मस्जिद गए ट्रूडो के विरोध में लगे नारे, कनाडा का इसराइल-फ़लस्तीन पर क्या है रुख़

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो शुक्रवार को जब टोरंटो की मस्जिद में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे वो वहां उनके ख़िलाफ़ नारे लगाए गए.

जुमे की नमाज़ के लिए मस्जिद में एकत्र कुछ लोग इसराइल और हमास के संघर्ष में ट्रूडो के रवैये से नाराज़ थे और इसलिए उन्होंने नारेबाज़ी कर उनके ख़िलाफ़ अपनी नाराज़गी जताई.

यही नहीं उन पर इसराइल और हमास के बीच जारी संघर्ष को रोकने में सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए दबाव बढ़ता जा रहा है.

हाल ही में 33 सांसदों ने ट्रूडो को एक चिट्ठी लिखकर गुज़ारिश की है कि वो तुरंत संघर्ष विराम और लोगों की मदद के लिए मानवीय गलियारे के लिए कोशिश करें.

मस्जिद में क्या हुआ?

शुक्रवार को प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो टोरंटो के टोबिकोक इलाक़े के रेक्सडेल में मौजूद इंटरनेशनल मुस्लिम्स ऑर्गेनाइज़ेशन के दफ्तर पहुंचे थे.

कनाडाई प्रेंस एजेंसी के हवाले से द टोरंटो सन ने लिखा है कि उनके इस दौरे को बारे में उनके कार्यालय ने शुक्रवार शाम तक मीडिया को कोई जानकारी नहीं दी थी.

बाद में सोशल मीडिया पर उनके मस्जिद जाने के दौरान का वीडियो सामने आया जिसमें कई लोग उनके ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे.

कुछ लोगों ने कथित तौर पर ट्रूडो के ख़िलाफ़ "शर्म करो" के नारे लगाए और आयोजकों से कहा कि उन्हें मंच पर बोलने न दिया जाए.

इसके बाद जब जस्टिन ट्रूडो मस्जिद से बाहर निकले तो वहां खड़े लोगों में से एक महिला एक पोस्टर लिए खड़ी थीं. पोस्टर पर लिखा था- "जनसंहार बंद करो".

महिला ने सीधे-सीधे ट्रूडो से इसराइल हमास संघर्ष के बारे में सवाल किया और पूछा, "संघर्ष विराम के ऐलान की अपील करने के लिए आपको कितने फ़लस्तीनी बच्चों की मौत चाहिए? और कितनी लाशें चाहिए?"

द टोरंटो सन के अनुसार प्रधानमंत्री ट्रूडो के प्रवक्ता मोहम्मद हुसैन के अनुसार "मध्य पूर्व में हो रही भयावह घटनाओं से प्रभावित मुस्लिम समुदाय के लोगों के प्रति अपना समर्थन दिखाने के लिए" ट्रूडो मस्जिद गए थे.

ट्रू़डो ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर मस्जिद में लोगों से मिलने कीं अपनी तस्वीरें पोस्ट की हैं. साथ ही उन्होंने लिखा कि हम आम नागरिकों की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन करने के लिए अपील करने से पीछे नहीं हटेंगे.

सोशल मीडिया पर एक अन्य पोस्ट में उन्होंने इसराइल और फ़लस्तीन मसले के निपटारे के लिए दो राष्ट्र समाधान की बात की.

इसी शनिवार जस्टिन ट्रूडो ने कहा कि हमास के पास मौजूद बंधकों को छुड़ाने के लिए वो क़तर के साथ मिलकर काम करते रहेंगे.

शुक्रवार को हमास ने दो बंधकों (अमेरिकी नागरिक) को रिहा किया था जिसके बाद ट्रूडो ने क़तर को इसके लिए शुक्रिया कहा था. इन दोनों महिलाओं को सात अक्तूबर को हमास के लड़ाके अपने साथ बंधक बना कर ले गए थे.

कनाडाई सरकारी समाचार एजेंसी सीबीसी के अनुसार शुक्रवार को जिस वक्त ट्रूडो मस्जिद गए थे उनके साथ न्याय मंत्री आरिफ़ विरानी मौजूद थे.

विरानी ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, "जुमे की नमाज़ के वक्त प्रधानमंत्री और जनता के साथ यहां होना महत्वपूर्ण है. हम कल रेक्सडेल में इंटरनेशनल मुस्लिम्स ऑर्गेनाइज़ेशन की मस्जिद में थे."

कई लोग सोशल मीडिया पर इस घटना का वीडियो शेयर कर रहे हैं. वीडियो में देखा जा सकता है कि आयोजक लोगों से गुज़ारिश कर रहे हैं कि वो प्रधानमंत्री को लोगों को संबोधित करने दें.

वीडियो में पोस्टर पकड़े एक महिला उनसे सवाल कर रही हैं और कह रही हैं कि वो संघर्ष विराम की घोषणा के लिए कब कहेंगे.

ये वीडियो कुद्स न्यूज़ नेटवर्क ने भी शेयर किया है, वहीं रूसी समाचार एजेंसी स्पुतनिक ने इस ख़बर को शेयर किया है.

संघर्ष विराम के लिए बन रहा दबाव

कनाडा में ग़ज़ा में आम लोगों की जान बचाने और उन तक मानवीय राहत पहुंचाने के लिए संघर्ष विराम की मांग ज़ोर पकड़ रही है.

ट्रूडो के मस्जिद दौरे से पहले 33 मंत्रियों ने उन्हें चिट्ठी लिखकर मांग की कि "कनाडा कड़ाई से अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का पालन करने के पक्ष में खड़ा हो और ये स्पष्ट करे कि युद्ध में किसी आम नागरिक को नुक़सान न पहुंचाया जाए."

चिट्ठी लिखने वालों में पूर्व कैबिनेट मंत्री ओमार अलगब्रा, लिबरल पार्टी, न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों के साथ-साथ ग्रीन पार्टी के सांसद शामिल हैं.

इन सांसदों की मांग है कि "कनाडा ये स्वीकार करे कि फ़लस्तीनी लोग पीढ़ियों से किसी और के कब्ज़े की समस्या से जूझ रहे हैं. कनाडा को एक आज़ाद इसराइल के साथ आज़ाद फ़लस्तीन की भी बात करनी चाहिए, साथ ही दोनों पक्षों को बातचीत की मेज़ पर लाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए."

दो राष्ट्र समाधान का समर्थन

सात अक्तूबर को हमास के इसराइल पर किए हमले के बाद से ट्रूडो ने इसे आतंकवादी हमला बताया और

ट्रूडो ने कहा था कि इसराइल को खुद की रक्षा करने का हक है. इसके कुछ दिनों बाद उन्होंने फ़लस्तीनियों के प्रति चिंता जताई और इसराइल, गज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक में लोगों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए आर्थिक मदद की घोषणा की.

उन्होंने गज़ा के लोगों तक मदद पहुंचाने के लिए मानवीय गलयारे की भी बात की और कहा कि उन तक पानी, खाना, दवाएं और अन्य मदद पहुंचाने के लिए सुरक्षित मानवीय गलियारा ज़रूरी है.

हाल के दिनों में प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने इसराइल और हमास के मसले पर कहा था कि दो राष्ट्र समाधान के ज़रिए मुश्किल हल हो सकती है.

शुक्रवार को टोरंटो में संवाददाताओं से बात करते हुए उन्होंने कहा कि "कनाडा मानता है कि दो राष्ट्र समाधान इसका हल हो सकता है, कनाडा इसके लिए प्रतबद्ध है."

उन्होंने कहा कि "पूरी दुनिया को और ख़ासकर मध्य पूर्व को एक शांतिपूर्ण, समृद्ध, गणतांत्रिक और सुरक्षित इसराइल चाहिए... जिसके पड़ोस में शांतिपूर्ण, सुरक्षित, समृद्ध और व्यवहारिक फलस्तीनी राष्ट्र हो."

हालांकि जस्टिन ट्रूडो अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जो इसराइल और फ़लस्तीन के लिए दो राष्ट्र समाधान के फॉर्मूले का हिमायत कर रहे हैं.

शनिवार को काहिरा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में शिरतक करने पहुंचीं इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसराइल और हमास के बीच संघर्ष बढ़ने से रोकने के लिए कोशिशें तेज़ करनी होंगी, साथ ही दो राष्ट्र समाधान का रोडमैप भी तैयार करना होगा.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि दो राष्ट्र समाधान के लिए एक स्पष्ट समयसीमा भी तय की जानी चाहिए.

भारत का भी यही मानना है कि इसराइल और फ़लस्तीन दो राष्ट्र के रूप में एक-दूसरे के पड़ोसी बन कर शांति से रहें.

कुछ दिन पहले विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था- "इस मामले में भारत की नीति लंबे वक्त से वही बनी हुई है जो पहले थी. भारत एक संप्रभु, आज़ाद और व्यवहारिक फ़लस्तीनी राष्ट्र का समर्थन करता है जिसकी अपनी मान्य सुरक्षित सीमाएं हों. ये इसराइल के पड़ोसी के रूप में शांति से रहें. इस मामले में भारत का स्टैंड बदला नहीं है."

कनाडा की विदेश नीति में इसराइल और फ़लस्तीन

कनाडा की विदेश नीति की बात की जाए तो, जहां एक तरफ वो तय सीमाओं के भीतर एक शांतिपूर्ण इसराइल के हक़ का समर्थन करता है वहीं वो एक स्वतंत्र, संप्रभु और आज़ाद फ़लस्तीनी राष्ट्र का भी समर्थन करता है.

कनाडा सरकार के अनुसार इसराइल को हक़ है कि वो शांतिपूर्ण तरीके से अपने पड़ोसियों के साथ रहे, अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करे.

वहीं फ़लस्तीन के बारे में सरकार का कहना है कि कनाडा फ़लस्तीनी प्रशासन को वेस्ट बैंक और गज़ा में एक सरकारी ईकाई के रूप में मान्यता देता है. साथ ही वो फ़लस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन को भी फ़लस्तीनी लोगों के प्रतिनिधि के रूप में देखता है.

सरकार के अनुसार कनाडा मध्य पूर्व में शांति चाहता है, वो पूर्वी यरुशलम पर इसराइल के इकतरफ़ा कब्ज़े को माान्यता नहीं देता.

कनाडा 1967 के बाद उन इलाक़ों (जिनमें गोलान हाइट्स, वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गज़ा पट्टी शामिल हैं) जिन पर 1967 में इसराइल ने स्थायी तौर पर कब्ज़ा किया था, वहां इसराइल के कब्ज़े को मान्यता नहीं देता. कब्ज़े वाली ताकत होने के नाते इसराइल के लिए ये ज़रूरी है वो जेनेवा संधि के अनुसार इन इलाक़ों में रहने वालों के मानवाधिकारों का सम्मान करे, उनके साथ मानवीय व्यवहार करे.

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