जम्मू-कश्मीर: नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार इस वोट पैटर्न के दम पर आई

उमर अब्दुल्लाह ने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री पद की ली शपथ

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    • Author, क़ाज़ी ज़ैद
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ़्रेंस की सरकार बन गई है. उमर अब्दुल्लाह मुख्यमंत्री बने हैं. कांग्रेस इस सरकार को बाहर से समर्थन दे रही है.

जम्मू-कश्मीर में 18 सितंबर से एक अक्तूबर के बीच 90 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए. नतीजों की घोषणा 8 अक्टूबर को हुई. यहां 10 साल पहले चुनाव हुए थे और तब से अब तक झेलम में काफी पानी बह चुका है.

अनुच्छेद 370 ख़त्म हो चुका है, जम्मू-कश्मीर अब केंद्रशासित प्रदेश है. अब यहां नई विधानसभा और नए मुख्यमंत्री के पास वैसी शक्तियां नहीं हैं जो एक राज्य की विधानसभा और मुख्यमंत्री के पास होती हैं.

आइए जानते हैं कि इस चुनाव में लोगों के वोट डालने का पैटर्न क्या रहा.

जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव परिणाम में धार्मिक बंटवारा साफ नज़र आता है.

मुस्लिम बहुल ज़िलों ने नेशनल कॉन्फ़्रेंस और कांग्रेस को अपनी पसंदीदा पार्टी के तौर पर चुना जबकि जम्मू में बीजेपी का वर्चस्व रहा.

केंद्र शासित प्रदेश में कुल 27 सीटों पर बीजेपी को जीत हासिल हुई उनमें से 21 जम्मू के हिंदू बहुल इलाकों से हैं.

वहीं छह सीटें जम्मू क्षेत्र में मुस्लिम बहुल हैं. इनमें से बीजेपी को कश्मीर में एक भी सीट पर जीत नहीं मिली.

हिंदू बहुल इलाकों में बीजेपी बड़े अंतर से चुनाव जीतने में सफल रही.

जम्मू के किश्तवाड़ जैसे मुस्लिम बहुल इलाके में बीजेपी की शगुन परिहार नेशनल कॉन्फ़्रेंस के उम्मीदवार से महज 521 वीटों से जीत पाईं.

जम्मू में जहां बीजेपी अपनी पकड़ बरकरार रखने में सफल रही, वहीं चेनाब घाटी, पीर पंजाल जैसे इलाकों में वोटों का बंटवारा एनसी-कांग्रेस, पीडीपी और निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच रहा.

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जम्मू-कश्मीर में हिंदू और मुस्लिम बहुल सीटों का बंटवारा
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शहरी और ग्रामीण इलाकों में क्या हुआ?

किस पार्टी का वोट प्रतिशत कितना
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शहरी विधानसभाओं में श्रीनगर के चानपोरा पर सब की नजरें थीं. यहां से 'अपनी पार्टी' प्रमुख अल्ताफ़ बुखारी चुनाव लड़ रहे थे.

2019 के बाद जम्मू-कश्मीर में नई पार्टियों का भी गठन हुआ.

ये पार्टियां उनके ख़िलाफ़ आईं थीं जिन्हें बीजेपी 'वंशवादी नेता' करार देते हैं. इन्हीं पार्टियों में से अल्ताफ़ बुखारी की 'अपनी पार्टी' और सज्जाद लोन की 'पीपल्स कॉन्फ़्रेंस' शामिल है.

चानपोरा शहरी इलाका है. शहरी इलाकों में, जहां अमूमन ग्रामीण इलाकों में वोटिंग प्रतिशत कम ही रहता है, वहां पारिवारिक संबंध काफी मायने रखता है.

किसके किस परिवार से कैसे संबंध हैं, लोग इस आधार पर भी वोट करने की बात कहते दिखते हैं.

हुर्रियत ने चुनाव बहिष्कार करने की बात कही थी लेकिन ये अपील सफल नहीं हुई.

यहां नेता घर-घर जाकर वोट मांगते दिखे. बुखारी ने भी लोगों से वोट करने की अपील की. हालांकि बुखारी यहां से चुनाव हार गए.

यहां से नेशनल कॉन्फ़्रेंस के मुश्ताक़ गुरु को 5000 से ज़्यादा वोटों से जीत मिली. बुखारी हार की वजहों में से एक में ये भी बताया जा रहा था कि उन पर नई दिल्ली और बीजेपी का टैग लगा था, जिसकी वजह से भी वो चुनाव हार गए, क्योंकि यहां बीजेपी के ख़िलाफ़ भावना काफी प्रबल थी.

वहीं, नेशनल कॉन्फ़्रेंस के मुश्ताक गुरु लगातार बीजेपी पर निशाना साधते रहे.

सज़्जाद लोन की पीपल्स कॉन्फ़्रेंस पार्टी को सिर्फ़ एक सीट पर जीत मिली.

कश्मीर के ग्रामीण इलाकों की बात करें तो यहां राजनीति सड़क, सिंचाई, सामाजिक कल्याण और स्वास्थ्य के मुद्दे पर ज्यादा केंद्रित दिखती है. पार्टी के प्रति वफादारी और उम्मीदवार का अपने इलाके से कितना जुड़ाव है, इस पर भी लोग वोट करते हैं.

लाइन ऑफ़ कंट्रोल के पास के इलाके लोलाब में नेशनल कॉन्फ़्रेंस के क़ैसर लोन को जीत मिली. उन्हें क़रीब 20 हज़ार वोट मिले थे. उनकी जीत को विचारधारा और पार्टी की जीत से कहीं ज़्यादा उनकी अपनी जीत की तरह देखा जा रहा है.

वहीं, नेशनल कॉन्फ़्रेंस के प्रति लहर के बाद भी कुपवाड़ा में नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेता नासिर असलम वानी की हार हुई. उनके हार की वजह में लोगों का उनको आउटसाइडर के तौर पर देखा जाना भी है. यहां पीडीपी के उम्मीदवार फ़याज़ मीर की जीत हुई.

हालांकि कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में विचारधारा और नैरेटिव (कथानक) की एक सीमित ही भूमिका होती है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपनी रैलियों में बीजेपी के ख़िलाफ़ भावनाओं का इस्तेमाल किया लेकिन उम्मीदवार के प्रति लोगों का एक लगाव भी अहम भूमिका निभाता है. इसकी वजह से उम्मीदवार जीतते हैं.

पीपल्स कॉन्फ्रेंस के सज्जाद लोन बीजेपी के टैग के बाद भी अपनी सीट जीतने में सफल रहे क्योंकि लोगों के बीच उनकी छवि मिलनसार व्यक्ति की है.

कश्मीर में निर्दलीय उम्मीदवारों का उदय

जम्मू-कश्मीर विधानसा चुनाव का परिणाम आठ अक्टूबर को आया

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इस चुनाव में कुल 345 निर्दलीय उम्मीदवारों ने पर्चा भरा, जिनमें से 325 पुरुष और 21 महिलाएं हैं.

इनमें से सिर्फ़ सात उम्मीदवार ही सीट जीतने में सफल रहे.

निर्दलीय उम्मीदवारों का वोट शेयर 16.45 प्रतिशत रहा. जम्मू-कश्मीर में सबसे ज़्यादा 25.64 प्रतिशत बीजेपी का रहा, इसके बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस को 23.43 प्रतिशत वोट मिला.

कांग्रेस का वोट शेयर 11.9 प्रतिशत था और पार्टी को छह सीटें मिली. नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन का वोट शेयर 35.99 प्रतिशत रहा.

निर्दलीय उम्मीदवार चाहे वो प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी (जेईआई) से संबंध वाले हों या इंजीनियर राशिद की अवामी इत्तेहाद पार्टी (एआईपी) के हों, इन सब पर निगाहें थीं.

प्रतिबंध की वजह से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे जेईआई से जुड़े उम्मीदवारों ने इस्लाम के नाम पर वोट मांगे जबकि एआईपी के उम्मीदवार 'राय शुमारी (रेफ़रेंडम) की बातें करते रहे.

कुलगाम से सीपीएम के नेता एमवाई तारीगामी की जीत हुई.

इल्तिजा मुफ्त़ी की हार

पीडीपी नेता इल्तिजा मुफ़्ती बिजबेहरा सीट से हार गईं.

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इमेज कैप्शन, पीडीपी नेता इल्तिजा मुफ़्ती

अनंतनाग जिले के सिरीगुफवारा-बिजबेहरा को पीडीपी का गढ़ माना जाता है.

यहां से महबूबा मुफ़्ती समेत पीडीपी के संस्थापक मुफ़्ती मोहम्मद सईद भी निर्वाचित हो चुके हैं.

इस विधानसभा से पहले प्रतिनिधि रहे रहमान विरी अपनी दावेदारी पेश कर रहे थे, लेकिन उनकी जगह महबूबा मुफ़्ती की बेटी इल्तिजा मुफ़्ती को टिकट मिला.

यहां वीरी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में वोट करते हैं, यही वजह थी कि लंबे समय से पीडीपी इस सीट को जीत रही थी. इस बार नेशनल कॉन्फ्रेंस ने बशीर वीरी को उम्मीदवार बनाया था.

बशीर को 9770 मतों से जीत मिली.

इसी तरह की स्थिति जम्मू के पीरपंजाल सुरनकोट और थानामंडी में भी देखने को मिली जहां जनजातीय समुदाय से आने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत मिली.

जम्मू-कश्मीर में किस पार्टी ने कितनी सीटों पर महिलाओं को दिया टिकट
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महिला फ़ैक्टर


जम्मू-कश्मीर

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इमेज कैप्शन, एनसी-कांग्रेस गठबंधन ने चार महिला उम्मीदवार खड़े किए जबकि बीजेपी ने सिर्फ़ एक उम्मीदवार उतारा.

भले ही आबादी के हिसाब से देश के वोटरों में आधी महिलाएं हों लेकिन यहां 870 मंजूर पर्चों में से सिर्फ़ 43 ही महिला उम्मीदवारों की दावेदारी थीं. इनमें से 21 निर्दलीय थीं.

एनसी-कांग्रेस गठबंधन ने चार महिला उम्मीदवार खड़े किए जबकि बीजेपी ने सिर्फ़ एक उम्मीदवार उतारा.

यहां रैलियों से लेकर उम्मीदवार तक में कुछ अपवाद को छोड़ दें तो महिलाएं नदारद दिखीं. इल्तिजा मुफ्ती की रैली इससे इतर थी.

वहीं लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान जब इंजीनियर राशिद जेल में थे तब उनकी पत्नी वोट मांगती दिखीं थीं. उनके साथ बड़ी संख्या में महिलाएं भी दिखती थीं. यहां पर नारों से लेकर मुद्दों तक में महिलाओं को अहमियत मिलती नहीं दिखी.

इस चुनाव में धार्मिक आधार पर बंटवारा साफ नज़र रहा था, लेकिन समुदाय के आधार पर विभाजन नहीं दिखा. पारंपरिक शिया इलाके के लोगों ने जिस पैटर्न पर वोट किया, उसी तरह का पैटर्न सुन्नी इलाकों में रहा.

शिया बहुल इलाकों में मुक़ाबला शिया उम्मीदवारों के बीच ही था. वहीं, ज़ादीबल में सुन्नी लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा था लेकिन शिया उम्मीदवार तनवीर सादिक़ की जीत हुई.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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