लोकसभा चुनाव 2024: महिला आरक्षण बिल फाड़ने वाले सुरेंद्र यादव क्या हासिल कर पाएँगे जहानाबाद के मतदाताओं का प्यार?

बिहार

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    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, जहानाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए

वर्ष 1998 की बात है. संसद में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी में महिला आरक्षण विधेयक पेश किया जा रहा था.

इस बिल का विरोध कर रहे राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और समाजवादी पार्टी के सांसद हंगामा कर रहे थे. इतने में बिहार के जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र के सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवाणी से बिल की कॉपी छीनकर फाड़ दी.

सुरेंद्र प्रसाद यादव इस कारण लंबे समय तक सुर्ख़ियों में रहे.

महिला आरक्षण बिल फाड़ने के बाद सुरेंद्र प्रसाद यादव चार बार जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र से राजद के टिकट पर चुनाव लड़ चुके है.

लेकिन हर बार उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा. साल 2019 के चुनाव में तो उन्हें निवर्तमान सांसद चंद्रेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी ने महज 1751 वोट से हराया था.

आरजेडी बनाम जेडीयू

चंद्रेश्वर चंद्रवंशी

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सुरेंद्र प्रसाद यादव इस बार भी जहानाबाद लोकसभा सीट से अपनी क़िस्मत आजमा रहे है. उनका मुख्य मुकाबला चंद्रेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी से है. लेकिन इस सीट की लड़ाई को एनडीए और इंडिया गठबंधन के बाग़ी उम्मीदवार दिलचस्प बना रहे हैं.

'हम महिला बिल के विरोधी नहीं हैं'

बिहार की राजधानी पटना से महज 50 किलोमीटर दूर जहानाबाद में सातवें चरण यानी एक जून को मतदान होना है. जहानाबाद लोकसभा सीट में जहानाबाद, मखदुमपुर, घोसी, कुर्था, अरवल और अतरी विधानसभा सीटें आती हैं.

भीषण गर्मी में जहानाबाद का राजगृह होटल पसीने से भींगे हुए समर्थकों से भरा पड़ा है. सुरेंद्र यादव इसी होटल की पहली मंज़िल पर आजकल रुके हुए हैं और यहीं से वो अपने चुनाव प्रचार के लिए रोज़ाना सुबह 9 बजे के आसपास निकलते हैं.

महिला आरक्षण बिल फाड़ने पर अपने स्पष्टीकरण में सुरेंद्र प्रसाद यादव महिलाओं की इज़्ज़त का दम भरते हैं.

वो बीबीसी से कहते हैं, "बिल फाड़ने के बाद मुझे वाजपेयी और आडवाणी जी ने बुलाकर पूछा था कि आपने बिल क्यों फाड़ा? इस पर हम उनकी चुपचाप सुनते रहे और बाद में बोले कि महिलाओं को देना है तो 50 फ़ीसदी आरक्षण दीजिए. उसमें भी जाति का आरक्षण जिस अनुपात में मिल रहा है, वैसा प्रावधान महिला आरक्षण में कीजिए. हम महिला बिल के विरोधी नहीं हैं."

'बाग़ी ही तय करेंगें जीत'

जहानाबाद

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सुरेंद्र यादव के समर्थकों की भीड़ में तीन महिलाएँ भी हैं, जो अपने दुपट्टे और साड़ियों में लालटेन (आरजेडी का चुनाव चिन्ह) लगाए हैं. इस बारे में पूछने पर वो बीबीसी से कहती हैं, "हमको ये सारी जानकारी नहीं है. हम बस जानते हैं कि इस बार हमारे नेता जीतेंगे."

सुरेंद्र यादव की पहचान एक दबंग नेता की है. आरजेडी में उनके प्रभाव को इसी बात से समझा जा सकता है कि 1998 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद सिर्फ़ 2004 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दें, तो बाक़ी सभी लोकसभा चुनावों में उन्हीं को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया है. हालाँकि वे हारते रहे.

फ़िलहाल सुरेंद्र यादव गया की बेलागंज विधानसभा सीट से विधायक हैं. वो यहाँ से आठ बार विधायक चुने गए हैं.

16 लाख मतदाताओं वाली जहानाबाद सीट पर भूमिहार और यादव वोट निर्णायक होते हैं. इस सीट पर कुल 15 उम्मीदवार खड़े हैं.

यहाँ मुख्य मुक़ाबला तो जेडीयू के चंद्रेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी और राजद के सुरेंद्र प्रसाद यादव के बीच ही माना जा रहा है. लेकिन बाग़ी उम्मीदवारों ने मुक़ाबले को रोचक बना दिया है.

दरअसल, जहानाबाद सीट से खड़े उम्मीदवारों की सूची देखें, तो बसपा के टिकट पर पूर्व सांसद अरुण कुमार, राजद के पूर्व विधायक मुनीलाल यादव बतौर निर्दलीय उम्मीदवार और राष्ट्रीय जन जन पार्टी के आशुतोष कुमार चुनावी अखाड़े में है. आशुतोष कुमार ख़ुद को भूमिहार जाति के नेता के तौर पर प्रचारित करते हैं.

निवर्तमान सांसद और जेडीयू उम्मीदवार चंद्रेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी बीबीसी से कहते हैं, "हम अपनी जीत के प्रति 100 प्रतिशत आश्वस्त हैं. हम जीतने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं और किसी को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं मानते. प्रधानमंत्री मोदी का देश विदेश में डंका बज रहा है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काम की बदौलत एनडीए का वोटर सब जात का है."

बीएसपी से उलझा मामला

जहानाबाद

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लेकिन जहानाबाद के चुनावी संग्राम को नज़दीक से देखने वालों की मानें, तो अरुण कुमार का खड़ा होना चंद्रेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी की जीत मुश्किल कर सकता है. अरुण कुमार भूमिहार जाति के प्रभावशाली नेता हैं.

अरुण कुमार इस सीट से 1999 में सुरेंद्र प्रसाद यादव को 17,287 वोटों से हराकर जेडीयू के टिकट पर सांसद बने थे.

बाद में उन्होंने रालोसपा के टिकट पर 2014 के लोकसभा चुनाव में भी सुरेंद्र प्रसाद यादव को ही हराकर इस सीट पर अपनी जीत दर्ज की थी.

बसपा के टिकट पर खड़ा होने से पहले वो लोजपा (आर) में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे, जहाँ से उन्होंने इस्तीफ़ा देकर हाथी का दामन थामा.

स्थानीय पत्रकार मुशर्रफ़ बीबीसी से कहते हैं, "भूमिहार और यादव जाति इस सीट पर निर्णायक हैं. अरुण कुमार को भूमिहार वोट मिलेंगें तो इसका नुक़सान चंद्रेश्वर चंद्रवंशी को होगा. आशुतोष कुमार भी भूमिहार वोट काटेंगे. मुनीलाल यादव, सुरेंद्र यादव को मिलने वाले यादव वोट का नुक़सान करेंगे. लेकिन ये लोग इतने प्रभावी नहीं है. अरुण कुमार की मौजूदगी जहानाबाद की लड़ाई को त्रिकोणीय बना रही है."

अरवल के लोदीपुर गाँव के मंदिर के पास बसपा उम्मीदवार अरुण कुमार अपने सैकड़ों समर्थकों से घिरे हैं.

बदहाल सड़कों से गुज़रते हुए हम अरुण कुमार के पास पहुँचे. अरुण कुमार के साथ गाड़ियों का लंबा चौड़ा काफ़िला है.

2019 में मिली थी हार

तेजस्वी यादव

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इमेज कैप्शन, तेजस्वी यादव और राहुल गांधी

साल 2019 के चुनावों में जहाँ आरजेडी की ओर से चंद्रेश्वर चंद्रवंशी के ख़िलाफ़ सुरेंद्र प्रसाद यादव मैदान में थे, वहीं तेज प्रताप यादव ने भी अपना उम्मीदवार खड़ा किया था.

तेज प्रताप ने चंद्र प्रकाश नाम के उम्मीदवार को मैदान में उतारा था, जिन्होंने ये चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा था.

इस चुनाव में चंद्र प्रकाश को 7,755 वोट मिले थे, जो सुरेंद्र प्रसाद यादव का ही वोट माना जा रहा था.

सुरेंद्र प्रसाद यादव इस पर कहते हैं, "तेज प्रताप नेता है, हमारी उनके सामने कोई हैसियत नहीं. पिछली बार हम हारे नहीं थे, बल्कि हमें हरवाया गया था. लेकिन अबकी बार हमारे ऊपर तेज प्रताप, राजमाता राबड़ी देवी, लालू जी, तेजस्वी यादव, महागठबंधन सबका आशीर्वाद है. मैं इस बार जीतूँगा."

जहानाबाद सीट पर सबसे ज़्यादा बार सीपीआई ने जीत दर्ज की.

पार्टी ने साल 1996 तक जहानाबाद लोकसभा सीट पर अपनी जीत दर्ज की. लेकिन इसके बाद 1998 से यहाँ से आरजेडी और जेडीयू के उम्मीदवार जीतते रहे.

सिर्फ 2014 में यहाँ से अरुण कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी.

जातीय समीकरण

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जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र नक्सल प्रभावित इलाक़ा रहा है. 90 के दशक में यहाँ लक्ष्मणपुर बाथे, सेनारी, शंकर बिगहा नरसंहार हुए, जिसकी दहशत आपको अभी भी मतदाताओं की बातों में मिलती है.

जैसा कि जहानाबाद शहर से 12 किलोमीटर दूर नेवारी गाँव के गनौरी राम कहते है, "लालू राज में तो गाँव का गाँव साफ़ हो जाता था. नीतीश आए तो शांति आई और गाँव-गाँव रोड पहुँची."

नेवारी भूमिहार जाति बहुल गाँव है. इस गाँव से रामाश्रय प्रसाद सिंह बिहार सरकार में मंत्री भी रहे हैं.

यहाँ के नौजवान गौतम कुमार कहते हैं, "सांसद को हम नहीं जानते, लेकिन यहाँ मोदी जी के नाम पर वोट होगा. हमारे गाँव के लिए कुछ नहीं हुआ, लेकिन मोदी जी देश के लिए किए हैं."

लेकिन सांसद से नाराज़गी और मोदी से प्यार से इतर रोज़गार भी यहाँ एक प्रमुख मुद्दा है. जैसा कि नौजवान जितेंद्र कुमार कहते हैं, "हम रोज़गार के मुद्दे पर वोट करेंगें. सिर्फ़ तेजस्वी यादव ही रोजडगार की बात कर रहे हैं, बीजेपी वाले तो दागी उम्मीदवारों को वॉशिंग मशीन में धो रहे हैं."

जहानाबाद साल 2005 में जेल ब्रेक कांड के चलते देश भर में सुर्ख़ियों में आया था.

उस समय नक्सलियों ने जेल पर हमला किया था, जिसमें 341 क़ैदी भाग गए थे.

हाल ही में सुधीर मिश्र ने इस घटना पर आधारित वेब सिरीज़ 'जहानाबाद ऑफ़ लव एंड वॉर' बनाई थी. देखना दिलचस्प होगा कि जहानाबाद के चुनावी ‘वॉर’ में अबकी बार किस उम्मीदवार को मतदाताओं का प्यार मिलेगा.

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