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डेयरी फ़ार्म श्रमिकों में बर्ड फ़्लू कितनी बड़ी चिंता का विषय है?- दुनिया जहान
मार्च 2024 में अमेरिका के टेक्सस राज्य की एक गोशाला यानी डेयरी फ़ार्म में एक गाय को बर्ड फ्लू हो गया और बाद में उससे एक श्रमिक भी इस वायरस से संक्रमित हो गया.
कुछ महीने बाद एक हज़ार मील दूर मिशीगन राज्य के दो अलग डेयरी फ़ार्मों में भी इसी प्रकार की घटना हुई. इन तीनों श्रमिकों में एच5एन1 यानी एवियन या बर्ड फ्लू के वायरस का संक्रमण पाया गया.
यह चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि पहली बार बर्ड फ्लू का संक्रमण किसी मैमल या स्तनधारी प्राणी से मनुष्य में हुआ है. साथ ही पहली बार गायों में भी इस वायरस का संक्रमण पाया गया.
यह श्रमिक ठीक तो हो गये लेकिन तब से लेकर अब तक बर्ड फ़्लू का संक्रमण अमेरिका के कई राज्यों के कई डेयरी फ़ार्मों में फैल गया है. तो इस हफ़्ते हम दुनिया जहान में यही जानने की कोशिश करेंगे कि मनुष्यों के लिए बर्ड फ़्लू कितनी बड़ी चिंता का विषय है?
डेयरी और पोल्ट्री फ़ार्म में बर्ड फ़्लू का प्रसार
अमेरिका की जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की असोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर एरीन सोरेल का मानना है कि आम लोगों को इससे ख़तरा बहुत कम है लेकिन खेतों में जानवरों के साथ काम करने वाले लोगों को इससे ज़्यादा ख़तरा है.
इस संक्रमण के बारे में एरिल सोरेल का कहना है, "गाय का दूध निकालते समय उसके स्तन से आंखों के ज़रिए यह संक्रमण फैलने की संभावना है. यानी संभव है कि संक्रमित दूध को छूने के बाद श्रमिकों ने अपनी आंखों को छुआ होगा."
"ऐसा लगता है कि पहले केस में मरीज़ को कंजंक्टिवाइटिस हो गया था जिसकी वजह से वो डॉक्टर के पास गए. मिशीगन के दूसरे मामले में कंजंक्टिवाइटिस के साथ मरीज़ में खांसी और सांस लेने में दिक्कत जैसे लक्षण भी देखे गए थे.”
तो फिर इन मामलों में गायों के साथ बर्ड फ़्लू का संबंध कैसे सामने आया?
डॉक्टर एरीन सोरेल ने जवाब दिया कि कुछ सतर्क वेटरनरी या जानवरों के डॉक्टरों को पशुओं की बीमारी को देख कर अचरज हुआ क्योंकि इन डेरी के मवेशियों में पहले बर्ड फ़्लू नहीं देखा गया था. उन्होंने जांच की तब इसका पता लगा.
डेयरी से आए दूध को पाश्चराइज़ किया जाता है. इससे दूध के भीतर कोई बैक्टीरिया या फंगस हो तो वो नष्ट हो जाते हैं. मगर कई जगहों पर बिना पाश्चराइज़ किए गए दूध भी बेचे जाते हैं, जिससे कुछ बीमारियों का संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है.
इस साल जून तक अमेरिका के लगभग एक दर्जन डेयरी फ़ार्म में मवेशियों में बर्ड फ़्लू के संक्रमण के कम से कम सौ मामले सामने आए हैं.
एरीन सोरेल के अनुसार मिशिगन राज्य ने टेस्टिंग और निगरानी बढ़ा दी और साथ ही डेयरी श्रमिकों को इस समस्या से अवगत कराने के लिए कई कदम उठाए.
मगर अन्य अमेरिकी राज्यों में इस समस्या से तत्परता से नहीं निपटा जा रहा है.
एरीन सोरेल यह भी कहती हैं, "खेतों में या डेयरी फ़ार्म में काम करने वाले श्रमिकों को ख़तरा रहता है. क्योंकि इन्हें बीमारी के लक्षण सामने आने पर भी अपनी जांच करवाने के लिए छुट्टी नहीं मिल पाती. ना ही उन्हें वो चिकित्सा सुविधाएं मिल पाती हैं जो एक आम औसत अमेरिकी व्यक्ति को मिलती हैं.
इसकी वजह से एच5एन1 की रोकथाम करने के लिए जो जांच और दूसरे कदम उठाने होते हैं वो इनके मामले में मुश्किल साबित होते हैं. अमेरिकी केंद्रीय रोग नियंत्रण संस्था के आंकड़ों के अनुसार बर्ड फ़्लू के मामलों में वृद्धि हुई है.
डॉक्टर एरीन सोरेल ने बताया, "मार्च से अब तक कम से कम 45 लोगों में इस संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है और लगभग 550 लोगों को बर्ड फ़्लू से संक्रमितों के संपर्क में आने की वजह से निगरानी में रखा गया है."
हालांकि यह संख्या बहुत बड़ी नहीं हैं, लेकिन स्थिति का सही अंदाज़ा तभी लगेगा जब टेस्टिंग बढ़ाई जाएगी.
उन्होंने कहा, "संक्रमित लोगों की सही जांच और इलाज बेहद ज़रूरी है. बाद में यह वायरस और म्यूटेट हो सकता है या नए रूप में तब्दील हो सकता है. हमने अभी इस दिशा में कदम नहीं उठाए तो मनुष्यों में एक दूसरे से बर्ड फ़्लू का ख़तरा बढ़ सकता है. अगर इसे रोकना है तो हमें अभी कदम उठाने चाहिए."
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फ़िट वायरस
लंदन के इंपीरियल कॉलेज की प्रोफ़ेसर और वायरस विशेषज्ञ वेंडी बार्कले बताती हैं, "बर्ड फ़्लू इन्फ़्लूएंजा वायरस का ही एक प्रकार है जो आमतौर पर बत्तख और हंस जैसे जंगली पक्षियों या समुद्री पक्षियों को संक्रमित करता है."
"लेकिन जब बर्ड फ़्लू मुर्गियों जैसे पालतू पक्षियों को संक्रमित करता है तब वह बड़ी समस्या बन जाता है. पक्षियों के लिए यह वायरस बेहद ख़तरनाक होता है क्योंकि इससे उनकी मौत जल्द हो जाती है. इसके संक्रमण से पूरा पोल्ट्री फ़ार्म नष्ट हो जाता है. जब मनुष्य में इसका संक्रमण होता है तो यह उनके श्वसन तंत्र में पहुंचता है लेकिन पक्षियों में यह पूरे शरीर में फैल जाता है और उनके ब्रेन और ख़ून को संक्रमित कर देता है जिनसे पक्षियों की मौत हो जाती है."
मगर एच5एन1 अपनी तरह का अकेला वायरस नहीं है. इसके सोलह प्रकार या वेरिएंट हैं. इसी वायरस का एक वेरिएंट H2344B पिछले कुछ सालों में दुनियाभर में जानवरों में फैल रहा है. अमेरिका के डेयरी फ़ार्मों में इसी के एक वेरिएंट का संक्रमण फैल रहा है.
वेंडी बार्कले का कहना है कि यह अत्यंत जीवट वायरस है जो पक्षियों के ज़रिए दूर-दूर तक पहूंच रहा है.
उन्होंने कहा, "यह बहुत ही फ़िट वायरस है. यह एशिया से यूरोप और अटलांटिक सागर पार अमेरिका तक पहुंच गया है. दक्षिण अमेरिका में इससे केवल समुद्री पक्षी ही नहीं बल्कि सील जैसे स्तनधारी प्राणी भी संक्रमित हो रहे हैं. सील कई बार मरे हुए संक्रमित पक्षियों को खाती है जिससे उनमें भी यह वायरस पहुंच जाता है."
लेकिन मनुष्यों में बर्ड फ़्लू के संक्रमण के मामले पहली बार कब आए?
वेंडी बार्कले कहती हैं, "1997 में चीन की मुर्गा मंडियों में इसके मामले बड़ी संख्या में सामने आए. तब वहां मनुष्यों में इसका संक्रमण फैलने की रिपोर्टे आयी थी. चीन में जिन अठारह लोगों में बर्ड फ़्लू का संक्रमण हुआ था उनमें से छ: की मौत हो गयी. ऐसी वारदात पहले कभी नहीं हुई थी. यह स्थिति साल 2000 से 2005 तक जारी रही."
इसके बाद संक्रमित मुर्गियों की वजह से इंडोनेशिया और वियतनाम में भी बर्ड फ़्लू फैला और सैकड़ों लोग इससे संक्रमित हुए.
बार्कले कहती हैं, "उस समय यह वायरस हवा के ज़रिए नहीं फैल रहा था यानी जो लोग संक्रमित मुर्गियों के संपर्क में आए उन्हीं को यह बीमारी हुई. मगर किसी संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बीमारी का संक्रमण नहीं हुआ जिसकी वजह से यह महामारी का रूप नहीं ले पाई. आज भी यही स्थिति है."
वेंडी बार्कले कहती हैं, "जंगली पक्षियों में इस वायरस का संक्रमण जारी रहा और यह वायरस अपना रूप बदलता रहा, विकसित होता रहा. 2022 में एक बार फिर इसका संक्रमण बढ़ने लगा. मगर पक्षियों से गायों में इसका संक्रमण कैसे हुआ इसके बारे में अभी पूरी जानकारी नहीं है."
प्राणियों की नयी प्रजातियों में संक्रमण
ग्लासगो की एम आर सी यूनिवर्सिटी में सीनियर लेक्चरर वायरोलॉजिस्ट डॉक्टर एड हचीसन कहते हैं, "जब वायरस का संक्रमण प्राणियों की एक प्रजाति से दूसरी में होता है तो वायरस का स्वरूप बदल जाता है."
"अन्य पैथोजन के विपरीत जब वायरस किसी दूसरी प्रजाति के प्राणी में प्रवेश करता है तो वह उसे खाने लगता है और उसकी कोशिकाओं पर कब्ज़ा जमा के वहां नए वायरस बनाना शुरू कर देता है. लेकिन वायरस के लिए नयी प्रजाति के अनुसार अपने आपको बदलना आसान नहीं होता."
उन्होंने बताया, "एच5एन1 वायरस के बारे में भी यह लागू होता है. वायरस को अपने आपको नयी प्रजाति में जीने के लिए ढालने में कई साल लग जाते हैं जो कि हमने इस वायरस के बारे में भी पाया है. लेकिन एक बार वो ऐसा करने में समर्थ हो जाए तो उसका स्वरूप बदलने लगता है और नयी प्रजातियों और मनुष्यों के लिए संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है.”
तो आगे इसके क्या परिणाम हो सकते हैं?
इस सवाल के जवाब में डॉक्टर एड हचीसन ने कहा, "इसे लेकर कई चिंताएं हैं जिसमें से एक है इसका इकॉलॉजी यानी पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाला प्रभाव."
"पिछले दो सालों के दौरान हमने देखा कि समुद्री तटों पर समुद्री पक्षियों को इस वायरस से काफ़ी नुकसान पहुंचा था. अब यही संक्रमण अंटार्कटिका में समुद्री पक्षियों में भी हो रहा है. वहीं दक्षिण अमेरिका के तटों पर सील जैसे स्तनधारी प्राणियों में भी बर्ड फ़्लू का संक्रमण बढ़ रहा है. दूसरी चिंता मवेशियों में इस वायरस के संक्रमण की है जिसकी वजह से वायरस की रोकथाम के लिए बड़े स्तर पर मवेशियों को नष्ट करने की ज़रूरत पड़ सकती है."
और मनुष्यों को इस वायरस से कितना ख़तरा है?
इस पर डॉक्टर एड हचीसन का कहना है कि, “ अगर यह वायरस मनुष्यों के भीतर आसानी से जीने के लिए अपने आपको ढाल लेता है तो मनुष्यों के लिए ख़तरा बढ़ जाएगा. अभी तक तो बर्ड फ़्लू का शिकार वो लोग हुए हैं जो संक्रमित जानवरों के संपर्क में थे. लेकिन अगर यह वायरस मनुष्यों के भीतर पलने के लिए अपने स्वरूप को ढाल ले तो फिर संक्रमित मनुष्यों से दूसरे मनुष्यों में संक्रमण होने लगेगा जो कि महामारी की शुरुआत होगी. फ़िलहाल तो ऐसा नहीं हो रहा.”
मगर क्या इस वायरस पर नियंत्रण किया जा सकता है?
डॉक्टर एड हचीसन का कहना है कि एच5एन1 का ज्यादातर संक्रमण जंगली पक्षियों में होता है इसलिए उनमें उसके संक्रमण की रोकथाम बहुत मुश्किल है. लेकिन उन पक्षियों से हम तक यह संक्रमण न पहुंचे इसके लिए प्रयास किये जा सकते हैं.
उन्होंने कहा, "मिसाल के तौर पर अंटार्कटिका जैसे क्षेत्रों में पर्यटन को सीमित किया जा सकता है. प्रभावित इलाकों की निगरानी और वहां से मिलने वाले डेटा का आदान-प्रदान बहुत ज़रूरी है जो कि कई वजहों से आसान नहीं रहा है."
"दूसरी संभावना यह है कि यह वायरस अपने आप कमज़ोर होकर ख़त्म हो जाएगा. या मवेशियों में इसके ख़िलाफ़ प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाएगी. मनुष्यों में इसके संक्रमण और महामारी जैसी स्थिति को टालने के लिए समन्वय के साथ व्यापक कदम उठाए जाने की ज़रूरत है.”
फ़्लू फाइटर्स
यूरोप में विश्व स्वास्थ्य संगठन के हाइथ्रेट पैथोजन ग्रुप का नेतृत्व करने वाले डॉक्टर मार्क एलन विडोसन कहते हैं कि अमेरिका और विश्व के दूसरे देशों में इस प्रकार के संक्रमण से निपटने में बड़ी चुनौती यह है कि इसमें कई गुटों और लोगों के साथ मिल कर काम करना पड़ता है.
"इस संक्रमण की रोकथाम में स्वास्थ्य संगठनों की अपनी राय होती है, फिर प्राणियों के स्वास्थ्य से जुड़े गुट हैं, कृषि उद्योग से जुड़ें गुटों के अपने हित हैं. साथ ही राजनीतिक गुटों के हित भी इस मुद्दे से जुड़े हुए हैं इसलिए इन सब के साथ मिलकर काम करना पड़ता है."
बर्ड फ़्लू से मुर्गियों की जल्द ही मौत हो जाती है और संक्रमण का पता चल जाता है. मार्क एलन विडोसन कहते हैं कि मवेशियों में इस वायरस के संक्रमण का पता जल्द नहीं चलता क्योंकि बर्ड फ्लू से संक्रमित गाय कुछ बीमार और थकी हुई नज़र आती है और उसका दूध फट जाता है लेकिन वो इतनी बीमारी नहीं होती की किसान या डेयरी फ़ार्म के कर्मचारी उसकी जांच करें. उन्हें इस बारे में अधिक जागरूक होना पड़ेगा. H5N1 वायरस से दुनिया भर में लाखों पक्षी मारे जा रहे हैं. वियतनाम, चीन और इंडोनेशिया उन गिने चुने देशों में हैं जिन्होंने पोल्ट्री फ़ार्म में मुर्गियों सहित पाले जाने वाले पक्षियों को वैक्सीन लगाना शुरू कर दिया है.
डॉक्टर मार्क एलन विडोसन ने कहा कि यह काम निश्चित ही किया जा सकता है लेकिन आसान नहीं है. क्योंकि एक एक मुर्गी को पकड़ के वैक्सीन लगाना मुश्किल भी है और महंगा भी है. यह करने के लिए लोगों को सोचना पड़ता है कि क्या संक्रमण का ख़तरा इतना बड़ा है कि इसकी रोकथाम के लिए इतना खर्चा उठाया जाए.
सीज़नल यानी मौसमी फ़्लू से बचने के लिए जो इंजेक्शन लिए जाते हैं वो बर्ड फ़्लू को नहीं रोक पाएंगे. मगर बर्ड फ्लू के वायरस से मनुष्यों को बचाने के लिए कुछ वैक्सीन तैयार की जा चुकी हैं. इस साल जून में फ़िनलैंड ने घोषणा की कि वह ऐसे हज़ारों कर्मचारियों को यह वैक्सीन देगा जिनके संक्रमित प्राणियों से संपर्क होने की संभावना है. यह कदम उठाने वाला वह दुनिया का पहला देश हैं. मार्क एलन विडोसन ने कहा कि फ़िनलैंड ने यह कदम इसलिए उठाया है क्योंकि वहां कुछ जगहों पर बड़ी मात्रा में बर्ड फ़्लू का संक्रमण हुआ है जिससे श्रमिक प्रभावित हुए. मगर अमेरिका में गायों में बर्ड फ़्लू के संक्रमण से क्या दूसरे देशों को भी चिंता करनी चाहिए?
डॉक्टर मार्क एलन विडोसन मानते हैं कि और देशों के लिए भी यह चिंता का विषय है क्योंकि अगर यह बीमारी एक गाय से दूसरी गाय में फैल रही है तो संक्रमण जितना बढ़ेगा यह वायरस उतना ही विकसित होता जाएगा और संक्रमित स्तनधारी प्राणियों में इससे सांस लेने में दिक्कत बढ़ जाएगी. यह महामारी का रूप धारण कर लेगा. जिस प्रकार अमेरिका में यह पक्षियों के माध्यम से गायों में पहुंच गया वैसा ही यूरोप में भी हो सकता है. मनुष्यों में इसका संक्रमण चिंता का विषय है. यूके में पिछले चार सालों में H5N1 के पांच मामले सामने आ चुके हैं. लेकिन अभी तक एक व्यक्ति से दूसरे में इस वायरस का संक्रमण होता नहीं दिखा है. लेकिन आगे अगर मनुष्यों में एक दूसरे के माध्यम से यह बीमारी फैलने लगी तो स्थिति ख़तरनाक हो जाएगी.
तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर- मनुष्यों के लिए बर्ड फ़्लू कितनी बड़ी चिंता का विषय है? पहले भी एच5एन1 का संक्रमण स्तनधारी प्राणियों में पाया गया है लेकिन अब संक्रमित मवेशियों के साथ काम करने वाले मनुष्यों में संक्रमण फैलने लगा है. हालांकि अभी भी यह बीमारी एक इंसान से दूसरे को नहीं लगी है. आम लोगों को इससे ख़ास ख़तरा नहीं है. लेकिन मवेशियों और पोल्ट्री फ़ार्म में मुर्गियों की देखभाल करने वाले श्रमिकों को ख़तरा ज़रूर है. डेयरी और पोल्ट्री फ़ार्म में लगातार निगरानी और जांच के ज़रिए इसकी रोकथाम में मदद मिल सकती है लेकिन यह काम आसान नहीं है. डॉक्टर मार्क एलन विडोसन की राय है कि हमें घबराने की ज़रूरत नहीं है लेकिन सावधानी बरतना ज़रूरी है.
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