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पाकिस्तान के संसदीय चुनावों से इमरान की पार्टी को बाहर रखने की तिकड़म?
- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद
पाकिस्तान ने देश में आठ फ़रवरी को अगला आम चुनाव कराए जाने की घोषणा की है. ये घोषणा देर से हुई है लेकिन चुनाव को आगे टाले जाने की अफवाह अभी भी नहीं बंद हुई है.
दूसरी ओर इमरान के पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) पार्टी के चेयरमैन पद से हटने से चुनावी प्रक्रिया को लेकर आशंका पैदा हो गई है.
पाकिस्तान चुनाव आयोग की घोषित तारीख़ पर अगर चुनाव कराए जाने हैं तो यह प्रक्रिया लगभग आठ हफ़्तों में पूरी होनी है.
हालांकि पहले की तरह पाकिस्तान में चुनावी माहौल बिल्कुल ठंडा पड़ा हुआ है.
इमरान के बिना चुनाव
पिछले कुछ महीनों से चुनाव आयोग ने पीटीआई को निशाने पर ले रखा था और अंतर पार्टी चुनाव को विवादित घोषित कर रद्द कर दिया.
आयोग ने आंतरिक चुनाव कराने के लिए पार्टी को 20 दिन का समय दिया और वो भी इस हिदायत के साथ कि अगर वो ऐसा करने में असफल रहती है तो अपना चुनाव चिह्न ‘क्रिकेट बैट’ खो बैठेगी.
क़ानूनी आधार पर चुनाव लड़ने से रोकने की साज़िश को भांपते हुए पार्टी ने एक रणनीति अपनाई. जेल में इमरान ख़ान से मीटिंग के बाद पार्टी के वकील बैरिस्टर अली जाफ़र ने कहा कि वो नहीं चाहते कि चुनाव आयोग को कोई बहाना दिया जाए.
उन्होंने कहा, “इमरान ख़ान ने कहा है कि उनके पार्टी चेयरमैन रहते, पीटीआई के चुनाव चिह्न छीने जाने, चुनाव लड़ने से रोकने या उम्मीदवारों के नामांकन रद्द करने का चुनाव आयोग को कोई क़ानूनी बहाना न दिया जाए.”
चूंकि कई मामलों में इमरान ख़ान को सज़ा हुई है और दोषी ठहराया गया है इसलिए चेयरमैन के तौर पर उनके फ़ैसलों को आयोग कभी भी रद्द कर सकता है और इससे पार्टी का राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ जाएगा.
इसलिए वो पद से हट गए और बैरिस्टर गौहर अली को चेयरमैन मनोनीत किया.
इमरान की पार्टी निशाने पर?
अली ज़ाफ़र ने कहा, “यह पार्टी के अंदर कोई, ‘एक के बिना’ फ़ार्मूला या बग़ावत नहीं है और फ़िलहाल के लिए एक उपयुक्त चुनाव है. पीटीआई का मतलब इमरान ख़ान है और इससे फर्क नहीं पड़ता कि वो पेपर पर चेयरमैन हैं या नहीं.”
कुछ विश्लेषकों के अनुसार, इमरान द्वारा मनोनीत पार्टी के नए नेतृत्व को बिना विरोध स्वीकार कर लिया गया, जिससे पता चलता है कि पीटीआई पर अभी भी उनकी पकड़ क़ायम है.
वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद कहते हैं, “इस कुर्बानी के बावजूद, मुझे संदेह है कि इमरान ख़ान पार्टी को लड़ाई में खड़ा रख पाएंगे. पार्टी टूट चुकी है, कुछ लोग चले गए और उनकी ही तरह कुछ दमन का शिकार हैं या फरार चल रहे हैं. ऐसा लगता है कि मतगणना पत्र पर क्रिकेट बैट का चुनाव चिह्न भी नहीं रहेगा.”
ज़मीनी हालात भी कुछ ऐसे ही हैं. पीटीआई के स्थानीय नेताओं या टिकट के उम्मीदवारों ने जनसभा करने की कोशिश तो उन्हें धमकाया गया और गिरफ़्तारी हुई. इसमें आने वाले लोग भी पुलिसिया दमन का शिकार हुए.
हारून रशीद कहते हैं, “इससे पार्टी ज़मीन से कट गई है. असहाय लोग सोचते हैं कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि वो किसे समर्थन करना चाहते हैं. पर्दे के पीछे से चाल चलने वाले (सेना) पहले से तय कर चुके हैं कि उन्हें किसे सत्ता में लाना है किसे नहीं. इसीलिए चुनाव प्रक्रिया में लोगों का ख़ास उत्साह नहीं है.”
अदालती मुकदमों में फंसी पार्टियां
पाकिस्तान की दो राजनीतिक पार्टियां क़ानूनी मोर्चे पर अपने वजूद का संघर्ष लड़ रही हैं.
इमरान ख़ान के अलावा, नवाज़ शरीफ़ को कई मामलों में 2018/19 में दोषी ठहराया जा चुका है और वो अपने क्लीनचिट की कोशिश में जुटे हैं.
सिर्फ हालात बदले हैं. पिछली बार नवाज़ शरीफ़ सेना के ख़िलाफ़ खड़े थे, इस बार निशाने पर इमरान ख़ान हैं. सेना को पाकिस्तानी राजनीति का असली किंगमेकर माना जाता है.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इमरान ख़ान का भविष्य धुंधला है जबकि नवाज़ शरीफ़ अगले प्रधानमंत्री हो सकते हैं.
अक्टूबर में जबसे नवाज़ शरीफ़ पाकिस्तान लौटे हैं, कोई बड़ी रैली नहीं की है. सिर्फ लौटने के दिन मीना-ए-पाकिस्तान पर एक रैली की थी. चुनाव से पहले वो अपने सारे केस रफ़ा दफ़ा कराने में लगे हैं.
वो पहले ही एवेनफ़ील्ड अपार्टमेंट केस में बरी हो गए हैं और अन्य मामलों में सुनवाई जारी है.
हालांकि उनकी बेटी मरियम नावज़ पीएमएल-एन के समर्थकों की रैली कर सकती हैं लेकिन उनकी सक्रियता नदारद है.
विश्लेषक अयाज़ अमीर का मानना है कि पीएमएल-एन के नेता भी चुनाव प्रचार को अनिच्छुक लगते हैं. चुनाव में क्या मुद्दा होगा, इसे लेकर असमंजस है. उन्हें इसका भी एहसास है कि किंगमेकर के समर्थन से वो चुनाव तो जीत सकते हैं कि वो वोटरों के पास कैसे जाएं जबकि तीन तिकड़म से सबसे लोकप्रिय पीटीआई को चुनाव से बाहर रखा जा रहा है.
अयाज़ कहते हैं, “फ़र्ज़ करिए 9 मई के हमले के बाद से ही जेल में बंद पीटीआई महिला पीएमएल-एन उम्मीदवार के ख़िलाफ़ नामांकन भरती हैं, तब क्या होगा? प्रिंटिंग प्रेस अभी भी ऑर्डर का इंतज़ार कर रहे हैं.”
जनता में अविश्वास और असंतोष
कई राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि चुनाव को लेकर अभी भी अविश्वास का माहौल है.
राजनीति विज्ञानी डॉ. हसन अस्करी कहते हैं, “चुनाव आयोग लगातार कह रहा है कि चुनाव तय समय पर होंगे लेकिन लगता है कि लोगों ने भरोसा खो दिया है. हमने पहले ही संसद भंग होने के 90 दिनों के अंदर चुनाव कराए जाने की सीमा को तोड़ दिया है. इसलिए लोगों को भरोसा नहीं है.”
डॉ. अस्करी का मानना है कि राज्य और इसके विषय के बीच भरोसे का बंधन टूट चुका है. लोगों का मोहभंग है. हो सकता है कि आने वाले समय में चुनावी गहमागहमी बढ़े लेकिन अभी सब ठंडा है.
हारून रशीद कहते हैं, “पाकिस्तान का अमीर और मध्य वर्ग तबका चुनाव प्रचार में हिस्सा नहीं लेता है, बल्कि ग़रीब और मज़दूर वर्ग ही पंडाल भरते हैं. लेकिन उनके पास खाने के लाले पड़े हैं, वे दो जून की रोटी कमाने में लगे हैं. तेल इतना महंगा है कि कौन खर्च करके रैली में जाएगा.”
सुरक्षा के ख़तरे
जनता के कटे रहने के कई कारणों में से एक कारण है सुरक्षा ख़तरा.
जुलाई में पाकिस्तान अफ़गान सीमा के पास बजौर ज़िले में मौलाना फ़ज़ल-उर-रहमान के जेयूआई-एफ़ चुनावी रैली को निशाना बनाया गया जिसमें 54 लोगों की मौत हो गई और 200 लोग घायल हो गए.
इस्लामिक स्टेट खोरासन ग्रुप ने इसकी ज़िम्मेदारी ली. यह घटना पाकिस्तान में सुरक्षा के हालात बयां करती है. इसके अलावा जनसभाओं में राजनेताओं के मारे जाने का खूनी इतिहास भी रहा है.
2008 और 2013 के चुनावों में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और आमी नेशनल पार्टी को पारिस्तान तालिबान और अन्य चरमपंथियों ने निशाना बनाया.
पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ़ कान्फ़्लिक्ट एंड सिक्युरिटी स्टडीज़ के अनुसार, पिछले साल के मुकाबले इस साल की पहली छमाही में आतंकी घटनाओं में 79% की वृद्धि हुई है.
जनवरी 2023 में पाकिस्तान तालिबान ने अपने ग्रुप के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा करने के लिए पीपीपी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो और पूर्व पीएम शहबाज़ शरीफ़ का नाम लेकर धमकी दी थी.
ऐसे हालात में अफ़ग़ान सीमा के क़रीब बलोचिस्तान और उत्तर पूर्व ख़ैबर पख़्तूनख्वा प्रांतों में ख़तरा बढ़ गया है.
चुनाव के शेड्यूल का इंतज़ार
हालांकि चुनाव आयोग ने मतदान की तारीख़ घोषित कर दी है लेकिन अभी पूरा शेड्यूल जारी नहीं किया है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ने संकेत दिया है कि पूरा शेड्यूल दिसम्बर के मध्य तक जारी हो सकता है लेकिन जबतक ये घोषित नहीं हो जाता लोगों का संदेह बरकार रहेगा.
एक बार शेड्यूल घोषित हो जाता है तो नामांकन से लेकर चुनाव नतीजों तक 56 दिनों का समय लगेगा.
विश्लेषक सलमान ग़नी का मानना है कि शेड्यूल घोषित होने के बाद ही चुनाव प्रचार अभियान शुरू होगा.
वो कहते हैं, “अभी भी कुछ समय है, पार्टियां उम्मीदवारों के टिकटों को अंतिम देने और अन्य प्रशासनिक चीजों को हल करने में लगी हुई हैं. शेड्यूल घोषित होने के बाद लोगों की रुचि और गहमागहमी देखने को मिलेगी.”
हालांकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने अपने चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत कर दी है लेकिन वरीष्ठ पत्रकार हारून रशीद का मानना है कि वोटरों में उत्साह ग़ायब है.
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