नेपाल में ऐसा क्या हो रहा है जिससे राजतंत्र लौटने की बात कही जा रही है?

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इमेज कैप्शन, बॉलीवुड अभिनेत्री मनीषा कोईराला को काठमांडू स्थित अपने आवास पर तिलक लगाकर स्वागत करते नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र वीर विक्रम शाह
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नेपाल इन दिनों कई तरह की सियासी हलचलों से गुज़र रहा है. पिछले कुछ दिनों में ऐसी कई रैलियां हुई हैं, जिनमें राजशाही व्यवस्था की मांग की जा रही है.

काठमांडू में बुधवार को राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) ने बाइक रैली का आयोजन किया था, जिसमें बड़ी संख्या में लोग नेपाल के राष्ट्रध्वज के साथ जुटे थे.

आरपीपी को पूर्व राजा ज्ञानेंद्र का समर्थन हासिल है. इस रैली में लोग नेपाली में नारा लगा रहे थे- 'नारायणहिटी खाली गर, हाम्रो राजा आउँदै छन्' यानी नारायणहिटी ख़ाली करो, हमारे राजा आ रहे हैं. इस रैली में आरपीपी के अध्यक्ष राजेंद्र लिंगदेन ने कहा कि संघीय सरकार का अंत होना चाहिए क्योंकि इससे एक भ्रष्ट व्यवस्था मज़बूत हो रही है.

नारायणहिटी काठमांडू में स्थित वही रॉयल पैलेस है, जिसमें राजा रहते थे. लेकिन 2008 में जब राजशाही व्यवस्था ख़त्म हुई और गणतंत्र आया तो इसे संग्रहालय में बदल दिया गया था. नारायणहिटी के भीतर ही एक गणतंत्र स्मारक भी बना दिया गया था.

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इससे पहले नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र का बड़ी संख्या में लोगों ने गलेश्वर धाम और बागलुंग कालिका में स्वागत किया था. इसमें कई लोगों ने नारा लगाया था- राजा आओ, देश बचाओ.

वहीं गुरुवार को पोखरा में पूर्व राजा वीरेंद्र की मूर्ति का अनावरण किया गया. पूर्व राजा ज्ञानेंद्र मूर्ति का आनावरण करने आए थे. वहाँ मौजूद पत्रकारों का कहना है कि इस मौक़े पर क़रीब तीन हज़ार लोगों की भीड़ मौजूद थी. मूर्ति का अनावरण करते हुए वहाँ मौजूद लोगों ने राजशाही व्यवस्था वाला राष्ट्रगान गाया.

इस कार्यक्रम में मौजूद पोखरा के स्थानीय पत्रकार रोहित पराजुले ने बीसीसी हिन्दी से कहा, ''भीड़ तीन हज़ार से ज़्यादा लोगों की थी. ज़्यादातर नौजवान दिख रहे थे और ज्ञानेंद्र ने बीरेंद्र की मूर्ति का अनावरण किया तो वहाँ मौजूद लोगों ने राजशाही व्यवस्था का राष्ट्रगान गाया. इसमें कई ऐसे लोग भी थे जो धार्मिक समूहों से जुड़े थे और आरपीपी के कार्यकर्ता भी थे.''

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इमेज कैप्शन, पूर्व राजा वीरेंद्र की मूर्ति के अनावरण में राजशाही व्यवस्था का राष्ट्रगान गाया गया

नेपाल में राजशाही की मांग क्यों?

रोहित कहते हैं कि ज्ञानेंद्र ने मूर्ति का अनावरण करते हुए कुछ कहा नहीं. रोहित कहते हैं, ''राजा राजनीतिक बयानबाज़ी बहुत कम करते हैं लेकिन ऐसा लग रहा है कि वो जो करना चाह रहे हैं, वो कर रहे हैं.''

आरपीपी के सीनियर उपाध्यक्ष रविंद्र मिश्रा से पूछा कि वह नेपाल में फिर राजशाही व्यवस्था क्यों लाना चाहते हैं? मिश्रा कहते हैं, ''नेपाल में अभी जो व्यवस्था चल रही है, उससे लोगों का मोहभंग हो गया है. अब लोग पुराने दिन याद कर रहे हैं. 17 सालों बाद अब किंग ज्ञानेंद्र नेपाल में कोई विलेन नहीं हैं. अब ज्ञानेंद्र जहाँ भी जाते हैं, वहाँ लोगों की भीड़ जमा हो जाती है.''

रविंद्र मिश्रा से पूछा कि ज्ञानेंद्र नेपाल की कमान अपने हाथ में चाहते हैं तो चुनावी राजनीति में क्यों नहीं आ जाते हैं?

मिश्रा कहते हैं, ''उन्हें नेता नहीं राजा बनना है. चुनावी राजनीति के ज़रिए कोई राजा नहीं बनता है. मुझे लगता है कि यह भारत के भी हित में है. नेपाल के कम्युनिस्ट शासन में भारत विरोधी भावना बढ़ी है. अब नेपाल में लोग राजशाही व्यवस्था के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं.''

संपादक, कान्तिपुर

रविंद्र मिश्रा कहते हैं, ''हमने आम जनता के साथ पोखरा में महाराजा वीरेंद्र की मूर्ति का अनावरण करते हुए राजशाही व्यवस्था का राष्ट्रगान गाया लेकिन पुलिस नहीं रोक पाई. अब हमें कोई भी रोक नहीं पाएगा. दरअसल पुलिस और फ़ौज भी मौजूदा व्यवस्था से ऊब गई है.''

क्या नेपाल फिर से राजतंत्र की ओर बढ़ रहा है? चर्चित नेपाली अख़बार कान्तिपुर के संपादक उमेश चौहान कहते हैं, ''नेपाल के लोगों में मौजूदा सरकार को लेकर निराशा तो है. लोग ग़ुस्से में भी हैं. यहाँ की जनता वैकल्पिक राजनीति की तलाश कर रही है. लेकिन अभी कोई ठोस विकल्प दिख नहीं रहा है. ऐसे में राजतंत्र के समर्थक इसी असंतोष को लामबंद करना चाहते हैं. मुझे नहीं लगता है कि यह असंतोष राजतंत्र के पक्ष में जाएगा.''

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इमेज कैप्शन, पूर्व राजा ज्ञानेंद्र को कई तबकों से समर्थन भी मिल रहा है

नेपाल में क्या राजतंत्र फिर आना संभव है?

उमेश चौहान कहते हैं, ''ज्ञानेंद्र आरपीपी का समर्थन करते हैं लेकिन उसे जनता का समर्थन कितना मिलता है? अगर ज्ञानेंद्र आरपीपी में शामिल हो जाएं और ख़ुद भी चुनाव लड़ें तो जीत नहीं पाएंगे. बहुत होगा तो आरपीपी को जो पांच लाख वोट मिलता था, वो 10 लाख हो जाएगा. इससे ज़्यादा कुछ नहीं होना है. संभव है कि ज्ञानेंद्र के समर्थक नारायणहिटी का गेट तोड़ ज्ञानेंद्र को वहाँ बैठा दें लेकिन उसके बाद जो होगा उसकी आप कल्पना नहीं कर सकते हैं. मुझे नहीं लगता है कि ज्ञानेंद्र कभी ऐसा जोखिम उठाएंगे.''

आरपीपी के नेपाल में कुल 14 सांसद हैं. इनमें सात निर्वाचन प्रक्रिया से चुने गए हैं और सात समानुपातिक प्रक्रिया से. नेपाल की संसद प्रतिनिधि सभा में कुल 275 सांसद हैं. इनमें 165 निर्वाचन प्रक्रिया से चुने जाते हैं और 110 समानुपातिक प्रक्रिया से.

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नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकिशोर भी मानते हैं कि तमाम असंतोष के बावजूद नेपाल में राजतंत्र कभी नहीं आ पाएगा. लेकिन ज्ञानेंद्र जहाँ जा रहे हैं, वहाँ इतनी भीड़ क्यों जुट रही है?

चंद्रकिशोर कहते हैं, ''ज्ञानेंद्र जब राजा थे, तो जनता से बहुत दूर थे. आम जनता ने उन्हें कभी देखा नहीं था. ऐसे में जब वे आम लोगों के बीच दिख रहे हैं तो लोगों की भीड़ लग रही है. इसका मतलब यह नहीं है कि ज्ञानेंद्र को लोग फिर से राजा बना देंगे.''

चंद्रकिशोर कहते हैं, ''नेपाल में 250 सालों तक राजशाही रही है. ऐसे में इस व्यवस्था से फ़ायदा उठाने वालों की बड़ी संख्या है. ये क्यों नहीं चाहेंगे कि राजतंत्र फिर से आ जाए? लेकिन नेपाल के लोग राजतंत्र को परख चुके हैं और यह अतीत से वर्तमान नहीं बनने जा रहा है.''

एक आम नेपाली जब राजशाही व्यवस्था और लोकतांत्रिक व्यवस्था की तुलना करता है तो किस निर्णय पर पहुँचता है? उमेश चौहान कहते हैं, ''मुझे लगता है कि कन्फ्यूज़ हो जाता है. ग़ुस्से में एक आम नेपाली कह सकता है कि राजतंत्र ही अच्छा था लेकिन मुझे यह नहीं लगता है कि यह ग़ुस्सा किसी निर्णय तक पहुँचने के लिए काफ़ी है.''

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इमेज कैप्शन, नेपाल में हाल के दिनों में राजशाही व्यवस्था की मांग को लेकर कई रैलियां हुई हैं

नेपाल के लोग क्या सोचते हैं?

पिछले साल मैं एक रिपोर्ट के सिलसिले में नेपाल के वीरगंज गया था. वीरगंज नेपाल का मधेसी इलाक़ा है, जो बिहार के रक्सौल से लगा है. नेपाल के 98 फ़ीसदी मुसलमान मधेस में रहते हैं. इनसे पूछा था कि राजतंत्र के जाने और लोकतंत्र के आने से उनके जीवन पर क्या फ़र्क़ पड़ा?

इसके जवाब में कई स्थानीय मुसलमानों का कहना था कि राजतंत्र के होते हुए उनके साथ कभी भेदभाव नहीं हुआ था और न ही कभी असुरक्षा का अहसास हुआ. चंद्रकिशोर कहते हैं कि मुसलमानों की इस बात में तथ्य है लेकिन इसे सपाट तरीक़े से नहीं देखना चाहिए.

चंद्रकिशोर कहते हैं, ''लोकतंत्र में वोट के लिए लोगों को लामबंद करना होता है. लामबंदी धर्म के आधार पर भी होती है. राजतंत्र में इसकी ज़रूरत नहीं पड़ती है. ऐसे में भेदभाव की गुंजाइश नहीं रहती है. लेकिन दूसरी बात यह देखिए कि इसी लोकतंत्र ने मधेस प्रदेश का मुख्यमंत्री मुसलमान को बनाया. लालबाबू राउत मुसलमान थे और मधेस प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. राजशाही व्यवस्था ख़ुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए ऐसी छवि गढ़ती है कि उसकी व्यवस्था में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होता है.''

रंजीत राय नेपाल में भारत के राजदूत थे. उनसे पूछा कि क्या नेपाल में फिर से राजतंत्र आ सकता है? राय कहते हैं, ''देखिए नेपाल में निराशा तो है. लोगों की उम्मीदों पर सरकारें खरी नहीं उतर पाई हैं. लेकिन इस निराशा से नेपाल के लोगों को राजशाही व्यवस्था निकाल देगी, मुझे संदेह है. राजतंत्र के समर्थन में अभी इतने लोग नहीं हैं, जिसे नेपाल के लोकतंत्र के लिए ख़तरे के रूप में देखा जाए.''

वीडियो कैप्शन, भारत और नेपाल बीच होने वाले विवाह पर क्यों लग रहे हैं विराम

नेपाल को गणतंत्र बने क़रीब 17 साल ही हुए हैं और इतने छोटे वक़्त में किसी व्यवस्था की सफलता और असफलता का मूल्यांकन करना थोड़ी जल्दबाज़ी हो सकती है. नेपाल एक लैंडलॉक्ड देश है और भारत पर इसकी निर्भरता काफ़ी हद तक है. नेपाल तीन तरफ़ से भारत से घिरा है और एक तरफ़ चीन से सीमा लगती है.

भारत की राजनीति में किसका ज़ोर है, इसका असर नेपाल पर भी सीधा पड़ता है. 2008 में नेपाल में जब राजशाही लंबे आंदोलन के बाद ख़त्म हुई तो लोकतंत्र स्थापित हुआ और संविधान बनने की प्रक्रिया शुरू हुई.

सितंबर 2015 में नेपाल ने अपना नया संविधान लागू किया और इसमें नेपाल को सेक्युलर स्टेट बताया गया. ऐसा तब हुआ जब भारत में एक हिंदुत्व विचारधारा वाली पार्टी के पोस्टर बॉय माने जाने वाले नरेंद्र मोदी की सरकार थी.

26 मई 2006 को बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था, ''नेपाल की मौलिक पहचान एक हिंदू राष्ट्र की है और इस पहचान को मिटने नहीं देना चाहिए. बीजेपी इस बात से ख़ुश नहीं होगी कि नेपाल अपनी मौलिक पहचान माओवादियों के दबाव में खो दे.''

राजशाही के दौरान नेपाल एक हिंदू राष्ट्र के तौर पर जाना जाता था. तब नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था.

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