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मध्य प्रदेश- विधायकों के 'अखाड़े' में बीजेपी के मंत्रियों की 'कसरत' कितनी कठिन?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मुरैना से दिमनी की सड़क पर जाम लगा हुआ है. 22 किलोमीटर का सफ़र है मगर सुबह से ही गाड़ियों का रेला लगा हुआ है.
आज का दिन ख़ास है. आज विधानसभा का टिकट मिलने के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर पहली बार अपने विधानसभा क्षेत्र जा रहे हैं.
वो मुरैना से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं और इस ज़िले में विधानसभा की छह सीटें हैं.
सड़क से लेकर आसमान तक लोगों की निगाहें लगी हुईं हैं क्योंकि आज मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी आ रहे हैं.
दिमनी में आज एक सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है ताकि कार्यकर्ताओं में ‘जोश फूँका’ जा सके.
ग्वालियर-चंबल संभाग प्रदेश की राजनीति का महत्वपूर्ण क्षेत्र है.
कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेताओं की राजनीति का गढ़ भी माना जाता है.
लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया की कांग्रेस से बग़ावत और फिर उनका अपने समर्थन वाले 22 कांग्रेस के विधायकों के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद इस क्षेत्र के सारे समीकरण तेज़ी से बदल गए.
भारतीय जनता पार्टी के अंदर भी असंतोष पनपने लगा और आपसी गुटबाज़ी बढ़ने लगी.
भाजपा का चौंकाने वाला फ़ैसला
इसी गुटबाज़ी को नियंत्रित करने के लिए भारतीय जनता पार्टी के आलाकमान ने केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को मध्य प्रदेश में विधान सभा के चुनावों की रणनीति बाने के लिए संयोजक बनाकर भेजा.
वो प्रदेश की राजनीति से लंबे समय तक कटे रहे.
2019 में लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में बतौर कृषि मंत्री शामिल किया गया.
उनका ज़्यादातर कार्यकाल किसान आंदोलन से निपटने में चला गया.
एक महीने पहले जब बीबीसी से उनकी मुलाक़ात हुई थी, तो वो काफ़ी जोश में थे. वे प्रदेश की राजनीति में वापसी के बाद अपनी तरह से चुनावी रणनीति बनाने में लग गए थे.
लेकिन उनका नाम भाजपा के प्रत्याशियों की पहली सूची में ही आ गया था. ये पार्टी का चौंकाने वाला फ़ैसला था.
उनके क़रीबी नेताओं का कहना है कि इस फ़ैसले की ना तो उनको पहले से कोई जानकारी थी और ना ही इस बारे में उनसे कोई सलाह ही ली गई थी.
इस वजह से वो नाराज़ भी चल रहे थे और अपने विधानसभा क्षेत्र यानी दिमनी से दूर ही रह रहे थे.
एमएलए की रेस में एमपी- एक अबूझ पहेली
भारतीय जनता पार्टी ने मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनावों के उम्मीदवारों की जो पहली सूची जारी की थी, उनमे तीन केंद्रीय मंत्री सहित कुल सात सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के नामों ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी.
तोमर के अलावा नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में उनके साथी दो राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते और प्रहलाद पटेल को भी विधान सभा चुनावों में उम्मीदवार बनाए जाने से सारे समीकरण उलट पुलट हो गए.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक देव श्रीमाली ने ग्वालियर में बीबीसी से बात करते हुए कहा कि जिन बड़े नेताओं को चुनावी मैदान में उतारा गया है, सब इस फ़ैसले से नाराज़ हैं.
वो कहते हैं कि इनमे कोई पाँच बार तो कोई छह बार का सांसद है.
श्रीमाली कहते हैं, “बीजेपी हाईकमान का पिछले 15-20 सालों का जो रवैया देखने को मिल रहा है, वो चौंकाने वाला है. चौंकाने में वो तो अब अपने ही नेताओं को चौंका रहे हैं. इसके पीछे क्या रणनीति है अभी तक पार्टी ने भी स्पष्ट नहीं किया है.”
क्या ये मास्टर स्ट्रोक है?
दिमनी के बड़ेगाँव के रहने वाले आकाश तोमर भी पार्टी के फ़ैसले से आश्चर्य में हैं.
वो कहते हैं कि नरेंद्र सिंह तोमर प्रदेश की राजनीति से होते हुए देश की राजनीति तक पहुँच गए हैं. उनका मानना है कि इतने वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री को विधानसभा का चुनाव लड़वाना सही नहीं है.
बड़ेगाँव के आगे एक छोटा सा बाज़ार है, जहाँ रोज़ की तरह काफ़ी गहमा-गहमी है. बातचीत में भीड़ जुट गई.
कुछ पार्टियों के कार्यकर्ता हैं और कुछ व्यापारी. बतौर मुरैना के सांसद नरेंद्र सिंह तोमर ने क्या किया? इस पर चर्चा हो रही है.
प्रदेश में चल रही ‘एंटी इनकमबेंसी’ का भी असर समझ आ रहा है.
यहाँ पर मौजूद भाजपा के कार्यकर्ता सोनू तोमर कहते हैं कि प्रदेश में पार्टी के अंदर चल रही अंतर्कलह से निपटने के लिए नरेंद्र सिंह तोमर को मैदान में उतारना दरअसल पार्टी का ‘मास्टर स्ट्रोक’ है.
चूँकि भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री का चेहरा सामने नहीं किया है, इसलिए बड़े नेताओं के समर्थक और भी उम्मीदें पाले हुए हैं.
वो कहते हैं, “केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर जी को पार्टी ने नया दायित्व दिया है विधानसभा के चुनावों में. उन्हें विधायक का चुनाव लड़ने के लिए उतारा गया है. हम उन्हें अच्छे मतों से विजयी बनाना चाहते हैं. जनता में भी बहुत उत्साह है. नरेंद्र सिंह तोमर जी को दिमनी से जिताकर मुख्यमंत्री के लिए भेजा जाएगा.”
लोग क्या कह रहे हैं?
यहीं मौजूद व्यापारी राजू जैन बताते हैं कि जब से उन्होंने वोट डालना शुरू किया है तो वो भाजपा को ही वोट देते थे. वो कहते हैं, “मगर इस बार नहीं. हम बदलाव चाहते हैं. कुछ भी नहीं किया है हमारे लिए सरकार ने.”
ये सीट पिछले उपचुनाव में बीजेपी हार गई थी. यहाँ पर कांग्रेस के मौजूदा विधायक भी तोमर यानी ‘ठाकुर’ ही हैं और वो हैं रविंदर सिंह तोमर.
दिमनी में कुल 201517 मतदाता हैं, जिनमें 89234 महिलाएँ हैं. 65000 के आसपास तोमर समाज के वोट हैं.
लेकिन दो तोमरों के मैदान में होने से अनुसूचित जाति के 48000 वोट पर सबकी निगाहें टिकी हुईं हैं.
अति पिछड़े वर्ग की भी अच्छी तादात है, इसलिए यहाँ पर बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार की मौजूदगी लड़ाई को रोचक बना रही है.
नरेंद्र सिंह तोमर
नरेंद्र सिंह तोमर 15 सालों के बाद विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. पूरे मन से या आधे मन से?
इस पर बहस चल रही है, लेकिन उनके पहले के तेवर और आज के तेवर में फ़र्क स्पष्ट है.
दिमनी में अपने चुनावी कार्यालय का उद्घाटन करते-करते दिन ढल चुका है. बिजली चली गई है.
मोबाइल की ‘टार्च’ की रोशनी में उनसे बातचीत कैमरे में रिकार्ड कर रहे थे, तो उन्होंने माना कि ‘विधानसभा का चुनाव इतने अंतराल के बाद लड़ना उनके लिए एक अलग अनुभव है.'
बीबीसी से उन्होंने कहा, “तीन बार लोकसभा में रहा. 15 सालों के बाद विधानसभा का चुनाव लड़ना, निश्चित रूप से एक अलग प्रकार का अनुभव तो है ही. लेकिन, मुझे इस बात की ख़ुशी है कि पार्टी मुझे समय-समय पर आदेश देती है और पार्टी के आदेश का पालन करना मेरा सौभाग्य है और मेरी ज़िम्मेदारी भी है.”
चुनाव लड़ना नरेंद्र सिंह तोमर के लिए कोई बड़ी बात नहीं है. फ़र्क बस इतना सा है कि इस चुनावी रणभूमि के वो कभी कमांडर हुआ करते थे.
यानी पूरे प्रदेश में चुनाव की रणनीति बनाने के लिए उन्हें संयोजक बनाया गया है. वो दूसरे नेताओं के लिए प्रचार कर रहे थे. अब वो सैनिक की तरह लड़ रहे हैं.
हालाँकि उन्होंने तर्क देते हुए कहा, "जब युद्ध का क्षेत्र होता है, तो अनेकों तरह की रणनीतियाँ बनती हैं. और उस रणनीति के हिसाब से ही एक सैनिक को खड़ा भी होना चाहिए."
पिछली बार बीजेपी को इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा था. यहाँ से कांग्रेस के विधायक रवींद्र सिंह तोमर के लिए भी इस बार कड़ी चुनौती है.
रवींद्र सिंह तोमर कहते हैं, “कैबिनेट मंत्री को यहाँ दिमनी में भेजना, साफ़ साफ़ दिखा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी डरी हुई है. ढाई साल से मैं विधायक हूँ. उस भय के कारण ही कोई कैंडिडेट नहीं निकला बीजेपी में से. तब केंद्रीय मंत्री को लाना पड़ा.”
फग्गन सिंह कुलस्ते
दिमनी से 500 किलोमीटर दूर चार बार के सांसद और मंडला के बड़े आदिवासी नेता फग्गन सिंह कुलस्ते 1990 के बाद विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं अपने गृह ज़िले की निवास सीट से.
वो केंद्रीय इस्पात राज्य मंत्री हैं. चिलचिलाती धूप में एक के बाद एक गाँव में प्रचार के लिए जा रहे हैं.
कुछ ही गाड़ियों का क़ाफ़िला है उनका. वे रास्ते में छोटे छोटे गाँव में रुक कर ग्रामीणों से बात कर रहे हैं. वोट मांग रहे हैं.
निवास सीट पर भी पिछले विधान सभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था.
इसलिए कुलस्ते के लिए डगर उतनी आसान भी नहीं है. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि इस बार उन्हें मैदान में उतारा जाएगा.
समय कम है और उनके सामने चुनाव जीतने का लक्ष्य बड़ा है. क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि इस चुनाव की हार जीत पर उनका राजनीतिक भविष्य निर्भर करेगा.
एक ऐसी ही चुनावी सभा के दौरान मंच पर बातचीत के दौरान वे बताते रहे कि बतौर सांसद उन्होंने काफ़ी काम किया है.
उनका कहना था, “देखिए, कभी मैंने अपने आपको जनप्रतिनिधि के रूप में नहीं माना. मैंने हमेशा एक समाजसेवी के रूप में ही काम किया है. इसलिए मुझे बिल्कुल कहीं से फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन सा चुनाव लड़ रहा हूँ. संसद का हो. आज विधानसभा का चुनाव भी मैं लड़ रहा हूँ. मुझे कहीं फ़र्क नहीं दिखा रहा है. यहाँ जो लोग जमा हैं, आप मेरे बारे में इनसे पूछ सकते हैं. एक सामान्य नागरिक की तरह लोगों से बातचीत करता रहता हूँ और जो लोगों के हित में बेहतर कर सकता हूँ उसकी कोशिश करता हूँ.”
बातचीत में ही उन्होंने स्वीकार भी किया कि उन्हें पता नहीं था कि चुनाव लड़ना है. यानी पार्टी से किसी ने उनकी सहमति के लिए चर्चा भी नहीं की.
मंत्री जी की सभा समाप्त हुई और वो जबलपुर की तरफ़ निकल पड़े, जहाँ से उन्हें दिल्ली की फ़्लाइट पकड़नी थी. हम भी ‘हाई वे’ पर उनके पीछे-पीछे निकल पड़े. रास्ते में पड़ने वाले एक गाँव की दुकान पर हमारी मुलाक़ात बहादुर सिंह नरेटी से हुई.
नरेटी और उनके साथ बैठे ग्रामीण पत्रकारों के सामने अपने पत्ते खोलना नहीं कहते थे.
काफ़ी पूछने पर नरेटी कहते हैं, “केंद्रीय मंत्री को एक विधायक की टिकट मिली. निकाल लेंगे. विधानसभा में 35 साल की राजनीति है उनकी. अगर विकास किया होगा तो सीट निकाल लेंगे.”
पास के ही एक दूसरे गाँव में हमारी मुलाक़ात विनोद कुमार मरावी से हुई, जिन्होंने खुलकर बोलना पसंद किया.
उनका कहना था, “निवास विधानसभा क्षेत्र से पिछली बार भी वोट उनको कम मिला था, जब वो लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे. वो यहीं के रहने वाले हैं. निवास विधान सभा के ही निवासी हैं. निवास विधानसभा क्षेत्र में वोट की संभावना कम है है उनके लिए. बीजेपी तो घबराई हुई है इस बार. सारे दांव पेंच लगाकर भी मुश्किल हो जाएगा जीतना.”
लेकिन, जानकार मानते हैं कि अगर किसी एक सीट पर भाजपा के उम्मीदवार की जीत की सबसे प्रबल संभावना है तो वो है नरसिंहपुर, जहाँ से केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और जल शक्ति राज्य मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल को उतारा गया है.
प्रहलाद सिंह पटेल का कार्यक्रम
आज की रात प्रहलाद सिंह पटेल सागोन घाट के किनारे रहने वाले मल्लाह समुदाय के लोगों के साथ गुज़ारेंगे.
इसकी तैयारियाँ पिछले दो दिनों से चल रहीं हैं. वो घर जहाँ उन्हें रात में रहना है उसकी साफ़ सफाई की जा चुकी है. रंग रोगन भी हो गया है.
उनके आने की ख़बर आते ही सांस्कृतिक कार्यक्रम भी शुरू हो गया है. आसपास के अखाड़ों के कलाकार ढोल नगाड़ों के साथ मौजूद हैं.
मंत्री जी को इन्ही नगाड़ों की आवाज़ के बीच मंच तक ले जाया जा रहा है. प्रहलाद पटेल पहली बार विधान सभा का चुनाव लड़ रहे हैं.
उन्हें छिंदवाड़ा की विधानसभा की सीट से कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के खिलाफ़ चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया गया था.
लेकिन उन्होंने नरसिंहपुर से लड़ना बेहतर समझा, जिस सीट पर उनके भाई जालम सिंह मौजूदा विधायक हैं.
वर्ष 1989 से सांसद रहे प्रहलाद पटेल मध्य प्रदेश की राजनीति के साथ-साथ संसदीय राजनीति में वरिष्ठ हैं. लेकिन विधान सभा चुनाव लड़ने का उनका अनुभव नहीं रहा है.
फिर भी पार्टी के निर्णय के बाद वो मैदान में उतरे हैं, लेकिन अपने भाई जालम सिंह पटेल के तैयार किए गए जनाधार पर.
सागोन पहुँचने से पहले करेली में हमारी मुलाक़ात उनसे हुई. उन्होंने बताया कि उन्हें ‘कहीं और से’ चुनाव लड़ना था.
बीबीसी से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, “मुझे कहीं और से लड़ना था. मुझे पार्टी का ऑफ़र था. मैंने हाँ भी कहा था. लेकिन उनका (मेरा भाई का) ऐसा मानना था कि दो भाइयों को एकसाथ नहीं लड़ना चाहिए. उन्होंने कहा कि आप लड़ेंगे तो मैं नहीं लडूँगा. इससे अच्छा कि मैं नरसिंहपुर की सीट ख़ाली कर दूँगा. आपको यहाँ से लड़ना चाहिए. 36 साल बाद मैं अपनी जन्मभूमि में वापस आया.”
राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि बाक़ी के दो केंद्रीय मंत्रियों की तुलना में, दमोह के सांसद, प्रहलाद सिंह पटेल के लिए जीत का रास्ता ज़्यादा मुश्किल नहीं होगा क्योंकि इस सीट पर उनके भाई विधायक हैं और उन्होंने इस इलाके में काफ़ी काम किया है.
लेकिन राजनीति का तकाज़ा है कि जालम सिंह को अपनी सीट की क़ुर्बानी देनी पड़ेगी.
लेकिन जालम सिंह मानसिक रूप से इसके लिए तैयार भी हैं और कहते हैं, “पार्टी का ऐसा कहना था कि मैं भी चुनाव लडूँ और वो (प्रहलाद सिंह पटेल) भी चुनाव लड़ें कहीं दूसरे ज़िले से. लेकिन मैंने निवेदन और आग्रह पार्टी से किया और कहा कि आप नरसिंहपुर से उनको टिकट दे दीजिए. क्योंकि इतने बड़े नेता हैं. सिद्धांतवादी हैं. उनकी आवश्यकता हमारे ज़िले को थी. उनको अवसर मिला है तो मैं पार्टी को धन्यवाद देता हूँ.”
प्रहलाद सिंह पटेल का संसदीय क्षेत्र दमोह और बालाघाट रहा है. वो सबसे पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल के सदस्य बन गए थे.
ये बात 1989 की है यानी संसदीय राजनीति में वो नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राज्य की अगर बात की जाए तो शिवराज सिंह चौहान से भी सीनियर हैं.
चर्चा के दौरान वो कहते हैं कि मध्य प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर की बजाय संगठन में आपस का मतभेद चिंता की बात बन गया है.
उनका कहना था, “मैं मानता हूँ कि सत्ता विरोधी या सत्ता के पक्ष में लहर जैसी शब्दावली को अब बदल देना चाहिए. विरोध किसके बीच में? क्या जनता के बीच में? नहीं. जनता तो ख़ुश है. जनता से तो आपत्ति नहीं है. कार्यकर्ताओं के बीच में जो चीज़ें आती हैं, उसे सत्ता विरोधी लहर नहीं कह सकते. हमारी कार्यप्रणाली में कहीं गैप रह जाता है शायद वो होता है. पार्टी इसका आकलन करती है. इसलिए मुझे नहीं लगता. लेकिन 18 साल से ज़्यादा जब हम राज्य की राजनीति में हैं, तो हमें बेहतर से बेहतर परफ़ॉर्म करना पड़ेगा. आप एक बार जीतते हैं तो कोई बड़ी बात नहीं है. लेकिन अटल जी कहते थे कि दोबारा पुनरावृत्ति करना कठिन है.”
राजनीतिक विश्लेषकों का क्या है कहना?
राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि पिछले विधान सभा के चुनावों में भी भारतीय जनता पार्टी को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा था.
पिछले चुनावों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था. उन्हें लगता है कि इस बार भी हालात वैसे ही बने हुए हैं जिससे कांग्रेस का पलड़ा थोड़ा भारी नज़र आने लगा था.
लेकिन कांग्रेस को पिछली बार की तरह अगर अपना प्रदर्शन बनाए रखना है, तो उसे काफ़ी मेहनत करनी पड़ेगी और कई बातों को ध्यान में रखना होगा.
कांग्रेस पर लंबे अरसे से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई कहते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के सामने ये है कि वो अति आत्म विशवास के जाल में ना फँस जाए.
बीबीसी से किदवई का कहना था कि कांग्रेस में हमेशा से ही अति आत्मविश्वास ‘बड़ी चुनौती’ रही है. कभी कभी वो इसमें बहुत ज़्यादा फँस जाते हैं. उनके अनुसार, कांग्रेस के बड़े नेता भी मानने लगते हैं कि दूसरों की ग़लतियों से जीत जाएँगे. लेकिन ऐसा नहीं है.
किदवई कहते हैं, “अब जबकि कांग्रेस को लगता है कि हवा उसके अनुकूल है तो उसे गुटबाज़ी, जातिवाद और भावनात्मक मुद्दों से बचना होगा. जैसे धर्म के मुद्दे. सबसे बड़ी चुनौती यही है. कमलनाथ ने अपने हिंदू पक्ष को मज़बूत किया है. लेकिन भाजपा इस मामले में बहुत आगे है क्योंकि मध्य प्रदेश देश के बहुत कम राज्यों में से है जहाँ पर 92 प्रतिशत आबादी बहुसंख्यक हैं. अभी पश्चिम एशिया में जो चल रहा है. हमास और दुनिया भर की बातें, वो हो सकता है कि इस चुनाव पर असर डालें.”
हालाँकि कांग्रेस का दावा है कि वो इस बार अपना होमवर्क पहले से कहीं ज़्यादा बेहतर ढंग से करने के बाद ही मैदान में उतरी है.
वो ये भी मानती है कि केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को चुनाव में उतारने से भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ ही माहौल बन रहा है.
कांग्रेस का दावा
मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता आरपी सिंह का दावा है कि भाजपा में चल रही गुटबाज़ी का कांग्रेस को ही फ़ायदा होगा.
वो कहते हैं, “मुरैना-चंबल में देसी भाषा में कहा जाता है- उन्होंने कट्टों की जगह तोपों को उतार दिया है. हमारे लिए तो ये जीतने वाली स्थिति है. मध्य प्रदेश में तीन भाजपा हो गई है-शिवराज भाजपा, महाराज भाजपा और नाराज़ भाजपा. तो ये जो तीन गुट भारतीय जनता पार्टी के आप देखेंगे, यही लोग भारतीय जनता पार्टी के लीडर्स और विशेषकर इस बड़ी छवि के नेताओं को हराने में लग जाएँगे.”
जानकार ये भी मानते हैं कि विधानसभा के चुनाव के रण में उतारे गए केंद्रीय नेताओं का राजनीतिक भविष्य भी दाँव पर लग गया है.
वो इसलिए कि विधान सभा के चुनावों के फ़ौरन बाद लोकसभा के चुनाव भी होने वाले हैं. ऐसे में विधानसभा में उनकी कामयाबी पर ही उनका राजनीतिक भविष्य निर्भर करेगा.
राजनीतिक भविष्य पर जुआ
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक देव श्रीमाली कहते हैं कि विधान सभा के चुनावी परिणाम न सिर्फ़ तीन केंद्रीय मंत्रियों के लिए चुनौती हैं, बल्कि चार अन्य सांसदों के लिए भी, जिन्हें पार्टी ने इस समर में उतारा है. वो कहते हैं कि इनमें से सभी इसके लिए तैयार नहीं थे.
श्रीमाली के मुताबिक़, “इसको लेकर ही उधेड़ बुन चल रही है कि इनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा? कई सवाल पूछे जा रहे हैं. लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इन सवालों के जवाब अब तक नहीं दिए हैं. सवाल ये है कि, मान लीजिए ये जीत जाते हैं, तो इनकी क्या भूमिका होगी? क्या ये फिर लोक सभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे? ये सवाल पार्टी के कार्यकर्ता तो पूछ रहे हैं ही, जिन सांसदों को टिकट दिया गया है, वो भी यही पूछ रहे हैं. ये भी पता नहीं कि विधान सभा में हार की स्थिति में क्या इन्हें अपनी लोकसभा सीट से टिकट मिल पायेगा?”
वे बताते हैं कि बीजेपी के ये सांसद अपने राजनीतिक करियर के इस पड़ाव पर आने के बावजूद अपने भविष्य को लेकर एक तरह का जुआ ही खेल रहे हैं.
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