डिप्रेशन की दवाइयों के साइड इफ़ेक्ट्स पर भी गौर करना क्यों ज़रूरी है?

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- Author, जेम्स गैलाघर
- पदनाम, स्वास्थ्य एवं विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
अवसाद यानी डिप्रेशन की कई तरह की दवाइयां होती हैं. इन तरह-तरह की डिप्रेशन की दवाइयों को एक स्टडी में पहली बार इनके साइड इफ़ेक्ट्स के आधार पर छांटा गया है.
डिप्रेशन की अलग-अलग दवाइयों के साइड इफ़ेक्ट्स में बड़ा अंतर पाया गया है.
रिसर्चर्स ने इन दवाइयों से इलाज की शुरुआत के पहले आठ हफ़्ते में मरीज़ों पर इनके असर की स्टडी की.
इसमें पाया गया कि डिप्रेशन की कुछ दवाइयों के कारण मरीज़ों का वज़न 2 किलोग्राम तक बढ़ गया या हार्ट रेट में हर मिनट 21 धड़कनों तक का अंतर आ गया.
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ब्रिटेन में लगभग 80 लाख लोग डिप्रेशन की दवाएं लेते हैं.
रिसर्चर्स ने चेतावनी दी है कि इन दवाइयों के साइड इफ़ेक्ट्स में अंतर लोगों की सेहत को प्रभावित कर सकता है.
रिसर्चर्स का कहना है कि इस स्टडी का मतलब ये नहीं है कि लोग अपना ट्रीटमेंट बंद कर दें, लेकिन उनकी ये अपील है कि मरीज़ की ज़रूरत के हिसाब से उनके लिए डिप्रेशन की दवाइयों का चुनाव करना चाहिए.
रिसर्चर प्रोफ़ेसर ओलिवर हाउज़ ने कहा, "डिप्रेशन की दवाइयां लेने वाले मरीज़ बड़ी संख्या में हैं और इन दवाइयों में बड़ा अंतर है. इसलिए मामूली बदलाव से भी पूरी आबादी पर बड़ा असर पड़ सकता है."
लैंसेट में छपी स्टडी के नतीजे

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हम हमेशा से जानते हैं कि डिप्रेशन की दवाइयों का सेहत पर असर पड़ता है. किंग्स कॉलेज लंदन और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की इस स्टडी में पहली बार डिप्रेशन की दवाइयों को इस तरह से रैंक किया गया है ताकि इनके साइट इफ़ेक्ट्स की आसानी से तुलना की जा सके.
टीम ने डिप्रेशन में आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली 30 दवाइओं के 151 अध्ययनों का विश्लेषण किया, जिसमें 58,500 से अधिक मरीज़ शामिल थे.
हर किसी को साइड इफ़ेक्ट्स नहीं होते, लेकिन लैंसेट मेडिकल जर्नल में पब्लिश किए गए नतीजों से पता चला:
- आठ हफ़्ते एगोमेलाटिन लेने से मैप्रोटिलिन की तुलना में 2.4 किलोग्राम वज़न कम हुआ, जबकि मैप्रोटिलिन लेने से लगभग 2 किलोग्राम वज़न बढ़ा
- फ्लुवोक्सामिन हार्ट बीट को धीमा कर देता है और नॉर्ट्रिप्टीलिन हार्ट बीट तेज़ करता है, दोनों के बीच 21 धड़कन प्रति मिनट का अंतर देखा गया
- नॉर्ट्रिप्टीलिन और डॉक्सेपिन के बीच ब्लड प्रेशर में 11 एमएमएचजी का अंतर देखा गया
किंग्स कॉलेज लंदन के डॉ. आतीशन अरुमुहम ने कहा, "स्पष्ट रूप से डिप्रेशन की कोई भी दो दवाएं एक जैसी नहीं होतीं."
दवाइयों और इनके साइड इफ़ेक्ट्स में अंतर इलाज के लिहाज़ से अहम हैं, जिनमें हार्ट अटैक या स्ट्रोक का रिस्क बढ़ना भी शामिल है.
इसका मतलब है कि एक ही बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए डिप्रेशन की अलग-अलग दवाइयां ज़्यादा बेहतर हो सकती हैं, जो कि उनकी प्राथमिकताओं और उनकी दूसरी हेल्थ कंडीशन के हिसाब से हो.
डॉ. टोबी पिलिंजर ने बीबीसी रेडियो 4 के टुडे प्रोग्राम में बताया, "हमने जिन अध्ययनों पर गौर किया, उनमें से ज़्यादातर अपेक्षाकृत छोटे थे. हम आठ हफ़्तों की अवधि में ही सेहत के मापदंडों में बड़े बदलाव देख रहे थे और हमारा मानना है कि ये बदलाव अहम हैं."
डॉ. टोबी पिलिंजर कहते हैं कि वह चाहते हैं, दवाइयों के फ़ैसले में लोग भी अपने डॉक्टर के साथ शामिल हों.
डिप्रेशन की कौन सी दवा सबसे बेहतर?

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मान लीजिए 32 साल की सारा, 44 साल के जॉन और 56 साल की जेन, तीनों को ही डिप्रेशन है और उन्हें डिप्रेशन की दवा लेने की सलाह दी गई है.
लेकिन ये तीनों ही मरीज़ अलग-अलग साइड इफ़ेक्ट से बचना चाहते हैं.
सारा चाहती हैं कि डिप्रेशन की दवा लेने से उनका वज़न न बढ़े, जॉन को पहले से ही हाई ब्लड प्रेशर की समस्या है और जेन का कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है.
डॉ. टोबी पिलिंजर कहते हैं कि यहां तीनों को डिप्रेशन की अलग-अलग दवा देनी होगी.
वह कहते हैं, "सारा को वजन बढ़ने से रोकने वाली डिप्रेशन की दवा लेनी चाहिए, जैसे कि एगोमेलाटिन, सेर्ट्रालिन या वेनलाफ़ैक्सिन, न कि एमिट्रिप्टिलिन या मिर्टाज़ापीन, जिनसे वज़न बढ़ने की संभावना अधिक होती है."
डॉ. टोबी पिलिंजर के मुताबिक़ जॉन को वेनलाफ़ैक्सिन, एमिट्रिप्टिलिन या नॉर्ट्रिप्टीलिन जैसी दवाओं से बचना चाहिए, जो ब्लड प्रेशर बढ़ाती हैं. जॉन की कंडीशन के लिए सिटालोप्रैम, एस्सिटालोप्रैम और पैरोक्सेटीन बेहतर रहेंगी.
वहीं जेन के लिए वह कहते हैं, "कुछ एंटीडिप्रेसेंट, जैसे वेनलाफ़ैक्सिन, डुलोक्सटीन और पैरोक्सेटीन, हाई कोलेस्ट्रॉल से जुड़े हैं. उनके लिए सिटालोप्रैम या एस्सिटालोप्रैम ज़्यादा बेहतर हो सकते हैं, जो कोलेस्ट्रॉल पर असर नहीं डालते हैं.
हालिया स्टडी के नतीजों के मायने

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रिसर्चर्स के मुताबिक़ यह नहीं कहा जा सकता है कि डिप्रेशन की कोई दवा अच्छी है या बुरी. जैसे, एमिट्रिप्टिलिन से भले ही वज़न, हार्ट बीट और ब्लड प्रेशर बढ़ता है, लेकिन यह दर्द और नींद न आने की समस्या में मदद करती है.
कुल मिलाकर, सबसे अधिक लिखी जाने वाली डिप्रेशन की दवाइयों जैसे पैरोक्सेटीन, सिटालोप्रैम, एस्सिटालोप्रैम सेर्ट्रालिन के कम साइड इफ़ेक्ट्स होते हैं.
अध्ययन में फ़्लूऑक्सेटिन, जिसे प्रोज़ैक भी कहा जाता है, का लिंक वज़न घटने और हाई ब्लड प्रेशर से पाया गया.
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एंड्रिया सिप्रियानी के मुताबिक़ फ़िलहाल इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है कि डिप्रेशन की दवाएं ले रहे लाखों लोगों में से कितने लोगों को अलग दवा लेनी चाहिए.
हालांकि, उन्होंने कहा कि क्योंकि "जेनेरिक, सस्ती दवाओं" पर जोर दिया गया है, तो इसका मतलब है कि ब्रिटेन में मरीज़ों को लिखी गई डिप्रेशन की दवाओं में 85 प्रतिशत सिर्फ़ ये तीन, सिटालोप्रैम, सेर्ट्रालिन और फ़्लूऑक्सेटिन, दवाइयां लिखी गई हैं.
उन्होंने कहा कि अगर हालिया स्टडी के नतीजों को लागू किया जाए, तो "अधिक लोगों को बेहतर इलाज मिलेगा."
रिसर्चर्स डॉक्टरों और मरीजों को सही दवा चुनने में मदद करने के लिए एक निःशुल्क ऑनलाइन टूल बना रहे हैं.
हालांकि, इसके लिए अभी भी एनएचएस (नेशनल हेल्थ सर्विस) में काफ़ी बदलाव लाने की ज़रूरत होगी.
स्टडी में केवल यह विश्लेषण किया गया कि इलाज शुरू होने के आठ हफ़्ते बाद क्या हुआ. डॉ. पिलिंजर के मुताबिक़ इसका मतलब है कि हो सकता है इस अवधि में जो बदलाव देखे गए, वो "बने रहेंगे", लेकिन इसकी भी उचित जांच की ज़रूरत है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ बाथ के डॉ. प्रसाद निष्टाला, जो इस अध्ययन में शामिल नहीं थे, ने कहा कि इसके नतीजे "नये और अहम" हैं.
उन्होंने कहा, "मरीज़ों को अक्सर महीनों या सालों तक डिप्रेशन की दवाएं दी जाती हैं, ऐसे में अधिक जोखिम की आशंका है, ख़ासकर उन लोगों में जो लंबे समय से डिप्रेशन से जूझ रहे हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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