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इस्लाम में तलाक़-ए-हसन क्या है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में हो रही है बहस
- Author, सैय्यद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट ने इस्लाम में प्रचलित 'तलाक़-ए-हसन' की प्रक्रिया पर गंभीर चिंता जताई है. यह प्रथा पति को तीन महीने के अंदर एक-एक बार 'तलाक़' कहकर शादी ख़त्म करने की अनुमति देती है.
इससे पहले 2017 में अदालत तीन तलाक़ यानी तलाक़-ए-बिद्दत को असंवैधानिक घोषित कर चुकी है.
अब सुप्रीम कोर्ट में तलाक़-ए-हसन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है. याचिका में कहा गया है कि यह प्रथा "अतार्किक, मनमानी और असंवैधानिक" है क्योंकि यह महिलाओं की समानता, सम्मान और गरिमा के अधिकारों का उल्लंघन करती है.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तलाक़-ए-हसन की प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हुए पूछा कि "आधुनिक समाज में ऐसी प्रथा को कैसे स्वीकार किया जा सकता है."
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हालांकि सुप्रीम कोर्ट में वकील फ़ुज़ैल अहमद अय्यूबी ने बीबीसी हिन्दी से कहा कि अदालत की कार्यवाही को लेकर कुछ ग़लतफ़हमी हुई है.
उन्होंने कहा कि अदालत की यह टिप्पणी तलाक़-ए-हसन की प्रथा पर नहीं थी, बल्कि उस दलील के जवाब में थी जिसमें बताया गया था कि तलाक़ के नोटिस अधिकतर मामलों में वकीलों के माध्यम से भेजे जा रहे हैं.
क्या है मामला?
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी जिस याचिका की सुनवाई के दौरान की, उसकी याचिकाकर्ता ने कोर्ट में बताया कि उनके बच्चे के स्कूल में दाख़िले की प्रक्रिया इसलिए अटकी है क्योंकि तलाक़ के दस्तावेज़ों पर उनके पति के हस्ताक्षर नहीं हैं.
उनके पति ने अपने वकील के ज़रिए तलाक़ दिया और फिर दूसरी शादी कर ली. अदालत ने तलाक़ के नोटिस वकील द्वारा भेजने पर सवाल उठाते हुए इसे "व्यक्तिगत क़ानून के तहत भी संदिग्ध" बताया.
जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि तलाक़ जैसी गंभीर प्रक्रिया में पति की सीधी भागीदारी होनी चाहिए.
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि उनके पति की ओर से भेजे गए तलाक़ के नोटिस पर पति के हस्ताक्षर ही नहीं थे. पति की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि इस्लाम में वकील के माध्यम से नोटिस देना आम प्रथा है.
इस पर अदालत ने पूछा कि "ऐसे नए तरीक़े क्यों ईजाद किए जा रहे हैं और क्या इन्हें प्रथा माना जा सकता है."
सुप्रीम कोर्ट में वकील फ़ुज़ैल अहमद अय्यूबी ने कहा, "इस मामले को तीन तलाक़ वाले मुद्दे से जोड़ना ग़लत है. तलाक़-ए-हसन में अगर पक्षकारों में मेल-मिलाप हो जाए तो पहला या दूसरा तलाक़ अपने आप ही निरस्त हो जाता है. इसलिए यह अपरिवर्तनीय नहीं है, बल्कि सुलह-सफ़ाई पर आधारित प्रक्रिया है."
उन्होंने कहा, "पति ख़ुद तलाक़ बोले या फिर वकील के ज़रिए नोटिस से भेजे- ये एक प्रक्रिया से जुड़ा सवाल है."
अदालत ने तलाक़-ए-हसन की विस्तृत व्याख्या मांगी है और अगली सुनवाई में पति की मौजूदगी अनिवार्य कर दी है.
तलाक़-ए-हसन क्या है?
इस्लामिक शरीयत में तलाक़ के कई तरीक़े माने गए हैं, जिनमें से एक है तलाक़-ए-हसन. यह तरीक़ा तलाक़-ए-बिद्दत यानी तीन तलाक़ से अलग, अधिक संतुलित और विचार-विमर्श वाला माना जाता है.
तलाक़-ए-हसन में पति तीन महीनों या तीन तुहर (पीरियड) में एक-एक बार कर के "तलाक़" कहता है.
इन तीन तलाक़ के बीच पति-पत्नी को एक ही घर में रहना होता है. हालांकि, इस बीच उनके बीच शारीरिक संबंध नहीं होने चाहिए.
इस्लाम में ऐसा मानना है कि यह प्रक्रिया जल्दबाज़ी में निर्णय लेने से रोकती है और पारिवारिक विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने का मौक़ा देती है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट की वकील सायमा ख़ान कहती हैं कि तलाक़-ए-हसन मुस्लिम क़ानून में अच्छा तरीक़ा माना जाता है.
उनका कहना है, "इसमें पति तीन अलग-अलग महीनों में, जब पत्नी पाक हो, एक-एक बार तलाक़ बोलता है. पहले दो तलाक़ बोलने के बाद भी रिश्ता वापस बहाल हो सकता है. तीसरे तलाक़ के बाद तलाक़ पक्का हो जाता है. वह कहती हैं कि प्रक्रिया लगभग तीन महीने की होती है, जिससे सोच-समझकर फ़ैसला करने और सुलह का अवसर मिलता है."
सायमा कहती हैं, "भारत में यह क़ानूनी और मान्य है. हालांकि इसके नुक़सान भी हैं क्योंकि केवल पुरुष ही तलाक़ दे सकता है. इससे महिलाओं पर मानसिक और आर्थिक दबाव बढ़ता है, ख़ासकर तब जब पति ग़ायब हो जाए या नोटिस फ़र्ज़ी हो. वकील द्वारा नोटिस भेजने से वैधता पर विवाद और बढ़ जाता है."
क़ानूनी जानकार कहते हैं कि जब ये मामले अदालत में जाते हैं तो लंबे समय तक चलते हैं. कुछ लोग इस प्रक्रिया में किसी भी हस्तक्षेप को धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) का उल्लंघन मानते हैं. अक्सर लिखित दस्तावेज़ या आर्बिट्रेशन अनिवार्य न होने के कारण यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि तलाक़ वास्तव में तीन अलग-अलग तुहर में दिया गया था.
'परिवार-हितैषी तरीक़ा'
इस्लामी जानकार और जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष सलीम इंजीनियर ने कहा, "तलाक़-ए-हसन शुरू करने से पहले दोनों पक्षों के घरवालों के बीच बातचीत होनी चाहिए ताकि समझौते की संभावना तलाश की जा सके. अगर यह संभव न हो तो तलाक़ दिया जाता है, जिसकी मियाद तीन महीने दस दिन होती है. इस दौरान दोनों को एक ही घर में रहना होता है और समझौते की गुंजाइश बनी रहती है."
क़ानूनी जानकार फ़ुज़ैल अहमद अय्यूबी बताते हैं, "तलाक़-ए-हसन की प्रक्रिया इस प्रकार होती है. पहले तुहर में पति एक बार 'तलाक़' कहता है और एक महीने प्रतीक्षा की जाती है. अगर सुलह हो जाए तो तलाक़ ख़ुद ही रद्द हो जाता है. अगर सुलह नहीं होती तो दूसरे तुहर में पति दूसरी बार 'तलाक़' कहता है और फिर एक महीने का समय दिया जाता है. अगर तब भी समझौता नहीं होता तो तीसरे तुहर में पति तीसरी बार 'तलाक़' कहता है, जिससे तलाक़ पक्का हो जाता है."
जानकारों का कहना है कि तलाक़-ए-हसन की विशेषता यह है कि इसमें जल्दबाज़ी या भावनात्मक आवेग की जगह विचार, सुधार और बातचीत का अवसर मिलता है.
कई इस्लामी विद्वान इसे अधिक न्यायसंगत और परिवार-हितैषी तरीक़ा बताते हैं क्योंकि यह तलाक़-ए-बिद्दत की तरह अचानक और अपूरणीय नहीं होता.
उनका कहना है तलाक़-ए-हसन एक वैध, संवैधानिक और धार्मिक रूप से स्वीकार्य प्रक्रिया है. भारत सहित कई देशों में मुस्लिम महिलाओं ने इस तरीक़े को अपेक्षाकृत सुरक्षित माना है क्योंकि इसमें समय मिलता है और पति को सोचने का मौक़ा मिलता है कि क्या शादी को बचाया जा सकता है.
हालांकि सामाजिक संगठनों का कहना है कि तलाक़ का कोई भी तरीक़ा तभी न्यायपूर्ण है जब दोनों पक्षों को समान अधिकार और सुरक्षा मिले, क्योंकि इस तलाक़ में पुरुष की मर्ज़ी ही चलती है.
महिलाओं के लिए तलाक़ के विकल्प
लखनऊ स्थित सामाजिक कार्यकर्ता ताहिरा हसन ने कहा, "तुरंत तीन तलाक़ से बेहतर तलाक़-ए-हसन का तरीक़ा है क्योंकि इसमें अंत तक सुलह की गुंजाइश रहती है."
उनका कहना है, "अगर महिला को लगता है कि उसके अधिकारों का हनन हो रहा है तो अदालत का रुख़ कर सकती है. फ़ैमिली कोर्ट में इस तरह के केस बहुत आ रहे हैं जिसमें पुरुष गुज़ारा-भत्ता नहीं दे रहे हैं."
उन्होंने कहा, "वक़्फ़ बोर्ड और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को ऐसी प्रताड़ित महिलाओं को लेकर कोई कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए, जिससे आगे चलकर उनकी ज़िंदगी आसान रहे. पर्सनल लॉ बोर्ड को मेहर की रक़म ज़्यादा कर देनी चाहिए जिससे तलाक़ देने में लोग ग़ुरेज़ करें."
मेहर की रक़म वह रकम कहलाती है जो निकाह से पहले आदमी को अपनी होने वाली पत्नी को देनी होती है. हालांकि भारत में निकाह से पहले मेहर देने का चलन कम है.
इस्लाम में महिलाओं के पास पति से अलग होने के लिए 'खुला' का विकल्प होता है.
इसमें पत्नी मेहर यानी निकाह के वक़्त तय रक़म को लौटाकर तलाक़ ले सकती है लेकिन पति की सहमति ज़रूरी है.
अगर पति की सहमति नहीं है तो काज़ी के दख़ल से तलाक़ लिया जा सकता है.
खुला के बाद महिला को इद्दत की अवधि का पालन करना होता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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