कुंभ मेला के समापन के बाद अब पीपा पुल का क्या होगा?

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प्रयागराज में हुए कुंभ मेले का समापन हो चुका है. कुंभ मेला क़रीब डेढ़ महीने चला. इस दौरान यहां करोड़ों लोग पहुँचे.
लेकिन अब मेला खत्म हो चुका है और लोग अपने घरों की ओर लौट गए हैं. इन सबके बीच कुंभ में आवाजाही के लिए बनाए गए पीपा पुल की चर्चा हो रही है.
पीपा पुल को लेकर लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि इसका इस्तेमाल अधिकतर वीआईपी लोगों ने किया है.
दरअसल, ये वो पुल होते हैं जो कि कुंभ के बाद हटा दिए जाते हैं. लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर आलोक कुमार कहते हैं, "पीपा पुल अस्थायी पुल होते हैं."

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प्रयागराज के स्थानीय पत्रकार प्रभात वर्मा भी आलोक कुमार की बात से सहमत होते हुए बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "पीपा पुल यहां (स्थानीय) कारखाने और अस्थायी परेड ग्राउंड में बनता है."
जिस पीपा पुल की इतनी चर्चा हो रही है और जिन्हें मेले के बाद हटा दिया जाता है वो आखिर है क्या? मेले के बाद पीपा पुल को कहां रखा जाएगा? ऐसे ही तमाम सवाल के जवाब यहां जानेंगे.
पीपा पुल क्या है?

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पीपा पुल तैरते हुए खोखले लोहे के सिलिंडरों का इस्तेमाल कर बनाया जाता है. इन्हें लोहे की ज़ंजीरों से बांधा जाता है. पुल की सतह बनाने के लिए फिर लकड़ी के तख़्तों को इनके ऊपर रखा जाता है.
पत्रकार प्रभात वर्मा ने कहा कि पीपा पुल का इस्तेमाल कब शुरू होगा? इसका निर्णय मेलाधिकारी और एसएसपी मिलकर लेते हैं. वो दोनों ये भी तय करते हैं कि किस पुल का वाहन के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, किस पुल का सिर्फ भक्त इस्तेमाल करेंगे, कौन से पुल का उपयोग इमरजेंसी के लिए किया जाएगा. जिसका कि वीआईपी और प्रशासन उपयोग करेगा.
कुंभ में कितने पीपा पुल लगाए गए?

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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने बताया कि कुंभ में 30 पीपा पुल का इस्तेमाल किया गया.
सरकार ने कहा कि 30 पीपा पुलों के निर्माण में 3,308 पांटून (विशाल लोहे के खोखले डिब्बे) का इस्तेमाल किया गया.
पीपा पुल पानी में कैसे तैरता है?

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इंजीनियर आलोक कुमार ने कहा कि एक पांटून का वजन लगभग 5 टन होता है. इसके पानी में तैरने की वजह आर्किमिडीज का सिद्धांत है.
इंजीनियर आलोक कुमार का कहना है, "जब कोई वस्तु पानी में डूबी होती है, तो वह अपने द्वारा हटाए गए पानी के बराबर भार का प्रतिरोध झेलती है. यही सिद्धांत भारी-भरकम पांटून को पानी में तैरने में मदद करता है."
उन्होंने बताया, "इस कारण पुलों का डिजाइन इस तरह से किया गया है कि यह 5 टन तक का भार ही सहन कर सकते हैं. इससे अधिक वजन होगा तो पुल के डूबने का खतरा बढ़ जता है. इस कारण पुलों पर भीड़ प्रबंधन बेहद ज़रूरी होता है."
मेला ख़त्म होने के बाद इन पुलों का क्या होता है?

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अधिकारियों ने बताया कि कुंभ मेला खत्म होने के बाद कुछ पुलों को प्रयागराज के त्रिवेणीपुरम और परेड ग्राउंड में रखा जाएगा.
वहीं प्रभात वर्मा ने भी बताया कि पीपा पुल को कारखाने में रखा जाएगा और कुछ को ग्राउंड में रखा जाएगा. सरकार ज़रूरत के हिसाब से तय करती है कि यह कहां जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि जिस तरीके से पीपा पुल नदी में स्थापित किया जाता है, वैसे ही इसे हटाने की प्रक्रिया होती है.
भारत सरकार ने बताया, "मजबूत लोहे की चादरों से बने खोखले पांटून को क्रेन की मदद से नदी में उतारा जाता है. फिर इन पर गार्डर रखकर नट और बोल्ट से सुरक्षित किया जाता है. बाद में हाइड्रोलिक मशीनों से पांटून को सही जगह पर फिट किया जाता है. इसके बाद लकड़ी की मोटी पट्टियों, बलुई मिट्टी और लोहे के एंगल से पुल को और अधिक स्थायित्व दिया जाता है. अंत में पुल की सतह पर चकर्ड प्लेटें लगाई जाती हैं."

पीपा पुल बनाने की तकनीक कितनी पुरानी है?

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यूपी सरकार ने बताया कि पीपा पुल की तकनीक, 2500 साल पुरानी है.
भारत में पहला पीपा पुल अक्टूबर 1874 में हावड़ा और कोलकाता के बीच हुगली नदी पर बनाया गया था. इसे ब्रिटिश इंजीनियर सर ब्रेडफोर्ड लेसली ने डिजाइन किया था.
ये पुल बाद में क्षतिग्रस्त हो गया और1943 में इसे हटाकर प्रसिद्ध हावड़ा ब्रिज बना. 3 फ़रवरी 1943 को इसे जनता के लिए खोल दिया था.
आज ये हावड़ा ब्रिज पश्चिम बंगाल की पहचान बन चुका है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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