मुसलमान महिला को तलाक़ के बाद किस क़ानून के तहत मिले गुज़ारा भत्ता

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक मुसलमान महिला को तलाक़ के बाद गुज़ारा भत्ता किस क़ानून के अनुसार मिलना चाहिए - सीआरपीसी के सेक्शन 125 या मुस्लिम पर्सलन लॉ के तहत?
इस मामले पर सहयोग करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज बीवी नागरत्ना और ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह ने वकील गौरव अग्रवाल को एमाइकस क्यूरी नियुक्त किया था.
ये मामला सुप्रीम कोर्ट इसलिए पहुंचा क्योंकि एक मुसलमान व्यक्ति ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली थी.
मामला क्या है?
तेलंगाना के फ़ैमिली कोर्ट ने मोहम्मद अब्दुल समद को तलाक़ के बाद अपनी पूर्व पत्नी को हर महीने 20,000 रुपए गुज़ारा भत्ता देने को कहा था.
महिला ने सीआरपीसी के सेक्शन 125 के अंतर्गत फ़ैमिली कोर्ट में भत्ता देने की गुहार लगाई थी और कहा था कि समद ने उन्हें ट्रिपल तलाक़ दिया है.
समद ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में अपील की. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कई सवाल उठाए गए जिन पर फ़ैसला लेना होगा लेकिन साथ ही याचिकाकर्ता समद को 10,000 रुपए अंतरिम भत्ता देने को कहा.
हाई कोर्ट के निर्देश को चुनौती देते हुए समद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और कहा कि हाई कोर्ट ने इस बात को नज़रअंदाज़ कर दिया कि 1986 का क़ानून एक ख़ास क़ानून है और सीआरपीसी के सेक्शन 125 की तुलना में उसे ही माना जाएगा क्योंकि सीआरपीसी एक आम क़ानून है.

मोहम्मद अब्दुल समद के वकील वसीम क़ादरी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''मुस्लिम महिला को दिए गए तलाक़ के मामले में सेक्शन 125 को लागू करना संभव नहीं है लेकिन अगर किसी मुस्लिम महिला को अलग कर दिया गया है या उसका पति ध्यान नहीं रख रहा है तो वो इस सेक्शन के तहत भत्ता मांग सकती है.''
वसीम क़ादरी के अनुसार, ''तलाक़शुदा महिला के लिए स्पेशल लॉ 1986 लागू होता है यानी इद्दत अवधि में ही उसे वो भत्ता दिया जाएगा और कोर्ट में मैंने यही तर्क दिए हैं और जिस व्यक्ति की जितनी क्षमता है, उसे उसी प्रकार देना होगा.''
वहीं एमाइकस क्यूरी, गौरव अग्रवाल ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के दर्जन से ज़्यादा फ़ैसलों का हवाला दिया है और 125 सेक्शन के तहत हर महीने भत्ता देने की बात कही है.

याचिका को लेकर सवाल
पत्रकार और लेखक ज़िया उस सलाम सवाल उठाते हैं कि जिस व्यक्ति ने याचिका डाली है क्या वो शाह बानो मामले पर लौटना चाहते हैं?
विमेन इन मस्जिद, टिल तलाक़ डू अस पार्ट: अंडरस्टैंडिंग तलाक़, ट्रिपल तलाक़ एंड ख़ुला आदि जैसी किताबों के लेखक ज़िया उस सलाम कहते हैं, ''ये सोचने की बात है कि पिछले 47 साल में भारत का मुसलमान समुदाय कहाँ पहुँचा है. शाह बानो ने उस ज़माने में छोटी सी मांग की थी और राजीव गांधी ने उसे ओवर टर्न कर दिया था.''
वे बताते हैं कि मुस्लिम पर्सलन लॉ इद्दत की बात करता है, वहीं मुस्लिम विश्लेषक कहते हैं कि आपकी अपनी पत्नी के प्रति ज़िम्मेदारी तब तक रहती है, जब तक वह दूसरा निकाह न कर ले.
वे इस्लामिक लॉ के बारे में बताते हुए कहते हैं कि इसमें लिखा है कि पैसा कमाने की ज़िम्मेदारी मर्द की है, अगर महिला पैसा कमाती भी है तो उसके बावजूद उसका मर्द से पैसे और उससे भत्ता लेने का अधिकार बना रहता है. महिला का अपने कमाए पैसे पर पूरा अधिकार है. उस पर मर्द का कोई अधिकार नहीं है.
ज़िया उस सलाम कहते हैं कि क़ुरान के सुरे में भी कहा गया है कि मर्द अगर पत्नी को तलाक़ दे चुका है तो उसे उचित भत्ता देने का प्रावधान करना चाहिए.
हालांकि इसकी अलग-अलग व्याख्या की जाती है.
शाहबानो का मामला

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शाह बानो मामला मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और पर्सनल लॉ के ख़िलाफ़ लड़ाई में मील का पत्थर माना जाता है.
इस मामले ने मुसलमान महिलाओं को क़ानूनी अधिकार पाने के लिए क़ानूनी ज़मीन तैयार की.
सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो मामले में तलाक़ के बाद गुज़ारा भत्ता देने के फ़ैसले को सही ठहराया था.
लेकिन इस बात को लेकर राजनीतिक विवाद भी पैदा हो गया था कि कोर्ट किस हद तक मुस्लिम पर्सनल लॉ में दख़ल दे सकता है.
वहीं शाह बानो के मामले ने मुसलमान महिलाओं को शादी में समान अधिकार और सामान्य अदालत में तलाक़ लेने की सुविधा का भी दरवाज़ा खोला.
साल 1978 में 62 साल की एक मुसलमान महिला शाह बानो ने कोर्ट में अर्ज़ी डाल कर अपने पति, मोहम्मद अमहद ख़ान से तलाक़ के बाद गुज़ारा भत्ता की मांग की थी.
शाह बानो और मोहम्मद अहमद ख़ान का निकाह साल 1932 में हुआ था और उनके पांच बच्चे थे.
मोहम्मद अहमद ख़ान पेशे से वकील थे और उन्होंने दूसरी शादी इस्लामिक क़ानून के तहत की थी.
इसके बाद शाह बानो ने साल 1978 में इंदौर की अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और 500 रुपए प्रति महीना गुज़ारा भत्ता दिए जाने की मांग की.
उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता या सीआरपीसी के सेक्शन 125 के तहत गुज़ारा भत्ता की मांग की थी.
लेकिन मोहम्मद अहमद ख़ान ने तर्क दिया था कि भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, तलाक़ के बाद पति इद्दत की मुद्दत तक ही गुज़ारा भत्ता देता है.
इद्दत क्या होता है?

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मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक़ इद्दत वह अवधि होती है, जब एक पत्नी अपने पति की मौत या तलाक़ के बाद बिताती है.
ये अवधि तीन महीने की होती है लेकिन स्थिति के अनुसार, इसमें बदलाव भी किया जा सकता है. इस अवधि के बाद महिला दूसरी शादी कर सकती है.
इस केस के दौरान मोहम्मद अहमद ख़ान का ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने समर्थन किया था और कहा था कि कोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत आने वाले मामलो में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है.
इस मामले पर चली लंबी सुनवाई के बाद 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया और जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सही माना, जिसमें सीआरपीसी के तहत गुज़ारा भत्ता देने का निर्णय दिया गया था.
ये अलग बात है कि इस फ़ैसले के बाद राजनीतिक बवाल हुआ और उस दौरान राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक़ पर सरंक्षण अधिनियम), 1986 पास कर दिया.
इसका नतीजा ये हुआ कि शाह बानो के मामले पर आया फ़ैसला पलट गया और कहा गया कि इद्दत की अवधि के लिए ही भत्ता दिया जा सकता है.

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क्या कहता है सीआरपीसी का सेक्शन 125?
सीआरपीसी, 1973 के सेक्शन 125 के अनुसार, सामाजिक न्याय के अंतर्गत हर उपेक्षित व्यक्ति को गुज़ारा भत्ता का अधिकार है.
इस सेक्शन के तहत किसी भी धर्म का व्यक्ति इसके लिए अर्जी डाल सकता है.
सीआरपीसी की धारा 125 में गुज़ारा भत्ता का ज़िक्र है, इसमें स्पष्ट किया गया है कि कौन-कौन गुज़ारा भत्ता की मांग कर सकता है.
पत्नी
हिंदू धर्म में एक महिला पत्नी तभी मानी जाएगी जब पुरुष से उसकी शादी क़ानूनी रूप से वैध हो.
विवाह संबंध में दूसरी पत्नी गुज़ारा भत्ता की मांग नहीं कर सकती क्योंकि क़ानून में दूसरी शादी वैध नहीं मानी जाती.
दूसरी पत्नी उसी परिस्थिति में गुज़ारा भत्ता की मांग कर सकती जब तक पति ने उससे पहली शादी की बात छिपाई हो.
किन तीन परिस्थितियों के तहत 'पत्नी' गुज़ारा भत्ता पाने की हक़दार नहीं है.
- यदि वह विवाहेत्तर संबंधों में रह रही हो
- उसने बिना पर्याप्त कारण दिए अपने पति को छोड़ दिया हो
- वे आपसी सहमति से अलग-अलग रह रहे हों

महिला अधिकारों पर मुखर होकर बोलने वाली और वकील सोनाली कड़वासरा कहती हैं, ''सेक्शन 125 हर महिला को भत्ता मिलने का अधिकार देता है चाहे वो किसी धर्म की क्यों न हो.''
उनके अनुसार, हालांकि महिला को भत्ता देने का प्रावधान अलग-अलग है, जैसे पर्सनल लॉ में भत्ता का अलग से प्रावधान हैं. वहीं हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन 24, इंडियन डिवोर्स एक्ट के सेक्शन 37 और स्पेशल मैरिज एक्ट के सेक्शन 24 में ये प्रावधान किए गए हैं.
लेकिन ये बात भी स्पष्ट है कि सीआरपीसी के सेक्शन 125 को मुस्लिम पर्सनल लॉ के अधीन नहीं देखा जा सकता है.
वहीं मुसलमानों में निकाह वैध तभी माना जाता है, जब दोनों पक्ष महिला-पुरुष की इसमें सहमति हो. महिला ने दूसरा निकाह न किया हो और वो इद्दत में न हो.
सीआरपीसी के सेक्शन 125 के अनुसार, मुसलमान महिला इद्दत की अवधि बीत जाने के बाद भी गुज़ारा भत्ता की दावेदार होती है बशर्ते उसे दूसरा निकाह न किया हो.
इसके अलावा इस सेक्शन के तहत बच्चे चाहे वो वैध या शादी से बाहर पैदा हुए हों गुज़ारा भत्ता के हक़दार होते है. वहीं माता-पिता अपने जैविक या गोद लिए हुए बच्चों से भत्ते की मांग कर सकते हैं.
बहरहाल इस मामले पर सोमवार को लंबी सुनवाई हुई और सुप्रीम कोर्ट ने मामला आरक्षित कर लिया है.
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