ ने मौत की सज़ा सुनाई."

जलालउद्दीन ने वहाँ से दिल्ली का रुख़ किया लेकिन वहाँ के सुल्तान इल्तुतमिश ने मंगोलों के हमले के डर से उसे आधिकारिक शरण देने से इनकार कर दिया.

भारत की गर्मी ने किया परेशान

जलाल दिल्ली तो नहीं पहुंचा लेकिन भारत में ही तब तक रहा जब तक चंगेज़ ने उसका पीछा करने का विचार त्याग नहीं दिया.

जब जलाल इस बारे में सुनिश्चित हो गया कि चंगेज़ अपने देश मंगोलिया लौट गया है तब वो नौका के ज़रिए सिंधु नदी के मुहाने से निकला और फिर समुद्री रास्ते से ईरान पहुंच गया.

चंगेज़ के पुराने इतिहास को देखते हुए ये आश्चर्यजनक था कि उसने जलालउद्दीन का पीछा करने का विचार त्याग दिया और भारत के अंदर अपनी सेना नहीं भेजी.

फ़्रैंक मैकलिन लिखते हैं, 'दरअसल, चंगेज़ ने बाला और दोरबी दोक्श्न के नेतृत्व में दो टुकड़ियाँ भारत भेजी थी. उन्होंने सिंध नदी पार कर लाहौर और मुल्तान पर हमला भी बोला था लेकिन वो मुल्तान पर कब्ज़ा नहीं कर पाए. उनके आगे न बढ़ पाने का कारण वहाँ पड़ रही गर्मी थी, जिसके कि वो बिल्कुल भी आदी नहीं थे."

दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने जहाँ जलालुद्दीन को शरण नहीं दी, वहीं उसने चंगेज़ को भी जलालउद्दीन का पीछा करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया.

जॉन मेक्लॉयड अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया' में लिखते हैं, "इल्तुतमिश ने साफ़ इनकार कर चंगेज़ को नाराज़ नहीं किया. उसने भारत में घुसकर जलालउद्दीन का पीछा करने के चंगेज़ के अनुरोध पर न तो हाँ कहा और न ही न. चंगेज़ ने इल्तुतमिश की मंशा को पहचान लिया. वो समझ गया कि इल्तुतमिश इस मुद्दे पर उससे युद्ध नहीं चाहता है. वो भी इल्तुतमिश से लड़ाई करने के मूड में नहीं था."

द्र विंक अपनी किताब 'स्लेव किंग्स एंड द इस्लामिक कॉन्क्वेस्ट' में लिखते हैं, "चंगेज़ के लिए भारत की गर्मी बर्दाश्त के बाहर थी. इसी वजह से चंगेज़ के सिपहसालारों ने वापस लौटने का फ़ैसला किया."

घोड़ों और उनके चारे की कमी

चंगेज़ के सामने दूसरी समस्या घोड़ों की थी. इब्न बतूता ने भी ज़िक्र किया है कि मंगोल सेना के दस हज़ार घोड़ों की टुकड़ी को 250 टन चारे और ढाई लाख गैलन पानी की ज़रूरत पड़ती थी. सिंध और मुल्तान में पानी तो उपलब्ध था लेकिन चारा नहीं.

दूसरे उस इलाक़े में उच्च कोटि के घोड़ों की भी कमी थी इसलिए अतिरिक्त घोड़ों का इंतज़ाम नहीं किया जा सकता था. इसके अलावा चंगेज़ इतनी अधिक भूमि जीत चुका था कि उस पर नियंत्रण करने के लिए उसके पास पर्याप्त सैनिक नहीं थे. फिर सैनिकों के स्वास्थ्य का मुद्दा भी था.

फ़्रैंक मेकलिन लिखते हैं, "चंगेज़ के बहुत से सैनिक बुख़ार और इस इलाके की बीमारियों के शिकार हो गए थे. चंगेज़ को आगे पड़ने वाले भारत के जंगलों और पहाड़ों के बारे में भी सटीक ख़ुफ़िया जानकारी नहीं थी. चंगेज़ अंधविश्वासी शख़्स भी था. उसके सैनिकों की नज़र एक गैंडे पर गई थी जिसे आगे बढ़ने के लिए अपशकुन माना गया था. इन्हीं सबके बीच चंगेज़ ने वापस अपने देश लौटने का फ़ैसला किया था."

चंगेज़ का आख़िरी संदेश

जुलाई 1227 आते-आते चंगेज़ का स्वास्थ्य गिरने लगा था. एक दिन उसने अपने सभी बेटों और विश्वासपात्र जनरलों को अपनी पलंग के पास बुलाया.

मंगोल लोगों को बताया गया था कि चंगेज़ को बुख़ार है लेकिन चंगेज़ की पलंग के पास खड़े लोगों को अंदाज़ा था कि वो बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सकेगा.

आर डी थैक्सटन अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ़ मंगोल्स' में लिखते हैं, "मृत्यु शैया पर लेटे चंगेज़ ने अपने बेटों से कहा, 'ज़िंदगी बहुत छोटी है. मैं पूरी दुनिया नहीं जीत सका. तुम्हें ये काम पूरा करना होगा. मैं तुम्हारे लिए दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य छोड़ कर जा रहा हूँ. इसकी रक्षा सिर्फ़ एक बात से हो सकती है कि तुम संगठित रहो. अगर तुम आपस में लड़ोगे तो ये साम्राज्य तुम्हारे हाथ से फिसल जाएगा."

कुछ समय बाद ही चंगेज़ ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.