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इसराइल-हमास संघर्ष: ग़ज़ा पर पोस्ट को लेकर अरब मूल के लोगों पर सख़्ती, कोई गिरफ़्तार तो किसी की गई नौकरी
- Author, सारा मोनेटा
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, यरूशलम
ग़ज़ा में संघर्ष को लेकर सोशल मीडिया पोस्ट करने वाले इसराइल के दर्जनों अरब नागरिकों को गिरफ़्तार किया गया है.
गिरफ़्तार लोगों में जानी पहचानी सिंगर और इनफ़्लूएंसर दलाल अबू अमनेह भी हैं, जिन्हें दो दिन तक पुलिस हिरासत में रखने के बाद बुधवार को ज़मानत दी गई. अब उन्हें सोमवार तक घर में नज़रबंद रखा गया है.
उनकी वकील अबीर बाकर के अनुसार, पुलिस ने उन पर 'विघटनकारी व्यवहार' करने का आरोप लगाया है और कहा है कि उनकी पोस्ट से उनके फॉलोवरों में हिंसा भड़क सकती है.
अबू अमनेह ने अपनी पोस्ट में एक फ़लस्तीनी का फ़ोटो लगाया था और लिखा था, “ईश्वर के अलावा कोई विजेता नहीं है.”
बाकर ने कहा कि फ़लस्तीनी विरासत पर केंद्रित अपने गानों के लिए अबू अमनेह को पूरे अरब जगत में जाना जाता है और उन्होंने सिर्फ धार्मिक भावना को ज़ाहिर किया था.
जबकि इसराइली अधिकारियों ने अमनेह के पोस्ट को 'फ़लस्तीनियों के लिए हथियारबंद' होने के आह्वान के रूप में लिया.
जबसे हमास और इसराइल के बीच संघर्ष शुरू हुआ है पुलिस ने ऐसे सोशल मीडिया पोस्ट पर तथाकथित "ज़ीरो टॉलरेंस पॉलिसी" अपनाई हुई है जिसमें ज़रा सा भी हमास के प्रति सपोर्ट का भाव दिखे.
नौकरी से निकाला गया
अमनेह अकेली नहीं है. कई अन्य लोगों को उनकी नौकरियों से निकाल दिया गया या उनके विश्वविद्यालयों में उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई.
इसराइल में रहने वाले अरब खुद को 'इसराइल के फ़लस्तीनी नागरिक' कहते हैं और वे देश की आबादी का पांचवां हिस्सा हैं.
सात अक्टूबर को जब से हमास ने इसराइल में हमला किया, तब से पुलिस ने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखने के मामले में 100 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया है.
और यरूशलम में ही 63 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है और उनसे पूछताछ की गई है.
इसराइल के पुलिस कमिश्नर याकोव शाबताई ने इसी हफ़्ते बताया था, “कोई भी इसराइली राष्ट्र, इसके सरकारी चिह्नों, चुने हुए अधिकारियों, सैनिकों और पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ भड़काने की कोशिश करेगा, उन्हें याद रखना होगा कि इसराइल की पुलिस उन पर कड़ाई और बिना मुरव्वत के कार्रवाई करेगी.”
इसराइल में अरब अल्पसंख्यकों के लिए एक क़ानूनी मदद सेंटर 'अदालाह' के अनुसार, गिरफ़्तार किए गए लोगों की संख्या कहीं ज़्यादा है क्योंकि हाल ही में और गिरफ़्तारियां हुई हैं.
'अदाहाला' की एक रिपोर्ट के अनुसार, मई 2021 में इसराइल-ग़ज़ा संघर्ष भड़का था उस समय केवल 16 लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने के आरोप लगाए गए थे, जिनमें 15 अरब मूल के थे.
भारी क़ीमत
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को चिंता है कि मौजूदा गिरफ़्तारियों में और तेज़ी आने वाली है क्योंकि पुलिस ने हिंसा भड़काने की परिभाषा का दायरा बढ़ा दिया है.
उदाहरण के लिए रहात के बेदोइन शहर में पुलिस ने मेयर पद के उम्मीदवार रह चुके डॉ. अमेर अल-हुज़ैल को हिरासत में ले लिया, जिन्होंने ग़ज़ा पट्टी का एक नक्शा सोशल मीडिया पर साझा किया और इसराइली सेना को ओर से वहां ज़मीनी कार्रवाई का एक विश्लेषण प्रस्तुत किया था.
इस पर उनके ख़िलाफ़ 'युद्ध के समय दुश्मन को मदद करने' का आरोप लगाया गया.
लेकिन इसके बावजूद कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया गया.
इसराइल में अपनी सोशल मीडिया गतिविधि के लिए कुछ लोग तो भारी क़ीमत चुका रहे हैं.
'अदालाह' के साथ जुड़े वकीलों का कहना है कि अभी तक अरब वर्करों को काम से निकाले जाने के 40 मामले उनके पास आए हैं.
सलाम इरशीद कहते हैं, “हालत ये है कि कोई पोस्ट लाइक करने की वजह से लोगों को नौकरी से निकालने जाने की धमकी दी जा रही है. ग़ज़ा में हालात पर एक रिपोर्ट को सोशल मीडिया पर लाइक करने पर एक वर्कर की नौकरी ख़तरे में पड़ गई है.”
छात्रों पर कार्रवाई
यही नहीं इसराइल के विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले अरब छात्रों के ख़िलाफ़ भी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा रही है.
पिछले हफ़्ते तेल अवीव यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट एरियल पोराट ने कहा था कि 'कुछ छात्रों को हमास के अत्याचारों के प्रति सहानुभूति दर्शाने के लिए नोटिस दिया गया है.'
यूनिवर्सिटी वेबसाइट पर उन्होंने लिखा, “इन मुठ्टी भर छात्रों के साथ हम बहुत कड़ाई से पेश आएंगे. अगर उल्लंघन आपराधिक प्रकृति का होगा तो हम पुलिस में शिकायत करेंगे.”
'अदालाह' के वकीलों ने बताया कि पूरे देश में 83 छात्रों के निलंबन का मुद्दा उनके संज्ञान में आया है. कुछ मामलों में बहुत कम समय में उन्हें हॉस्टल से चले जाने को भी कहा गया.
'अदालाह' के जनरल डायरेक्टर डॉ. हसन जबरीन ने कहा, “ये सारे मामले किसी कार्रवाई, प्रदर्शन या गैरक़ानूनी गतिविधियों में शामिल होने से नहीं बल्कि सोशल मीडिया से जुड़े हैं.”
उनके अनुसार, “90 प्रतिशत पोस्ट युद्ध, ग़ज़ा में इसराइली कार्रवाई के ख़िलाफ़ और ग़ज़ा युद्ध में पीड़ितों के समर्थन में हैं. केवल 10 प्रतिशत पोस्ट के हमास के समर्थन में होने की बात कही जा सकती है. अगर ये सामान्य समय होता तो इन्हें इस तरह सें नहीं बताया जाता.”
सात अक्टूबर को हमास ने इसराइल पर हमला कर दिया जिसमें 1400 से अधिक लोग मारे गए, जिसमें अधिकांश आम नागरिक हैं, इस वजह से उन इसराइली यहूदी लोगों के प्रति भी ग़ुस्सा है जो युद्ध को ख़त्म करने की बात कर रहे हैं.
पिछले रविवार को एक जाने माने वामपंथी यहूदी पत्रकार इसराइल फ़्रे को तेल अवीव से उनके घर से सुरक्षा घेरे में बाहर ले जाया गया क्योंकि कुछ प्रदर्शनकारी उनके अपार्टमेंट के सामने इकट्ठा होकर प्रदर्शन कर रहे थे.
उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया जिसमें वो ग़ज़ा के नागरिकों के लिए प्रार्थना कर रहे थे.
बीते बुधवार को अरब नीत हदश-ताल गठबंधन से जुड़े यहूदी जनप्रतिनिधि ओफ़र कासिफ़ को इसराइली संसद से 45 दिनों के लिए निलंबित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने ग़ज़ा पर बमबारी का तीखा विरोध किया था.
एक पोस्ट में उन्होंने फ्रे की सुरक्षा में तत्काल कार्रवाई न करने के लिए पुलिस की आलोचना की थी.
उन्होंने लिखा, "ग़ज़ा के प्रति ज़रा सी भी सहानुभूति दिखाने वालों को पकड़ने के लिए हथियारबंद पुलिस बल को तुरंत भेज दिया जाता है लेकिन एक वामपंथी पत्रकार, जिसकी ज़िंदगी ख़तरे में है, उसकी सुरक्षा में पुलिस की कोई दिलचस्पी नहीं है."
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