कराची का एक अनोखा स्कूल जहां बच्चे के साथ माँ को भी दाख़िला लेना पड़ता है

- Author, नाज़िश फ़ैज़
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, कराची
हम में से लगभग हर आदमी के मन में स्कूल का नाम सुनकर एक ऐसी इमारत की तस्वीर सामने आती है जहां छोटे बड़े हर तरह के बच्चे बस्ता उठाकर आते हैं और पढ़ते-लिखते हैं.
लेकिन हम आपको आज एक ऐसे ख़ास स्कूल के बारे में बताते हैं जहां दाख़िले की पहली शर्त ही यह है कि बच्चे के साथ उसकी मां को भी एडमिशन लेना होगा.
तहमीना की कम उम्र में शादी हुई और फिर बच्चे के बाद तलाक़. इस सदमे से गुज़र कर अपनी ज़िंदगी को आगे बढ़ाने के लिए वो कराची के इस स्कूल में पहुँचीं.
"जब मैं अपने बेटे के एडमिशन के लिए इस स्कूल में गई तो मुझे कहा गया कि बेटे के साथ मुझे भी यहां दाख़िला लेना होगा. मुझे लगता था कि यहां मेरी सिलाई-कढ़ाई के काम को बेहतर बनाया जाएगा. मगर यहां पहुंच कर मुझे अंदाज़ा हुआ कि यह स्कूल आम स्कूलों से बिल्कुल अलग है. यहां मुझे पढ़ाया भी गया और सदमे से निकलने के लिए कई थेरेपी सेशन भी दिए गए."

कराची के इलाक़े ल्यारी में स्थित 'मदर चाइल्ड ट्रॉमा इन्फ़ॉर्म्ड स्कूल' में ऐसे बच्चे अपनी मांओं के साथ दाख़िला लेने के योग्य होते हैं जो किसी हादसे के कारण सदमे से दो-चार हुए हों और जिन्हें ज़िंदगी में आगे बढ़ने के मौक़े समझ नहीं आ रहे हों.
यह स्कूल सबीना खत्री चला रही हैं जो ख़ुद आठ साल की उम्र में मां से अलग होने का सदमा झेल चुकी हैं.
अपने बचपन के सदमे से शुरू होने वाली कहानी ने सबीना खत्री को ल्यारी में ऐसा स्कूल खोलने के लिए प्रेरित किया जो आज कई बच्चों के जीवन में आने वाले सदमों से निकालने में मददगार बन रहा है.
इस स्कूल के पीछे सबीना की सोच क्या थी? स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों और उनके माता-पिता की ज़िंदगी कैसे बदली? इसके लिए हम आपको लिए चलते हैं ल्यारी.
एक मां का दूसरी मां के लिए तोहफ़ा

सबीना खत्री स्कूल को एक तोहफ़ा समझती हैं जो एक मां का दूसरी मां के लिए है. उन्होंने बीबीसी से बातचीत में बताया कि जब वह आठ साल की थीं तो अपनी मां से अलग हो गई थीं.
"मुझे उस वक़्त समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है लेकिन वह सदमा कहीं ना कहीं मेरे अंदर रह गया."
साल 2006 में सबीना खत्री ने ल्यारी में एक स्कूल के साथ अपने मिशन की शुरुआत की.
सबीना बताती हैं कि उनके स्कूल में पिछड़े वर्ग के लोग आते हैं. इस स्कूल में मानव मूल्य, मानसिक स्वास्थ्य और भलाई जैसी बातों पर ज़ोर दिया जाता है.
कराची के इलाक़े ल्यारी में गैंगवार और क्राइम की कहानियां आमतौर पर चर्चा में रहती हैं. इस वजह से जब सबीना खत्री से मिलने हम ल्यारी पहुंचे तो हमारे अंदर हिचकिचाहट थी.
लेकिन पुरानी इमारत में रहने वाले लोग, बेतहाशा भीड़ और कारोबार में लगे लोगों को देखकर इलाक़े की अलग तस्वीर सामने आई.
सबीना खत्री ने बताया, "अमीर घरों के बच्चों ने लड़ाई, मार-काट असल में नहीं देखी. वह वीडियो गेम्स में ऐसी चीज़ें देखते हैं मगर ल्यारी के बच्चों ने वह सब अपनी आंखों से असल में देखा है."
सबीना के अनुसार उनको एहसास हुआ कि ल्यारी में जो कुछ भी हो रहा है उसका असर बच्चों पर ज़रूर पड़ रहा होगा.
ऐसे में एक दिन उन्होंने ठान ली कि जैसे वह अपने बचपन के सदमे से निकली हैं वैसे ही वह ल्यारी के हर बच्चे को सदमे से निकालेंगी.
सबीना का मानना है कि कई बच्चे ऐसे भी होते हैं जो किसी सदमे से निकलकर पढ़ाई कर भी लें तो एक उम्र को पहुंचकर उनको लगता है कि उनके मां-बाप के सोचने समझने का ढंग उनसे अलग है.
इसी वजह से सबीना ने इस स्कूल में बच्चों के साथ-साथ मांओं के मानसिक स्वास्थ्य पर काम करने के बारे में सोचा और आज इस स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा अपनी मां के साथ स्कूल में दाख़िला हासिल करता है.
बेटे के साथ मां के एडमिशन की शर्त

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सबीना का मिशन किस हद तक कामयाब रहा इसकी सबसे बड़ी मिसाल ल्यारी की तहमीना हैं.
तहमीना की 16 साल की उम्र में शादी हो गई थी और एक साल बाद ही वह एक बच्चे की मां भी बन गई. मगर कम उम्र की शादी केवल तीन साल ही चल सकी.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "तलाक़ के बाद मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं अपने बच्चे के साथ क्या करूं."
तहमीना ने सोचा कि वह कुछ काम करके अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू करेंगी.
तलाक़ के बाद उसका सीधा असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है. तहमीना के बेटे ने भी अपनी मां के साथ होते हुए ज़ुल्म देखे थे.
तहमीना को इस स्कूल के बारे में पता चला लेकिन उन्हें कहा गया कि बेटे के साथ ख़ुद उन्हें भी स्कूल में दाख़िला लेना होगा.
तहमीना सिलाई-कढ़ाई का काम जानती थीं तो उनको लगा कि इस स्कूल में वह इस काम के बारे में जानकर इसे बेहतर बनाएंगी.
जब वह पहुंचीं तो उन्हें अंदाज़ा हुआ कि यह स्कूल आम स्कूलों से बिल्कुल अलग है.
"मुझे कई थेरेपी सेशंस दिए गए. मुझे और मेरे बेटे को उन सदमों से निकलने में लगभग चार साल लग गए."
तहमीना ने इस स्कूल से मैट्रिक, इंटरमीडिएट और उसके बाद ग्रेजुएशन किया और अब वह स्कूल में ही काम कर रही हैं जबकि उनका बेटा इस स्कूल में ही पढ़ाई कर रहा है.
तहमीना ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत समझती हैं कि उनके इलाक़े में ऐसा स्कूल है जिसने उनकी ज़िंदगी को बदल दिया और उनको जीने की एक वजह दी.
स्कूल के शिक्षकों ने हुनर को पहचाना
मोहम्मद अब्दुल्लाह भी उन युवाओं में से एक हैं जिन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा इसी स्कूल से हासिल की और अब वह एक यूनिवर्सिटी से बीबीए की डिग्री हासिल कर रहे हैं.
अब्दुल्लाह अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अभिनय भी करते हैं.
उन्होंने बताया कि जब स्कूल में पढ़ाई शुरू की तो एक पारिवारिक समस्या की वजह से वह सदमे में थे.
अब्दुल्ला ने कहा, "मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि ज़िंदगी में क्या करना है. मेरा पढ़ने का मन नहीं चाहता था. मेरे अंदर क्या क्षमता है, मुझे यह भी मालूम नहीं था."
अब्दुल्लाह का कहना है कि इस स्कूल के टीचरों ने उनके हुनर को पहचाना और उन्हें दुख से निकालकर वहां ले आए जिसका उन्हें खुद भी नहीं पता था.
अब्दुल्ला ने स्कूल में ही एक्टिंग शुरू कर दी.
अब्दुल्ला बताते हैं कि इस स्कूल ने उनको ऐसा माहौल दिया जहां वह अपने शिक्षकों पर भरोसा कर सकते थे.
अब वह सदमे से लड़कर वह एक बेहतरीन ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं.
बच्चों की तरह मां के लिए भी पाठ्यक्रम

सबीना खत्री कहती हैं कि वो दाख़िले की शर्तों से कोई समझौता नहीं करतीं.
इस स्कूल में बच्चों को पहली क्लास से दाख़िला लेना पड़ता है. बच्चे को हफ़्ते में पांच दिन क्लास करने आना होता है, वहीं मां के लिए हफ़्ते में तीन दिन आना ज़रूरी है. बच्चों की तरह मां के लिए भी सिलेबस रखा गया है जिसमें काउंसलिंग सेशन भी शामिल है.
सबीना खत्री ने स्कूल की कामयाबी को देखते हुए इसे न केवल पूरे कराची बल्कि पाकिस्तान के दूसरे शहरों में भी शुरू करने का इरादा किया है. कराची में इसकी दूसरी ब्रांच खोली गई है.
इस स्कूल के क्लासरूम में पारंपरिक ब्लैकबोर्ड नहीं है. यहां कुर्सियों के साथ-साथ बच्चों के लिए ज़मीन पर बैठकर खेलने का भी अच्छा इंतज़ाम है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















