यहां हीरा तलाशने के 'नशे' में पूरी उम्र झोंक देते हैं ये लोग

- Author, विष्णुकांत तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
स्वामीदीन पाल के घर पर ख़ुशियों का माहौल है. उनकी और उनके बेटे की सालों की मेहनत रंग लाई है.
पन्ना के नारंगी बाग में रहने वाले इस परिवार को हाल ही में 32 कैरट के 80 सेंट का हीरा मिला है.
पाल परिवार को उम्मीद है कि इससे उन्हें डेढ़ करोड़ रुपए तक मिल सकते हैं.
अब दिवाली के आसपास सरकारी तरीक़े से उनको मिले हीरे की नीलामी होगी. उससे जितने रुपये मिलेंगे, उसमें से एक निश्चित सरकारी राशि काटकर बाक़ी रक़म स्वामीदीन के ख़ाते में जमा कर दी जाएगी.
लेकिन इतना क़ीमती हीरा मिलने के बावजूद पाल परिवार आराम करने या थमने के मूड में नहीं है.

बीबीसी से बात करते हुए स्वामीदीन पाल ने कहा, “हमने बहुत समय तक मज़दूरी की. मज़दूरी करके अपना छोटा सा घर बनाया. फिर उम्र के इस पड़ाव में आकर बेटे के साथ हीरा खोजने के लिए खदान लगाई. चार से पाँच साल हो गए लेकिन कुछ नहीं मिला. अब जाकर हमारी मनोकामना पूरी हुई है. उम्मीद है कि चीज़ें अब बेहतर होंगी.”
स्वामीदीन के बेटे जमुना पाल ने कहा कि जिस दिन उन्हें हीरा मिला, उस रात वो सो नहीं पाए थे. उनका मन कर रहा था वो बस नाचते रहें.

वो कहते हैं, “अब तो मैं खदान का ही काम करूंगा. हीरा मिल गया है तो मैं अब मज़दूरी नहीं करूंगा. चाहे मेरे पास खाने को कुछ ना हो तब भी मैं हीरा खदान में ही काम करूंगा.”
हीरे की तलाश में जुटे स्वामीदीन जैसे हज़ारों लोग हैं, जो भारत के कोने-कोने से मध्य प्रदेश के इस छोटे से शहर पन्ना में आकर अपनी किस्मत आज़माते हैं.
हीरा यहाँ आए लोगों के लिए सपना, जुनून और नशा है और रातोंरात ज़िंदगी बदलने का ज़रिया है.

पीढ़ियों से हीरों की खोज
भारतीय खान ब्यूरो, भारत सरकार के खान मंत्रालय का एक हिस्सा है. इसकी 2022 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, पन्ना में देश के 90 प्रतिशत से अधिक हीरे के भंडार हैं, जिनकी मात्रा 28.597 मिलियन कैरट है.
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से क़रीब 380 किलोमीटर, इस शहर में हीरे लोगों की जीवनशैली, बातचीत और उम्मीदों का अभिन्न हिस्सा हैं. सुबह होते ही हज़ारों लोग अपने-अपने घरों से निकल पड़ते हैं हीरे की तलाश में.
यहाँ कई ऐसे परिवार भी हैं जो पीढ़ियों से हीरों की खोज में जुटे हैं. ऐसे ही एक शख़्स हैं, 67 साल के प्रकाश शर्मा, जिन्हें उनके क़रीबी कक्कू नाम से भी जानते हैं.
उनके पिता ने भी हीरे की तलाश में ज़िंदगी गुज़ार दी. पन्ना में वो एक तंबू लगाकर रहते हैं तो हर सुबह निकल पड़ते हैं, अपने सपने यानी हीरे खोजने.

अब से ठीक 50 साल पहले उन्हें पहली बार हीरा मिला था. पुराने दिन याद करते हुए वो कहते हैं, “मैंने 1974 में अपनी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी की थी. उन दिनों में किसी भी विभाग में एक अच्छी नौकरी मिल सकती थी, लेकिन मेरा मन कुछ और ही सोच चुका था. इंटर पास करने के कुछ वक़्त पहले मुझे पहला हीरा मिला था जो लगभग छह कैरट का था और तभी मैंने फैसला किया कि मैं हीरे ही खोजूंगा.”
प्रकाश कहते हैं कि हीरों के प्रति दीवानगी के कारण उन्होंने ताउम्र शादी नहीं की. वो अब अपने भाइयों और उनके परिवार के साथ रहते हैं और पूरी तरह से हीरे की खोज के प्रति समर्पित हैं.
वो कहते हैं, "ये मेरे लिए एक नशे जैसा है. अगर मैं हीरे की खोज ना करूं, तो बीमार महसूस करता हूँ."

हीरे ने बदली ज़िंदगी
पन्ना के पास ही रहुनिया गांव के रहने वाले मुलायम सिंह को 2020 में लगभग 60 लाख रुपए का हीरा मिला था.
आज मुलायम सिंह ने एक छोटा पक्का मकान बनवा लिया है, बच्चों की पढ़ाई और सेहत का बेहतर ख़्याल रख पा रहे हैं.
वो कहते हैं, “हम लोग बचपन से हीरा खदानों का काम कर रहे हैं, पिता जी भी यहीं काम करते थे. काफ़ी समय बाद हमारी किस्मत खुली. हम चार लोगों ने साझेदारी में हीरा खदान लगाई थी और इस बार जब हीरा मिला तो उससे जो भी पैसा मिला, उसका इस्तेमाल हमने घर बनाने, बच्चों की पढ़ाई और खेत ख़रीदने में किया.”
वर्षों का संघर्ष

लेकिन यहाँ हर किसी की कहानी स्वामीदीन या मुलायम सिंह जैसी नहीं है. ओडिशा से आए सुखदेव कई सालों से यहाँ हीरा खोज रहे हैं लेकिन वो हीरे की चमक से महरूम हैं.
वो कहते हैं, "मैंने यूट्यूब पर एक वीडियो देखा, जिसमें लोगों से पन्ना आकर किस्मत आज़माने की बात की गई थी. मैंने अपना सामान बांधा और आ गया. लेकिन अब तक मेरी किस्मत खुली नहीं है."
ऐसे ही सालों से हीरा खोज रहे हैं अमित श्रीवास्तव, जो पन्ना के ही सिंहपुर इलाक़े के रहने वाले हैं.
वो कहते हैं, “हमारे यहाँ रूंज नदी है, जिसमें बहुत हीरे मिलते हैं. उसमे हीरे खोजता हूँ. बरसात के दिनों में यहाँ हीरे मिलते हैं. हालांकि अब तक मुझे नहीं मिले हैं लेकिन हीरों के लालच में ही मैं यहाँ आता हूँ.”
वहीं सब्ज़ी बेचने वाले रमेश कुशवाहा कहते हैं कि रातोरात अमीर बनने की चाहत में वो हीरा खोज रहे हैं.
वो कहते हैं, “बारिश के दिनों में मैं हीरा खोजता हूँ और बाक़ी टाइम सब्ज़ी बेचता हूँ. सब्ज़ी बेचकर कोई एकदम से अमीर नहीं बन सकता इसलिए हीरे खोजने में जुटा हूं. मेरा एक दोस्त हीरे का काम करता है तो हीरे देखे ज़रूर बहुत सारे हैं लेकिन अब तक मिला नहीं. क़िस्मत में होगा तो एक दिन हीरा मिल भी जाएगा.”
हीरा खोजने के लिए क्या करना पड़ता है?

तो सवाल ये उठता है कि पन्ना में हीरे खोजने के लिए क्या करना पड़ता है.
अगर कोई वहाँ जाकर क़ानूनी तरीक़े से हीरा खोजना चाहे तो उसे किस प्रक्रिया का पालन करना होगा?
पन्ना में स्थित मझगवाँ खान, जिसे राज्य नियंत्रित नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी) संचालित करती है. ये देश का एकमात्र संगठित हीरा उत्पादन स्रोत है.
इसके अलावा पन्ना में, कोई भी 8x8 मीटर के भूखंड को पट्टे पर लेकर क़ानूनी रूप से वहां हीरे की खुदाई एक साल तक कर सकता है. इसके लिए उसे महज़ 200 रुपये सालाना खर्च करने होंगे. लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है कि जितना एरिया उसे पट्टे पर मिला है, उसमें उसे हीरा मिल ही जाए.
ऐसे में कई लोग ये आधिकारिक तरीक़ा अपनाने से बचते हैं.
हीरा मिलने के बाद क्या होता है?
सरकारी पट्टे पर मिली ज़मीन पर अगर किसी को निश्चित समयावधि में हीरा मिल जाता है तो वो हीरा को पन्ना में सरकार द्वारा नियुक्त सरकारी जौहरी के पास लेकर जाता है.
जहाँ ये जौहरी हीरे के रंग, चमक, आकार, दोष वगैरह के आधार पर उसका मूल्यांकन करता है. फिर हीरे के मूल्यांकन के आधार पर सभी डीटेल्स और हीरे की अनुमानित क़ीमत के साथ हीरा पाने वाले को एक रसीद दे दी जाती है और हीरे को सरकारी जौहरी के पास जमा कर दिया जाता है.
जौहरी फिर उस हीरे की एक बेस प्राइस तय करता है और फिर शुरू होती है नीलामी की प्रतीक्षा.
प्रत्येक तिमाही में या हीरों की उपलब्धता के आधार पर हीरा कार्यालय खुली नीलामी आयोजित करता है जहाँ कोई भी हीरे के लिए बोली लगा सकता है और उन्हें सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को बेचा जाता है.
हीरे की नीलामी से होने वाली कुल आय का 12.5 प्रतिशत भारत सरकार रखती है और बाक़ी राशि हीरा खनिक यानी हीरा पाने वाले के खाते में जमा कर देती है.

अवैध खनन ज़ोरों पर
लेकिन ऊपर दी गई प्रक्रिया कहानी का एक पहलू है. इससे अलग रोज़ाना पन्ना में हज़ारों लोग बिना पट्टे की सरकारी ज़मीन पर आपको हीरे की तलाश करते दिख जाएंगे.
बिना किसी डर के ये लोग रोज़ाना अपने तंबू, झोपड़ी या घरों से निकलकर अपनी मुहिम में जुट जाते हैं.
अधिकांश खनिकों (खुदाई करने वाले) को हीरा खनन में कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं मिला है.
ये लोग आमतौर पर पुरानी खानों के पास ही गड्ढा खोदते हैं. खनिक तब तक खोदते हैं, जब तक कंकडों वाली मिट्टी की परत तक नहीं पहुंच पाते. इसे स्थानीय भाषा में 'चाल' कहा जाता है.
फिर उस गड्ढे में पानी भरते हैं. फिर उस गीली मिट्टी को बारीक़ छन्नी से छानते हैं. फिर इसे धोकर सुखाया जाता है और छन्नी में जमा पत्थरों को इकट्ठा करके फिर बीनने की प्रक्रिया शुरू होती है. छन्नी में मौजूद असंख्य कंकड़ों से हीरा चुनने की अंतहीन प्रक्रिया.

स्थानीय लोगों और इस प्रक्रिया में जुटे कई लोगों ने हमसे बात करते हुए दावा किया कि पन्ना की रूंज नदी के किनारे या खाली पड़ी ज़मीनों पर लोग सुबह से फावड़ा लेकर खुदाई में जुट जाते हैं.
इसी तरह से खुदाई में जुटे एक शख़्स ने हमसे कहा, “मेरे पिता ने दशकों पहले एक छोटा सा हीरा पाया था और तब से उनकी कहानी हमने सुनी है. उन्होंने अपने जीवनभर हीरे की तलाश की, कुछ समय पहले उनका निधन हो गया और अब मैं उनके रास्ते पर चलते हुए हीरों की खोज कर रहा हूँ.”
इस शख़्स ने ये भी कहा कि उसे पता है कि वो अवैध तरीक़े का इस्तेमाल करते हुए हीरा खोज रहा है.
तो छन्नी में जमा पत्थरों में से कौन सा सामान्य कंकड़ है और कौन सा हीरा, इसकी पहचान कैसे होती है. इसके जवाब में एक खनिक ने कहा, “हीरा जब आप देखते हैं या छूते हैं तो शरीर में एक करंट सा दौड़ जाता है. लगता है मानो पत्थर ज़िंदा हो उठा. हीरे के दीवाने इसमें धोखा नहीं खाते.”
इनमें से ज़्यादातर लोगों ने कहा कि अगर क़ानूनी तरीक़े से किसी को हीरा मिलता है और वो उसका मूल्यांकन कराने के लिए सरकारी जौहरी के पास जाता है तो ये बात कई बार उसके लिए नुक़सानदेह साबित हो सकती है क्योंकि इससे अपराधियों के उन तक पहुंचने का ख़तरा पैदा हो जाता है.
पैसे मिलने की स्थिति में चोरी का डर भी होता है. इस वजह से ये लोग सरकारी तरीक़ा अपनाने से डरते हैं.
हीरों की अवैध ख़रीदो-फ़रोख़्त में जुटे एक स्थानीय शख़्स ने कहा, “पन्ना में पाए गए हीरों का केवल 10-15% ही हीरा कार्यालय तक पहुँचता है, बाकी हीरे निजी रूप से बेचे जाते हैं. तत्काल और कर-मुक्त भुगतान का आकर्षण ही काले बाजार को और आकर्षक बनाता है. वहीं सरकारी हीरा कार्यालय में हीरा जमा करने पर नीलामी तक का इंतज़ार करना पड़ता है. उसके बाद ही पैसा मिल पाता है.”
बिना सरकारी पट्टे के हीरा खोजने वाले लोगों की सूची में अन्य राज्यों से आए लोग भी शामिल हैं.
अवैध खनन के आरोप पर सरकार क्या कहती है?
पन्ना में अवैध खनन गतिविधियों और हीरों के काले बाज़ार के आरोपों पर पन्ना ज़िले के खनन अधिकारी ने दावा किया कि स्थिति नियंत्रण में है.
जब हमने रूंज नदी के किनारे और पन्ना में अवैध खनन के बारे में सरकारी खनन अधिकारी रवि पटेल से बात की तो उन्होंने कहा, "हम समय-समय पर सोशल मीडिया का उपयोग करके जागरूकता फैलाते हैं और लोगों से हीरे को पन्ना के हीरा कार्यालय में ही जमा करने की अपील करते हैं. लेकिन हीरा इतना छोटा होता है कि उसकी खोज का पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि आख़िर हीरा किसको मिला या किसने किसको बेचा.”
पटेल ने आगे कहा, "जहाँ तक अवैध खानों का सवाल है, जैसे रूंज नदी के किनारे खोदी गई खदानें, वहाँ शामिल लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाती है. हाल ही में हमने खनन में लगी तीन मशीनें पकड़ी हैं, जिसके कारण लोग डरे हुए हैं और स्थिति नियंत्रण में है."

वहीं हीरों की कालाबाज़ारी के आरोप पर रवि पटेल कहते हैं, "जब भी हमें हीरों की कालाबाज़ारी के बारे में जानकारी मिलती है तो हम कार्रवाई करते हैं. लेकिन तथ्य ये है कि हीरा इतना छोटा होता है कि चाहे आप कितनी भी कोशिश करें, कुछ न कुछ आपके हाथ से फिसल ही जाता है. हमारी कोशिशें लोगों में ये जागरूकता फैलाने पर केंद्रित हैं कि वे काला बाज़ारी में शामिल न हों."
पन्ना में हीरे की खोज में जुटे ज़्यादातर लोग निम्न आय वर्ग से आते हैं. उनमें से कई लोगों को ये पता भी नहीं है कि हीरे खोजने का क़ानूनी तरीक़ा क्या है.
जहाँ अधिकारी लगातार दावा कर रहे हैं कि वो हीरे के ग़ैर क़ानूनी खनन की समस्या से निपट रहे हैं, वहीं पन्ना के सरकारी हीरा कार्यालय में साल दर साल नीलामी के लिए पहुंचने वाले हीरों की संख्या लगातार कम हो रही है.
साल 2016 में जहां 1133 हीरे नीलामी के लिए पहुंचे तो वहीं 2023 में नीलामी के लिए पहुंचने वाले हीरों की संख्या महज़ 23 थी.


इमेज स्रोत, Diamond office panna
ग़रीबी और बेरोज़गारी से जूझता इलाक़ा
केंद्र सरकार के ग़रीबी के अलग-अलग पैमानों के आधार पर तैयार सूचकांक के मुताबिक़ पन्ना, मध्य प्रदेश के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है.
ये बड़े पैमाने पर ग़रीबी, पानी की कमी और कुपोषण जैसी समस्याओं से जूझ रहा है. बेरोज़गारी भी यहां बड़ी समस्या है और यहां के स्थानीय लोग हीरा खनन, मज़दूरी और खेती पर निर्भर हैं.
हलांकि हीरे की खुदाई के काम में ज़्यादातर पुरुष ही शामिल होते हैं लेकिन महिलाएं भी खनन में मज़दूरी का काम करती हैं. हालाँकि यहां काम करने की स्थितियां बहुत अच्छी नहीं है. नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक़ पन्ना के 23.2 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण से ग्रस्त हैं तो वहीं 15 से 49 साल की 59 प्रतिशत महिलाओं को ख़ून की कमी है.

पर्यावरण भी बड़ी चिंता
पन्ना में लगातार होते खनन ने पर्यावरणविदों की चिंता भी बढ़ा दी है.
सरकार पर लगातार दबाव है कि वो हीरे की खुदाई को नियंत्रित करे ताकि इसके कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले बुरे असर को रोका जा सके. चिंता की वजह यहां का पन्ना टाइगर रिज़र्व भी है, जहाँ इस वक़्त क़रीब 50 बाघ हैं.
इस रिज़र्व को पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित बनाने के लिए सरकार पर खनन प्रक्रियाओं को सीमित करने का दबाव है.
हलांकि यहां बिना इजाज़त खनन करने पर प्रतिबंध और जुर्माने का प्रावधान है.
सालों से हीरे खोज रहे कई ऐसे लोग भी हैं, जिनके लिए अब ये पैसे कमाने और ज़िंदगी बदलने से परे की बात हो चुकी है.
अब उनके लिए ये उनकी रोज़मर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है. एक बार फिर से कई जमना पाल, अमित श्रीवास्तव और प्रकाश शर्मा अगली सुबह हीरे की खोज में घर से निकल पड़ेंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















