बिहार में कुपोषण से लड़ाई: दावे बनाम ज़मीनी हक़ीकत, कैसे तंदुरुस्त होंगे बच्चे

    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी के लिए

22 साल की सोनी ख़ातून पांच बच्चों की मां हैं. उनकी सबसे बड़ी बेटी आठ साल की है और सबसे छोटी बेटी एक साल की.

सोनी के पति ग़ुलाम ग़ौस कोयला ढोते हैं. यह दंपति अपने पांच बच्चों के साथ बिहार की राजधानी पटना के सबसे बड़े स्लम में से एक कमला नेहरू के एक अंधेरे कमरे में रहता है.

इस बस्ती की एक किलोमीटर की परिधि में कई राजनीतिक दलों के दफ़्तर और एक अस्पताल भी है. लेकिन कोई भी उनके जीवन में बदलाव नहीं ला पाया है.

दुबली-पतली सोनी की आंखें धंस गई हैं. उनकी सबसे बड़ी बेटी को छोड़कर सारे बच्चे घर के अंधेरे कमरों में ही पैदा हुए हैं.

सोनी के दो बच्चे अपने घर से कुछ दूरी पर सामुदायिक केंद्र में चल रहे आंगनवाड़ी केंद्र में जाते हैं.

आंगनवाड़ी केंद्र में क्या मिलता है? इस सवाल पर बच्चे जवाब देते हैं, "खिचड़ी. रोज़ एक बड़ा चम्मच मसूर दाल की खिचड़ी और कभी-कभार गुड़ में पकाए चावल."

सोनी कहती हैं, ''आंगनवाड़ी कभी खुलती है, कभी बंद रहती है. ड्रेस का पैसा भी पैरवी वाले लोगों को मिलता है. बच्चों की जांच हुए तो सालों बीत गए.''

सोनी की तरह ही काजल, शाहजहां ख़ातून और यहां की ज़्यादातर महिलाओं की भी यही शिकायत है.

कमला नेहरू की वॉर्ड पार्षद श्वेता रंजन भी बीबीसी भी इन हालात की तस्दीक करती हैं. वो कहती हैं, ''हमने भी इसकी शिकायत सीडीपीओ (बाल विकास कार्यक्रम अधिकारी) से की थी, लेकिन कुछ बदलाव नहीं आया.''

सरकारी दावे

आंगनवाड़ी और पोषण पुर्नवास केंद्र ये दो केंद्र बिहार में कुपोषण के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे हैं.

आंगनवाड़ी केंद्रों पर 0-6 साल तक के बच्चों और गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं के पोषण में सुधार की ज़िम्मेदारी है. वहीं राज्य के प्रत्येक ज़िले में बने पोषण पुनर्वास केंद्रों में पांच साल तक की उम्र के गंभीर रूप से कुषोषित बच्चों को 21 दिन के लिए रखा जाता है.

राज्य में एक लाख 14 हज़ार 718 आंगनवाड़ी केंद्र हैं. इनमें सात हज़ार 115 मिनी आंगनवाड़ी केंद्र हैं. राज्य ने केंद्र सरकार से 18 हज़ार अतिरिक्त आंगनवाड़ी की मांग की है.

आंगनवाड़ी में प्रत्येक बच्चे के खाने के लिए आठ रुपये रोज़ाना का खर्च निर्धारित है. इसमें खाने से लेकर खाना पकाने के ईंधन तक का खर्च शामिल है. इसके अलावा, तीन से छह साल के बच्चों की वर्दी के लिए अभिभावक को हर साल डीबीटी के माध्यम से 400 रुपये मिलते हैं.

समाज कल्याण विभाग के तहत आने वाला एकीकृत बाल सेवा निदेशालय (आईसीडीएस) मुख्य रूप से 0-6 साल आयु के बच्चों, किशोर लड़कियों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं से संबंधित योजनाओं को लागू करता है.

आईसीडीएस के निदेशक कौशल किशोर ने बीबीसी से कहा, ''सोशल सेक्टर में चीज़ें बदलने में समय लेती हैं. हम लगातार बदलाव की कोशिश कर रहे हैं. आंगनवाड़ी में महीने के पहले हफ्ते में बच्चों की जांच करके उनका रिकॉर्ड पोषण ट्रैकर पर डाला जाता है. बिहार के आंगनवाड़ी केंद्रों में 90 फ़ीसदी ग्रोथ देखी जा रही है जो दूसरे कई राज्यों से बेहतर है.''

एनीमिया के बढ़ते मामले

लेकिन योजनाओं के शब्दों और ज़मीनी हक़ीक़त में बहुत अंतर दिखाई देता है. आंकड़े भी देखें तो नीति आयोग के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी इंडिया इंडेक्स) 2020 21 में बिहार सबसे फिसड्डी राज्य है.

नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे-5 की रिपोर्ट देखें तो पांच साल से कम उम्र के वर्ग में प्रति 1000 बच्चों में 56.4 बच्चों की मृत्यु हो जाती है.

वहीं, 15 से 19 साल की 65.7 फ़ीसदी किशोरियां एनीमिया ग्रस्त हैं. एनएफएचएस -4 में यह आंकड़ा 61 फ़ीसदी था. इसी तरह, 06-59 सप्ताह के 69.4 फ़ीसदी बच्चे (पहले 63.5 फ़ीसदी) और 15 से 49 आयुवर्ग की 63.1 फ़ीसदी गर्भवती स्त्रियां (पहले 58.3 फ़ीसदी) एनीमिया ग्रस्त हैं.

इसी तरह पांच वर्ष से कम आयुवर्ग के 42.9 फ़ीसदी बच्चों में नाटापन, 22.9 फ़ीसदी में दुबलापन, 8.8 फ़ीसदी बच्चे अति दुबलापन देखा गया. इसके अलावा, 41 फ़ीसदी का वज़न कम और 2.4 फ़ीसदी का वज़न ज़्यादा है.

नाटेपन के मामले में देश के10 सबसे ख़राब ज़िलों में बिहार के सीतामढ़ी और शेखपुरा शामिल हैं. दुबलेपन में अरवल और शिवहर जबकि कम वज़न के मामले में अरवल शामिल है. आईसीडीएस के मुताबिक़, मधुबनी ज़िले की स्थिति सबसे ज़्यादा ख़राब है.

आंगनवाड़ी के छोटे कमरे और बदहाली

पटना में आईसीडीएस निदेशालय से क़रीब 40 किलोमीटर दूर खुसरूपुर के मोसिमपुर स्थित आंगनवाड़ी का रास्ता बरसाती गंदे पानी से भरा है.

किराए के कमरे में चल रहे इस आंगनवाड़ी में इस साल 27 सितंबर को केवल 15 बच्चे पहुंचे थे. केंद्र की सहायिका गुड़िया कुमारी ग़ैरहाज़िर थीं. इसका मतलब था कि आज बच्चों को खाना नहीं मिलेगा.

कुछ बच्चे ड्रेस में थे तो कुछ मैली-कुचैली और छोटे-मोटे सुराखों वाली बनियान पहने हुए थे. उनपर 'काबू पाने के लिए' केंद्र में एक मोटी छड़ी भी रखी गई थी.

गुड़िया कुमारी को बीते चार महीने से मानदेय (6,000 रुपये प्रतिमाह) नहीं मिला है. वो बताती हैं, ''इस केंद्र में 40 बच्चों का नाम लिखा है, लेकिन औसतन 30 बच्चे ही आते हैं.''

रोहतास के तिलौथू प्रखंड के सरैया गांव के वॉर्ड-8 में स्थित आंगनवाड़ी केंद्र में बमुश्किल 15 बच्चे बैठ सकते हैं.

एक दिक्कत आंगनवाड़ी केंद्र के किराए के भुगतान की भी है. एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने बीबीसी से कहा, ''सरकार एक–एक साल पर किराया देती है, इस वजह से आंगनवाड़ी सेविका के लिए कई बार मकान मालिक बहुत असहज स्थिति बना देते हैं.''

खाली पड़े पोषण पुनर्वास केंद्र

आंगनवाड़ी केंद्रों की तुलना में पोषण पुनर्वास केंद्रों का इन्फ़्रास्ट्रक्चर बेहतर है, लेकिन ये केंद्र ज़्यादातर समय ख़ाली रहते हैं.

इन केंद्रों को स्वास्थ्य विभाग चलाता है. आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें यहां भेजने की सिफ़ारिश करती हैं.

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 10 बेड का पोषण पुनर्वास केंद्र है. यह बाल अस्पताल के कैंपस में ही है.

पूरे बाल अस्पताल से गुज़रने पर आपको बड़ी तादाद में ऐसे दुबले-पतले बच्चे मिल जाएंगे जिनकी उभरी हुई हड्डियां आसानी से गिनी जा सकती हैं. लेकिन ये बच्चे इस केंद्र में भर्ती नहीं होते हैं.

मैं जब सितंबर में वहां गई थी तो केवल पांच बच्चे ही भर्ती थे.पुनर्वास केंद्र से जुड़ी एक डॉक्टर कहती हैं, ''यहां बच्चे भर्ती ही नहीं होते. ग्रामीण इलाक़े के लोगों को लगता है कि ये कोई बीमारी ही नहीं है.''

इसी तरह भोजपुर के सदर अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र में सिर्फ़ सात बच्चे भर्ती हैं, जबकि यहां 20 बेड हैं.

भोजपुर के बूंदी गांव की रूबी देवी अपने जुड़वा बच्चों के साथ यहां रह रही हैं. वो बताती हैं, "दोनों बहुत कमज़ोर हैं और दिन भर रोते हैं. इसलिए यहां भर्ती हुए."

रूबी की छह साल की बेटी भी उनके साथ आ गई हैं जो मां की मदद करती हैं.

आईसीडीएस के निदेशक कौशल किशोर कहते हैं, ''आधे से ज़्यादा मामलों में मां-बाप बच्चों को पुनर्वास केंद्र में रखने से इनकार कर देते हैं. दिक्कत ये है कि मां के ऊपर पूरा घर चलाने की ज़िम्मेदारी है और उसे कुषोषित बच्चे के साथ-साथ अपने दूसरे बच्चे की भी देखभाल करनी है. इसलिए अब कम्युनिटी बेस्ड मैनेजमेंट का प्रस्ताव कैबिनेट के पास है, जिस पर अप्रूवल होना बाक़ी है.''

महिलाओं में एनीमिया

कुपोषण का ये कठिन घेरा तोड़ने के लिए ज़रूरी है कि महिलाओं और किशोरियों की सेहत को ध्यान में रखकर नीतियां बनाई जाएं.

अभी आंगनवाड़ी केंद्र से गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को सूखा राशन उपलब्ध कराया जाता है. इसमें प्रतिदिन 9.50 रुपये एक महिला पर खर्च किए जाते हैं. इसके साथ ही 14-18 साल की किशोरियों पर सरकार दो स्तरों पर काम कर रही है- एक है पोषण और दूसरा जीवन कौशल.

बिहार में ग़ैर-लाभकारी संस्था पी.ए.टी.एच (पाथ) के प्रमुख कुमार सौरभ बताते हैं, ''दिसंबर 2021 से आईसीडीएस द्वारा मिडडे मील और जन वितरण प्रणाली में फ़ोर्टिफ़ाइड चावल उपलब्ध कराए जा रहे हैं. फ़ोर्टिफ़ाइड राइस वो चावल हैं जिन्हें सामान्य चावल में माइक्रो न्यूट्रीएंट्स डालकर तैयार किया जाता है. ये एनीमिया से निपटने का एक कारगर उपाय है.''

लेकिन बिहार में जन वितरण प्रणाली कितने लोगों को कवर करती है और अनाज की गुणवत्ता क्या है? इस सवाल पर 'भोजन के अधिकार' से जुड़े रूपेश कुमार कहते हैं, ''बिहार में 86 फ़ीसदी परिवार ही इसका लाभ ले पा रहे हैं. उसमें भी एक से डेढ़ लाख परिवार छूटे हुए हैं. इसकी वजह 2011 के बाद जनगणना नहीं होना और आर्थिक सामाजिक डेटा के आधार पर पीडीएस कार्ड का वितरण होना है. सिर्फ़ 60 फ़ीसदी परिवारों में ही ठीक ढंग से अनाज बांटा जा रहा है. यहां सिर्फ़ गेंहू और चावल मिलते हैं, जबकि दूसरे राज्यों में दाल ,चना जैसे ज्यादा पौष्टिक अनाज मिलते हैं.''

बदहाल शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र

बिहार के बदहाल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, कोढ़ में खाज का काम कर रहे हैं.

कमला नेहरू स्थित शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में 5 एएनएम, एक लैब टेक्नीशियन समेत 15 कर्मचारी हैं. लेकिन पिछल एक साल से अधिक समय से कोई डॉक्टर नहीं है, जबकि गंदगी से भरी ये बस्ती बीमारियों का अड्डा है.

दिलचस्प यह है कि ये स्वास्थ्य केंद्र तीन छोटे-छोटे कमरों में चलता है. इस केंद्र में स्टाफ़ तक ठीक से नहीं बैठ सकता, लेकिन इस केंद्र में योग टीचर को भी तैनात किया गया है.

एएनएम सोनी कुमारी बताती हैं, ''हम लोग इस केंद्र में अपने स्तर पर सिर्फ़ टीकाकरण, फ़ैमिली प्लानिंग, एंटी नेटल केयर और एक दिन की आंख की ओपीडी की सेवा देते हैं. हम लोग अति कुषोषित बच्चे को ही पहचान पाएंगे. जिनमें कुपोषण शुरू हो रहा है, उनकी पहचान मुश्किल है.''

नीतीश कुमार की सरकार ने सत्ता संभालते ही एक 'श्वेत पत्र' जारी किया था. श्वेत पत्र में आईसीडीएस के बारे में लिखा था कि 1990-91 से 2004-05 तक आईसीडीएस के तहत मिले कुल 400 करोड़ में से सिर्फ़ 196 करोड़ रुपये ही खर्च हुए यानी महज 49 फ़ीसदी.

इसके साथ ही 2003-04 के दौरान नेशनल प्रोग्राम फ़ॉर एडोलेसेंट गर्ल के लिए आए फ़ंड से एक भी रुपया खर्च नहीं हुआ. इसी तरह आर्थिक सर्वेक्षण 2007-08 के मुताबिक़, सीडीपीओ के 544 पदों में से केवल 184 की ही बहाली हुई थी. यह संख्या 2022 -23 में 337 हो गई है.

आंकड़ों में देखें तो बिहार में पोषण के लिए बजट लगातार बढ़ता जा रहा है. साल 2017-18 में ये 1352 करोड़ था, जो 2021-22 में 1896 करोड़ हो गया.

नीतीश सरकार में कुपोषण से लड़ने के लिए बजटीय प्रावधानों के साथ-साथ जमीनी स्तर पर काम तो हुआ है. लेकिन बिहार की चुनौतियों के आईने में ये 'नौ दिन चले अढ़ाई कोस' जैसा ही मामला लगता है.

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