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वक़्त देखकर खाना खाने या भूखे रहने वाले ध्यान दें
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग इस दशक का सबसे चर्चित डाइट ट्रेंड बन चुका है. इस तरह की फ़ास्टिंग में कैलोरी या कार्ब्स की मात्रा पर नज़र रखने का झंझट नहीं होता.
इस फ़ास्टिंग में खाने का समय तय करना ज़रूरी है, न कि यह देखना कि आप क्या खा रहे हैं. टेक इंडस्ट्री से जुड़े कई लोग इसे अपनाते हैं. कई हॉलीवुड सितारे भी कहते हैं कि यह उन्हें फ़िट रखता है.
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने भी एक बार कहा था कि वे हफ़्ते की शुरुआत 36 घंटे का उपवास रखकर करते हैं.
विज्ञान ने भी अब तक इस तरह की फ़ास्टिंग का समर्थन किया है.
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अभी तक की रिसर्च से संकेत मिले हैं कि रात का उपवास लंबा करने से मेटाबॉलिज़्म बेहतर हो सकता है. फ़ास्टिंग से कोशिकाओं की मरम्मत में मदद मिलती है और यह इंसान की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर सकती है.
हालांकि, न्यूट्रिशन एक्सपर्ट अरसे से चेतावनी देते आए हैं कि सेहतमंद रहने के लिए भोजन छोड़ने से कोई जादू नहीं हो सकता है.
एक्सपर्ट ये भी कहते रहे हैं कि ऐसा करना पहले से ही बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए ख़तरनाक हो सकता है.
नई स्टडी में क्या पता चला?
इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग में रोज़ाना भोजन करने के समय को एक छोटी सी समय सीमा में समेट दिया जाता है.
इसके तहत व्यक्ति आठ घंटे तक भोजन कर सकता है लेकिन उसे 16 घंटे का फ़ास्ट करना होता है.
इसके अलावा टाइम-रिस्ट्रिक्टेड डाइट्स के दूसरे मॉडल भी हैं. इनमें से एक है हफ़्ते में दो दिन कम खाना और पांच दिन नॉर्मल डाइट लेना. इस दौरान समय की पाबंदी नहीं होती है कि आप किस समय खाएं और कितनी देर न खाएं.
लेकिन अब एक स्टडी में इस पर गंभीर चिंता जताई गई है. यह इस मुद्दे पर एक तरह से पहला बड़ा अध्ययन है.
इस स्टडी में 19 हज़ार से ज़्यादा वयस्कों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया.
शोधकर्ताओं ने पाया कि रोज़ाना आठ घंटे के अंदर खाना खाने वालों में कार्डियोवैस्कुलर यानी दिल और उससे जुड़ी बीमारियों से मौत का जोखिम, उन लोगों के मुकाबले 135% अधिक पाया गया, जो 12 से 14 घंटे की समय सीमा में भोजन करते थे.
कार्डियोवैस्कुलर रिस्क बढ़ने का मतलब है कि किसी व्यक्ति की सेहत, जीवनशैली और मेडिकल डेटा के आधार पर उसके दिल से जुड़ी बीमारियों, जैसे दिल का दौरा पड़ने का ख़तरा दूसरे लोगों की तुलना में कहीं ज़्यादा है.
हालांकि अध्ययन में यह भी पाया गया कि कुल मृत्युदर (किसी भी कारण से होने वाली मौतों) से इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग का कोई पुख़्ता संबंध नहीं था.
लेकिन इसकी वजह से दिल से जुड़ी बीमारियों से मरने का ख़तरा किसी भी उम्र, लिंग और जीवनशैली के लोगों में लगातार बना रहा.
दूसरे शब्दों में, शोधकर्ताओं ने पाया कि छोटी समय सीमा में भोजन और कुल मृत्युदर के बीच बहुत ठोस संबंध नहीं था. लेकिन दिल और उससे जुड़ी बीमारियों से मरने का ख़तरा काफ़ी बढ़ा हुआ था.
यह अध्ययन इसकी वजह और असर को साबित नहीं करता, लेकिन यह संकेत इस तरह की फ़ास्टिंग को पूरी तरह सुरक्षित और सेहत के लिए अच्छा मानने वाली सोच को चुनौती देने के लिए अहम है.
स्मोकिंग करने वालों और डायबिटिक लोगों को ज़्यादा ख़तरा
शोधकर्ताओं ने इसके लिए आठ साल तक अमेरिकी वयस्कों का रिकॉर्ड रखा. उनकी खाने की आदतें जानने के लिए इसमें शामिल लोगों से दो अलग-अलग दिनों (क़रीब दो हफ़्तों के अंतराल पर) यह याद करने को कहा गया कि उन्होंने क्या-क्या खाया-पिया.
इन 'डाइटरी रिकॉल्स' के आधार पर वैज्ञानिकों ने हर व्यक्ति का औसत भोजन समय-अंतराल निकाला और इसे उनके लंबे समय की रूटीन की तरह माना.
इस अध्ययन के मुताबिक़ 12-14 घंटे के अंदर खाना खाने वालों की तुलना में जो लोग रोज़ाना आठ घंटे के अंदर खाना खाते थे, उनमें दिल और उससे जुड़ी बीमारियों से मरने का ख़तरा ज़्यादा था.
शोधकर्ताओं ने पाया कि सभी सामाजिक और आर्थिक वर्ग से जुड़े ग्रुपों में कार्डियोवैस्कुलर रिस्क बढ़ा हुआ था और यह ख़तरा धूम्रपान करने वालों और डायबिटीज़ या पहले से दिल की बीमारी से जूझ रहे लोगों में सबसे अधिक था.
इसका मतलब यह है कि ऐसे लोगों को लंबे समय तक सख़्त पाबंदियों के साथ भोजन के लिए छोटी समय सीमा अपनाने में ख़ास सावधानी बरतनी चाहिए.
शोधकर्ताओं ने पाया कि भोजन की गुणवत्ता, मात्रा और स्नैक्स लेने के दुहराव और रोज़ाना की जीवनशैली में अन्य फेरबदल के बाद भी यह संबंध बना हुआ था.
जब हमने शोधकर्ताओं से पूछा कि दिल की बीमारियों से मौतों का ख़तरा इतना अधिक क्यों दिखा, जबकि कुल मृत्युदर का आंकड़ा इतना स्पष्ट नहीं दिखा- यह बायोलॉजी का असर है या आंकड़ों में कोई पूर्वाग्रह है?
'डायबिटीज़ एंड मेटाबॉलिक सिंड्रोम: क्लिनिकल रिसर्च एंड रिव्यूज़' जर्नल में छपी पीयर-रिव्यूड स्टडी के प्रमुख लेखक विक्टर वेन्ज़े झोंग ने कहा कि डायबिटीज़ और हृदय रोग की सबसे बड़ी वजहों में से एक है खुराक, इसलिए हृदय रोग से ज़्यादा मौतों का संबंध चौंकाने वाला नहीं है.
आम धारणा के विपरीत स्टडी के निष्कर्ष
प्रोफ़ेसर झोंग चीन की शंघाई जियाओ टोंग यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन में एपिडेमियोलॉजिस्ट (महामारी विज्ञान के विशेषज्ञ) हैं.
वो कहते हैं, "जिस बात की उम्मीद नहीं थी वो यह है कि कई साल तक आठ घंटे के अंतराल में भोजन करने की आदत का संबंध, हृदय रोग से मौत के बढ़े हुए ख़तरे से निकला."
यह निष्कर्ष उस आम धारणा के विपरीत है, जिसे अब तक कुछ छोटे अध्ययनों ने समर्थन दिया था कि इस तरह के भोजन की आदत से दिल की सेहत और मेटाबॉलिज़्म में सुधार होता है.
इसी जर्नल में छपे एक संपादकीय में प्रमुख एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉक्टर अनुप मिश्रा ने इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग के फ़ायदे और नुक़सान दोनों पर चर्चा की.
उनका कहना है कि कई ट्रायल और विश्लेषण इसका सकारात्मक पक्ष दिखाते हैं कि यह वज़न घटाने में मदद कर सकता है, इंसुलिन सेंसिटिविटी को सुधार सकता है, ब्लड प्रेशर कम कर सकता है और लिपिड प्रोफ़ाइल बेहतर कर सकता है.
उनका कहना है कि इससे एंटी-इंफ्लेमेटरी फ़ायदे के भी कुछ सबूत मिले हैं.
यह लोगों को सख़्त कैलोरी काउंटिंग के बिना भी ब्लड शुगर नियंत्रित करने में मदद कर सकता है. उपवास की धार्मिक या सांस्कृतिक रिवाज़ों के साथ यह आसानी से मेल खा सकता है और इसका पालन करना भी आसान है."
प्रोफ़ेसर मिश्रा कहते हैं, "लेकिन इसका संभावित नुक़सान शरीर में पोषक तत्वों की कमी, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, बहुत ज़्यादा भूख लगना, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द और ऐसे डाइट को लंबे समय तक अपनाने की मुश्किलें शामिल हैं."
उनके अनुसार, "शुगर मरीज़ों की निगरानी नहीं की जाए तो उपवास की वजह से उनका ब्लड शुगर ख़तरनाक रूप से नीचे गिर सकता है. यह जंक फूड खाने को बढ़ावा दे सकता है. बुज़ुर्गों या लंबे समय से बीमार लोगों में कमज़ोरी आ सकती है और मांसपेशियों पर असर हो सकता है."
किन बातों का ध्यान रखने की ज़रूरत है?
यह पहली बार नहीं है जब इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग की आलोचना हुई हो.
साल 2020 में जेएएमए इंटरनल मेडिसिन में छपी एक तीन महीने की स्टडी में बताया गया था कि इससे शोध में शामिल हुए लोगों का वज़न बहुत कम घटा, जिसमें अधिकांश हिस्सा मांसपेशियों का था.
एक अन्य अध्ययन में संकेत मिला था कि इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग कमज़ोरी, भूख, पानी की कमी, सिरदर्द और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी जैसे बुरे असर पैदा कर सकती है.
प्रोफ़ेसर मिश्रा कहते हैं कि नया अध्ययन में दिल और उससे जुड़ी बीमारियों की ओर चिंताजनक संकेत किया है.
जब प्रोफ़ेसर झोंग से पूछा गया कि दिल की बीमारी या डायबिटीज़ वाले लोगों को इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग करते वक़्त क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
उनका कहना था कि ये निष्कर्ष इस ओर इशारा करते हैं कि आहार संबंधी सलाह 'व्यक्तिगत' होनी चाहिए, जो व्यक्ति की सेहत और नए सबूतों पर आधारित हों.
वो कहते हैं, "अब तक के सबूतों के आधार पर, यह कहना ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि लोग क्या खाते हैं, न कि कब खाते हैं. कम से कम, लोगों को हृदय रोग से बचाव या लंबी उम्र के लिए लंबे समय तक आठ घंटे की ईटिंग विंडो अपनाने से बचना चाहिए."
इस अध्ययन का मैसेज यही है कि उपवास को पूरी तरह छोड़ना ज़रूरी नहीं है, बल्कि इसे व्यक्ति की सेहत के हिसाब से ढालने की ज़रूरत है.
फिलहाल, सबसे सुरक्षित विकल्प यही होगा कि लोग घड़ी पर कम और अपनी थाली पर ज़्यादा ध्यान दें.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित