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हिज़्बुल्लाह और इसराइल के युद्धविराम समझौते में किसकी जीत हुई?
लेबनान में ईरान समर्थित हथियारबंद समूह हिज़्बुल्लाह और इसराइल के बीच 27 नवंबर को हुए युद्धविराम समझौते की मध्य-पूर्व के मीडिया में काफ़ी चर्चा है.
इसराइल और हिज़्बुल्लाह के बीच पिछले एक साल से ज़्यादा वक़्त से जंग चल रही थी.
अक्तूबर 2023 में ग़ज़ा में जब इसराइल ने हमला शुरू किया था, तब हिज़्बुल्लाह ने इसराइल पर लेबनान के भीतर से रॉकेट दागना शुरू कर दिया था. हिज़्बुल्लाह खुलकर हमास का समर्थन कर रहा था.
इसराइल के अंग्रेज़ी अख़बार हारेत्ज़ में स्तंभकार रावित हेच्ट ने लिखा है, ''हमास और हिज़्बुल्लाह के संपर्क को तोड़ना इसराइल की एक जीत है. इसके लिए इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू अपनी पीठ थपथपा सकते हैं.''
26 नवंबर को इस समझौते की घोषणा करते हुए नेतन्याहू ने कहा था, ''लेबनान में हुए इस समझौते के बाद हमास अलग-थलग पड़ गया है. हिज़्बुल्लाह को अब पूरे मामले से दफ़ा कर दिया गया है और इस जंग में हमास अकेला रह गया है.''
इसराइली मीडिया में क्या कहा जा रहा है?
इसराइली मीडिया में कहा जा रहा है कि हिज़्बुल्लाह अब कमज़ोर हो चुका है और इसे फिर से ताक़त हासिल करने में वक़्त लगेगा. और हिज़्बुल्लाह तभी ताक़त हासिल कर सकता है, जब इसराइल उसको मौक़ा देगा.
इसराइल की वाला न्यूज़ वेबसाइट के राजनयिक संवाददाता बराक रैविड ने लिखा है, ''यह हिज़्बुल्लाह की एक रणनीतिक हार नहीं है लेकिन निश्चित तौर पर उत्तरी सीमा पर युद्ध में यह इसराइल की जीत है. हिज़्बुल्लाह नष्ट नहीं हुआ है लेकिन नाटकीय रूप से कमज़ोर हुआ है.''
हालांकि लेबनान की सीमा पर रहने वाले इसराइल के लोगों का कहना है कि हिज़्बुल्लाह धीरे-धीरे ख़ुद को फिर से खड़ा कर लेगा. लेबनान से लगी सीमा पर स्थित इसराइली शहर किरयात शमोना के मेयर ने दक्षिणपंथी अख़बार यिस्राएल हायोम में एक कॉलम लिखा है.
इस कॉलम में उन्होंने लिखा है, ''मुझे शक है कि यह यु्द्धविराम लागू होगा. दक्षिणी लेबनान में इसराइल की सेना को एक बफ़र ज़ोन बनाना चाहिए.''
लेबनान की सीमा से लगे इलाक़ों में रहने वाले इसराइल के लोगों का कहना है कि हिज़्बुल्लाह दक्षिणी लेबनान के गाँवों में फिर से जड़ें जमा लेगा.
हिज़्बुल्लाह से समझौते होने के बाद ग़ज़ा में जारी जंग और इसराइली बंधकों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं.
जो लेबनान में हिज़्बुल्लाह के साथ हुआ, वैसा ग़ज़ा में क्यों नहीं?
येडियोट ह्रोनोट में सिमा कद्मोन ने अपने कॉलम में लिखा है, ''नेतन्याहू इसराइल के लोगों को यह बताने में नाकाम रहे हैं कि जो वह लेबनान में कर रहे हैं, उसे ग़ज़ा में क्यों नहीं कर पा रहे हैं?''
''इसका जवाब है कि वह ऐसा करना नहीं चाहते हैं. नेतन्याहू ग़ज़ा के बदले लेबनान को प्राथमिकता दे रहे हैं. हमास के बदले हिज़्बुल्लाह को प्राथमिकता दे रहे हैं और बंधकों की रिहाई के बदले अपनी सत्ता को प्राथमिकता दे रहे हैं."
हारेत्ज़ ने अपने संपादकीय में लिखा है कि नेतन्याहू को हमास के अलग-थलग पड़ने का फ़ायदा उठाना चाहिए और इसी तरह का समझौता ग़ज़ा में करना चाहिए ताकि बंधकों को छुड़ाया जा सके.
दूसरी तरफ़ हिज़्बुल्लाह समर्थित मीडिया में इस समझौते को जीत के रूप में पेश किया है.
अल-मनार की वेबसाइट पर एक रिपोर्ट में कहा गया है, ''यह लेबनान की जीत है. इसराइली बलों को भारी नुक़सान हुआ है. दक्षिणी लेबनान में खिआम शहर जो रणनीतिक रूप से काफ़ी अहम है, उस पर इसराइली क़ब्ज़े को नाकाम कर दिया गया.''
''इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने अपने भाषण में युद्धविराम की घोषणा की. इससे पता चलता है कि इसराइली सेना किस हद तक बेबस हो गई थी. इसराइली सेना को लगने लगा था कि वह जंग के मैदान में जीत हासिल नहीं कर सकती है.''
ईरान की कमज़ोरी?
हिज़्बुल्लाह समर्थित अल-अख़बार दैनिक ने भी कुछ इसी तरह की लाइन लिखी है.
इस दैनिक के पहले पन्ने की हेडलाइन है- अडिग जीत.
इसमें कहा गया है, ''हमारे दुश्मन ने वो सब कुछ किया जो कर सकता है. इस संघर्ष का अंत 2006 के युद्ध की तरह ही हुआ, जब संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव 1701 के साथ हुआ था और इसमें भी वही सारे प्रावधान थे.''
हिज़्बुल्लाह की वेबसाइट अल-अहद ने लिखा है, ''युद्धविराम तब लागू हुआ, जब दुश्मन को मुश्किलें होने लगीं. इसराइल को यहाँ प्रतिरोध का अनुभव हो गया होगा. हिज़्बुल्लाह ने सबक सिखा दिया है. इसराइल जो लक्ष्य हासिल करना चाहता था, वो कर नहीं पाया लेकिन हमारी जीत हुई है. इसराइल की कमज़ोरी और क्रूरता दोनों सामने आ गई है.''
ईरान के अंग्रेज़ी अख़बार तेहरान टाइम्स ने हिज़्बुल्लाह के प्रमुख रहे सैयद हसन नसरल्लाह के बेटे सैयद मोहम्मद मेहदी का एक वीडियो शेयर किया है. मेहदी युद्धविराम को हिज़्बुल्लाह की जीत बता रहे हैं.
मेहदी ने युद्धविराम को लेकर कहा, ''यह हमारे साहस और समर्पण की जीत है. उन्होंने हमारे घरों को नष्ट किया और लोगों को मारा लेकिन अंततः जीत हमारी हुई.''
वहीं कई लोग इस युद्धविराम समझौते को ईरान के कमज़ोर पड़ने से जोड़ रहे हैं. भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित मानते हैं कि यह डील बताती है कि ईरान अब टकराने के मूड में नहीं है बल्कि डिफेंसिव हो गया है.
अब्दुल बासित ने यूट्यूब पर पोस्ट किए एक वीडियो में कहा, ''ट्रंप के आने के बाद ईरान अब डिफेंसिव हो गया है. ईरान ने ही हिज़्बुल्लाह से कहा होगा कि युद्धविराम की ओर बढ़े. पहले हिज़्बुल्लाह का रुख़ था कि इसराइल ग़ज़ा में हमले बंद करे तब वह युद्धविराम पर बात करेगा.''
''लेकिन अब चीज़ें तेज़ी से बदल रही हैं. ईरान भी ट्रंप के आने से पहले चाहता है कि हिज़्बुल्लाह को अभी किनारे रखा जाए. वह अभी ट्रंप से टकराना नहीं चाहता है. ऐसे में वह युद्धविराम पर आगे बढ़ा ताकि यूरोप के साथ संबंध ठीक किया जाए. ईरान में अमेरिका सरकार बदलना और परमाणु कार्यक्रम को रोकना चाहता है. लेकिन ईरान अभी चाहता है कि वह ट्रंप को उकसाए नहीं और ऐसा करने से रोके.''
अब्दुल बासित कहते हैं, ''रूस अभी यूक्रेन से युद्ध में लगा हुआ है. पश्चिम के प्रतिबंधों के कारण रूस भी आर्थिक रूप से कमज़ोर हुआ है. चीन का ईरान में अरबों डॉलर का निवेश है. ईरान को न तो अभी रूस से मदद मिलेगी और न ही चीन चाहता है कि ईरान किसी जंग में फँसे. चीन ऐसे भी किसी को सैन्य मदद नहीं देता है. ऐसे में ईरान के पास ट्रंप के मामले में सतर्क रहने का अलावा कोई विकल्प नहीं है.''
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