You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
गाड़ी में सफ़र के दौरान अक्सर उलटी आती है तो इसके क्या संकेत हैं?
- Author, इफ़्तेख़ार अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गाड़ी में सफ़र के दौरान उलटी की शिकायत बहुत आम है. मेडिकल भाषा में इसे मोशन सिकनेस कहा जाता है.
आख़िर सफ़र के दौरान ऐसा क्यों होता है? दिमाग़, आँख और शरीर के संतुलन का इससे क्या संबंध है? क्या इससे बचा जा सकता है?
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
मोशन सिकनेस क्या है?
मोशन सिकनेस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें सफ़र के दौरान व्यक्ति को चक्कर, उलटी, सिर दर्द या बेचैनी से जूझना पड़ता है.
यह समस्या ज़्यादातर गाड़ी, बस, ट्रेन, जहाज़ या हवाई यात्रा के दौरान होती है. कुछ लोगों को यह समस्या पहाड़ी रास्तों पर ज़्यादा होती है.
गाड़ी में होने वाली यह परेशानी समुद्री या हवाई सफ़र में होने वाली परेशानी जैसी ही होती है.
दिल्ली स्थित सर गंगाराम हॉस्पिटल में सीनियर कंसल्टेंट डॉ मोहसिन वली कहते हैं कि जब हम सफ़र करते हैं तो असल में उस समय दिमाग़ को आँखों और कानों से अलग-अलग संकेत मिलते हैं.
डॉ मोहसिन वली कहते हैं, ''अगर आप कार या बस में बैठे-बैठे नीचे देख रहे हैं या किताब पढ़ रहे हैं, तो आपकी आँखें दिमाग़ को बताती हैं कि आप हिल नहीं रहे हैं. लेकिन कानों के अंदर मौजूद संतुलन तंत्र दिमाग़ को बताता है कि शरीर चल रहा है. इन संकेतों की वजह से शरीर को लगता है कि कोई ज़हरीली चीज़ आपके अंदर चली गई है और शरीर ज़हर से निपटने का एक ही तरीक़ा जानता है- उसे बाहर निकालना, यानी उलटी करना.''
इससे बचने का एक तरीक़ा है कि आप खिड़की से बाहर दूर की तरफ़ देखें. ऐसा करने से आँखों और कानों से आने वाले संकेत एक जैसे हो जाते हैं और तब यह परेशानी कम हो जाती है.
साल 2015 में छपी बीबीसी संवाददाता काटिया मोस्कविच की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, मोशन सिकनेस एक ऐसी बीमारी है, जिससे हर तीन में से एक व्यक्ति प्रभावित है.
साथ ही उन्होंने पाया कि यह अनुमान नहीं लगा सकते कि कौन कब इसकी चपेट में आएगा और इसका कोई इलाज भी नहीं है.
इस पर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के न्यूरोलॉजी विभाग की डॉक्टर मंजरी त्रिपाठी बताती हैं, "मोशन सिकनेस इसलिए होती है क्योंकि हमारे शरीर का संतुलन बनाने वाला सिस्टम ठीक से तालमेल नहीं बना पाता. यह सिस्टम मुख्य रूप से कान के अंदर मौजूद बैलेंस ऑर्गन (वेस्टिबुलर सिस्टम) से जुड़ा होता है."
उनके मुताबिक़, जब हम बस, कार, ट्रेन या जहाज़ में सफ़र करते हैं, तो आंखें, कान और शरीर के दूसरे हिस्सों से दिमाग़ को मिलने वाली जानकारी आपस में मेल नहीं खाती. इससे बैलेंस से जुड़े रिसेप्टर्स ज़्यादा संवेदनशील हो जाते हैं. इसी वजह से दिमाग़ के कुछ हिस्से, जैसे ब्रेन स्टेम और हाइपोथैलेमस, उत्तेजित हो जाते हैं और हमें चक्कर और उलटी से जूझना पड़ता है.
अगर आसान शब्दों में कहें तो मोशन सिकनेस कान के अंदर मौजूद बैलेंस सिस्टम और शरीर की मूवमेंट को महसूस करने वाले रिसेप्टर्स की गड़बड़ी के कारण होती है.
डॉ त्रिपाठी कहती हैं, ''हमारे शरीर में एक ख़ास तरह के सेंसर होते हैं, जिसे हम रिसेप्टर्स कहते हैं. ये बाहरी और अंदरूनी बदलावों को महसूस करके उनकी जानकारी दिमाग़ तक पहुंचाते हैं.''
सफ़र के दौरान उलटी क्यों होती है?
सफ़र के दौरान उलटी की समस्या सभी लोगों में एक जैसी नहीं होती. कुछ लोगों को यात्रा शुरू होते ही बेचैनी महसूस होने लगती है. वहीं, कुछ अन्य लोगों में यह परेशानी लंबे सफ़र के बाद सामने आती है.
ऊबड़-खाबड़ सड़कें, पहाड़ी रास्तों से गुज़रना, गाड़ी के लगातार झटके और भीतर फैली दुर्गंध भी इस समस्या को बढ़ा सकते हैं.
डॉक्टर मोहसिन वली के मुताबिक़, सफ़र के दौरान हमारे दिमाग़ में एक फ्लूइड होता है. जब यह फ्लूइड हिलता है, तो उसमें पैदा होने वाली कंपन (वाइब्रेशन) गर्दन तक पहुंचती है. गर्दन के मूवमेंट के साथ यह कंपन खोपड़ी तक जाती है. इस प्रक्रिया से दिमाग़ में संतुलन बिगड़ता है और इसके कारण मतली, चक्कर और बेचैनी जैसी समस्याएं हो सकती हैं. जब यह असहनीय हो जाए, तो उलटी भी हो सकती है.
डॉक्टर मोहसिन कहते हैं कि इन सभी लक्षणों को मिलाकर ही मोशन सिकनेस कहा जाता है.
उन्होंने बताया कि सफ़र के दौरान पेट की स्थिति भी महत्वपूर्ण है.
ख़ाली पेट सफ़र करने वाले: पेट की वेगस नर्व, जो हार्ट और गर्दन की नर्व से जुड़ी होती है, ज्यादा सक्रिय हो जाती है. इसका असर दिमाग़ और शरीर पर पड़ता है और चक्कर जैसा महसूस होता है.
भारी भोजन के बाद सफ़र करने वाले: ऐसे लोग उलटी (वोमिटिंग) की समस्या का सामना कर सकते हैं. इसलिए डॉक्टर सलाह देते हैं कि सफ़र से पहले हल्का खाना ही खाया जाए.
मोहसिन वली बताते हैं कि मोशन सिकनेस हमेशा सिर्फ़ सफ़र से जुड़ी परेशानी नहीं होती. यह कभी-कभी दिमाग़ की किसी बीमारी या दवाई के साइड इफेक्ट का संकेत भी हो सकती है. कुछ मामलों में मोशन सिकनेस ब्रेन ट्यूमर का संकेत भी हो सकता है.
इसलिए, बार-बार सफ़र के दौरान उलटी होने की स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है.
सफ़र में उलटी रोकने के लिए क्या करें और क्या नहीं
अगर आप चाहते हैं कि सफ़र के दौरान उलटी की समस्या न हो, तो ये चीज़ें अपना सकते हैं.
- भारी भोजन से बचें
डॉक्टर वली सुझाव देते हैं कि सफ़र से ठीक पहले ज़्यादा खाना न खाएं.
- ख़ाली पेट सफ़र न करें
हल्का भोजन या स्नैक्स ज़रूर लें.
- दवा का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह से करें
अगर ज़रूरी हो, तो उलटी रोकने वाली टेबलेट ली जा सकती है.
- चलती गाड़ी में सोएँ नहीं
सोते समय संतुलन बिगड़ता है और उलटी की संभावना बढ़ती है.
- मतली महसूस होने पर तुरंत रुकें
गाड़ी साइड में रोककर उलटी करें और फिर सफ़र शुरू करें.
- बहुत ज़्यादा उलटी को नज़रअंदाज़ न करें
बार-बार उलटी हो रही हो तो डॉक्टर से संपर्क करें.
- किताब या मोबाइल से ध्यान भटकने से बचें
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के रिसर्च पेपर के अनुसार, चलते वाहन में पढ़ना मोशन सिकनेस बढ़ा सकता है.
- शरीर की स्थिति स्थिर रखें
सिर, कंधे, कमर और घुटनों की हलचल कम करें.
आगे की ओर मुड़े हुए सीट पर बैठें, या सामने की सीट चुनें.
संभव हो तो खुद वाहन चलाएँ.
- निकोटीन से बचें
धूम्रपान करने वाले लोग उलटी की संभावना ज़्यादा होती है.
- सुखद संगीत सुनें
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की वेबसाइट पर छपी रिसर्च में पाया गया है कि हल्का, सुखद संगीत सुनने से मतली कम महसूस होती है और सफ़र आरामदायक बनता है.
क्या महिलाओं में ये दिक्क़त ज़्यादा होती है?
डॉक्टर मंजरी त्रिपाठी के मुताबिक़, महिलाओं में मोशन सिकनेस की समस्या पुरुषों की तुलना में अधिक देखी जाती है. इसके पीछे कई शारीरिक और हार्मोनल कारण होते हैं.
जानकारों का मानना है कि महिलाओं की जीवनशैली पुरुषों से अलग होती है. यही वजह है कि यह समस्या महिलाओं में अपेक्षाकृत ज़्यादा देखने को मिलती है.
इस पर डॉक्टर मोहसिन वली बताते हैं कि इसका पहला कारण ब्लड प्रेशर है. आमतौर पर पुरुषों का औसत ब्लड प्रेशर महिलाओं की तुलना में ज़्यादा होता है.
लो ब्लड प्रेशर की स्थिति में मोशन सिकनेस के लक्षण जल्दी दिखाई देने लगते हैं.
दूसरा कारण पोश्चरल हाइपोटेंशन है. उनके अनुसार बहुत-सी महिलाएं घर के कामकाज़ के दौरान लंबे समय तक खड़ी रहती हैं, खासकर रसोई में. लगातार खड़े रहने से खड़ी अवस्था में ब्लड प्रेशर गिर सकता है, जिसे पोश्चरल हाइपोटेंशन कहा जाता है. इससे चक्कर आना, मतली और मोशन सिकनेस जैसी दिक्कतें बढ़ सकती हैं.
मोहसिन वली के मुताबिक़ महिलाओं के शरीर में होने वाले नियमित हार्मोनल बदलाव भी एक अहम वजह हैं. पीरियड्स के दौरान शरीर में नमक, पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन लगातार बदलता रहता है.
वह यह भी बताते हैं कि मासिक धर्म के दौरान अगर रक्तस्राव अधिक हो जाए, तो ब्लड प्रेशर और गिर सकता है. इससे मोशन सिकनेस की आशंका बढ़ जाती है.
इसके अलावा डॉ. वली का कहना है कि महिलाओं का ब्रेन वॉल्यूम औसतन पुरुषों की तुलना में लगभग 150 मिलीलीटर कम होता है. उनके अनुसार इससे ब्रेन पर पड़ने वाले बाहरी प्रभावों का असर महिलाओं में अपेक्षाकृत ज़्यादा हो सकता है.
डॉ. मोहसिन वली के मुताबिक लो ब्लड प्रेशर, पोश्चरल हाइपोटेंशन, हार्मोनल बदलाव और शारीरिक संरचना. ये सभी कारण मिलकर महिलाओं में मोशन सिकनेस की समस्या को अधिक आम बना देते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित