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इमरान ख़ान और बुशरा बीबी को सज़ा: क़ानूनी विशेषज्ञों ने सुनवाई को बताया 'मज़ाक', आगे क्या हैं विकल्प
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पत्नी बुशरा बीबी ने कोर्ट की ओर से सज़ा सुनाए जाने के बाद सरेंडर कर दिया है. इमरान ख़ान और बुशरा बीबी को बुधवार को पाकिस्तान की एक कोर्ट ने 14 साल जेल की सज़ा सुनाई है.
इमरान ख़ान और उनकी पत्नी पर आरोप है कि उन्होंने सरकारी उपहारों को निजी फ़ायदे के लिए ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से बेचा.
इमरान ख़ान ने साल 2018 में बुशरा बीबी से निकाह किया था. ये उनकी तीसरी शादी है. उनकी पहली दो शादियां टूट चुकी हैं.
इमरान ख़ान को भ्रष्टाचार के मामले में सज़ा सुनाई गई है. वो पहले से ही भ्रष्टाचार के एक अन्य मामले में तीन साल की सज़ा काट रहे हैं.
इमरान ख़ान को पिछले साल अगस्त में गिरफ़्तार किया गया था, तब से वह जेल में ही हैं.
इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ ने कोर्ट के फ़ैसले को पाकिस्तान के न्यायिक इतिहास का एक और दुखद दिन कहा है. पीटीआई ने कहा है कि अदालत के इस फ़ैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जाएगी.
मंगलवार को आए फ़ैसले को भी इमरान ख़ान और उनकी पार्टी ने ‘फ़र्जी’ कहा था.
इमरान ख़ान को मंगलवार को साइफ़र केस यानी गोपनीय सरकारी दस्तावेज़ लीक करने के मामले में 10 साल की सज़ा सुनाई गई थी.
पाकिस्तान में आठ फ़रवरी को आम चुनाव होने हैं. इमरान ख़ान पाबंदी के कारण ये चुनाव नहीं लड़ सकते हैं.
हालांकि, इमरान ख़ान ने देश के लोगों से अपील की है कि वे आठ फरवरी के मतदान में हिस्सा लें और अपने ‘अधिकार का इस्तेमाल करते हुए नाइंसाफी का बदला लें.’
कोर्ट के फ़ैसलों को लेकर क्या कहते हैं क़ानूनी विशेषज्ञ
इमरान ख़ान को दो दिन के अंदर दो मामलों में सज़ा सुनाए जाने के बाद बीबीसी ने क़ानून के कई विशेषज्ञों से बात की.
वकीलों का कहना है कि इमरान ख़ान और उनकी पत्नी के पास ऊपरी अदालतों में अपील का अधिकार है. वो सज़ा निलंबित कराने की अपील भी कर सकते हैं. वकीलों और क़ानूनी विशेषज्ञों ने सुनवाई की प्रक्रिया पर भी बात की.
क़ानूनी विशेषज्ञ अब्दुल मोइज़ जाफ़री कहते हैं कि इस मामले में हुई सुनवाई एक तरह का मज़ाक थी.
मोइज़ मानते हैं कि कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बेवजह की तेज़ी दिखाई.
जाफ़री कहते हैं, “क्या वो सोचते हैं कि लोग ये मानेंगे कि इमरान ख़ान सरकार की गोपनीय बातें लीक कर रहे थे? और जिस तेज़ी के साथ सुनवाई की गई, उनसे लोगों के मन में और भी संदेह पैदा हुए हैं.”
वकील हसन रज़ा पाशा कहते हैं कि फ़ैसले के ख़िलाफ़ ऊपरी अदालत में अपील का विकल्प मौजूद है. सज़ा पर रोक के लिए भी अपील की जा सकती है.
पाशा के मुताबिक, “इमरान ख़ान की टीम फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील कर सकती है और सज़ा पर रोक लगाने का आवेदन कर सकती है. सुनवाई को लेकर क़ानूनी पहलुओं के अलावा हमें नैतिक और लोगों की राय को भी देखना होगा, उन्हें लेकर सवाल पूछे जाएंगे.”
वो कहते हैं, “लोगों की प्रतिक्रिया के बारे में अभी अंदाज़ा लगाना जल्दीबाज़ी होगी. लेकिन अदालत के ये फ़ैसले पीटीआई के वोटरों को एकजुट कर सकते हैं. हालांकि, ऐसा होता है या नहीं, ये आगे पता चलेगा.”
फ़ैसले पर सवाल
वकील शइक़ उस्मानी की राय क़ानून के दूसरे जानकारों से थोड़ी अलग है लेकिन वो भी मानते हैं कि साइफ़र केस में बचाव पक्ष अपने अधिकार का सही तरह से इस्तेमाल नहीं कर सका.
शइक़ उस्मानी ने कहा, “जहां तक साइफ़र केस का मामला है, सुनवाई में जल्दीबाज़ी नहीं की गई लेकिन वहां एक कमज़ोरी उजागर होती है. बचाव पक्ष के वकील को गवाहों को क्रॉस एक्ज़ामिन करने का मौका नहीं मिला. ऐसा होने की वजह ये है कि वो सुनवाई में मौजूद नहीं थे और बार-बार सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं रहने की गुजारिश कर रहे थे.”
पाकिस्तान की ह्यूमन राइट्स काउंसिल ने भी फ़ैसले की आलोचना की है.
काउंसिल ने एक बयान जारी किया है और कहा है, “निष्पक्ष सुनवाई तय करने की जो अहम बातें हैं, उनमें ठीक तरह से क्रॉस एक्ज़ामिन करने का अधिकार मिलना और मजबूती के साथ बचाव करना शामिल हैं. फ़ैसले को बारीकी से पढ़ने के बाद पता चलता है कि ये सारी प्रक्रिया कैसे पूरी की गई, उससे निष्पक्ष क़ानूनी प्रक्रिया के सिद्धांतों के संभावित उल्लंघन के संकेत मिलते हैं.”
भारत पर क्या होगा असर?
जुलाई, 2018 में चुनाव से दो हफ़्ते पहले नवाज़ शरीफ़ को भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराया गया था और 10 साल की क़ैद की सज़ा मिली थी. पनामा पेपर्स मामले में नवाज़ शरीफ़ को पाकिस्तान में चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था.
पाकिस्तान में 2013 से 2015 तक भारत के उच्चायुक्त रहे टीसीए राघवन ने अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू से कहा, ''इमरान ख़ान और उनकी पार्टी पीटीआई के साथ जो हो रहा है, वही नवाज़ शरीफ़ और पीएमएल-एन के साथ अतीत में हुआ था. पाकिस्तान में भारत इसे एक और चुनाव से ज़्यादा कुछ नहीं देखेगा. हमें पूरी तस्वीर देखने के लिए थोड़ा इंतज़ार करना होगा.''
2009 से 2013 तक पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे शरत सभरवाल ने द हिन्दू से कहा, ''इमरान ख़ान को दोषी ठहराकर सज़ा देना चौंकाता नहीं है. 2018 में पाकिस्तान के चुनाव को जैसे मैनेज किया गया था, यह उसी का प्रतिबिंब है.''
''2018 में सेना इमरान ख़ान के साथ खड़ी थी और अभी उनके ख़िलाफ़ है. अंतर इतना ही है. 2017-18 में जिस तरह से नवाज़ शरीफ़ की सज़ा पर सवाल उठ रहे थे, उसी तरह इमरान ख़ान की सज़ा भी निष्पक्ष नहीं है. मैनेज किए गए चुनाव से पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता का संकट ख़त्म नहीं होगा और न ही आर्थिक संकट.''
अगले हफ़्ते पकिस्तान का चुनावी नतीजा आएगा. शरत सभरवाल से हिन्दू ने पूछा कि पाकिस्तान के चुनावी नतीजे का असर भारत पर क्या पड़ेगा?
इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''दोनों देशों के बीच व्यापार फिर से शुरू हो सकता है. लेकिन दोनों देशों के बीच संबंध किस करवट बैठेगा, यह सेना पर ही निर्भर करेगा.''
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