पाकिस्तानी पायलट सरेंडर से बचने के लिए कैसे ढाका से भागे थे?

    • Author, मुनज़्ज़ा अनवर
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद

यह 15 दिसंबर, 1971 की रात थी. पाकिस्तानी सेना भारत के सामने औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण करने की तैयारी कर रही थी. ढाका में तैनात पाकिस्तानी सेना के चौथे एविएशन स्क्वाड्रन को अपने हेलीकॉप्टरों और हथियारों को नष्ट करने के आदेश मिले थे.

लेकिन ये पायलट कैद नहीं होना चाहते थे. उनका इरादा ढाका से भाग निकलने का था.

योजना देखने में तो बहुत सरल थी. पायलट हेलीकॉप्टरों को नष्ट करने के बजाय उन्हें बर्मा ले जाना चाहते थे. इंडियन एयर फ़ोर्स का हवाई क्षेत्र पर पूरा नियंत्रण था.

ढाका भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी की कड़ी घेराबंदी में था और बाहर निकलने के सभी रास्ते बंद हो रहे थे.

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आख़िरकार इन पायलटों ने उड़ान भरी. लेकिन ये लोग आख़िरकार कैसे बच निकले?

इसका जवाब खोजने के लिए हमें 54 साल पहले की उस अंधेरी और निर्णायक रात में वापस जाना होगा, जहां इस अभियान की कहानी इसमें भाग लेने वाले अधिकारियों के शब्दों में सामने आती है.

उस समय इस स्क्वाड्रन की कमान पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट कर्नल सैयद लियाक़त बुख़ारी के पास थी और यह ढाका में तैनात थी.

स्क्वाड्रन के पास पांच एमआई-8 और चार अलूएट-3 हेलीकॉप्टर थे.

3 दिसंबर, 1971 की शाम को पाकिस्तानी वायु सेना ने भारत पर हवाई हमले शुरू कर दिए थे. इसके तुरंत बाद उसी रात भारतीय विमानों ने ढाका हवाई अड्डे पर हमला किया.

भारतीय विमान हर रात आते थे और ढाका हवाई अड्डे के रनवे को उड़ा देते थे.

यह युद्ध की शुरुआत थी. लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) अली कुली ख़ान उस समय मेजर और एमआई-8 पायलट थे. वे 10 अप्रैल, 1971 को ढाका पहुंचे थे.

बीबीसी से बात करते हुए सेवानिवृत्त जनरल अली कुली ख़ान ने कहा कि 26 मार्च को विद्रोह शुरू होने के बाद मुक्ति वाहिनी ने कई स्थानों पर नियंत्रण कर लिया था.

उस समय ढाका में केवल एक ही हवाई अड्डा था. अली कुली ख़ान के अनुसार, तीन दिसंबर की रात जब हमला हुआ, तो पहले ही दिन ढाका पर भारतीय एयर फ़ोर्स ने लगभग 130 बार हमला बोला.

कुली ख़ान बताते हैं, "इंडियन एयर फ़ोर्स ने हवाई अड्डे को उड़ा दिया. इसके बाद पाकिस्तानी वायु सेना के विमान वहां से उड़ान नहीं भर सके, लेकिन पाकिस्तान सेना के चौथे एविएशन स्क्वाड्रन के हेलीकॉप्टर अब भी बचे हुए थे."

ढाका के आसमान पर इंडियन एयर फ़ोर्स का नियंत्रण

भारतीय वायु सेना के ख़ौफ़ के कारण पाकिस्तानी सेना के हेलीकॉप्टर अधिकांश उड़ानें रात में ही भरते थे.

पाकिस्तानी पायलट कभी राशन तो कभी गोला-बारूद ढोते रहते थे, लेकिन ये उड़ानें रात के अंधेरे में ही भरी जाती थीं.

ढाका के आसमान पर भारत का दबदबा था. पायलटों को यह भी नहीं पता होता था कि लैंडिंग के समय उन्हें अपनी सेना दिखेगी या दुश्मन की.

'हिस्ट्री ऑफ पाकिस्तान आर्मी एविएशन 1947 से 2007' नामक पुस्तक में मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) मुहम्मद आज़म और मेजर (सेवानिवृत्त) अमीर मुश्ताक चीमा लिखते हैं कि 'उचित नेविगेशनल उपकरणों और साज़ो-सामान के बिना अंधेरी रातों में बहुत कम ऊंचाई पर उड़ान भरना बेहद ख़तरनाक था.'

भागने की योजना

अली कुली ख़ान के अनुसार, जब "हमारे कमांडिंग ऑफिसर 15 दिसंबर की शाम को पूर्वी कमान पहुंचे, तो उन्हें बताया गया कि जनरल नियाज़ी ने 16 दिसंबर को आत्मसमर्पण करने का फ़ैसला किया है. इसलिए पूर्वी कमान के चीफ ऑफ स्टाफ ब्रिगेडियर बाकिर सिद्दीकी ने आत्मसमर्पण करने के निर्देश दिए. साथ ही उन्होंने तोपों, टैंकों और हेलीकॉप्टरों सहित सभी भारी उपकरणों को नष्ट करने का आदेश दिया."

"जब हमारे कमांडिंग ऑफिसर ने यह सुना, तो उन्होंने कहा कि हम आत्मसमर्पण करने और जहाज़ों को नष्ट करने के बजाय यहां से निकल सकते हैं."

अली कुली ख़ान के अनुसार, उस समय बाहर निकलने के दो रास्ते थे.

"एक मार्ग बर्मा (अब म्यांमार) में अक्याब था. यह चटगांव के दक्षिण में स्थित था और पाकिस्तानी पायलट वहां उड़ान भर सकते थे. दूसरा मार्ग नेपाल था."

लेकिन अक्याब जाना बेहतर था. अक्याब का मौजूदा नाम सित्तवे है. ये बर्मा के रखाइन प्रांत की राजधानी है.

अली कुली ख़ान के अनुसार, फ़ैसला यह था कि 'हम अपने हथियार नहीं डालेंगे और अपने हेलीकॉप्टरों को बर्मा ले जाएंगे.'

भागने की ख़बर जंगल की आग की तरह फैल गई

अतिरिक्त ईंधन के साथ एमआई-8 लगभग 24 यात्रियों को ले जाने में सक्षम था, जबकि अलूएट-3 हथियारों के साथ तीन से चार यात्रियों को ले जा सकता था. हालांकि समस्या यह थी कि उस समय इस स्क्वाड्रन के सभी हेलीकॉप्टर ढाका छावनी में अलग-अलग जगह खड़े थे.

अली कुली ख़ान के अनुसार, उन्हें अपना हेलीकॉप्टर तैयार करने का आदेश मिला और उनसे कहा गया, "आप हेलीकॉप्टर तैयार कर लीजिए, हम आपको यात्रियों के बारे में बता देंगे."

रिटायर्ड ब्रिगेडियर सैयद लियाक़त बुख़ारी ने हिस्ट्री ऑफ़ पाकिस्तान आर्मी एविएशन को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि ब्रीफ़िंग के दौरान पायलटों को 16 दिसंबर, 1971 को सुबह 3 से 3:35 बजे के बीच उड़ान भरने का निर्देश दिया गया था.

आदेश था कि हर हेलीकॉप्टर पांच मिनट के अंतराल पर उड़ान भरेगा. एमआई-8 हेलीकॉप्टर बीवर हेलीकॉप्टरों के बाद उड़ान भरेंगे और अलूएट हेलीकॉप्टर अतिरिक्त ईंधन के साथ धीमी गति से उड़ान भरेंगे.

पहली उड़ान कमांडिंग ऑफिसर लियाक़त बुख़ारी को भरनी थी, लेकिन उड़ान से पहले अफ़रा-तफ़री मच गई क्योंकि भागने की ख़बर जंगल की आग की तरह फैल गई थी और दो-तीन सौ लोग जमा हो गए थे. हर कोई हेलीकॉप्टर में सवार होना चाहता था.

आख़िरकार हेलीकॉप्टर ने 40 यात्रियों के साथ उड़ान भरी.

लेफ्टिनेंट कर्नल आतिफ़ अल्वी उस समय सात साल के थे. उन्होंने मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) मुहम्मद आज़म और मेजर (सेवानिवृत्त) आमिर मुश्ताक चीमा को बताया, "हम छह भाई-बहन थे. आधी रात को मेरे पिता जल्दी में आए और मेरी मां से सामान पैक करने को कहा. मैंने अपना क्रिकेट बैट उठाया. फिर हम एक जीप में एक स्कूल पहुंचे, जहां एक बड़ा हेलीकॉप्टर खड़ा था और लोग चिल्ला रहे थे. जगह नहीं थी. मेरे पिता हमें वहां से दूसरी जगह ले गए और वहां हमें हेलीकॉप्टर में जगह मिल गई. लेकिन हमारे पिता पीछे छूट गए."

इन हेलीकॉप्टरों से सीटें हटा दी गई थीं और सारे उपकरण बाहर फेंक दिए गए थे. जब अली कुली ख़ान और उनके साथी पायलट रात में अपने हेलीकॉप्टर में सवार होने पहुंचे, तो वे कतार में दूसरे नंबर पर थे.

वे कहते हैं, "पांच मिनट बाद, जब हम उड़ान भरने ही वाले थे, कुछ महिलाएं आईं. उनके साथ बच्चे भी थे. उन्होंने कहा, 'हमें भी ले चलो.'"

"हमने उनसे कहा कि हमें कोई समस्या नहीं है, लेकिन हमारे हेलीकॉप्टर का रोटर थोड़ा क्षतिग्रस्त हो गया है. हम कोशिश कर रहे हैं कि अगर यह उड़ जाए, तो हम आपको भी ले जाएंगे."

उन्होंने कहा, "ठीक है."

कुछ महिलाएं और एक छोटा लड़का इस हेलीकॉप्टर में सवार होने में सफल रहे.

बादलों से घिरे आसमान में मुश्किल उड़ान

आसमान पर इंडियन एयर फ़ोर्स का राज था. लेकिन पाकिस्तानी पायलट एक के बाद एक उड़ान भरते हुए चटगांव तट के साथ-साथ उत्तर की ओर कम ऊंचाई पर उड़ते हुए अक्याब की ओर बढ़ रहे थे.

आख़िरी हेलीकॉप्टर को एमआई-8 के मेजर मंज़ूर कमाल बाजवा उड़ा रहे थे.

उन्होंने 'हिस्ट्री ऑफ पाकिस्तान आर्मी एविएशन' को बताया कि उस रात, "आसमान पूरी तरह से बादलों से ढका हुआ था, जिससे पायलटों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था."

जब ये हेलीकॉप्टर अक्याब पहुंचे, तब तक सुबह हो चुकी थी.

अली कुली ख़ान कहते हैं, "जब हमने अक्याब में हवाई अड्डा देखा, तो हम समुद्र की ओर मुड़े और व्यक्तिगत हथियारों, कैमरों, पहचान दस्तावेज़ों, लॉगबुक और पासपोर्ट सहित सभी सैन्य उपकरणों को समुद्र में फेंक दिया. फिर वापस लौटे और उतरे."

इससे पहले उन्होंने अपने हेलीकॉप्टरों से पाकिस्तानी सेना की निशानियां मिटा दी थीं.

अली कुली ख़ान का हेलीकॉप्टर सबसे पहले अक्याब पहुंचा था.

अली कुली ख़ान बताते हैं, "जब हम वहां उतरे और मैं विमान से बाहर आया, तो एक बर्मी सैनिक दौड़ता हुआ आया और मुझसे उर्दू में पूछा, 'क्या आप पाकिस्तानी हैं.' मैंने कहा, 'हां, मैं पाकिस्तानी हूं.' उसने पूछा, 'क्या आप सैनिक हैं.' मैंने कहा, 'नहीं, नहीं, हम बाढ़ सुरक्षाकर्मी हैं.' फिर उसने पूछा, 'क्या आप मुसलमान हैं.' मैंने कहा, 'हां.' उसने तुरंत अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा, 'मैं भी मुसलमान हूं और मेरा नाम मुस्तफ़ा कमाल है.'"

कुछ ही देर में बाक़ी हेलीकॉप्टर भी आने लगे. उनमें से अधिकतर में महिलाएं, बच्चे, सैनिक, साथ ही पायलट और मैकेनिक थे. कुल मिलाकर लगभग 170 लोग सात हेलीकॉप्टरों पर सवार होकर बर्मा पहुँचे थे.

हेलीकॉप्टर बर्मा से रवाना हो गए

अगले दिन एक विमान आया और महिलाओं और बच्चों को रंगून ले गया, जहां से पीआईए के एक विमान ने उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया. पायलट और अन्य सैनिक कुछ दिनों तक वहीं रुके रहे.

बाद में हर पायलट के साथ एक गनर को भेजा गया और उन्हें मैतिला हवाई अड्डे ले जाया गया. वहां से एक विमान उन्हें रंगून ले गया. वे वहां लगभग तीन सप्ताह तक रहे.

फिर एक दिन उन्हें बताया गया कि पीआईए का एक विमान रंगून में उतरेगा और उन्हें पश्चिमी पाकिस्तान ले जाएगा. इस तरह लगभग एक महीने बाद वे पाकिस्तान पहुंच गए.

उन्होंने अपने सभी हेलीकॉप्टर बर्मा में ही छोड़ दिए थे. फिर पाकिस्तान पहुंचने के दो-तीन हफ़्ते बाद उन्हें वापस जाकर अपने विमान लाने का आदेश दिया गया.

ये हेलीकॉप्टर बर्मा से बैंकॉक ले जाए गए. वहाँ से 23 जनवरी, 1972 को हेलीकॉप्टरों को हटाकर नावों पर रखा गया और उसी दिन समुद्री मार्ग से कराची भेज दिया गया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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