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बिहार और यूपी में स्वास्थ्य सुविधाओं का क्यों बुरा हाल है?
- Author, संदीप राय
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार के मुजफ़्फ़रपुर में दिमागी बुखार के प्रकोप के बीच नीति आयोग की ओर से जारी किए गए हेल्थ इंडेक्स ने बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है.
इस इंडेक्स के मुताबिक़, स्वास्थ्य के मामले में 21 बड़े प्रदेशों में बिहार और यूपी की हालत सबसे ज़्यादा खस्ता है और उनकी रैंकिंग 20वीं और 21वीं है.
जबकि शीर्ष तीन राज्य केरल, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र हैं. इंडेक्स से साफ़ ज़ाहिर होता है कि उत्तर भारत के राज्यों में स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट अधिक गहरा है.
वालंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन आलोक मुखोपाध्याय कहते हैं, "स्वास्थ्य के मामले में इन राज्यों का हाल पिछले 40 सालों से बहुत बुरा रहा है. कुछ सुधार हुआ है लेकिन ज़रूरत के मुताबिक़ नहीं. इन राज्यों में 30 से 40 फ़ीसदी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे है. बाल विवाह, लड़कियों की शिक्षा के मामले में इन राज्यों की हालत बहुत अच्छी नहीं है."
वो कहते हैं, "सबसे बड़ी बात है कि इन राज्यों में प्रशासन भी बहुत कमज़ोर है, इसलिए कोई योजना भी लागू नहीं हो पाती. यहां शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सामाजिक क्षेत्रों में निवेश भी बहुत कम हुआ है."
उनके अनुसार, केरल की स्थिति इसलिए अच्छी है क्योंकि वहां आर्थिक स्थिति अच्छी है, शिक्षा बेहतर है और राजनीतिक सुधार की वजह से महिलाओं की स्थिति बेहतर है. इन सारी चीजों का असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखता है.
सरकारी लापरवाही से बिगड़ी व्यवस्था
सामुदायिक स्वास्थ्य पर कई सालों से काम कर रहे दिल्ली के डॉ एके अरुण भी उत्तर भारत के राज्यों में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रशासनिक लापरवाही को मुख्य वजह मानते हैं.
डॉ एके अरुण कहते हैं, "इन दोनों प्रदेशों में स्वास्थ्य को लेकर सरकारों की लापरवाही साफ़ दिखती है और विडंबना है कि पिछले दस सालों से उनका ऐसा ही प्रदर्शन रहा है."
न्यू हेल्थ पॉलिसी और नेशनल हेल्थ रूरल मिशन (एनएचआरएम) की वजह से उत्तर भारत के राज्यों की स्थिति में सुधार हुआ है लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है.
अगर दिल्ली का उदाहरण लिया जाए तो पिछले कुछ सालों में यहां स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार देखा गया है, हालांकि हेल्थ इंडेक्स में दिल्ली केंद्र प्रशासित क्षेत्रों में पांचवें स्थान पर है.
हेल्थ इंडेक्स में दिल्ली की स्थिति पर डॉ एके अरुण हैरानी जताते हैं और कहते हैं कि शायद ये स्थिति इसलिए है क्योंकि बेस इयर 2017-2018 माना गया है.
वो कहते हैं, "अगर बेस इयर 2014-15 माना जाता तो दिल्ली की जो प्रगति है वो निश्चित रूप से इसमें दिखती."
वो पिछले साल यूएनडीपी की रिपोर्ट का हवाला देते हैं जिसमें अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने अन्य राज्यों के मुक़ाबले दिल्ली की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बताया था.
हालांकि दिल्ली की स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ोसी राज्यों के रोगियों का बहुत बड़ा भार है.
आलोक मुखोपाध्याय कहते हैं कि 'दिल्ली की आबादी कभी भी स्थिर नहीं रहती है, अन्य राज्यों से पलायन के कारण यहां पांच से 10 प्रतिशत आबादी बढ़ जाती है. इसलिए स्वास्थ्य में जितना सुधार होता है, आबादी बढ़ते ही वो पहले की स्थिति में आ जाता है.'
क्या किया जाना चाहिए
आलोक मुखोपाध्याय का कहना है कि केंद्र और राज्य में स्वास्थ्य पर आवंटित होने वाला बजट बहुत कम है, उसे बढ़ाना होगा.
नेशनल हेल्थ पॉलिसी में ही 2025 तक स्वास्थ्य बजट 2.5 प्रतिशत किए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है.
जबकि मौजूदा समय में भारत का स्वास्थ्य बजट 1.7 प्रतिशत है.
फ़रवरी में मोदी सरकार-1 के आख़िरी और अंतरिम बजट में रक्षा बजट, भारत के स्वास्थ्य बजट का पांच गुना आवंटित किया गया था.
स्वास्थ्य को लेकर सरकार की गंभीरता की ये बस एक नज़ीर है.
आलोक मुखोपाध्याय के अनुसार, "पूरे एशिया में देखा जाए तो का स्वास्थ्य पर बजट में भारत की हिस्सेदारी बहुत ही कम है यहां तक कि भारत इस मामले में बांग्लादेश और श्रीलंका से भी पीछे है."
वो कहते हैं, "दूसरी सबसे बड़ी समस्या मानव संसाधन की है. हमारे यहां एमबीबीएस करने में छह-सात साल लग जाते हैं. अब चाहिए कि तीन या चार साल का ऐसा कोर्स शुरू किया जाए जिससे कम से कम एक डॉक्टर तैयार हो सकें."
और तीसरी सबसे बड़ी बात, जो आलोक बताते हैं वो है सरकारी अस्पतालों का प्रशासन ठीक करना, "हमें सरकारी अस्पतालों की प्रशासनिक व्यवस्था ठीक करनी होगी. एम्स जैसे अस्पतालों में दबाव इसलिए भी बढ़ गया है कि कोई प्राइमरी हेल्थ केयर में जाना ही नहीं चाहता. जबकि एम्स एक रेफ़र अस्पताल है."
"हमें प्राइमरी स्वास्थ्य प्रणाली को दुरुस्त करना होगा ताकि विशिष्ट सेवाओं के लिए लोग बड़े अस्पतालों का रुख़ करें और इसतरह वहां भी दबाव कम होगा."
भारत में विकेंद्रित स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था का ठीक से संचालित न होना प्रमुख समस्याओं में से एक है.
आलोक मुखोपाध्याय के अनुसार, निजी अस्पतालों में सस्ती दरों पर बेहतर सेवाओं की ओर जाना होगा. अभी हो ये रहा है कि सेवाओं की गुणवत्ता निर्धारित नहीं है और अपनी मनमर्ज़ी के मुताबिक मरीज़ों से वसूली कर रहे हैं.
स्वास्थ्य बजट 3.5% हो
इसके अलावा उनका कहना है कि चैरिटेबल स्वास्थ्य संस्थाओं को उन इलाकों में अस्पताल खोलने के लिए बढ़ावा देना चाहिए जहां ज़रूरत हो.
उदाहरण के लिए रामकृष्ण मिशन, होली फ़ैमिली हॉस्पीटल, वेल्लोर मेडिकल कॉलेज जैसे गैर मुनाफ़ा वाली संस्थाओं को पिछड़े इलाके में अस्पताल खोलने के लिए एक वातावरण तैयार किया जाना चाहिए.
देश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की उम्मीद तभी की जा सकती है जब स्वास्थ्य सेवाओं को आवंटित होने वाले बजट को खर्च नहीं बल्कि निवेश के रूप में लिया जाए.
आलोक मुखोपाध्याय कहते हैं, "भारत की नेशनल हेल्थ पॉलिसी में स्वास्थ्य बजट का लक्ष्य है 2.5 प्रतिशत, जबकि मौजूदा बजट 1.7 प्रतिशत है. स्वास्थ्य बजट होना चाहिए कम से कम 3.5 प्रतिशत."
वो कहते हैं, "हमें बजट को खर्च नहीं बल्कि निवेश के रूप में देखना चाहिए."
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