नाटकीय वीडियो कैसे फैला रहे हैं धार्मिक नफ़रत और महिला विरोधी विचार?

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- Author, अखिल रंजन
- पदनाम, बीबीसी ग्लोबल डिसइन्फ़ॉर्मेशन टीम
भारत में एक वीडियो बड़े पैमाने पर साझा किया गया और लाखों लोगों ने उसे देखा.
इस वीडियो में एक आदमी, बुरका पहने और एक बच्चे को लिए व्यक्ति पर हमला कर रहा है. हमला करने वाला आदमी दूसरे व्यक्ति का बुरका हटा देता है. मकसद ये दिखाने का होता है कि बुरके की आड़ में एक पुरुष है.
इस वीडियो क्लिप में हिंदी में संदेश लिखा था- बुरका पहन कर ‘बच्चों को किडनैप’ करने वाले अपराधियों से सावधान रहें.
इस साल की शुरुआत में ये वीडियो यूट्यूब पर प्रकाशित हुआ और डिलीट होने से पहले इसे 2.9 करोड़ लोगों ने देखा.
लेकिन इसमें असल बात न बताई गई और न दिखाई गई. दरअसल, ये एक 'स्क्रिप्टेड वीडियो' था, जिसमें शौकिया कलाकारों ने अभिनय किया था.
भारत में मनोरंजन के नाम पर स्क्रिप्टेड वीडियो (पहले से तैयार थीम पर बनाए गए वीडियो) को एक सच्ची घटना के रूप में सोशल मीडिया पर साझा करने का चलन लगातार बढ़ रहा है.
अक्सर इन वीडियो में ग़लत दावे किए जाते हैं और कई बार ये धार्मिक नफ़रत और महिलाओं के ख़िलाफ़ नफ़रत को हवा देते हैं.
सच मान लेने का ख़तरा
कई बार ये शिकायत की जाती है कि भारत में मई 2014 में जबसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सत्ता में आई है, धार्मिक समुदायों के बीच तनाव बढ़ा है, ख़ासकर हिंदुओं और मुसलमानों में.
इन समुदायों को टार्गेट बनाने वाली झूठी कहानियां, महिलाओं के ख़िलाफ़ मॉरल पुलिसिंग को भी बढ़ावा देती हैं.
ये नाटकीय रूपांतरण वाले वीडियो हिंदी, तमिल, मलयालम, गुजराती, मराठी और तेलुगू समेत कई भारतीय भाषाओं में पहुंच गए हैं.
यहां तक कि कभी कभी तो मीडिया संस्थानों को भी इन नाट्य रूपांतरित फ़ेक वीडियो के सच्ची ख़बर होने का धोखा हो जाता है.
कई सारे नाटकीय वीडियो में दिखाया जाता है कि बच्चों को किडनैप करने के लिए व्यक्ति ने बुरका पहन लिया है.
पिछले कुछ सालों में इसका असर असल ज़िंदगी में भी दिखने लगा है. जब बच्चा चोरी के संदेह में कई लोगों पर भीड़ ने हमला कर दिया. तब भारत के कई राज्यों में प्रशासन को इस तरह के फर्जी वीडियो के ख़िलाफ़ चेतावनी जारी करनी पड़ी.

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ये वीडियो क्यों ख़तरनाक हैं?
इन नाटकीय वीडियो में ग़लत जानकारी का इस्तेमाल किया जाता है जो सोशल मीडिया पर दर्शकों को भ्रम में डाल देते हैं.
कुछ में डिस्क्लेमर दिया जाता है लेकिन ये या तो बीच में या वीडियो के अंत में होते हैं.
अधिकांश में अंग्रेज़ी में लिखा होता है जो सभी दर्शक नहीं समझ पाते.
फ़ैक्ट चेक करने वाली वेबसाइट 'आल्ट न्यूज़' के अनुसार, बुरका पहने पुरुष की वीडियो क्लिप में इसके काल्पनिक होने का डिस्क्लेमर दिया गया था. लेकिन ये केवल कुछ सेकेंड के लिए ही था. हालांकि बाद में वीडियो बनाने वाले ने ही इसे डिलीट कर दिया.
कुछ अन्य वीडियो बनाने वाले अपने वीडियो को अधिक वास्तविक दिखाने के लिए सीसीटीवी का टैंपलेट इस्तेमाल करते हैं.
इसी तरह का एक वीडियो दिसंबर 2021 में वायरल हुआ था. इसे बिना तथ्यों के इस दावे के साथ साझा किया गया कि मुस्लिम पुरुष खाने में नशीला पदार्थ मिलाकर हिंदू लड़कियों को बेहोश करने की कोशिश कर रहे थे.
वीडियो के कमेंट सेक्शन में इस्लाम विरोधी कमेंट देख कर लगता है कि कई यूज़र्स इसे सच मान बैठे थे. एक यूज़र ने लिखा, “लव जिहाद से सावधान.”
इस तरह के वीडियो हैदराबाद के क्रिएटर वेंकट सीपाना ने बनाए, जिसमें सीसीटीवी क्लिप जैसे टेंपलेट इस्तेमाल किया गए थे. उनके यू ट्यूब चैनल पर 12 लाख सब्सक्राइबर और 400 से अधिक वीडियो हैं.
एक क्लिप में एक टेलर को दिखाया गया है जो एक महिला के साथ ग़लत बर्ताव करता है. इसे ट्विटर और फ़ेसबुक पर बड़ी संख्या में साझा किया गया.
इसमें दावा किया गया कि एक मुस्लिम, हिंदू महिला के साथ बदतमीज़ी कर रहा है.
वीडियो में कहा गया, “हिंदू बहनों और बेटियों से अपील है कि वे मुसलमानों की दुकानों पर न जाएं, वे बुरी मानसिकता के लोग हैं.”
सीपाना ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने ये वीडियो लोगों में ‘जागरूकता फैलाने’ और ‘असल ज़िंदगी का सच’ बयान करने के लिए बनाया था.
हिंसा भड़काने में योगदान
पत्रकार और डिसइनफ़ॉर्मेशन रिसर्चर अलीशान जाफ़री कहते हैं कि हो सकता है कि वायरल होने वाले नाटकीय रूपांतरण वाले वीडियो क्लिप का सच्चाई से कोई लेना देना न हो. लेकिन वो समाज में मौजूदा धार्मिक पूर्वाग्रहों को और गहरा करते हैं.
उनके मुताबिक, “ये वीडियो पहले से ही बंटे हुए और ध्रुवीकृत समाज में आग में घी डालने का काम कर रहे हैं. इस तरह के अधिकांश वीडियो में कुछ समुदायों, ख़ासकर मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है और जब ये वायरल हो जाते हैं तो अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ व्यवस्थित हिंसा भड़काने में योगदान करते हैं.”
कभी कभी इन नाटकीय वीडियो को ऑनलाइन ग़लत जानकारियां फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. ये वीडियो सबसे पहले भ्रम पैदा करते हैं.
कुछ वीडियो में दोस्तों, परिवार के सदस्यों और ज़्यादा उम्र के अंतर वाले लोगों के बीच नाजायज संबंधों को दिखाया जाता है.

बीते मई महीने में ऐसे दो वीडियो बहुत साझा किए गए जिसमें हिंदुओं पर हमले का ग़लत दावा किया गया था.
पहले वीडियो में भगवा रंग का कपड़ा पहने एक आदमी को दिखाया गया जो अपनी बहन से शादी करने दावा करता है.
दूसरे वीडियो में वही महिला उसी आदमी के सामने बुरका पहने खड़ी है और वो कहता है कि वह उसे हिंदू धर्म में धर्मपरिवर्तन कराने के लिए शादी कर रहा है.
ट्विटर पर ये क्लिप साझा करते हुए कुछ लोगों ने ये दावा किया कि ये आदमी हिंदू है और उसने अपनी बहन को मुस्लिम महिला के रूप में दिखाया है.

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ट्विटर, फ़ेसबुक, यूट्यूब का क्या है कहना?
इन दोनों वीडियो में दिखने वाले पुरुष और महिला कई अन्य वीडियो में भी अलग अलग रोल करते हुए दिखते हैं.
शुरुआती वीडियो एक यूट्यूब चैनल पर देखा जा सकता है जिसके चार लाख फ़ॉलोवर हैं और ये अक्सर ही नाटकीय वीडियो पोस्ट करता है.
जब इस चैनल के मालिक विक्रम मिश्रा से बीबीसी ने पूछा कि क्या उन्हें इस बात की जानकारी है कि उनके वीडियो को लोग सच मानते हैं, उनका जवाब था, “हम सभी हिट होना चाहते हैं. मैं ऐसे वीडियो बनाता हूं जो समाज के ट्रेंड के हिसाब से अच्छा प्रदर्शन करे.”
उन्होंने कहा कि ये वीडियो “सिर्फ मनोरंजन और विव्यूज़ के लिए बनाए जाते हैं क्योंकि 12 लोगों की टीम अपने यूट्यूब चैनल से ही आजीविका कमाती है.”
बीबीसी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों से सवाल किया कि बिना संदर्भ के साझा किए जाने वाले इन नाट्यरूपांतरण वाले वीडियो पर उनकी क्या नीति है?
फ़ेसबुक (मेटा) प्रवक्ता ने कहा, “फ़ेसबुक पर हिंसा भड़काने वाली सामग्री को प्रतिबंधित करने की उनकी स्पष्ट नीति है और इन नियमों का उल्लंघन करने वाली सामग्रियों को वे हटा देते हैं.”
यूट्यूब ने भी कहा, “हिंसक और ग्राफ़िक कंटेंट, ग़लत जानकारियां और भ्रम फैलाने वाले या गंभीर नुकसान पहुंचाने की क्षमता वाली भ्रामक सामग्रियों को प्रतिबंधित करने के उनके कड़े नियम हैं."
एक्स, जिसे पहले ट्विटर के रूप में जाना जाता था, उसने एक ऑटो रिप्लाई में जल्द संपर्क करने के लिए कहा.
नाटकीय वीडियो को कैसे पहचानें?
अधिकांश वीडियो देखने में ही लगते हैं कि उन्हें तय स्क्रिप्ट के आधार पर बनाया गया है और ऐसे वीडियो अन्य देशों में भी बनाए और साझा किए जाते हैं.
भारत और एशिया के अन्य देशों में काम करने वाले ‘फ़ैक्ट क्रीसेंडो’ के मैनेजिंग एडिटर हरीश नायर कहते हैं, ' भारत में लोग इसे सच मान लेते हैं और वीडियो देश में वायरल हो जाता है' क्योंकि ये ‘ज़्यादा से ज़्यादा दकियानूस दर्शकों’ को भाता है.'
उनका ये भी मानना है कि भारतीय ऐसे वीडियो शेयर करते हैं जिनके बारे में उन्हें लगता है कि ये ‘सार्वजनिक हित’ में जारी किए गए हैं.
उनके अनुसार, "भारत में नाटकीय वीडियो ग़लत जानकारी फ़ैलाने का प्रमुख ज़रिया नहीं हैं लेकिन उनका समाज पर बहुत अधिक असर है क्योंकि वे पहले से मौजूद मान्यताओं और भावनाओं पर मुहर लगाते हैं."
दिल्ली के एक डिज़िटल राइट्स एडवोकेसी ग्रुप इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन के पॉलिसी डायरेक्टर प्रतीक वाघरे कहते हैं, “निम्न मीडिया साक्षरता समस्या का एक पहलू है लेकिन ये एक ऐसे समाज में हो रहा है जहां अभी भी सामाजिक विभाजन मौजूद हैं और लोग पहले से ही ऐसा सोचते हैं.”
लेकिन किसी थीम पर नाट्य रूपांतरण करके बनाए गए वीडियो को पहचानने के कई तरीक़े हैं.
भारत में कई भाषाओं में फ़ैक्ट चेक करने वाली मीडिया ‘न्यूज़चेकर’ की मैनेजिंग एडिटर रूबी धींगरा ने कहा कि दर्शकों को कैमरा एंगल, जगह, प्रतिक्रियाएं और वीडियो में इस्तेमाल होने वाली भाषा को लेकर सतर्क रहन चाहिए.
उनके मुताबिक, लोग ही पता लगा सकते हैं कि क्या एक्टिंग कर रहे लोग कैमरे से छिप रहे हैं या उसका सामना कर रहे हैं और क्या वे स्वाभाविक तरीके से बातचीत कर रहे हैं या ओवरएक्टिंग कर रहे हैं.
धींगरा के अनुसार, ये बहुत अटपटा है कि एक पूरी घटना कई कैमरे से रिकॉर्ड की जाती है और बिना किसी रुकावट के, जैसे कोई पहले से लिखी स्क्रिप्ट पर वीडियो बना हो.
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