उत्तर भारत में इतनी भारी बारिश कैसे हुई, पानी में क्यों डूबे शहर, अब क्या करें, जानें ज़रूरी सवालों के जवाब

कीर्ति दुबे

बीबीसी संवाददाता

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शनिवार की सुबह से उत्तर भारत में लगातार जारी भारी बारिश ने तबाही मचा रखी है.

दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और राजस्थान में कई जगह लगातार बारिश से डूब गईं. भारी बारिश और भूस्खलन से अब तक कई लोगों की मौत हो चुकी है.

बारिश से कई राज्यों में हो रही तबाही के बीच पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा है कि उन्होंने वरिष्ठ मंत्रियों और अधिकारियों से बात की है और हालात का जायज़ा लिया है.

भारतीय मौसम विभाग ने कुछ राज्यों में अगले 24 घंटों के लिए रेड अलर्ट जारी किया है.

दिल्ली, गुरुग्राम और नोएडा में सोमवार को स्कूल बंद रखने का आदेश दिया गया.

सोमवार को भी कई में राज्यों बारिश का कहर जारी है. इन राज्यों से बारिश और बाढ़ की भयावह तस्वीरें सामने आ रही हैं.

दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश और राजस्थान तक भारी बारिश के बाद सड़कें तालाब जैसी नज़र आ रही हैं.

पानी के तेज बहाव में गाड़ियां बहती दिख रही हैं. घरों के अंदर पानी तेजी से घुस रहा है. कई मंज़िला इमारतों के एक फ्लोर तक डूब गए हैं.

कई वीडियो सोशल मीडिया पर छाए हैं जिनमें उफनती नदियों की वजह से तटबंध टूट रहे हैं और मकान टूट कर ताश के पत्तों की तरह बिखरते दिख रहे हैं.

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दिल्ली में 40 साल का रिकॉर्ड टूटा

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राजधानी दिल्ली में कई इलाकों में पानी भर गया. यमुना नदी ने खतरे के निशान को पार कर लिया है. और कई हज़ार लोगों को उन इलाकों से बाहर निकाला गया है जिनके डूबने की संभावना है.

दिल्ली की पीडब्लूडी मंत्री आतिशी मार्लेना ने भारी से पैदा हुई स्थिति का जयज़ा लिया और मीडिया से कहा, “ हथनी कुंड से तीन लाख क्यूसेक पानी प्रति घंटे छोड़ा जा रहा हैं. सवाल ये है कि अगर लगातार बारिश होती रही, हरियाणा में, हिमाचल प्रदेश में बारिश हो रही है तो हमें ये देखना होगा कि कितना पानी आता है."

"हथिनी कुंड में जो पानी छोड़ा गया है उसे यहां तक आने में थोड़ा वक्त लगता है. उम्मीद है कि कल 11 बजे तक यमुना ब्रिज पर पानी ख़तरे के निशान से ऊपर पहुंच जाएगा. हमने बाढ़ की चपेट में आने वाले संभावित जगहों से लोगों को निकालना शुरू कर दिया है. परला से लेकर दक्षिण दिल्ली तक हमने तैयारी कर ली है. कई जगहों पर नावों को तैनात किया गया है. किसी भी शहर के इँफ्रास्ट्रक्चर की अपनी क्षमता होती है, हम लगातार अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं. ”

मॉनसून की दस्तक के साथ हुई इस बारिश ने दिल्ली में बीते 40 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया.

इतनी तेज़ बारिश आखिर हो क्यो रही है?

राज़धानी दिल्ली से लेकर कई शहरों के रिहायशी इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, मसलन देश के शहर कैसे बाढ़ के संकट से जूझ रहे हैं?

इन्हीं सवालों के साथ हमने मौसम विज्ञान के जानकार और शहरी विकास के क्षेत्र के जानकारों से बात की.

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48 घंटों में हुई भारी बारिश की वजह क्या है?

स्काईमेट के उपाध्यक्ष महेश पलावत ने बीबीसी से हुई बातचीत में ये अहम जानकारियां दीं-

पहाड़ों पर वेस्टर्न डिस्टरबेंस है. पंजाब और हरियाणा में एक साइक्लॉनिक सर्कुलेशन है. काफ़ी ज़्यादा मॉनसून ट्रफ़ मध्य भारत से चल कर पंजाब हरियाणा की ओर आया है.

साइक्लॉनिक सर्कुलेशन वो स्थिति होती है जिसमें हवा घड़ी के विपरीत दिशा में बहती है और वातावरण में ऊपर की ओर उठती है. ये हवा जब ठंडी होती हो तो बारिश होती है, मोटे तौर पर कहें तो जहां साइक्लॉनिक सर्कुलेशन होता है वहां मौसम खराब होता है. जहां-जहां ये जाती है वहां-वहां बारिश बढ़ जाती है.

साथ ही मॉनसून टर्फ़ भी इस इलाके में है. मॉनसून टर्फ़ वो स्थिति होती है जब मानसून के दौरान हवाएं किसी एक जगह पर एकत्र होती हैं और वहां कम दबाव वाला क्षेत्र पैदा होता है, यहां बादल बनते हैं और हवाओं के साथ नमी भी आती है और इस वजह से इन इलाकों में बारिश होती है.

वेस्टर्न डिस्टरबेंस, अत्यधिक साइक्लॉनिक सर्कुलेशन और मॉनसून टर्फ़ तीनों ही स्थितियों के टकराने के कारण बीते दो दिनों में दिल्ली, हिमाचल प्रदेश , हरियाणा पंजाब और यूपी के इलाकों में जबरदस्त बारिश हुई.

मंगलवार को मॉनसून टर्फ़ थोड़ा उत्तर भारत की ओर और बढ़ जाएगा. ऐसे में दिल्ली में बारिश कम हो जाएगी. लेकिन चूंकि टर्फ़ उत्तर की ओर बढ़ेंगे तो हिमालय के इलाकों में यानी पहाड़ों पर बारिश बढ़ जाएगी.

हालांकि 15 से 16 जुलाई को ये मॉनसून टर्फ़ फिर से दिल्ली और उत्तर प्रदेश के ऊपर आ जाएंगे और फिर दिल्ली में बारिश बढेगी.

हालांकि ये बारिश इतनी ज़्यादा नहीं होगी, क्योंकि बीते दो दिनों में इन सभी मौसम के पैटर्न आपस में मिल गए और इसलिए बहुत ज्यादा बारिश हुई. आने वाले दिनों में दिल्ली में इससे कम बारिश होगी.

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दिल्ली में एक अनुमान के मुताबिक़ एक दिन में 8 से 9 मिली मीटर की बारिश होती है लेकिन बीते दो दिनों में बारिश 153 मिली मीटर हुई. जो दिल्ली के औसत से 1000 फ़ीसदी से ज्यादा है.

आने वाले दिनों यानी 15-16 जुलाई को जब दिल्ली में बारिश होगी तो उस समय ये औसत 30 से 40 मिली मीटर तक हो सकता है.

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शहरों में जलभराव के क्या कारण हैं?

राजस्थान के शहरी विकास विभाग के प्रिसिंपल एडवाइज़र एसएच संचेती ने बीबीसी से बात की और बताया कि क्यों दो दिनों की बारिश में दिल्ली सहित कई शहरों में बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए. उनसे बातचीत का सार पढ़िए-

ये मानना होगा कि मॉनसून के पहले इतनी ज़बरदस्त बारिश होगी इसका अंदाज़ा नहीं था.

शहरों के प्लान की बात करें तो इनके बसने के समय मास्टर प्लान बनाए जाते हैं लेकिन प्लान लागू उसी रूप में नहीं होता जिस रूप में तैयार किया जाता है, वो कागज़ पर रह जाता है.

जब भी शहर या सोसायटी बसती हैं तो उसके साथ ही पानी की निकासी का प्लान बनता है. प्लान में देखा जाता है कि किस इलाके में पानी ज़्यादा जमा हो जाता है, कौन से निचले स्तर के इलाके हैं और उनके लिए पानी निकलने का मार्ग क्या होगा? इसका पूरा विवरण ड्रैनेज सिस्टम प्लान में होता है, लेकिन इतनी विस्तृत योजना ज़मीन पर लागू ही नहीं की जाती.

अगर शहर के पानी के निकासी के सिस्टम को ठीक से लागू कर दिया जाए तो शहर में पानी जमा होने की 70 से 80 फ़ीसदी समस्या ख़त्म हो जाएगी.

मुख्य रूप से बड़े शहरों में बाढ़ आने का कारण होता है नदी-नालों के इलाकों में अनाधिकृत बस्तियों का होना और ड्रैनेज सिस्टम पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव पड़ना.

कोई निकासी सिस्टम तैयार होता है तो नाले और नहरों की एक क्षमता होती है कि उसमें कितना पानी जा सकता है. जब शहर बसते हैं तभी ये तय होता है कि कितनी क्षमता वाला ड्रैनेज सिस्टम शहर के लिए रखना चाहिए. लेकिन फिर होता ये है कि कई सारी अनाधिकृत और असुनियोजित बस्तियां बसने लगती हैं इससे नदी-नालों में जो पानी जाता है वो उस क्षमता से बहुत ज़्यादा होता है, जिसके लिए वो तैयार किए गए हैं.

इसीलिए हम वो स्थिति देखते हैं जैसी हमने बीते शनिवार और रविवार को दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और यूपी के इलाकों में देखी.

नदी- नहरों के आसपास के इलाके में बस्तियां बसने से ये संकरे होते जा रहे हैं.

नियम ये कहते हैं कि नदियों-नालों के कैचमेंट इलाके में किसी तरह की बसावट ना हो लेकिन ज्यादातर ये देखा जाता है कि इन्हीं इलाकों में लोग बिना किसी तैयारी के बस जाते हैं. ये बहुत ज़रूरी है कि जो प्लान शहरों में पानी की निकासी के लिए बनाए जाएं उन्हें लागू किया जाए लेकिन ये असल में होता नहीं है और यही परेशानी की जड़ है.

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यही नियम बड़ी-बड़ी सोसायटी और रेज़ीडेंशियल अपार्टमेंट के लिए भी लागू होते हैं. हमने कई सोसायटी का वीडियो सोशल मीडिया पर देखा जहां भारी जलजमाव हुआ. कई लोगों के फ्लैट डूब गए.

किसी भी बिल्डर की ज़िम्मेदारी होती है कि जब वो सोसायटी प्लान कर रहे हैं, उसी समय ये भी प्लान बनाएं कि अगर बाहरी स्त्रोत से पानी आएगा तो उसकी निकासी का मार्ग क्या होगा?

साथ ही ये भी देखना होता है कि किस हद तक पानी बाहरी स्त्रोतों से आ सकता है. ये सब कुछ एक कैलकुलेशन पर आधारित होता है. किसी भी शहर की प्लानिंग के लिए वहां के 30 से 50 साल के डेटा देखे जाते हैं ताकि ये अनुमान लगाया जा सके कि वहां कितनी कम या अधिक बारिश होने का इतिहास रहा है.

लेकिन जिस तरह के हालात हैं उसे देखते हुए ये कहना होगा कि ज़मीन पर ये सारे नियम कायदे ठीक से लागू ही नहीं हो रहे.

सबकुछ एक दूसरे से जुड़ा है ये समझना होगा. नाले, नहरों में मिलते हैं , ये नहरें सहायक नदियों में मिलती हैं, ये सहायक नदियां नदी में मिलती हैं और नदी समंदर में जाकर मिलती हैं.

दिल्ली की बात करें तो अगर यमुना नदी में ज्यादा पानी आ जाएगा तो उसके आस-पास के इलाकों में बाढ़ की स्थिति हो जाएगी. यदि किसी तरह पानी को जगह दे कर बाहर निकालेंगे तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों में बाढ़ आ जाएगी. ये सबकुछ जुड़ा हुआ है.

भारत सरकार का एक बड़ा प्रोजेक्ट था जिसमें कैसे जलजमाव की स्थिति में एक नदी को कैसे दूसरी नदी से जोड़ कर इस संकट से निपटा जाए इस पर काम करने की मुहिम चलाई गई, हालांकि इस दिशा में उतना काम नहीं हो पाया जितना होना चाहिए.

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जलजमाव की स्थिति में क्या करें

एसएच संचेती बताते हैंकि अगर आप जलजमाव की स्थिति में फंस जाएं तो आपको क्या करना चाहिए-

अगर कोई ऐसी स्थिति में फँसा है जहां उसके घर में पानी भर चुका है तो व्यक्तिगत रूप से बस यही किया जा सकता है कि जान बचा कर किसी सुरक्षित जगह पर जाया जाए.

अगर आप इस तरह के अपार्टमेंट में रह रहे हैं तो बारिश की चेतावनी की स्थिति में सोसायटी के अध्यक्ष से बात कर तय वक्त के लिए सुरक्षित जगह पर जाएं.

सोसायटी में रहने वालों की ज़िम्मेदारी है कि मॉनसून आने से पहले ही पानी की निकासी जहां से भी होती है, उन सभी प्वाइंट को चेक कर लें कि कहीं वो जाम तो नहीं हो रहे है.

ये काम मिलजुल कर ही किया जा सकता है.

हर इंच ज़मीन के लिए ड्रैनेज प्लान होना चाहिए, ये प्लान होना ही चाहिए कि पानी आएगा तो आखिर जाएगा कहां?

इस तरह की बारिश की परिस्थिति में सोसायटी के पास नाव और लोगों के लिए लाइफ़ जैकेट होने चाहिए. आपातकाल की स्थिति के लिए तैयारी पूरी होनी चाहिए.

सरकार के स्तर पर ये तय करना बहुत ज़रूरी है कि वह अनाधिकृत बसावट का अध्ययन करें और देखें कि बस्तियां कैचमेंट में आ रही हैं तो उन्हें खाली कराया जाए. इस इलाके में रह रहे लोगों को सुरक्षित जगहों पर सरकार सब्सिडी पर आवास दें.

सरकारी विभागों के पास बीते 50 साल के आंकड़ें होते हैं और उनका अध्ययन करके ये देखना चाहिए कि किन इलाकों में अतीत में बहुत अधिक बारिश की वजह से पानी जमा हुआ है.

इन इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर के हिसाब से क्या बदलाव किए जा सकते हैं और किस तरह की तकनीक के इस्तेमाल से पानी को जमा होने के तुरंत बाद निकाला जा सकता है उसका अध्ययन करना चाहिए और तकनीक को विकसित करना चाहिए.

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