जगन्नाथ मंदिर के 'रत्न भंडार' का इतिहास, इसे वर्षों तक क्यों नहीं खोला गया

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- Author, संदीप साहू
- पदनाम, भुवनेश्वर से, बीबीसी हिन्दी के लिए
पुरी के विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार में रखे रत्न अलंकारों की गिनती की प्रक्रिया पूरे 46 साल बाद 14 जुलाई से शुरू हो गई है. ये गणना आख़िरी बार वर्ष 1978 में हुई थी.
हालांकि 1978 के बाद भी दिसंबर 1982 और जुलाई 1985 में इस रत्न भंडार को बार खोला गया था. तब इसे आभूषणों की गिनती के लिए नहीं, बल्कि श्री जगन्नाथ के लिए आवश्यक कुछ आभूषण निकालने और मरम्मत करने के लिए खोला गया था.
निर्धारित शुभ मुहूर्त के अनुसार, सोमवार दोपहर ठीक एक बजकर 28 मिनट पर, 11 सदस्यीय एक टीम आवश्यक सभी उपकरणों के साथ रत्न भंडार के अंदर गई.
इसमें ओडिशा हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस विश्वनाथ रथ की अध्यक्षता में राज्य सरकार द्वारा बनाई गई कमिटी के दो सदस्यों के साथ ज़िला और मंदिर प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी और सेवादारों के प्रतिनिधि शामिल थे.
शाम के करीब पांच बजे टीम के बाहर निकलने के बाद श्री जगन्नाथ मंदिर के मुख्य प्रशासक डॉ अरविंद पाढ़ी ने पत्रकारों को बताया कि आज केवल बाहरी रत्न भंडार में जमा आभूषणों को मंदिर के अंदर बने अस्थायी स्ट्रॉन्ग रूम में स्थानांतरित किया गया और उसे सील कर चाबी जिला प्रशासन को हस्तांतरित कर दिया गया.
मंदिर के मुख्य प्रशासक ने क्या बताया?

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डॉ अरविंद पाढ़ी ने कहा कि ज़िला कोषागार में रखी गई चाबी से भीतरी रत्न भंडार में लगे तीन तालों को खोलने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं खुले.
इसके बाद राज्य सरकार के नियमों के तहत मंदिर प्रशासन ने ताले तोड़े.
प्रशासन को भंडार के भीतर कई संदूक और अलमारियां मिलीं लेकिन उन्हें खोला नहीं क्योंकि तब तक काफी देर हो चुकी थी और रविवार को ही सारे आभूषणों को स्थानांतरित करना संभव नहीं था.
डॉ पाढ़ी बताते हैं, "सोमवार को महाप्रभु का "बाहुड़ा यात्रा" (वापसी) है, जिसे सफल रूप से संपन्न करने के लिए ज़िला और मंदिर प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका है. इसलिए हम राज्य सरकार के साथ विचार-विमर्श के बाद भीतरी रत्न भंडार खोलने और वहां से सारे आभूषणों को अस्थायी स्ट्रॉन्ग रूम में लाने के लिए एक दिन और लगाएंगे."
भीतरी रत्न भंडार में सबसे कीमती आभूषण रखे जाते हैं जबकि बाहरी रत्न भंडार में केवल उन आभूषणों को रखा जाता है जो रथ यात्रा और दूसरे महत्वपूर्ण अवसरों पर इस्तेमाल होते हैं.
भीतरी रत्न भंडार से सारे आभूषणों को स्थानांतरित करने के बाद उनकी मरम्मत की जाएगी.
मुख्य प्रशासक डॉ अरविंद पाढ़ी ने स्पष्ट किया कि रत्न भंडार के ढांचे की सुरक्षा सर्वोपरि है. उन्होंने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा भीतरी रत्न भंडार के मरम्मत के बाद ही अस्थायी स्ट्रांग रूम में रखे गए आभूषणों को दोबारा अंदर लाया जाएगा और फिर उनकी गिनती होगी.
जब उनसे पूछा गया कि गिनती की प्रक्रिया कब तक चलेगी, तो उन्होंने कहा कि इसके लिए कोई तारीख़ तय नहीं की गई है.

46 साल पहले क्या हुआ था
उस समय यह प्रक्रिया 13 मई, 1978 से शुरू होकर 23 जुलाई, 1978 यानी पूरे 70 दिन चली थी.
लेकिन फिर भी पूरी तरह संपन्न नहीं हो पाई थी क्योंकि गिनती के लिए तिरुपति मंदिर समेत बाहर से बुलाए गए अलंकार विशेषज्ञ भी रत्न भंडार में रखे गए कई आभूषणों का सही आकलन नहीं कर पाए थे.
लेकिन जिन आभूषणों की शिनाख्त और गिनती हो पाई थी, वह भी कुछ कम चौंकाने वाले नहीं थे.

रत्न भंडार में कुल 747 प्रकार के आभूषण मिले थे जिनमें 12,838 तोला सोने के गहने और 22,153 तोला चांदी के अलंकारों के अलावा कई हीरे, जवाहरात के कई बहुमूल्य आभूषण थे.
ये आभूषण बीती कई सदियों में या तो प्रभु जगन्नाथ के भक्त राजा-महाराजाओं ने दान में दिए गए थे या फिर ओडिशा के राज-घरानों की तरफ़ से अन्य राज्यों के साथ युद्ध में विजय के बाद मिले थे.
इन बहुमूल्य आभूषणों को लूटने के लिए 15वीं से लेकर 18वीं सदी के बीच मंदिर पर कम से कम 15 बाहरी आक्रमण हुए, जिनमें से आखिरी आक्रमण बंगाल के एक तत्कालीन सेनापति मोहम्मद तकी ख़ान ने वर्ष 1731 में किया था.
इन आक्रमणों में कई बहुमूल्य अलंकार लूट लिए गए. लेकिन इसके बावजूद रत्न भंडार की पुख्ता और जटिल सुरक्षा व्यवस्था के कारण ज्यादातर हीरे जवाहरात सुरक्षित रह गए.
माना जाता है कि रत्न भंडार में हीरे, मोती, स्वर्ण और अन्य कई बहुमूल्य रत्न से बने बेशुमार आभूषण हैं जिनके मूल्य सैकड़ों करोड़ रुपयों में है.
जानकारों के अनुसार, डिजिटल टेक्नोलॉजी में हुई प्रगति के कारण इस बार गिनती में शायद इतना समय न लगे. लेकिन इस प्रक्रिया को संपन्न करने में कितना समय लगेगा, यह कहना अभी मुश्किल है.
रत्न भंडार के लिए बनाई गई कमिटी के अध्यक्ष जस्टिस विश्वनाथ रथ ने कहा है कि सारे आभूषणों की गिनती के साथ साथ उनके मानक तय किए जाएंगे और फिर उनका एक डिजिटल कैटलॉग बनाया जाएगा और वर्ष 1978 में रिकार्ड किए गए आभूषणों की सूची से उसकी तुलना करके यह देखा जाएगा कि सभी आभूषण मौजूद हैं या नहीं.
हर तीन साल में इन्वेंटरी का प्रावधान
राज्य सरकार ने श्री मंदिर ऐक्ट, 1960 के जरिए मंदिर के प्रबंधन की जिम्मेदारी खुद ली, जो पहले पुरी के गजपति महाराज की जिम्मेदारी हुआ करती थी.

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इस कानून में हर तीन साल में रत्न भंडार के खोले जाने और उसमें जमा आभूषणों की इन्वेंटरी बनाए जाने का प्रावधान है. इसके बावजूद पिछले 46 साल में क्यों किसी सरकार ने रत्न भंडार खोलने की पहल नहीं की, इसका जवाब किसी के पास नहीं है .
रत्न भंडार को लेकर कई किंवंदतियां और अंधविश्वास इसका कारण हो सकते हैं.
कई सेवादारों का कहना है कि रत्न भंडार के अंदर जहरीले सांप हैं जो आभूषणों की हिफाज़त करते हैं. साल 1978 में आखिरी बार रत्न भंडार खोले जाने के कुछ ही महीने बाद तत्कालीन जनता पार्टी की सरकार गिर जाने के बाद कई नेता उसे रत्न भंडार खोले जाने से जोड़कर देखने लगे. यही कारण है कि इसके बाद सत्ता में आने वाली सरकारें इस दिशा में पहल करने से कतराती रहीं हैं.
साल 2018 में नाकाम कोशिश
हालांकि साल 2018 में तत्कालीन नवीन पटनायक सरकार ने रत्न भंडार खोलने की पहल की थी. लेकिन वह पहल रत्न भंडार के ढांचे का जायज़ा लेने के लिए थी, न कि अलंकारों की इन्वेंटरी बनाने के लिए.
गौरतलब है कि एएसआई ने साल 2018 में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि रत्न भंडार की स्थिति बहुत ही नाजुक है. कई जगह पानी रिस रहा है और दीवारों पर छाले पड़ गए हैं. इसलिए उसकी मरम्मत की सख्त जरूरत है वरना रत्न भंडार किसी भी समय ढह सकता है.

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ओडिशा हाई कोर्ट के निर्देश के अनुसार साल 2018 में राज्य सरकार ने रत्न भंडार का जायज़ा लेने के लिए एक टीम बनाई थी. लेकिन कमिटी अंदर नहीं जा पाई थी क्योंकि जिस चाबी के साथ टीम अंदर गई थी उससे भीतरी रत्न भंडार में लगे ताले खुले नहीं और कमिटी केवल बाहर से टॉर्च लाइट के जरिए ढांचे का जायज़ा लेकर वापस आ गई थी.
उसी दिन से यह मामला हाई कोर्ट में लंबित था. पिछले मार्च में हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार, तत्कालीन नवीन पटनायक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अरिजित पसायत की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई थी, जो रत्न भंडार की मरम्मत के साथ उसमें रखे गए आभूषणों की गिनती करने वाली थी. लेकिन चुनाव के बाद राज्य में मोहन माझी के नेतृत्व में बनी सरकार ने पुरानी कमिटी को भंग कर जस्टिस रथ की अध्यक्षता में नई कमिटी बनाई.
राजनैतिक मुद्दा
राज्य में हाल ही में संपन्न विधान सभा चुनाव में रत्न भंडार की खोई हुई चाबी एक प्रमुख मुद्दा बना रहा.
प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सभी भाजपा नेताओं ने लगभग हर चुनावी सभा में इस मुद्दे पर नवीन पटनायक सरकार को घेरा.

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नवीन पटनायक के चहेते रहे वीके पांडियन का नाम लिए बिना पीएम मोदी ने तो यहां तक कह दिया था कि ''चाबी कहीं तमिलनाडु तो नहीं चली गई.'' (पांडियन तमिलनाडु के निवासी हैं).
उनका आशय यह था कि नवीन पटनायक की सरकार में रत्न भंडार से कई आभूषण गायब कर दिए गए हैं. लेकिन कटघरे में खड़ी नवीन पटनायक सरकार इन आरोपों का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाई.
अपने चुनावी वादे के अनुसार भाजपा सरकार ने रत्न भंडार खुलवा तो दिया. लेकिन अभी यह देखना बाकी है कि साल 1978 में बनी इन्वेंटरी में सभी आभूषण सुरक्षित हैं या नहीं.
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