मोहन यादव को मध्य प्रदेश का सीएम बनाने से यूपी, बिहार पर क्या होगा असर?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव

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इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव.
    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना(बिहार) से

मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री मोहन यादव उसी ‘यादव’ समुदाय से हैं जिसका उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में बड़ा असर है.

मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर क्या बीजेपी उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में यादव वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाने की तैयारी में है?

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव को ‘यादवों’ का सबसे बड़ा नेता माना जाता रहा है.

इन राज्यों में दोनों ही नेताओं की बड़ी सियासी विरासत मौजूद है. इसी विरासत को अब अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव संभाल रहे हैं.

बिहार में इसी साल 2 अक्टूबर को जाति आधारित गणना के आंकड़े आए थे. इसके मुताबिक़ राज्य में यादवों की आबादी क़रीब 14 फ़ीसदी है, जबकि ओबीसी समुदाय की कुल आबादी क़रीब 36 फ़ीसदी है.

राज्य की राजनीति पर इस समुदाय का इतना बड़ा असर है कि अब भी बिहार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल है.

बीते तीन दशक से ज़्यादा समय से लालू या उनका परिवार इस राज्य की राजनीति में बड़ा असर रखते हैं.

बिहार एकमात्र ऐसा हिन्दी भाषी राज्य है, जहां बीजेपी कभी अपनी सरकार या अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई है. इन दोनों ही राज्यों में बीजेपी कोई बड़ा यादव नेता खड़ा नहीं कर पाई है.

ऐसे में मध्य प्रदेश में यादव चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने से क्या बीजेपी उत्तर प्रदेश और बिहार के यादव वोटरों पर भी असर डाल सकती है?

तेजस्वी अखिलेश

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राज्य से बाहर कितना असर

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वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी कहते हैं, “आमतौर पर इस तरह के नेता का दूसरे राज्यों में कोई असर नहीं होता है. मोहन यादव को बीजेपी ने भले ही मुख्यमंत्री बना दिया है, लेकिन वो नेता नहीं हैं. नेता तो नरेंद्र मोदी हैं. मोहन यादव मुलायम सिंह यादव या लालू यादव की तरह यादवों के नेता भी नहीं हैं.”

त्रिपाठी के मुताबिक़, एक राज्य में किसी जाति का बड़ा नेता होने पर भी दूसरे राज्य में उसका ख़ास असर नहीं होता है. इस मामले में न तो मायावती किसी अन्य राज्य में बहुत सफल हो सकीं और न ही अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी मध्य प्रदेश में कुछ ख़ास कर पाई.

उत्तर प्रदेश में यादवों की आबादी क़रीब 11 फ़ीसदी मानी जाती है. राज्य में मुलायम सिंह यादव और फिर उनके बेटे अखिलेश यादव भी मुख्यमंत्री रहे हैं.

समाजवादी पार्टी ने ‘एमवाई’ (मुस्लिम और यादव) समीकरण के आधार पर ख़ुद को राज्य में असरदार राजनीतिक ताक़त के तौर पर स्थापित किया है.

वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान मानते हैं कि मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे यूपी और बिहार के यादवों को संदेश देना एक मक़सद हो सकता है, लेकिन इसका कोई असर होगा ऐसा नहीं लगता है.

शरद प्रधान के मुताबिक़, “मोदी संदेश देने में अव्वल हैं कि देखिए हम यादवों के लिए कितने फ़िक्रमंद हैं. लेकिन यूपी या बिहार के यादवों पर वो कोई असर डाल सकें, इसके लिए बहुत वक़्त नहीं बचा है.”

नीतीश कुमार

जब फेल हुआ नीतीश का कुर्मी दांव

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ‘कुर्मी’ समुदाय के बड़े नेता माने जाते हैं, लेकिन बिहार के बाहर अन्य राज्यों में उनकी पार्टी का भी कोई ख़ास असर नहीं दिखता है.

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद भी इस बात से सहमत दिखते हैं.

उनके मुताबिक़, उत्तर प्रदेश में बिहार से दोगुना कुर्मी हैं और साल 2012 के विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार ने उत्तर प्रदेश में 200 से ज़्यादा उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें सभी की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी.

सुरूर अहमद

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उनके मुताबिक़ क्षेत्रीय नेताओं की अपनी सीमा होती है. पहले मुलायम सिंह यादव और अब अखिलेश यादव का बिहार में कोई असर नहीं हो पाया.

वैसे ही लालू प्रसाद यादव का उत्तर प्रदेश में कोई प्रभाव नहीं बन पाया. यहां तक कि बिहार की सीमा से सटे यूपी के इलाक़ों में उनका कोई असर नहीं दिखता.

वहीं जनता दल के पुराने नेता शरद यादव मध्य प्रदेश के ही होशंगाबाद के थे, जिन्होंने पहले यूपी और फिर बिहार में राजनीति की.

लेकिन शरद यादव भी इन राज्यों में जाति की राजनीति नहीं कर पाए, बल्कि ‘सोशलिस्ट’ नेता के तौर पर राजनीति करते थे.

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ओबीसी अधिकारों पर बयान देते रहे हैं.

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ओबीसी अधिकारों पर बयान देते रहे हैं.

‘राहुल गांधी को जवाब’

बीजेपी ने साल 2019 के लोकसभा चुनाव और साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों के लिए अपने नेता भूपेंद्र यादव को प्रभारी बनाया था. लोकसभा चुनावों में बिहार में एनडीए को 40 में 39 सीटें मिली थीं.

अगले ही साल हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को भले अच्छी सफलता मिली हो, लेकिन नीतीश कुमार की जेडीयू के साथ होने के बाद भी राज्य विधानसभा में आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी.

उन चुनावों में बीजेपी को 74 जबकि आरजेडी को 75 सीटों पर जीत मिली थी.

सरूर अहमद

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राम दत्त त्रिपाठी के मुताबिक़ बीजेपी ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मुख्यमंत्री के चुनाव में पार्टी के अंदर के जातीय समीकरण को साधा है और राहुल गांधी को भी जातिगत गणना के मुद्दे पर जवाब दिया है.

राम दत्त त्रिपाठी कहते हैं, “राहुल गांधी ओबीसी पर बहुत ज़ोर दे रहे थे. इस लिहाज से बीजेपी ने तीन अलग समुदाय से मुख्यमंत्री बनाकर जातिगत जनगणना का भी जवाब दिया है और पार्टी के अंदर भी संतुलन बनाया है कि वो पार्टी में ओबीसी को महत्व देते हैं.”

बीजेपी ने मध्य प्रदेश में ओबीसी, छत्तीसगढ़ में आदिवासी जबकि राजस्थान में ब्राह्मण चेहरे को मुख्यमंत्री बनाया है.

राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के साथ पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया

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‘पुरानी ग़लती’

मध्य प्रदेश में पहले भी यादव बिरादरी के बाबू लाल गौर बीजेपी के मुख्यमंत्री रहे हैं. जबकि राजस्थान में प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी के तौर पर बीजेपी के पास बड़ा ब्राह्मण चेहरा मौजूद था, लेकिन मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को बनाया गया है.

छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने रमन सिंह को मुख्यमंत्री बनाया था, जो राजपूत समुदाय से थे. रमन सिंह साल 2003 से साल 2018 तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे.

इस बार छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने आदिवासी नेता विष्णु देव साय को मुख्यमंत्री बनाया है.

बीजेपी ने झारखंड जैसे आदिवासी राज्य में रघुवर दास को पहला ग़ैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाया था.

रघुवर दास तेली समाज से आते हैं. इसका नुक़सान साल 2019 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को हुआ और वह सत्ता से बाहर हो गई.

सुरूर अहमद कहते हैं, “रघुवर दास को मुख्यमंत्री बनाने पर कुछ लोग इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘मास्टर स्ट्रोक’ बता रहे थे. इस बार बीजेपी ने अपनी पुरानी ग़लती सुधारने की भी कोशिश की है और यह ख़याल भी रखा है कि जो भी मुख्यमंत्री हो, वो शीर्ष नेतृत्व के नियंत्रण में हो.”

ज़ाहिर है मध्य प्रदेश में बीजेपी के प्रयोग का बिहार या उत्तर प्रदेश में कितना असर होता है यह अगले कुछ महीनों में स्पष्ट हो जाएगा.

बीजेपी के नए प्रयोग की परीक्षा साल 2024 के लोकसभा चुनावों में हो सकती है.

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साल 2019 में मध्य प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से 28 पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी.

वहीं राजस्थान की सभी 25 सीटें एनडीए के खाते में गई थीं, जिनमें 24 सीटें बीजेपी को मिली थीं. जबकि छत्तीसगढ़ की 11 सीटों में 9 बीजेपी के खाते में गई थीं.

इन तीनों राज्यों की 65 लोकसभा सीटों में 62 बीजेपी और एनडीए के खाते में गई थी.

यानी इन राज्यों में अगले लोकसभा चुनावों में बीजेपी के पास नया कुछ भी पाने को कम है, लेकिन उसके पास खोने के लिए बहुत कुछ है.

साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में यह तस्वीर भी साफ हो सकती है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पुराने चेहरों की जगह नए चेहरे को आगे लाने से बीजेपी को फ़ायदा होगा या नुक़सान.

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