पुलिस ने 'ग़ाज़ियाबाद में 31 साल बाद परिवार से मिले राजू' की फिर बताई नई कहानी

- Author, सुशीला सिंह और राजेश डोबरियाल
- पदनाम, ग़ाज़ियाबाद और देहरादून से
पिछले कुछ दिनों से एक मामला सुर्खियों में है.
पहले ख़बर आई कि ग़ाज़ियाबाद में 31 साल पहले खोया हुआ एक लड़का भीम सिंह उर्फ़ राजू अपने परिवार को मिल गया है. लेकिन पुलिस का कहना है कि राजू पहले भी कई परिवारों को मिलता रहा है.
ग़ाज़ियाबाद पुलिस ने खुद को राजू कहने वाले शख़्स पर कई आरोप लगाए हैं.
पुलिस ने कहा है कि बेटा होने का दावा करने वाले राजू को गिरफ़्तार कर लिया है और उसके असली नाम और घर का भी पता लगा लिया गया है.
ग़ाज़ियाबाद में ट्रांस हिंडन के डीसीपी निमिष पाटिल ने बताया कि अब तक हुई जांच में ये बात सामने आई है कि ये शख़्स पांच जगह फ़र्ज़ी बेटा बनकर रह चुका है और पुलिस इन मामलों का सत्यापन कर चुकी है.
उन्होंने कहा कि पुलिस को शक है कि ऐसे और भी मामले हैं और पुलिस उनका सत्यापन करने की कोशिश कर रही है.

पुलिस ने अपने दावे में क्या-क्या कहा?
ग़ाज़ियाबाद में ट्रांस हिंडन के डीसीपी निमिष पाटिल ने कहा, "साहिबाबाद के परिवार को इसे सौंप दिया गया था लेकिन दो-तीन दिन के बाद ये बातें आने लगीं कि देहरादून में भी एक ऐसा ही मामला जुलाई में आया था. पुलिस ने इसे संज्ञान में लेते हुए जांच टीम गठित कर जांच शुरू की तो पता चला कि वहां भी ऐसी ही कहानी है और यही लड़का है."
उन्होंने कहा, "जब फिर इससे सख़्ती से पूछताछ हुई तो इसने अपना असली नाम इंद्रराज और पिता का नाम चुन्नी राम बताया. इसने कहा कि इसका घर राजस्थान के श्रीगंगानगर में है. इसी आधार पर हमारी पुलिस टीम उस गांव में चली गई तो इसके कुछ और तथ्य सामने आए, जिसमें इसके परिवारवालों ने बताया कि ये बचपन से ही आदतन चोर है."
डीसीपी निमिष ये दावा करते हैं कि अभियुक्त के घर वालों ने उसके चोरी करने की आदत से तंग आकर उसे जायदाद से भी बेदखल कर दिया था.
उन्होंने कहा, "जितनी हमारी जांच हुई है, उसके अनुसार अब तक ये पांच बार फ़र्ज़ी बेटा बनकर रह चुका है. एक घटना श्रीगंगानगर की है, एक देहरादून की है, एक घटना सीकर की है, एक घटना ग़ाजियाबाद की है और एक जैसलमेर की है. इतनी घटनाओं की पुष्टि हो चुकी है.
डीसीपी निमिष पाटिल कहते हैं, "अब तक इस संबंध में जितने परिवारों से बात हुई है, उनमें एक परिवार है हनुमानगढ़ का. इस परिवार ने व्यक्ति के ख़िलाफ़ मामला भी दर्ज कराया था और ये जेल भी गया था."

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अभियुक्त को परिवार के बारे में कैसे पता चलता था
पुलिस से जब इस बारे में पूछा गया कि अभियुक्त गुमशुदा बच्चों की तलाश करते परिवारों के बारे में कैसे पता लगाता था तो पुलिस ने आरोप लगाया कि वो लोगों की भावनाओं का फ़ायदा उठाता था.
पुलिस ने कहा, " ये पुलिस थाने पर पेश होकर अपनी कहानी बताता था. फिर ये स्टोरी मीडिया में चली जाती थी. जैसे ही लोगों को ये जानकारी मिलती थी कि कोई ऐसा व्यक्ति जो 20-25 साल पहले ग़ायब हुआ था, आया हुआ है, तो जिस किसी परिवार में बच्चा गायब हुआ रहता था उसके परिवार के लोग सत्यापन के लिए थाने पहुंचते थे. उनमें से ही ये एक परिवार को चुन लेता था और वो परिवार जो भी आपस में बातें करते थे, उन्हें गौर से सुनकर दोहरा देता था. इसने लोगों की भावनाओं का फ़ायदा उठाया."
इससे पहले देहरादून पुलिस ने बताया था कि साल 2008 में कपिल देव शर्मा और आशा शर्मा का 16 साल का बेटा मोनू शर्मा ग़ायब हो गया था और उन्होंने गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी.
कपिल देव शर्मा के अनुसार, उनके बेटे मोनू शर्मा की उम्र 5-7 साल थी तब उसे एक कार ने टक्कर मार दी थी और तभी से उसका मानसिक संतुलन कुछ गड़बड़ा गया था. उसके बाद 2008 में जब वह 16 साल का था तब वह लापता हो गया था. इसी साल जुलाई में राजू उन्हें मिला और खुद को 'गुम हुआ मोनू शर्मा' बताया था.
फिर नवंबर के आख़िरी हफ्ते में ग़ाज़ियाबाद में '31 साल बाद लापता शख्स को मिला परिवार' ख़बर सुर्खियों में आई.
इस ख़बर की पुष्टि के लिए 29 नवंबर को जब बीबीसी टीम ग़ाज़ियाबाद के शहीद नगर में रहने वाली लीलावती के घर पहुंची तब परिवार ने राजू को उनका गुमशुदा बेटा बताया था.
राजू ने भी तब बीबीसी संवाददाता को अपने कथित अपहरण और राजस्थान से किसी तरह दिल्ली पहुंचने की कहानी सुनाई थी और लीलावती ने भी निशान के आधार पर 'बेटे' की पहचान की पुष्टि की थी.
लेकिन दो दिन बाद ही पुलिस को राजू की कहानी पर तब शक हुआ जब पता चला कि देहरादून में भी एक परिवार के साथ राजू ने ऐसे ही दावे किए थे.
देहरादून में ऐसी ही कहानी सामने आई थी

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देहरादून में रहने वाले कपिल देव शर्मा ने बताया कि साल 2008 के बाद उन्हें इसी साल जुलाई महीने में अख़बारों के ज़रिए पता चला कि एक युवक मिला है, जो उसी समय और परिस्थितियों में लापता हो गया था, जिन हालात में उनका बेटा.
उत्तराखंड पुलिस के अनुसार, एक जुलाई को देहरादून पुलिस के पास एक युवक आया और उसने बताया कि 16 साल पहले उसका किसी ने अपहरण कर लिया था. इस युवक ने अपना नाम राजू बताया था.
उसने कहा कि अपहरणकर्ता ने राजस्थान में उसे बेच दिया और वहां उसे ले जाकर बकरी चराने के काम में लगा दिया था. वहां उसे ठीक से खाना भी नहीं दिया जाता था और वह किसी तरह वहां से भागकर देहरादून पहुंचा है.
देहरादून की एंटी ह्यूमन ट्रैफ़िकिंग ब्रांच के इंचार्ज प्रदीप पंत ने बीबीसी को बताया, "हमने इस युवक की मदद करने के इरादे से से कुछ पत्रकारों को उसकी कहानी सुनाई. इसके बाद दो जुलाई को इस युवक की ख़बर स्थानीय अख़बारों में छप गई."
इस ख़बर के बारे में आशा शर्मा को पड़ोसियों से पता चला.
अख़बार में छपी ख़बर जानने के बाद आशा शर्मा अपने खोए हुए बेटे के मिलने की आस लिए थाने पहुंचीं. इस राजू नाम के युवक ने आशा शर्मा को देखते ही उन्हें अपनी मां बता दिया और उन्हें भी लगा कि वही उनका खोया हुआ बेटा, मोनू, है. वह उसे घर ले आईं.
नमकीन पैकिंग की छोटी सी फ़ैक्ट्री में काम करने वाले कपिल देव शर्मा कहते हैं कि उन्हें पूरी तरह यकीन तो नहीं हुआ था कि वह उनका बेटा है, लेकिन उन्होंने ऐतराज़ भी नहीं किया.
'बेटी को घर से निकालने की कोशिश की थी'

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कपिल देव शर्मा बताते हैं, "राजू उर्फ़ मोनू शर्मा घर में बेटे की तरह रहने लगा. दो दिन तक तो वह ठीक रहा, लेकिन फिर लड़ने-झगड़ने लगा."
वह बचपन से ही कपिल-आशा के साथ रह रही उनकी बेटी के बच्चों को भी यह कहकर घर से निकल जाने को कहता कि यह उसका घर है.
कपिल शर्मा कहते हैं कि वह उनसे भी झगड़ता था और कई बार उन दोनों पर हाथ भी उठाने की कोशिश कर चुका था.
आशा शर्मा बताती हैं, "राजू बात-बात पर अपने कपड़े थैले में उठाकर निकल जाता था और कहता था कि अब वापस नहीं आएगा. वह उसे मनाती थीं, लेकिन वह चला जाता था. हालांकि शाम को फिर लौट आता था."
जब झगड़े ज़्यादा बढ़ गए और राजू ने कपिल-आशा के साथ रह रहे उनके नाती-नातिन को घर से बाहर निकाल दिया तो उनकी बेटी शिल्पी ने देहरादून के पटेल नगर थाने में जाकर शिकायत की.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि पुलिस ने समझाया कि वह अपने बच्चों को अपने साथ रखें और राजू उर्फ़ मोनू को मां-बाप के पास रहने दें.
शिल्पी ने बताया कि 21 नवंबर 2024 को राजू या मोनू शर्मा यह कहकर घर से चला गया कि वह दिल्ली जाकर कुछ काम करेगा और काम मिलने पर घर में सूचना दे देगा.
हालांकि न तो उसने कोई फ़ोन किया और न ही उसकी कोई जानकारी मिली.
पहले ग़ाज़ियाबाद पुलिस ने क्या बताया था?

एक कहानी दिल्ली-एनसीआर इलाकों में छपे अख़बारों में एक युवा के मिलने की ख़बर से सामने आई थी.
यहां ग़ाज़ियाबाद के खोड़ा थाने पहुंचे राजू ने इसी से मिलती-जुलती कहानी बताई थी और एक पर्चा दिखाया था.
राजू का कहना था कि स्कूल से लौटते वक्त उसका अपहरण कर लिया गया था. उसे राजस्थान ले जाया गया और वहां वह भेड़-बकरियां चराता था.
वह एक सरदार ट्रक ड्राइवर की मदद से भागने में कामयाब हुआ और थाने पहुंच गया.
इस बारे में बीबीसी को गाज़ियाबाद पुलिस अधीक्षक रजनीश उपाध्याय ने बताया था कि उन्होंने सोशल और स्थानीय मीडिया में इस युवक के बारे मे ख़बरें छापीं जिसके बाद कई परिवार थाने आए.
उन्होंने बताया था, ‘’राजू ने लीलावती को अपने गले लगा लिया था और रोने लगा था. इसके बाद लीलावती ने राजू के शरीर पर बचपन के तीन निशान चेक किए थे और एक फोटो दिखाकर सबके बारे में पूछा था. जिसमें राजू ने अपनी बहनों के नाम सही बताए थे.’’
उनके अनुसार, ‘’राजू ने अपने बचपन की जो बात बताई कि कैसे जब वो स्कूल से आ रहा था तो उसका छतरी को लेकर बहन से झगड़ा हो गया था और फिर उसका अपहरण हो गया था और वही कहानी जब परिवार ने बताई और मिलान करने के बाद हमने उसे परिवार को दे दिया था.’’
लीलावती जिसे राजू ने अपनी मां बताया था, उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा था कि 'उनके पति तुलाराम, बेटियों ने सब निशानियां देखकर उसकी पहचान की पुष्टि की थी.'
उन्होंने कहा, "इसके बाद ही हमने उसे स्वीकार किया था."
पुलिस ने और क्या-क्या बताया था?

ग़ाज़ियाबाद पुलिस का कहना था कि जानकारी मिलने के बाद राजू को 30 नवंबर को हिरासत में ले लिया गया था.
जब मीडिया में ये ख़बर सामने आई तो बीबीसी ने ग़ाज़ियाबाद स्थित परिवार से संपर्क किया था तो परिवार में सबसे छोटी बेटी हेमा ने बताया कि पुलिसवाले दो बार घर पर आए थे.
हेमा कहती हैं, "मैंने राजू से पूछा कि तुमने लिखवाया कि चार बहनें हैं? तो इसके जवाब में उसने कहा कि मैंने चार भाई-बहन बताएं जिसमें तीन बहनें हैं और एक भाई है लेकिन अख़बार ने चार लिख दिया. हमारा विश्वास बन नहीं पा रहा, न पुलिसवालों का, न हमारा."
"लगभग आठ साल की उम्र में जो गायब हुआ वो 30 साल बाद मिलता है तो पहचान पाओगे? पुलिस का कहना है कि आपका बच्चा तो आप रखो पर हम पूछताछ करेंगे कि कैसे क्या हुआ, कहां से आया?"
ग़ाज़ियाबाद में ट्रांस हिंडन के डीसीपी निमिष पाटिल ने बीबीसी से इस बात की तस्दीक की थी कि 'उन्हें मिला राजू या भीम सिंह नाम का युवक वही है जो देहरादून में मोनू शर्मा बनकर रह रहा था.'
उन्होंने कहा कि 'अब उसका (राजू) कहना है कि यही (लीलावती का परिवार) उसका असली परिवार है और देहरादून में रहते हुए उसे समझ आ गया कि वह (शर्मा परिवार) उसका असली परिवार नहीं है.'
हालांकि डीसीपी पाटिल कहते हैं कि अभी उससे पूछताछ की जा रही है और पड़ताल के बाद ही कुछ कहा जा सकता है.
देहरादून में तो शर्मा परिवार ने राजू को परिवार के सदस्य के रूप में ख़ारिज कर दिया है और कपिल शर्मा उसके चले जाने और पकड़े जाने पर राहत जताते हैं, लेकिन डीसीपी पाटिल कहते हैं कि साहिबाबाद वाला परिवार अभी असमंजस में है.
हालांकि बीबीसी से लीलावती की बेटी राजो ने कहा था कि वे डीएनए टेस्ट कराएंगे लेकिन जब यही बात लीलावती के पति तुलाराम से पूछी गई तो उनका कहना था कि ‘जब हमें पता है हमारा है तो क्यों करवाएंगे.’
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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