महाकुंभ
दुनिया के सबसे बड़े समागम की कहानी

महाकुंभ मेले के लिए प्रयागराज में करोड़ों लोग जुट रहे हैं. ऐसा माना जाता है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग एक जगह यहीं पर इकट्ठा होते हैं. ये मेला एक बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है.
ये 12 साल में एक बार होने वाला आयोजन है और इसे उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) में आयोजित किया जा रहा है.
संगम में डुबकी लगाने के लिए यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं. तीन नदियां-गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती यहां मिलती हैं. ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र जगह स्नान करने से पाप धुल जाते हैं और मोक्ष मिलता है.

1संगम, जहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदी मिलती है
2कुंभ मेला मैदान, जहां टेंट, अस्पताल, अखाड़े और खोया-पाया केंद्र जैसे अस्थाई ढांचे तैयार किए गए हैं.
अक्षयवट- ये माना जाता है कि पवित्र अमर बरगद का पेड़ प्रलय में भी जीवित रह गया.
पीपा पुल जो झूंसी को अरैल से और झूंसी को संगम से जोड़ता है.
सरकारी अनुमान के अनुसार, 45 दिनों के इस मेले में करीब 40 से 45 करोड़ लोगों के आने का अनुमान है.
मेले में शामिल होने वाले कुल लोगों की संख्या को एक देश माना जाए तो आबादी के लिहाज से ये भारत और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे ज़्यादा जनसंख्या वाला देश होगा.
श्रद्धालुओं की अनुमानित संख्या अमेरिका की आबादी से ज़्यादा है.
आंकड़े करोड़ों में
2013 और 2001 में आयोजित पिछले दो पूर्ण कुंभ मेलों की तुलना में, इस बार मेले के क्षेत्रफल और यहां आने वाले लोगों की संख्या में काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई है.
पूर्ण कुंभ मेला हर 12 साल में आयोजित होता है, जबकि अर्ध कुंभ मेला, जैसे 2019 का मेला, हर 6 साल में आयोजित होता है. अर्ध कुंभ, पूर्ण कुंभ की तुलना में छोटा होता है.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट–बेंगलूर की एक स्टडी के अनुसार, करीब दो दशक पहले, 2001 में प्रयागराज में आयोजित कुंभ मेले में 5 करोड़ लोग शामिल हुए थे.
ये संख्या 2013 में बढ़कर 12 करोड़ हो गई थी. 2025 में इसके चार गुना होने का अनुमान है.
कुंभ मेले में श्रद्धालुओं की संख्या (आंकड़े करोड़ों में)
गंगा और यमुना के रेतीले तटों पर करोड़ों लोगों के जमा होने का अनुमान है. जिस मैदान पर मेले का आयोजन किया जा रहा है उसका क्षेत्रफल चार हज़ार हेक्टेयर है. यहां लोगों के ठहरने के लिए टेंट, अखाड़े, अस्पताल और कई अन्य अस्थाई ढांचे बनाए जा रहे हैं. ये पिछले कुंभ मेले की तुलना में दोगुना है.
पिछले तीन कुंभ मेलों का क्षेत्रफल (हेक्टेयर में)
कुंभ मेले का आयोजन क्यों होता है?
कुंभ मेले के आयोजन की शुरुआत का उल्लेख पुराणों और हिंदुओं की पौराणिक किताबों में मिलता है.
सबसे ज़्यादा लोकप्रिय कथा के मुताबिक़ समुद्र मंथन के दौरान अमृत की बूंदें पाने के लिए देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ.
इसी दौरान अमृत की कुछ बूंदें हरिद्वार, उज्जैन, प्रयागराज और नासिक में गिरीं. इसी वजह से इन चार शहरों में कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है

अस्थायी टेंट शहर का बनना

कुंभ मेला अपने आप में एक पूरा शहर है, यहां आवासीय ढांचे, स्वास्थ्य और यहां तक कि सुरक्षा की भी व्यवस्था होती है.
श्रद्धालु जो कुंभ में स्नान या ज़्यादा समय के लिए रुकने आते हैं, वो टेंट में रह सकते हैं या किफ़ायती सार्वजनिक रैन बसेरों में रह सकते हैं. लोगों के आने-जाने के लिए अस्थायी पीपा पुल समेत कई सड़कें भी बनाई गई हैं.

लोगों के ठहरने के लिए 1,50,000 टेंट तैयार किए गए हैं,

अखाड़े, कुंभ का बेहद अहम हिस्सा होते हैं. कुंभ में ऐसे कुल 13 अखाड़े हैं. इनके आराध्य देव यानी जिस देवता की ये पूजा करते हैं, उनके आधार पर इन अखाड़ों को तीन समूहों में बांटा गया है. शैव, वैष्णव और उदासीन.

मेले की तैयारियां अखाड़ों को ध्यान में रखकर पूरी की गई हैं. किसी भी तरह के हंगामे को रोकने के लिए रास्तों की निगरानी की जा रही है. शाही स्नान के दिनों में इन अखाड़ों के साधु और साध्वी एक शाही जुलूस निकालते हैं और सबसे पहले स्नान करते हैं.
एक अखाड़ा कैंप में एक ध्वज, एक मंदिर, जमा होने की जगह, ठहरने की जगह और खाना खाने की जगह होती है.

ऐसा एक पुल बनाने में क़रीब एक महीने का वक़्त लगता है. जैसे-जैसे मेले में श्रद्धालुओं की संख्या कम होती जाती है, इन पुलों को हटा दिया जाता है.

एक पीपा पुल तैरते हुए खोखले लोहे के सिलिंडरों का इस्तेमाल कर बनाया जाता है. इन्हें लोहे की ज़ंजीरों से बांधा जाता है. पुल की सतह बनाने के लिए फिर लकड़ी के तख़्तों को इनके ऊपर रखा जाता है.
हज़ारों धार्मिक संगठनों को अपना शिविर लगाने के लिए जगह दी गई है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 100 बिस्तरों वाला एक सेंट्रल अस्पताल तैयार किया गया है. इसके अलावा 20-25 बिस्तरों वाले छोटे-छोटे अस्पताल भी तैयार किए गए हैं.

कुंभ मेले के दौरान कई श्रद्धालु अपने परिजनों से बिछड़ जाते हैं. इसको ध्यान में रखकर भी एक 'खोया-पाया' केंद्र तैयार किया गया है.

क्रेडिट
स्टोरी और प्रोडक्शन: जैस्मिन निहालनी
डिज़ाइन: चेतन सिंह
इलस्ट्रेशन: पुनीत बरनाला
डेवलपमेंट: कावेरी बिस्वास और प्रीति वाघेला
फ़ोटो और वीडियो: अंशुल वर्मा और देबलिन रॉय
स्रोत
यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन डिवीज़न, वर्ल्ड बैंक, प्रयागराज मेला अथॉरिटी, प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो और सेंटर फॉर कल्चरल रिसोर्सेज एंड ट्रेनिंग

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