You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
यूक्रेन-रूस युद्ध पर भारत के रुख़ की जर्मनी ने क्यों की आलोचना?
जर्मनी ने भारत से कहा है कि उसे यूक्रेन युद्ध पर रूस की निंदा करनी चाहिए.
पिछले हफ़्ते तीन दिनों के दौरे पर आए जर्मनी के वाइस चांसलर रॉबर्ट हेबेक ने जर्मनी के डीडब्ल्यू समाचार को एक इंटरव्यू में कहा कि "अगर अन्याय हो रहा है, तो आप न्यूट्रल नहीं रह सकते."
उन्होंने कहा, "हमेशा एक हमला करने वाला होता है और एक पीड़ित. अगर आप ये कहते हैं कि आप हमलावर और पीड़ित के बीच फ़र्क नहीं करते, तो एक तरीक़े तो आप हालात को सही तरीके से नहीं देख रहे."
हेबेक ने कहा कि वो रूस के साथ "भारत की पारंपरिक साझेदारी" सम्मान करते हैं, लेकिन युद्ध के समय न्यूट्रल नहीं रहा जा सकता.
उन्होंने कहा, "मुझे ख़ुशी होगी और अगर भारत स्पष्ट शब्दों में कहता है कि ये हमला है, तो ये हमारे रिश्तों के लिए भी अच्छा होगा. दरअसल ये एकतरफ़ा आक्रमण है, ये पुतिन की जंग है."
भारत ने यूक्रेन पर हमला करने के लिए रूस की कभी निंदा नहीं की है.
साथ ही भारत ने यूक्रेन पर लगाए गए पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का समर्थन नहीं किया है और रूस से तेल ख़रीद रहा है.
'भारत न्यूट्रल नहीं, उसका एक स्टैंड है'
कई देशों में भारत के राजदूत रहे अचल मलहोत्रा के मुताबिक़ ये कहना ग़लत है कि भारत ने कोई स्टैंड नहीं लिया है.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "भारत न्यूट्रल नहीं है, उसका अपना एक स्टैंड है. भारत ने कहा है कि वो क्षेत्रीय अखंडता, अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का सम्मान करता है."
उनके अनुसार रूस के साथ कारोबार जारी रखना भारत की रणनीति का हिस्सा है, लेकिन भारत ने इस बात को बार-बार दोहराया है कि शांति का कोई विकल्प नहीं है.
रूस भारत की इस नीति से अवगत है और उसने इस पर कोई आपत्ति नहीं की है.
अचल मल्होत्रा कहते हैं, "भारत अमेरिका और यूरोप के फ़ैसले के अनुसार नहीं चल रहा है, उसकी अपनी एक नीति है."
वहीं जर्मनी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व राजदूत कंवल सिब्बल ने एक ट्वीट में लिखा, "इनका संबंध उस पीस पार्टी से है जो शांति के लिए काम नहीं करेगी. नेटो सदस्यता के रूप में भूमिका सीमित है, उसकी धरती पर अमेरिकी बेस हैं."
"द्वितीय विश्व युद्ध के बावजूद अब वो रूस के खिलाफ छद्म युद्ध में लगे हुए हैं. सबकुछ जियोपॉलिटिक्स से चल रहा है, तो नैतिकता के पीछे शरण क्यों ली जा रही है. भारत की स्थिति जानते हुए भी ऐसी बातें क्यों की जा रही हैं."
मल्होत्रा कहते हैं कि जर्मनी समेत दूसरे पश्चिमी देश रूस के ख़िलाफ भारत का समर्थन चाहते हैं, और यही कारण है कि वो इस मुद्दे को बार बार उठा रहे हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "भारत जैसे बड़े देश के साथ आने से रूस के ख़िलाफ लामबंदी में मदद मिलेगी. यही नहीं भारत के साथ मिलकर अगर वो बातचीत करें तो रूस पर दबाव बढ़ेंगा."
हेबेक ने और क्या कहा?
जर्मन वाइस चांसलर रॉबर्ट हेबेक तीन दिनों की भारत यात्रा पर आए थे.
इस दौरान उन्होंने ये भी कहा कि दुनिया भर के लोकतंत्रों को रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, खासकर कच्चे तेल की खरीद में, जिससे यूक्रेन में युद्ध जारी रखने के लिए मॉस्को को अधिक वित्तीय संसाधन मिलते हैं.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, उन्होंने कहा कि यूक्रेन के खिलाफ रूस की आक्रामकता यूरोप के लिए "अभूतपूर्व" है क्योंकि इसने क्षेत्र में शांति को "बर्बाद" कर दिया है.
हेबेक ने कहा, “प्रतिबंधों का मतलब है कि हमने तेल के व्यापार पर प्रतिबंध नहीं लगाया है. लेकिन कीमत की एक सीमा है. इसका मतलब है कि आपको कच्चा तेल खरीदने और उसे प्रोसेस करने की अनुमति है. इससे पैसा कमाना सही नहीं है.”
गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों में भारत की रियायती रूसी तेल की खरीद में काफी वृद्धि हुई है.
रूस ने दिया जवाब
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक भारत में रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जर्मनी ने यूरोप में सुरक्षा मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र स्थिति को "त्याग" दिया है, जिससे यूक्रेनी संघर्ष में उसकी आवाज "अप्रासंगिक" हो गई है.
उन्होंने कहा, "जर्मनी के वाइस चांसलर के भारत आने का उद्देश्य रूस और भारत की साझेदारी पर बात करना है. बेहतर होगा कि वो भारत और जर्मनी के रिश्तों पर ध्यान दें."
भारत सरकार के मुताबिक अपने दौरे पर हेबेक ने ग्रीन एनर्जी, सस्टेनेबल डेवलपमेंट और जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर बात की.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)