धनबाद में ज़हरीली गैस के रिसाव से दो महिलाओं की मौत और कई लोग बीमार

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- Author, मोहम्मद सरताज आलम
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, धनबाद से
झारखंड में धनबाद की बंद भूमिगत खदान के ऊपर बसे रिहायशी इलाक़े राजपूत बस्ती में ज़हरीली गैस के रिसाव से दो महिलाओं की मौत हो गई. वहीं बड़ी संख्या में लोगों के बीमार होने की ख़बर है.
ज़हरीली गैस की चपेट में आए दर्जनों लोगों को भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) के स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
धनबाद के ज़िला अधिकारी आदित्य रंजन ने बीबीसी को बताया, "खनन क्षेत्र होने के कारण गैस का रिसाव हुआ है, जिसमें कार्बन मोनोऑक्साइड का कंसन्ट्रेशन हाई था, जिससे होने वाली घुटन से दो महिलाओं की मौत हो गई."
हालांकि स्थानीय बीसीसीएल महाप्रबंधक गणेश साहा का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद मृत्यु के स्पष्ट कारणों का पता चल सकेगा.
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ज़िलाधिकारी आदित्य रंजन ने बताया, "छह घंटे के ऑब्ज़र्वेशन के बाद प्रभावितों को अस्पताल से छुट्टी दी जा रही है."
बीसीसीएल के सीएमडी मनोज अग्रवाल ने गैस रिसाव की घटना को स्वीकार किया और कहा, "शुक्रवार को मैंने अपनी टीम के साथ घर-घर जाकर देखा, वहां गैस का रिसाव तो है. लेकिन कहीं ज़्यादा तो कहीं कम है."
परिजनों ने क्या बताया?

मृतकों की पहचान बुज़ुर्ग प्रियंका देवी और ललिता देवी के रूप में हुई.
प्रियंका देवी की मौत बुधवार की शाम को हुई जबकि ललिता देवी ने गुरुवार को दम तोड़ा.
67 वर्षीय मृतक ललिता देवी राजपूत बस्ती की एक संकरी गली में दो कमरों के घर में रहती हैं. घर में उनका बेटा, बहू, पोता और पोती हैं.
शुक्रवार को ललिता देवी का अंतिम संस्कार हुआ. उनके बेटे सुजीत कुमार ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि बुधवार को उनकी मां रात में ठीक थीं लेकिन गुरुवार की सुबह जब गैस रिसाव की ख़बर फैली तो वो उनके कमरे में पहुंचे.
वो बताते हैं, "जब हम दरवाज़ा खोलकर अंदर पहुंचे तो मां की सांसें चल रही थीं. लेकिन अस्पताल जाते वक़्त उन्होंने दम तोड़ दिया."
उन्होंने आरोप लगाया, "बीसीसीएल की एम्बुलेंस में ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं थी. अगर ऑक्सीजन उपलब्ध होती तो मां बच जातीं." हालांकि बीसीसीएल ने इस आरोप का खंडन किया है.
सोमवार से हो रहा था रिसाव

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राजपूत बस्ती में गैस रिसाव की चपेट में आने वाला पहला परिवार महेश गोस्वामी का है जो यहां तीन पीढ़ियों से रह रहा है.
दो कमरों के घर में वो अपनी पत्नी शर्मीला देवी, दो बेटियों के साथ रह रहे थे लेकिन गैस रिसाव के बाद धनबाद शहर में अपने भाई के यहां चले गए.
उन्होंने बताया, "सोमवार की सुबह साढ़े पांच बजे मेरी दोनों बेटियां बेहोश होकर गिर गईं. उसके बाद मेरी पत्नी को भी सांस लेने में परेशानी होने लगी."
सूचना मिलने पर महेश के भाई तुरंत पहुंचे, तब तक महेश को भी सांस लेने में परेशानी होने लगी थी.
महेश ने बताया कि पूरे परिवार को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. हालांकि अब सभी अस्पताल से डिस्चार्ज हो गए हैं लेकिन लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे.
वो राजपूत बस्ती में एक छोटी सी दुकान चलाते हैं और अब उनके सामने भविष्य का संकट पैदा हो गया है.
वो कहते हैं, "हम अपने आवास पर कब और कैसे वापस जाएं, दोनों बेटियों की पढ़ाई को कैसे पूरा करें."
दर्जनों लोग बीमार

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इस गैस रिसाव से इलाक़े में बहुत से लोग बीमार पड़ गए हैं.
मृतक प्रियंका देवी के पड़ोस में रहने वाले सुरेंद्र सिंह ने बताया कि शुक्रवार को उनकी पत्नी भी बेहोश हो गई थीं जबकि उन्हें और उनकी भाभी को भी सांस लेने में दिक़्क़त हो रही थी.
तीनों लोगों को बीसीसीएल के सेंट्रल अस्पताल में भर्ती करना पड़ा है.
उसी इलाक़े में रहने वाले सदानंद बोस का दावा है कि पिछले तीन दिनों में कई दर्जन स्थानीय लोग गैस की चपेट में आ चुके हैं.
अस्पताल तक कितने मरीज़ पहुंच रहे हैं? इस सवाल पर बीसीसीएल के सेंट्रल अस्पताल की सीएमडी (चीफ़ मेडिकल सुपरिटेंडेंट) डॉ. वंदना ठाकुर ने बताया कि उनके यहां 17 लोगों को भर्ती कराया गया है.
उन्होंने कहा, "बीसीसीएल के रीज़नल अस्पताल में भी गैस से प्रभावित मरीज़ जा रहे हैं. जहां से ज़रूरत पड़ने पर उन्हें हमारे यहां भेजा जाता है."
लेकिन सदानंद बोस का मानना है कि मरीज़ों की संख्या बहुत अधिक है. वह कहते हैं, "लोग अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार अलग-अलग अस्पतालों का रुख़ कर रहे हैं. इसलिए मरीज़ों का सही आंकड़ा सामने नहीं आ रहा है."
40 साल से इंतज़ार

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पांच सौ घरों की लगभग ढाई हज़ार आबादी वाली राजपूत बस्ती का बीबीसी ने दौरा किया.
गैस रिसाव की ख़बर के बाद बस्ती की गलियां सुनी पड़ चुकी हैं. लोगों के घरों में ताले लटक रहे हैं.
प्रियंका देवी का परिवार अंतिम संस्कार के बाद अपने गांव चला गया है और उनके घर में भी ताला लगा है.
सदानंद बोस का कहना है कि कोई कब तक अपने घर से दूर रहेगा.
वो कहते हैं, "स्थायी हल सिर्फ़ पुनर्वास है जिसके लिए झरिया के अन्य क्षेत्रों की तरह हम राजपूत बस्ती वासी भी 40 साल से इंतज़ार कर रहे हैं."
दरअसल 1982 में अंडरग्राउंड माइनिंग के दौरान हुए एक हादसे में छह मज़दूरों के दब जाने के बाद केंदुआडीह क्षेत्र में कोयले का खनन बंद हो गया था.
राष्ट्रीय कोयला मज़दूर यूनियन के अध्यक्ष अनंत कुमार झा कहते हैं कि "खनन बंद होने के बाद इस क्षेत्र की देख-रेख में की गई लापरवाही के कारण अंडरग्राउंड आग लग गई. तो दूसरी तरफ़ इस इलाक़े में ज़मीन के घंसने की भी घटना हुई."
वह कहते हैं, "केंदुआडीह क्षेत्र में पिछले 42 साल में 40 बार भूस्खलन हुआ है. अब इस क्षेत्र के लोग ज़हरीली गैस का शिकार हो रहे हैं."
पुनर्वास योजना का क्या है हाल?

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अनंत कुमार झा का मानना है कि गैस रिसाव की चपेट से स्थानीय लोगों को बचाने के लिए सिर्फ़ पुनर्वास ही हल है.
वह कहते हैं, "पुनर्वास की रूपरेखा डेढ़ दशक पहले बनने के बावजूद आज तक ज़मीन पर पूरी नहीं हो सकी."
अगर धनबाद में कुल प्रभावित क्षेत्र की बात की जाए तो साल 2019 में 595 साइट्स को अति संवेदनशील चिह्नित किया गया. जिसके तहत 32 हज़ार रैयत और 72 हज़ार गैर रैयत परिवारों के लिए पुनर्वास का प्रबंध किया जाना था.
ज़िला अधिकारी आदित्य रंजन कहते हैं, "इस समय 81 साइट्स ही अति संवेदनशील हैं. पुनर्वास का काम जारी है. अब तक बेलगड़िया में कुल 4,000 विस्थापित परिवारों का पुनर्वास किया जा चुका है."
कुल एक लाख चार हज़ार परिवारों को शिफ्ट करना है, जबकि डेढ़ दशक में सिर्फ़ चार हज़ार परिवार को ही पुनर्वास मिला है, क्या प्रक्रिया धीमी नहीं है?
इस सवाल पर ज़िलाधिकारी कहते हैं, "झरिया मास्टर प्लान के अनुसार 2028 तक सभी को पुनर्वास करवाना है. अभी समय है."
लेकिन बीसीसीएल के महाप्रबंधक गणेश साहा कहते हैं, "बहुत कोशिशों के बावजूद स्थानीय लोग शिफ़्ट नहीं होना चाहते. इसी कारण से पुनर्वास में देर हुई है."
स्थानीय निवासी अनूप पासवान ने इस देरी के पीछे दूरी को कारण बताया.
उन्होंने कहा, "राजपूत बस्ती से धनबाद की दूरी कम है, जिससे धनबाद जाकर मज़दूरी करना या अन्य काम काम करना आसान है. लेकिन जिस बैलगड़िया टाउन भेजा जा रहा है वो धनबाद से अधिक दूर है.
वह कहते हैं, "आने जाने में प्रतिदिन सौ रुपये ख़र्च होते हैं. ऐसे में एक मज़दूर जो तीन सौ कमाता है उसको क्या बचेगा?"
झरिया मास्टर प्लान के तहत, भारत सरकार ने 25 जून 2025 को झरिया, धनबाद में सौ साल पुरानी अंडरग्राउंड कोयला खदानों में लगी भूमिगत आग लगने, ज़मीन धंसने और बड़े रिहैबिलिटेशन संकट से निपटने के लिए 5,940 करोड़ रुपये आवंटित किए गए.
यह 2009 में बनाए गए प्लान का एक संशोधित संस्करण है.
सीएमडी मनोज कुमार के अनुसार, "राजपूत बस्ती के सभी लोगों का पुनर्वास कराया जाना है. इसके साथ धनबाद के अन्य क्षेत्रों में भी पुनर्वास की प्रक्रिया जारी रहेगी."
ज़िला अधिकारी ने बताया कि पुनर्वास के लिए 16,000 फ़्लैट तैयार हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















