हिमालय में एक 'पवित्र पशु' की हिफ़ाज़त करता आदिवासी समुदाय

    • Author, आत्रेयी धर
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर प्लैनेट

मिथुन, गायों की ऐसी प्रजाति है जो हिमालय पर्वत श्रृंखला में पाई जाती है. इस पालतू जानवर को कई लोग पवित्र मानते हैं. लेकिन जलवायु परिवर्तन और लगातार घटते जंगलों की वजह से मिथुन के विलुप्त होने का ख़तरा मंडरा रहा है.

इस जानवर को बचाने के लिए पूर्वोत्तर भारत का एक आदिवासी समुदाय, पेड़-पौधों और जंगली झाड़ियों से एक ऐसी बाड़ बना रहा है, जिससे जानवरों की इस विलुप्त होती नस्ल को बचाया जा सके.

भारत के हिमालय पर्वत श्रृंखला के पूर्वी तराई वाले इलाक़ों में किसान यांग एरिंग मोयोंग एक ढीली ढाली कमीज़ और पैंट पहनकर सुबह सुबह ही घर से निकल जाती हैं. जब वो अपने गांव मिरेम के आस-पास ख़ूब मिलने वाली घनी झाड़ियों से होकर गुज़रती हैं, तो वो ज़ोर ज़ोर से आवाज़ देकर अपने मिथुनों को जंगलों से बुलाती हैं.

39 बरस की यांग एरिंग दो बच्चों की मां हैं. वो अरुणाचल प्रदेश के आदि जनजातीय क़बीले से ताल्लुक़ रखती हैं और अपने गांव की ऐसी इकलौती महिला हैं, जो चरवाहे का काम करती हैं. यांग एरिंग ने आठ साल पहले तब मिथुनों को पालना पोसना शुरू किया था, जब उनके पति की मौत हो गई थी. वो कहती हैं कि ये बहुत मुश्किल काम है.

मिथुन से कैसे बना रिश्ता

यांग एरिंग ने बीबीसी को बताया, "साल 2013 में मेरी ससुराल वालों के पास कम से कम 50 मिथुन थे. उनमें से लगभग आधे जानवरों को जंगली कुत्ते खा गए. मुझे कुछ मिथुनों को बेचना भी पड़ा, क्योंकि वो दूसरों के खेत में घुस जाते थे और उनकी फ़सलों को नुक़सान पहुंचाया करते थे.''

अपने परिवार का ख़र्च चलाने के लिए यांग एरिंग सरकार द्वारा नियुक्त प्रशिक्षिका की ज़िम्मेदारी भी निभाती हैं. वो मिरेम और दूसरे गांवों की महिलाओं को रोज़गार करने के हुनर सिखाती हैं.

अपने पालतू जानवरों की देखभाल के लिए यांग एरिंग को काफ़ी पैसे ख़र्च करने पड़ते हैं. वो बताती हैं, "साल 2019 में जब मेरे पालतू मिथुन दूसरे लोगों के घरों और खेतों में घुस गए थे, तो मुझे उनके नुक़सान की भरपाई करने में लगभग 40 हज़ार रुपए ख़र्च करने पड़े थे."

वो ये भी बताती हैं कि एक प्रशिक्षक के तौर पर उन्हें सरकार से हर महीने 12 हज़ार रुपए मिलते हैं. ऐसे में जब हर साल उनके पालतू जानवर दूसरों का नुक़सान करते हैं और उन्हें इसका हर्जाना भरना पड़ता है, तो बचे हुए पैसों से परिवार चलाना बहुत मुश्किल हो जाता है.

अपने मिथुनों को दूसरों के खेतों और घरों में घुसने से रोकने के लिए यांग एरिंग मोयोंग और आदि समुदाय के दूसरे सदस्यों ने मिलकर पेड़ पौधों और झाड़ियों की मदद से एक बाड़ बनाई है. इसके लिए उन्होंने आर्किड के पेड़ों के डंडों और कंटीले तारों की भी मदद ली है.

आदि समुदाय मिथुनों को एक पवित्र जानवर मानता है. अशोका यूनिवर्सिटी की रिसर्चर अभिश्रुति सरमा बताती हैं कि ये जनजातीय समुदाय मिथुनों को ऐसे जानवर मानता है, जिसके जन्म पर दुनिया की सारी चीज़ों का अस्तित्व टिका है. अभिश्रुति सरमा ने चेंजिंग एफिनिटीज़ नाम से एक किताब भी लिखी है, जिसमें मिथुनों के साथ आदिवासी समुदायों के रिश्तों की पड़ताल की गई है.

मिरेम गांव में मिथुनों के एक और चरवाहे और ये काम करने वाले किसानों के संगठन के पूर्व अध्यक्ष बरुन ताकी बताते हैं, "अरुणाचल प्रदेश की आदि जनजाति के लिए इस धरती पर मौजूद सभी चीज़ों का अस्तित्व मिथुन के जन्म से जुड़ा है. जब मिथुन का जन्म डाडी बोटे के तौर पर हुआ, तो जानवरों के देवता उनके संरक्षक बन गए थे."

बरुन ताकी कहते हैं, "डाडी बोटे मिथुन को इस दुनिया में हमारे लिए ले आए थे. अब ये हमारा फ़र्ज़ है कि हम उनकी देख-रेख करें."

अरुणाचल प्रदेश में हर साल सितंबर महीने में सोलुंग त्यौहार मनाया जाता है. बरुन ताकी ने बताया कि इस दौरान, आदि समुदाय के लोग डाडी बोटे की पूजा करते हैं, ताकि मिथुनों की तादाद बढ़ सके और वो मिथुनों को खाई में गिरने, और फूट ऐंड माउथ डिज़ीज़ जैसी बीमारियों से बचा सकें.

मिथुन पर मंडराता ख़तरा

इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर कंज़र्वेशन ऑफ नेचर ने (आईयूसीएन) मिथुन को ‘असुरक्षित’ प्रजातियों के दर्जे में रखा है. ये जानवर छह हज़ार मीटर की ऊंचाई वाले उन जंगली और पहाड़ी इलाक़ों में रहते हैं, जहां छोटी-छोटी नदियां, तालाब और झीलें होती हैं और जहां का औसत तापमान 20-30 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है.

उत्तरी पूर्वी भारत में यांग एरिंग मोयोंग और दूसरे आदिवासी चरवाहे, मिथुनों को एक खुले इलाक़े वाले इको-सिस्टम में पालते हैं. इन इलाक़ों में मिथुनों को जंगलों में घूमने की छूट होती है, और जानवरों को नमक के सिवा खाने के लिए कुछ और नहीं देना पड़ता.

तेज़ी से बढ़ता तापमान और पेड़ों की कटाई के साथ साथ जंगलों के घटते इलाक़े की वजह से हाल के वर्षों में मिथुनों की रिहाइश वाले इलाक़ों पर ख़तरा बढ़ता जा रहा है.

साल 2011 में की गई एक स्टडी के मुताबिक़, नगालैंड के कुछ हिस्सों में 2021 से 2050 के बीच तापमान में कम से कम 1.9 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. इस अध्ययन में भारत के उत्तरी पूर्वी इलाक़े में 2050 तक हर साल होने वाली बारिश के भी 26 प्रतिशत तक बढ़ने की भविष्यवाणी की गई है.

अभिश्रुति सरमा कहती हैं कि आने वाले समय में आब-ओ-हवा में होने वाले इस बदलाव से मिथुनों की तादाद और घटने की आशंका है. क्योंकि, उनके लिए खाने की उपलब्धता कम होगी और इन जानवरों के फूट ऐंड माउथ बीमारी के शिकार होने का भी डर रहता है.

नगालैंड में भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र के मिथुनों पर नेशनल रिसर्च सेंटर (आईसीएआर-एनआरसी) के निदेशक गिरीश पाटिल कहते हैं कि बढ़ते तापमान और बारिश में उतार चढ़ाव से मिथुन की रिहाइश वाले क्षेत्रों पर भी असर पड़ता है. इसकी वजह से हरियाली का फैलाव और वहां मिलने वाली पेड़ पौधों की प्रजातियां भी प्रभावित होती हैं. गिरीश पाटिल बताते हैं कि, ‘बाढ़ या सूखे जैसी भयंकर मौसम की घटनाएं उन इलाक़ों को और भी नुक़सान पहुंचाती हैं, जहां मिथुन पाये जाते हैं. उनके इलाक़े टुकड़ों में बंट जाते हैं. जंगल कम होने की वजह से मिथुनों की आबादी पर दबाव और भी बढ़ जाता है.’

गिरीश पाटिल कहते हैं कि कम होते जंगलों की वजह से भी मिथुनों के चरने के लिए अच्छे चरागाहों की उपलब्धता घटती जा रही है. वैसे तो इंसानों और मिथुनों के बीच टकराव की घटनाओं पर तो कोई रिसर्च नहीं किया गया है. लेकिन, वन क्षेत्र में आ रही कमी की वजह से ‘मिथुनों के खेती बाड़ी वाले इलाक़ों में घुसने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे इंसानों से उनका टकराव होता है.’

जंगल नहीं तो मिथुन नहीं

ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के मुताबिक़, साल 2001 से 2023 के बीच भारत में 23 हज़ार 300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से जंगल ख़त्म हो गए. इसी दौरान नगालैंड में 259 वर्ग किलोमीटर और अरुणाचल प्रदेश में 262 वर्ग किलोमीटर इलाक़े से पेड़ ख़त्म हो गए.

आईसीएआर-एनआरसी के वरिष्ठ तकनीकी अफसर कोबे खाटे कहते हैं कि, ‘अगर अगले 40-50 सालों तक ऐसे ही चलता रहा, तो जंगल बचेंगे ही नहीं और अगर जंगल नहीं होंगे, तो मिथुन भी नहीं होंगे.’

मिथुनों के ठौर ठिकाने वाले क्षेत्र और इस नस्ल को बचाने के लिए आईसीएआर-एनआरसी के वैज्ञानिकों ने 2022 में आदि जनजाति के साथ मिलकर काम किया था, ताकि उनके लिए एक स्थायी ‘बाड़' का निर्माण कर सकें. रेमी नदी के आर-पार हिमालय के पूर्वी तराई इलाक़ों में इन ‘सजीव बाड़ों' का निर्माण ऑर्किड के डंडों और कंटीले तारों की मदद से किया जाता है. मिथुन ऑर्किड के पेड़ों की पत्तियों को खाते हैं.

आईसीएआर-एनआरसी ने मिथुनों और उनके बछड़ों के रात में ठहरने के लिए बांस के तारों की मदद से बाड़ा बनाने में भी किसानों की मदद की है. दिन के वक़्त मिथुनों को केवल बाड़ के भीतर ही चरने दिया जाता है और रात के वक़्त उन्हें हांककर फिर से बाड़े के भीतर ले आया जाता है. पहले ये जानवर जंगलों में आज़ाद होकर घूमा फिरा करते थे, और अपनी मर्ज़ी से वापस आते थे. कई बार तो वो बरसों बाद अपने गांव लौटा करते थे.

यांग एरिंग मोयोंग अपने मिथुनों को तड़के ही चरने के लिए बाड़ से बाहर निकाल देती हैं और रात के वक़्त वो उनको बाड़े में बंद करके रखती हैं. वो कहती हैं कि, ‘बाड़ लगने के बाद से मुझे अपने मिथुनों की फ़िक्र नहीं करनी पड़ती. ये सोचकर परेशान नहीं होना पड़ता कि जाड़ों में वो दूसरों के खेतों में घुस जाएंगे.’ 2022 में यांग एरिंग को अपने एक मिथुन के दूसरे के खेत में चरने के बदले में सात हज़ार रुपए हर्जाने के तौर पर देने पड़े थे.

बरुन ताकी कहते हैं कि, ‘बाड़ के डंडों के बीच पेड़ लगाने से बाड़ मज़बूत भी होती है और इससे दूसरे जानवर भी नहीं घुस पाते.’ किसान हर छह महीने बाद अपनी बाड़ों की मरम्मत करते हैं. खरपतवार को उखाड़ फेंकते हैं, और ये देखते हैं कि कहीं किसी जगह कोई टूट-फूट तो नहीं हुई.

बरुन ताकी कहते हैं कि पिछली बार भारी बारिश होने पर रेमी नदी में बाढ़ आ गई थी. उसकी धारा में मिथुनों के लिए बनाई गई बाड़ डूब गई थी. वो कहते हैं कि, ‘ये बाड़ बारिश के दौरान नदी की तेज़ धार का क़हर नहीं झेल सकती. ऐसा होता तो बहुत कम है. पर कभी कभार होता ज़रूर है.’

इको-सिस्टम के 'इंजीनियर'

मिथुन, उत्तर-पूर्वी भारत के इको-सिस्टम के इंजीनियर की अहम भूमिका अदा करते हैं.

आईसीएआर-एनआरसी के गिरीश पाटिल कहते हैं कि, ‘वो इको-सिस्टम की सेहत के लिए काफ़ी अहम होते हैं क्योंकि वो जिन पेड़ पौधों को चरते हैं उनके बीजों को दूर दूर तक फैलाने में मदद करते हैं. वो पोषक तत्वों के अहम संचालक भी होते हैं. क्योंकि मिथुन हरे भरे पेड़ पौधों में चरते हैं, और उसके बाद वो पोषक खाद के रूप में उन्हें मिट्टी तक पहुंचाते हैं, जिससे पेड़ों के विकास के लिए मिट्टी को भी ताक़त मिलती है.’

आईसीएआर द्वारा 2010-11 में किए गए एक अध्ययन में नगालैंड के 200 किसानों से बात की गई थी. इस स्टडी में पाया गया कि जिन इलाक़ों में मिथुनों की तादाद अच्छी ख़ासी है, वहां बाड़ लगाने से दूसरे पालतू जानवरों की आबादी भी बढ़ी है और मिथुनों ने पेड़-पौधों के जो बीज और अपने गोबर के रूप में जो खाद दूर दूर तक फैलाई, उससे पौधों और चरागाह के विकास में मदद मिली और चारे का उत्पादन भी बढ़ा था.

क़ुदरती जंगलों में जानवरों को चराने का चलन और पेड़ों के बीच झाड़ियां लगाने और चरागाह विकसित करने को सिल्वोपास्चर कहते हैं. इससे कार्बन डाई ऑक्साइड के भंडारण में भी मदद मिलती है. 2023 में की गई एक स्टडी इस नतीजे पर पहुंची कि अमरीका के पूर्वी इलाक़े में दो लाख 50 हज़ार 905 वर्ग किलोमीटर दायरे में सिल्वोपास्चर के विस्तार से हर साल ये पेड़ पौधे 49 लाख से 2.56 करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड को वातावरण से सोखकर अपने भीतर जमा कर सकते हैं.

गिरीश पाटिल कहते हैं कि, ‘दूसरे पालतू जानवरों की तरह मिथुनों पर आधारित इकोसिस्टम के घने पेड़ पौधे और पोषक तत्वों से भरपूर मिट्टी, वातावरण से कार्बन डाई ऑक्साइड सोखकर जमा करने और रिसाइक्लिंग में मदद करते हैं. जिससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आती है.’

नगालैंड के 47 साल के मिथुन पालने वाले किसान केविरिबाम ज़ेलियांग कहते हैं कि, ‘मिथुन जंगलों में खुलकर विचरते हैं. ये जानवर आम तौर पर छोटे पौधों और नीचे पेड़ों को ही चरते हैं. क्योंकि ये ज़्यादा ऊंचाई की पत्तियों तक नहीं पहुंच पाते हैं. खाने के बाद ये जानवर चलते फिरते अपने गोबर के ज़रिए इन पौधों के बीज मिट्टी में गिरा देते हैं, जिससे जंगलों में पेड़ पौधे दोबारा उग आते हैं.’

ज़ेलियांग कहते हैं कि पेड़ पौधों की मदद से मिथुनों को घेरने के लिए जो बाड़ लगाई जाती है, उससे भी जंगलों के कटान को रोकने में मदद मिलती है. उनके मुताबिक़, ‘बाड़ लगने के बाद किसी को भी पेड़ काटने की इजाज़त नहीं होती. अगर कोई सामुदायिक जंगल के भीतर पेड़ काटता है, तो उसे पांच सौ रुपए का जुर्माना देना पड़ता है. वरना उसे जनकल्याण की उन सुविधाओं का फ़ायदा मिलना बंद हो जाता है, जिसकी निगरानी गांव की पंचायत करती है.’

मिथुन से जुड़ी अर्थव्यवस्था

यांग एरिंग के गांव मिरेम से लगभग 400 किलोमीटर दूर, नगालैंड के टेनिंग गांव में ज़ेलियांग जनजाति भी अपने मिथुनों के झुंड को पालती पोसती है. सीधी ढलान और घने जंगलों वाली नगा पहाड़ियां, म्यांमार की सीमा से ज़्यादा दूर नहीं हैं. ये पहाड़ियां और जंगल मिथुन पालने का बिल्कुल मुफ़ीद माहौल मुहैया कराते हैं. क्योंकि इनकी ऊंचाई 800 से 1500 मीटर के बीच है और मौसम ठंडा रहता है.

20 साल पहले यहां 30-40 चरवाहे कुल मिलाकर लगभग 300 मिथुनों को पाल रहे थे. लेकिन, 2016 में मिथुनों की तादाद घटकर केवल पचास रह गई और इनके चरवाहों की संख्या भी घटकर सिर्फ़ आठ बची. नगालैंड के किसानों ने बीबीसी को बताया कि बाक़ी मिथुनों में से कुछ को तो किसानों ने उस समय गोली मार दी, जब वो किसानों के खेत में घुस आए थे. वहीं कुछ को जंगली कुत्ते खा गए. इसका नतीजा ये हुआ कि बहुत से किसानों ने मिथुनों को पालना बंद कर दिया और काम की तलाश में शहरों की तरफ़ चले गए.

साल 2013 में केविरिबाम ज़ेलियांग के परिवार के पास 16 मिथुन हुआ करते थे. जब उन्होंने देखा कि मिथुनों को किसान गोली मार रहे हैं या फिर उन्हें जंगली कुत्ते खा जाते हैं, तो ज़ेलियांग ने मिथुन पालने बंद कर दिए. वो कहते हैं कि, ‘ज़्यादातर मिथुनों को किसानों ने उस वक़्त मार डाला, जब वो उनकी खेती बाड़ी की ज़मीन में घुस गए और फ़सलों को नुक़सान पहुंचाया था. बाक़ी मिथुनों को जंगली शिकारियों और फूट ऐंड माउथ बीमारी ने निगल लिया.’

मिथुनों की हिफ़ाज़त के लिए बनाई जाने वाली ‘ज़िंदा बाड़’ ने पुराने पेड़ों के लट्ठों की जगह ली है. पहले मिथुनों के चरने वाले इलाक़े की घेरेबंदी इन्हीं लट्ठों से की जाती थी. ज़ेलियांग बताते हैं कि, ‘पहले मिथुन बड़ी आसानी से गांव के जंगलों की तरफ़ निकल जाते थे, क्योंकि वो बड़ी आसानी से जंगली काली चेरी के खूंटों से बनी बाड़ के नीचे से निकल जाते थे. ये लट्ठे सूखकर गिर भी जाते थे.’

इसकी वजह से चरवाहों को का़फ़ी नुक़सान हो रहा था. इसी वजह से ज़ेलियांग ने किसानी छोड़कर छह साल तक अंग्रेज़ी के एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाया था. फिर 2019 में जब आईसीएआर-एनआरसी ने उनके गांव के आस-पास की पहाड़ियों में 20 किलोमीटर की कंटीली तारें और झाड़ियों वाली बाड़ लगाई, तो वो दोबारा मिथुनों को पालने का काम करने लगे.

ज़ेलियां कहते हैं कि, ‘इस नई तरह की बाड़ से हमें काफ़ी राहत मिली. पहले पहाड़ियों के ऊंचे जंगलों से हमें भारी भारी लट्ठे खींचकर लाने का थकाऊ काम करना पड़ता था. फिर साल में दो बार उनकी मरम्मत करनी पड़ती थी. अब कंटीले तारों वाली बाड़ का रख-रखाव करना आसान है और ये काम ठीक से किया जाए, तो ये बाड़ दो से दस साल तक चल जाती है.’ मिथुन भी इन बाड़ों को फांदकर नहीं निकल पाते हैं.

ज़ेलियांग कहते हैं कि मिथुन पालने से उनकी इतनी कमाई हो जाती है कि वो अपने बच्चों को स्कूल भेज सकते हैं और आगे चलकर शायद उन्हें यूनिवर्सिटी में भी पढ़ने भेज सकेंगे.

नई बाड़ से फ़ायदा

जब से इस इलाक़े में ये नई तरह की बाड़ लगनी शुरू की गई, तब से मिथुनों की आबादी बढ़ी है. खाटे और आईसीएआर-एनआरसी के दूसरे वैज्ञानिकों द्वारा की गई इस पहल की निगरानी करने वाली एक रिपोर्ट के मुताबिक़, 2016 में जहां मिथुनों की संख्या 50 थी, जो 2020 में बढ़कर 70 पहुंच गई थी. किसानों ने इस दौरान नौ लाख 75 हज़ार रुपए का मुनाफ़ा भी कमाया है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि इन नई बाड़ों और जानवरों के चरने की नई व्यवस्था ने मिथुनों की मौत की दर को काफ़ी कम कर दिया है. गिरीश पाटिल कहते हैं कि, ‘इन बाड़ों से हासिल एक बड़ी उपलब्धि ये है कि मिथुनों की आबादी बढ़ रही है.’

पालतू पशुओं की 20वीं जनगणना के मुताबिक़, 2019 में भारत में मिथुनों की कुल आबादी तीन लाख 90 हज़ार थी. गिरीश पाटिल बताते हैं कि, ‘उसके बाद से मिथुनों की आबादी में अभूतपूर्व रफ़्तार यानी 30 प्रतिशत सालाना की दर से इज़ाफ़ा हो रहा है.’

सही ढंग से बाड़ लगाने की वजह से मिथुन, खेतों की तरफ़ नहीं जा पाते हैं. इससे किसानों के साथ उनके टकराव और मारे जाने की आशंकाएं कम होती हैं.

40 बरस की किफुतलक नेवमई के पास पहले दो मिथुन थे. लेकिन, अपने बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च निकालने के लिए उन्हें अपने एक मिथुन को बेचना पड़ा था. वो बताती हैं कि, ‘और दूसरा मिथुन या तो खेती और फसलों को बचाने की लड़ाई में या तो मारा गया, या फिर जंगल में गुम हो गया.’

लेकिन, इन आधी जंगली और आधी पालतू गायों को पालने के आर्थिक लाभ को समझते हुए नेवमई ने 2023 में एक मिथुन को ख़रीदा था.

नगालैंड में मिथुनों की रखवाली मर्द करते हैं. इसके बदले में महिलाएं इन चरवाहों को खाना देती हैं.

मिरेम गांव में यांग एरिंग मोयोंग ने एक मिथुन की क़ीमत पर एक रखवाले को काम पर रखा है. वो अगले पांच बरस तक उनकी छह मादा मिथुनों की देख-रेख करेगा. वो कहती हैं कि, ‘मेरे लिए मिथुनों की रखवाली करना काफ़ी मुश्किल हो रहा था. क्योंकि मेरे समाज में महिलाओं को इस काम के लिए मर्दों के बराबर का नहीं समझा जाता है.’

अनुश्रुति सरमा कहती हैं कि अविवाहित या विधवा महिलाएं अक्सर किसी पुरुष रखवाले को पैसे देकर ये काम कराती हैं. क्योंकि उनके लिए मिथुनों की तलाश में घने जंगलों में जाना बहुत जोखिम भरा काम होता है.

हालांकि अनुश्रुति कहती हैं कि इन बाधाओं के बावजूद महिलाएं, मिथुनों को पालकर काफ़ी पैसे कमा रही हैं.

नेवमई भी इस बात से सहमत हैं. वो कहती हैं कि, ‘मिथुनों को पालने से पैसे के मामले में आज़ादी हासिल होती है. जब ज़रूरत होगी, तो मैं ये उम्मीद करती हूं कि किसान मेरे मिथुनों की अच्छी क़ीमत देंगे.’

हालांकि, इन नई बाड़ों की वजह से कुछ नई चुनौतियां भी पैदा हुई हैं. जानवरों को बचाने के लिए अगर ऐसी बाड़ें नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश के बाहर लगाई जाएं, तो किसानों को इसके लिए 50 हज़ार रुपए तक ख़र्च करने पड़ सकते हैं. ऐसे में, आईसीएआर-एनआरसी के वैज्ञानिकों का मानना है कि किसानों को सरकार से और मदद की दरकार है. जानवरों को रोकने के लिए इस तरह की बाड़बंदी को अगर देश के दूसरे हिस्सों में फैलाना है, तो उसके लिए चरागाह की ज़मीन और दूसरे संसाधनों की उपलब्धता को भी देखना होगा.

आईसीएआर-एनआरसी के गिरीश पाटिल कहते हैं कि, ‘मिथुन मुख्य रूप से मांस के लिए पाला जाने वाला जानवर है. जिसे कम से कम तीन से चार साल तक पालना पोसना पड़ता है. मिथुनों को पालने के लिए बड़े बड़े चरागाह होना बहुत ज़रूरी है. तमाम तरह के दूसरे पालतू जानवर पालने की तुलना में किसानों के लिए मिथुनों को पालना शायद फ़ायदे का सौदा न हो.’ उनका कहना है कि, ‘जनजातीय किसानों के पास आम तौर पर इतने पैसे नहीं होते कि वो दूसरे तरह के जानवर पाल सकें.’

मिथुन और मीथेन गैस

मिरेम गांव के किसान ये मानते हैं कि इन नई बाड़ों ने किसानों और मिथुनों के संघर्ष को कम किया है. हालांकि, इनसे दूसरे जंगली शिकारियों और ख़ास तौर से एशियाई जंगली कुत्तों के हमले रोकने में मदद नहीं मिली है. इन जंगली कुत्तों को भी आईयूसीएन की रेड लिस्ट में रखा गया है और इनके बहुत जल्द विलुप्त होने का डर है.

यांग एरिंग के चचेरे भाई, 52 बरस की ओयेम एरिंग कहते हैं कि उनके गांव में मिथुनों की तादाद में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है. क्योंकि मिथुनों के बछड़ों को अक्सर जंगली कुत्ते मार डालते हैं.

चूंकि, मिथुनों को रोकने वाली बाड़ जंगलों के पास बनाई जाती है. ऐसे में उनके ऊपर जंगली कुत्तों के झुंड के हमले का ख़तरा बना रहता है. गिरीश पाटिल के मुताबिक़ आईसीएआर-एनआरसी के वैज्ञानिक इस समस्या का समाधान तलाशने पर काम कर रहे हैं. योजना ये है कि छह महीने का होने तक मिथुनों के बछड़ों को अलग बाड़े में रखा जाए और उनको दूध पिलाने के दूसरे इंतज़ाम किए जाएं. इसके बाद उन्हें जंगलों में आज़ादी से घूमने के लिए छोड़ा जाए.

वैज्ञानिक, जंगली कुत्तों के हमलों को लेकर वन विभाग के अधिकारियों से भी सलाह मशविरा कर रहे हैं. गिरीश पाटिल कहते हैं कि चूंकि मिथुन खुले जंगलों में चरने के लिए जाते हैं. ऐसे में शिकारी कुत्तों के हमले से पांच फ़ीसद के मारे जाने की आशंका से तो बचा नहीं जा सकता है.

रिसर्च से पता चला है कि दूसरे पालतू जानवरों की तुलना में मिथुनों को पालने से मीथेन गैस का उत्सर्जन भी कम होता है. मीथेन उत्सर्जन का सबसे बड़ा मानवीय स्रोत खेती-बाड़ी है. और, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक़, धरती पर होने वाले कुल मीथेन उत्सर्जन में अकेले कृषि क्षेत्र का हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत है. मीथेन केवल बारह साल में दूसरे केमिकल्स में टूटकर वातावरण में मिल जाती है. इसकी तुलना में कार्बन डाई ऑक्साइड को हवा में घुलने में कई सदियां लगती हैं. लेकिन, कार्बन डाई ऑक्साइड की तुलना में मीथेन ऐसी ग्रीनहाउस गैस है, जो 20 साल के समय के दौरान, 80 गुना ज़्यादा ताक़तवर होती है.

आईसीएआर-एनआरसी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अप्रकाशित अध्ययन के मुताबिक़, मिथुनों के पेट से जो मीथेन गैस निकलती है, वो दूसरे जानवरों की तुलना में बहुत कम होती है.

यांग एरिंग मोयोंग बताती हैं कि ज़िंदा बाड़ों ने उनके ऊपर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को काफ़ी कम कर दिया है. उनका कहना है कि, ‘जब ये बाड़ लगाई गई है, तब से मैंने मिथुनों को अपने गांव में घुसते नहीं देखा. पहले इसकी वजह से मुझे पैसे का बहुत नुक़सान होता था. जंगल में लगी बाड़ के भीतर के पेड़ों को काटने की इजाज़त बिल्कुल नहीं है. ये जंगल केवल जंगली जानवरों के घूमने फिरने के लिए खुले हैं.’

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