ग़ज़ा हिंसा: इसराइलियों और फ़लस्तीनियों को डर, हालात और होंगे ख़राब

    • Author, जेरेमी बोवेन
    • पदनाम, बीबीसी, अंतरराष्ट्रीय मामलों के संपादक

बीते कुछ दिनों में मैंने दक्षिण इसराइल में ग़ज़ा से सटी उसकी सीमा के पास का दौरा किया और वेस्ट बैंक में बसाए गए कट्टर यहूदी लोगों से मुलाक़ात की.

इसके अलावा एक रिफ्यूजी शिविर में इसराइली सेना के हमले में मारे गए दो फ़लस्तीनी युवाओं के जनाज़े को भी मैंने करीब से देखा.

तेल अवीव की एक ऊंची इमारत में मैंने एक पूर्व इसराइली नेता से उनके दफ्तर में मुलाक़ात की, साथ ही मैंने रामल्ला में एक वरिष्ठ फ़लस्तीनी अधिकारी से उनके दफ्तर में बात की.

एक प्रदर्शन के दौरान मैंने एक इसराइली पिता से बात की जिन्होंने मुझसे कहा कि उनकी बेटी का बर्थडे केक उस वक्त फ्रिज में रखा हुआ था जब उनकी पत्नी और उनके तीन बच्चों को हमास के बंदूकधारियों ने अगवा कर लिया था. वो कहते हैं वो केक अब भी फ्रिज में रखा हुआ है.

जो काम मैं अब तक नहीं कर सका वो है ग़ज़ा में प्रवेश कर पाना. अब तक ग़ज़ा में प्रवेश कर पाने वालों में राहत सामग्री की कुछ गाड़ियां हैं और कुछ इसराइली सैनिक हैं जो टोह लेने पहुंचे हैं.

बीते ढाई हफ्तों में यहां और अधिक फ़लस्तीनियों और इसराइलियों की मौत हुई है. मरने वालों की ये संख्या साल 2000 से शुरू होकर 2004 में ख़त्म हुए दूसरे फ़लस्तीनी इंतिफादा या फ़लस्तीनी हथियारबंद संघर्ष में मरने वालों से अधिक हो गई है.

जिन अलग-अलग तरह के लोगों से मेरी मुलाक़ात हुई उनमें इसराइली और फ़लस्तीनी लोगों के अलावा विदेशी नागरिक शामिल हैं. इन सबसे बात कर के मेरे ज़ेहन में एक ही तस्वीर साफ़ हुई.

सभी को ये एहसास है कि लंबे वक्त से चले आ रहे इसराइल-फ़लस्तीनी संघर्ष में आख़िरी इंतिफादा के बाद आम ज़िंदगी जीने का लोगों का एक तरीका-सा बन गया था.

लेकिन सात अक्तूबर की घटना के बाद जो कुछ हुआ वो इतना बड़ा है कि उसने पुरानी बातों को हमेशा के लिए बदल दिया. अब हर तरफ़ ये डर है कि इसके बाद जो भी होगा वो और भी बुरा होगा.

इसराइल के कब्ज़े वाले इलाक़ों में ग़ज़ा, पूर्वी यरूशलम समेत वेस्ट बैंक शामिल हैं.

1967 के मध्य पूर्व युद्ध के दौरान इसराइल ने सीरिया के गोलन हाइट्स पर कब्ज़ा कर लिया था. और इसी वक्त इसराइल ने इन फ़लस्तीनी इलाक़ों पर भी कब्ज़ा कर लिया था.

इसराइल के इतिहास में ये अब तक की सबसे तेज़ और सबसे बड़ी जीत थी, जिसे उसने केवल छह दिनों में हासिल कर लिया था.

1948 में आज़ादी की लड़ाई के 19 साल के बाद हुई 1967 की अरब-इसराइल युद्ध को फ़लस्तीनी तबाही या अल-नक़बा करार देते हैं.

यही वो लड़ाई है जिसने उन स्थितियों को जन्म दिया जिस कारण पैदा हुए हालात आज के संघर्ष के लिए ज़िम्मेदार हैं.

बीते कुछ सालों से इसराइल और फ़लस्तीन के बीच जारी संघर्ष पर नज़र रखने वालों की तरह मेरा भी यह मानना था कि कभी भी कोई बड़ा संघर्ष छिड़ सकता है.

14 मई 2018 को जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल अवीव में मौजूद अमेरिका के दूतावास को वहां से बंद करने और यरूशलम में खोलने का फ़ैसला किया, तो इस मुद्दे पर हिंसा शुरू हो गई. मुझे लगा कि ये एक बड़े संघर्ष की शुरुआत है.

ट्रंप के फ़ैसले के बढ़ा तनाव

यरूशलम की विवादित स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय समझौते को मानने से ट्रंप ने इनकार कर दिया था. इसराइल यरूशलम को अपनी अविभाजित राजधानी मानता है, जबकि फ़लस्तीनी पूर्वी यरूशलम को अपने भावी राष्ट्र की राजधानी मानते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप ने इसराइल के दावे का समर्थन किया. वहीं, ब्रिटेन समेत इसराइल के दूसरे सहयोगियों के दूतावास अभी भी तेल अवीव में हैं.

जिस वक्त डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप दूतावास का उद्घाटन कर रही थीं, उस वक्त टेलीविज़न स्क्रीन दो हिस्सों में बांट कर, पहले हिस्से में उद्घाटन का फुटेज और दूसरे हिस्से में इसराइल और ग़ज़ा में सीमा पर जारी भीषण हिंसा का फुटेज दिखाया जा रहा था.

हमास के 'ग्रेट मार्च ऑफ़ रिटर्न' की अपील के बाद सीमा पर लगी बाड़ के पास हज़ारों फ़लस्तीनी विरोध प्रदर्शन कर रहे थे और इसराइली सैनिक उन पर गोलियां चला रहे थे.

प्रदर्शनकारियों में से कुछ ने बाड़ तोड़ने की कोशिश की. इस घटना में 59 फ़लस्तीनियों की मौत हुई जबकि हज़ारों घायल हुए.

अमेरिका का समर्थन पाने वाले इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा कि उनका देश सीमा पर होने वाले किसी भी हमले का कड़ा जवाब देगा.

इसके एक सप्ताह बाद दिनचर्या पटरी पर वापस लौट आई. बिन्यामिन नेतन्याहू और ट्रंप प्रशासन में उनके सहयोगी एक-दूसरे को ये बधाई देने लगे कि उन्होंने फ़लस्तीनियों को काबू कर लिया है.

शायद यही वो वक्त था जब हमास ने इसराइल पर हमला करने की योजना बनानी शुरू कर दी थी और इसका नतीजा वो हुआ जो हमने सात अक्तूबर को देखा.

कहां चूक गए बिन्यामिन नेतन्याहू ?

अमेरिका का समर्थन मिलने के बाद बिन्यामिन नेतन्याहू ने फै़सला किया कि वो इस संघर्ष को नज़रअंदाज़ कर दूसरे मसलों पर ध्यान देंगे. उनकी ये ग़लत धारणा बन गई थी कि इसराइल इस मसले पर अपना नियंत्रण रखते हुए दुनिया के दूसरे मसलों की तरफ अपना ध्यान केंद्रित कर सकता है. लेकिन ये उनकी बहुत बड़ी रणनीतिक ग़लती थी.

वेस्ट बैंक में फ़लस्तीनी क्षेत्र की राजधानी माने जानेवाले रामल्ला में मैं साबरी सायदाम से मुलाक़ात करने पहुंचा. साबरी की पढ़ाई लंदन के इंपीरियल कॉलेज में हुई है. वो फ़लस्तीनी प्रशासन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के सलाहकार रह चुके हैं और फतह पार्टी के वरिष्ठ सदस्य हैं.

फ़लस्तीनी लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन के प्रमुख रहे यासिर अराफ़ात की बनाई फतह पार्टी अभी भी वेस्ट बैंक के उन हिस्सों पर शासन करती है जिन पर इसराइल ने अब तक कब्ज़ा नहीं किया है.

1990 के दशक में ओस्लो शांति प्रक्रिया के तहत फ़लस्तीनी क्षेत्र को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के लिए जो फ़लस्तीनी प्रशासन बना महमूद अब्बास उसके प्रमुख हैं.

ये प्रशासन अब नौकरियां पैदा करने वाली योजना बनकर रह गया है, जो एक म्यूनिसिपालिटी की तरह की भूमिका निभा रहा है. ये भ्रष्टाचार और अक्षमता की मिसाल बन कर रह गया है. प्रशासन के प्रमुख के पद के लिए साल 2006 से कोई चुनाव नहीं हुए हैं, यानी महमूद अब्बास प्रशासन के प्रमुख तो हैं लेकिन 2006 से वो कभी चुनावों में खड़े नहीं हुए हैं.

साबरी सायदाम ने कहा कि उन्होंने बिन्यामिन नेतन्याहू की धारणा को लेकर अमेरिका को पहले ही चेतावनी दी थी. उन्होंने कहा था कि नेतन्याहू को लगता है कि वो फ़लस्तीन के मुद्दे पर नियंत्रण रखते हुए अमेरिका की मदद से खाड़ी के बेहद धनी अरब तेल उत्पादक देशों के साथ अपने रिश्ते सामान्य कर लेंगे.

वो कहते हैं, "इसे लेकर प्रतिक्रया आएगी, इसका जवाब आएगा, किसी को नहीं पता कब, कैसे और किस पैमाने पर ये होगा. हमने बैठकों के दौरान कई बार अमेरिकियों को चेतावनी दी थी कि फ़लस्तीनी इस पर प्रतिक्रिया देंगे, मामले को मझधार में नहीं छोड़ना चहिए. आपको हस्तक्षेप करना चाहिए और शांति प्रक्रिया के बारे में गंभीर रुख़ अपनाना चाहिए."

उन्होंने उन ख़बरों से इनकार किया जिनमें कहा गया था कि हमास आम लोगों का इस्तेमाल मानव ढाल के रूप में कर रहा है. उन्होंने कहा कि जो इसराइल कर रहा है वो "जनसंहार है".

इसराइल-फ़लस्तीन संघर्ष का समाधान

संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के अनुसार इलाक़े में दशकों से जारी संघर्ष को कम करने के लिए एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र के साथ-साथ एक स्वतंत्र इसराइल राष्ट्र बनाने की कोशिश की जानी थी. लेकिन अब शांति प्रक्रिया इस दिशा में सालों से नाकाम हुई बातचीत के बाद बच गई एकमात्र कोशिश है.

हमास के हमले के बाद से इस मुद्दे पर सामने आने वाले और इसराइल का दौरा करने वाले राष्ट्राध्यक्षों ने एक बार फिर कहा है कि ये 'दो राष्ट्र समाधान' इस संघर्ष के निपटारे का वास्तविक हल है.

इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, ब्रितानी प्रधानमंत्री ऋषि सुनक, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और दूसरे राष्ट्राध्यक्ष शामिल हैं.

लेकिन इसके साथ मुश्किल ये है कि फिलहाल कोई शांति प्रक्रिया जारी ही नहीं है. आख़िरी बार क़रीब एक दशक पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसे फिर से शुरू करने की कोशिश की थी, लेकिन वो इसमें कामयाब नहीं हो सके. इसके बाद 'दो राष्ट्र समाधान' के लिए बातचीत केवल एक स्लोगन बनकर रह गया.

बिन्यामिन नेतन्याहू के प्रतिद्वंद्वी

इसराइल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक से मुलाक़ात करने के लिए मैं तेल अवीव की एक ऊंची इमारत में मौजूद कांच की दीवारों से बने उनके दफ्तर पहुंचा.

1973 में एक युवा कमांडर के तौर पर उन्होंने लेबनान पर हमले की न केवल योजना बनाई बल्कि उसे अमलीजामा भी पहनाया. इसराइल इस अभियान को 'स्प्रिंग ऑफ़ यूथ' कहता है.

बराक ने अपना भेष बदला और मेक-अप और विग लगाकर एक लड़की का रूप लिया. वो घातक लड़ाकों की एक टुकड़ी लेकर बेरुत में प्रवेश कर गए.

बाद में एहुद बराक इसराइली सेना में कमांडर बने और फिर 1999 से 2001 तक इसराइल के प्रधानमंत्री रहे. बिन्यामिन नेतन्याहू के कार्यकाल के दौरान एहुद बराक रक्षा मंत्री भी रहे, जो इससे पहले इसराइली सेना की स्पेशल फोर्स यूनिट में जूनियर अधिकारी थे. ये स्पेशल फोर्स यूनिट ब्रिटेन के स्पेशल एयर सर्विस (एसएएस) की तरह काम करती है.

तब से एहुद बराक और बिन्यामिन नेतन्याहू एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्विंद्वी बन गए हैं. बराक नेतन्याहू पर आरोप लगाते रहे हैं कि उन्होंने हमास के हमलों के लिए इसराइल को कमज़ोर किया है.

वो मानते हैं कि अगर सेना को हमास से निपटने की ज़म्मेदारी दी जाए तो प्रधानमंत्री का लंबा कार्यकाल ख़त्म हो जाएगा.

बराक ने मुझसे कहा, "युद्ध जीतने में वक्त लगता है और फिर इस मुहिम में जो खून और पसीना बहेगा उसे उचित ठहराना आसान नहीं होगा. जब युद्ध ख़त्म हो जाएगा, या फिर ख़त्म होने वाला होगा, मुझे लगता है कि लोगों का गुस्से का ज्वालामुखी फूट पड़ेगा और वो सरकार को सत्ता से बेदखल कर देंगे."

नेतन्याहू के लिए मुश्किल फ़ैसला

इसराइल पर हमास का हमला सात अक्तूबर को हुआ था. इसके बाद इसराइल ने जबाबी कार्रवाई शुरू की और ग़ज़ा पर हवाई हमले किए.

लेकिन हमास के पास 200 से अधिक इसराइली नागरिक बंधक के तौर पर हैं, जिनमें से अधिकांश आम नागरिक हैं. इसलिए ग़ज़ा में ज़मीनी कर्रवाई करने से वो हिचक रहे हैं.

हमले के दौरान हमास के लड़ाके इसराइली नागरिकों को अपने साथ बंधक बना कर ले गए ताकि वो इसराइल पर दबाव बना सकें और अपनी इस रणमनीति में कामयाब भी हो रहे हैं.

दोनों पक्षों के बीच एक तरह की मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी जारी है और इसमें चार बंधक छोड़ना और फिर कुछ और बंधकों को छोड़ना एक कारगर तरीका बन गया है. इसराइल के भीतर से आवाज़ें उठने लगी हैं और लोगों की मांग है कि सरकार किसी भी तरह के हमले से पहले हमास के पास मौजूद बंधकों को छुड़ाए.

एहुद बराक मानते हैं कि हमास को पूरी तरह से ख़त्म करने के लिए बिन्यामिन नेतन्याहू को अपनी सेना को ग़ज़ा के भीतर जाने का आदेश देना चाहिए.

वो कहते हैं कि उनके और उनकी वॉर कैबिनेट के सामने बेहद मुश्किल फ़ैसला है. वो कहते हैं, "अगर कोई रास्ता न बचा तो हमें ये करना होगा. क्योंकि ऐसा नहीं किया तो हम मानवता के ख़िलाफ़ अपराध करने वाले और 1,400 लोगों की हत्या करने वाले बर्बर आतंकियों को विकल्प दे देंगे... नेतन्याहू को मुश्किल फ़ैसला लेना है."

'हम युद्ध में हैं'

इस सप्ताह दो दिन मैंने वेस्ट बैंक के उन इलाक़ों का दौरा किया जो इसराइल के सख्त कंट्रोल में है. मैं एक जगह पहुंचा जहां बेहद अधिक तनाव था.

यहां के फ़लस्तीनी गांवों के आसपास हज़ारों इसराइली सैनिकों को युद्ध के लिबास में तैनात किया गया है और रास्तों पर अवरोध बनाए गए हैं. वो यहां बसाए गए यहूदी गांवों की सुरक्षा कर रहे हैं. इस गांवों को अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अवैध माना जा रहा है लेकिन इसराइल इस बात से इनकार करता है.

हेब्रॉन के बाहरी इलाक़े में बसावट से दूर एक आउटपोस्ट पर मुझे एक कट्टरपंथी यहूदी राष्ट्रवादी दिखे. हथियार लिए इन व्यक्ति ने मुझे बताया कि वो उस मौक़े का इंतज़ार कर रहे हैं जब वो अपने हथियारों का इस्तेमाल फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ कर सकें.

आउटपोस्ट के आसपास हथियार के साथ उनके नेता मीर सिमचा चहलकदमी कर रहे थे. उनके पास एक बड़ा धारदार चाकू था जो चमड़े के म्यान में रखा हुआ था. उन्होंने कहा कि 7 अक्तूबर को हमास के हमले से कई इसराइलियों को आश्चर्य हुआ लेकिन इस उन्हें इससे कोई आश्चर्य नहीं हुआ.

उन्होंने कहा कि ये शर्म की बात है कि जो बात पहले से पता है, मुख्यधारा के इसराइल को वो दिखाने के लिए कई यहूदियों को अपनी जान देनी पड़ी.

वो कहते हैं, "युद्ध में आपके पास एक बंदूक होती है और उस पर एक ट्रिगर होता है. और जो लोग अब तक ये नहीं समझ पाए, मैं बता दूं कि हम युद्ध में हैं. एक ऐसा युद्ध जिसके एक पक्ष दूसरे पक्ष के लिए कोई दया नहीं दिखाता और हमें भी यही करने का ज़रूरत है. इसमें हमारे पास चुनने जैसा कुछ नहीं है."

'वेस्ट बैंक में इसराइल ले रहा बदला'

वेस्ट बैंक के और उत्तर की तरफ जब मैं रामल्ला के बाहरी इलाके में बनाए गए जालाज़ोन शरणार्थी शिविर में पहुंचा, मैं माहौल में दुख, डर और गुस्से का एहसास कर पा रहा था. यहां इसराइली आर्मी के गिरफ्तारी अभियान में मारे गए दो फ़लस्तीनी युवाओं का जनाज़ा निकाला जा रहा था.

मारे गए एक व्यक्ति महमूद सैफ़ इसराइलियों पर पत्थरबाज़ी कर रहे थे. उनके कज़न मुस्तफ़ा अल-अयान कहते हैं कि पुलिस संदिग्धों को गिरफ्तार करने नहीं आई थी बल्कि सात अक्तूबर को हमास ने जो किया उसकी सज़ा देने के लिए यहां आई थी.

हम वहां खड़े हैं जहां से हम देख सकते थे कि कब्र के ऊपर मिट्टी डाली जी रही है. मुस्तफ़ा अल-अयान कहते हैं, "वो बदला लेने के लिए वेस्ट बैंक आए थे क्योंकि ग़ज़ा में विद्रोह करने वाले गुटों ने उन्हें बड़ी चोट पहुंचाई है. इसलिए वो अब वेस्ट बैंक में लोगों पर हमले कर रहे हैं. ग़ज़ा और वेस्ट बैंक में मारे गए शहीदों की आत्मा को ईश्वर शांति दे."

फ़लस्तीनी नागरिक एक डर ये भी जता रहे हैं कि इसराइल अपने गुस्से में इस संकट के बहाने 1948 की तर्ज़ पर एक और नक़बा या तबाही बरपाने की कोशिश कर सकता है.

वो कहते हैं कि इसराइल ने ग़ज़ा के लाखों लोगों को वादी ग़ज़ा के उत्तर काा इलाक़ा छोड़कर दक्षिण की तरफ जाने को कहा है, ये इस बात का सबूत है कि इसराइल तबाही लाना चाहता है. वो ये भी कहते हैं कि कुछ इसराइली नेताओं ने धमकी दी है कि वो ग़ज़ा को और छोटा कर देंगे और उसके कुछ इलाक़े में ज़मीन को बफ़र ज़ोन बनाएंगे.

भविष्य को लेकर डर

रामल्ला में मौजूद फतह के अधिकारी साबरी सायदाम कहते हैं कि सितंबर में नेतन्यााहू ने संयुक्त राष्ट्र में एक मानचित्र दिखाया था जिसमें वेस्ट बैंक और ग़ज़ा को इसराइल के हिस्से के तौर पर दिखाया गया था.

वो कहते हैं, "सभी को इसका अंदाज़ा है क्योंकि नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में जो मानचित्र दिखाया था उसमें न तो वेस्ट बैंक था और न ही ग़ज़ा. इसलिए लोगों में ये आम धारणा है कि नेतन्याहू फ़लस्तीनियों को डिपोर्ट करेंगे, उन्हें विस्थापित करेंगे और ग़ज़ा पर इसराइल कब्ज़ा कर लेगा."

दोनों ही तरफ लोगों की धारणा का आधार अतीत की घटनाओं पर टिका है.

इसराइल के लिए हमास का ताज़ा हमला उन्हें नाज़ी जर्मनी के हाथों यूरोप में यहूदियों के बड़े पैमाने पर हत्याओं की याद दिलाता है.

सात अक्तूबर को हुए हमास के हमले में मारे गए लोगों को लेकर इसराइल ने कहा कि होलोकॉस्ट के बाद से यहूदियों के लिए ये सबसे बुरा दिन था.

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