ऑनलाइन दिखने वाली तस्वीरें हमारे सोचने के तरीके को कैसे बदलती हैं?

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- Author, अमांडा रगेरी
- पदनाम, बीबीसी
सोशल मीडिया और इंटरनेट पर जो तस्वीरें हम देखते हैं उसका हमारे दुनिया को देखने के नज़रिए पर एक व्यापक असर पड़ता है.
हर दिन हम डिजिटल तस्वीरों से घिरे रहते हैं. ये तस्वीरें हमारे सोशल मीडिया फीड, हमारे सर्च रिज़ल्ट और हमारे द्वारा ब्राउज़ की जाने वाली वेबसाइट पर देखने को मिलती है. इसके अलावा लोग हमें मैसेजिंग ऐप्स और ईमेल्स के जरिए भी तस्वीरें भेजते हैं.
जब तक आज का दिन ख़त्म होगा, अरबों तस्वीरें इंटरनेट पर अपलोड और शेयर की जा चुकी होंगी. एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेट पर एक औसत यूज़र रोजाना छह घंटे 40 मिनट तक समय गुजारता है.
हालिया रिसर्च से पता चलता है कि तस्वीरें हमारी धारणाओं पर भी असर डाल सकती हैं.

इस साल की शुरुआत में छपी एक स्टडी ने गूगल, विकिपीडिया और इंटरनेट मूवी डेटाबेस (आईएमबीडी) पर मौजूद तस्वीरों का विश्लेषण किया.
इस स्टडी में इस बात पर ख़ास ध्यान दिया गया कि जब लोग किसान, सीईओ और टीवी रिपोर्टर जैसे पेशों के बारे में सर्च करते हैं, तो उन्हें किस जेंडर की तस्वीर ज़्यादा देखने को मिलती है. नतीजे बहुत चौंकाने वाले थे.
तस्वीरों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम था. लेकिन जेंडर के प्रति रूढ़िवादी सोच मज़बूती से दिख रही थी.
प्लंबर, डेवलपर, इंवेस्टमेंट बैंकर और हार्ट सर्जन जैसे पेशों में पुरुषों की तस्वीरें ज़्यादा दिख रही थी. वहीं हाउसकीपर, नर्स, चीयरलीडर, बैले डांसर जैसे पेशों में महिलाओं की तस्वीरें दिख रहीं थी. अब तक ये नतीजे बेहद स्वाभाविक थे, इनमें हैरान करने वाली कोई बात नहीं थी.
संयोग से, एक बार मुझे भी इसी तरह की घटना का सामना 2019 में करना पड़ा था.
हुआ ये था कि मैं अपनी वेबसाइट के लिए तस्वीरों के मुख्य स्रोत गेटी के क्रिएटिव से लैंगिक समानता वाली तस्वीरें खोज रही थी. मैंने पाया कि गेटी क्रिएटिव पर पुरुष डॉक्टरों की तस्वीरें महिला डॉक्टरों की तुलना में तीन गुना ज़्यादा हैं. जबकि अमेरिका में उस दौरान के आंकड़ों में पुरुष डॉक्टरों की तुलना में महिला डॉक्टर के होने की संभावना ज़्यादा थी.
मेडिकल जॉब में दिखाई गई तस्वीरें एक बड़ी समस्या का एक छोटा रूप है. इंटरनेट पर बच्चों के साथ महिलाओं की तस्वीरों के दोगुने ऑप्शन देखने को मिल जाते हैं.
इन तस्वीरों को देखने से क्या होता है प्रभाव?

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एक अन्य स्टडी में शोधकर्ताओं ने ऑनलाइन दिखने वाली तस्वीरों में जेडर के प्रति पूर्वाग्रह को देखने की जगह यह जानने की कोशिश की कि क्या इन तस्वीरों को देखने से लोगों के अपने पूर्वाग्रहों पर कोई असर पड़ता है.
इस प्रयोग में 423 अमेरिकी लोगों को दो समहूों में बांट दिया गया. इन्होंने अलग-अलग जॉब की खोज करने के लिए गूगल का इस्तेमाल किया.
एक ग्रुप ने गूगल या गूगल न्यूज़ का इस्तेमाल किया तो दूसरे ने गूगल इमेज का इस्तेमाल किया. इसके बाद, सभी लोगों को उनके पूर्वाग्रहों का आकलन करने के लिए एक टेस्ट देने को कहा गया.
जिन लोगों ने गूगल इमेज का इस्तेमाल करके तस्वीरों को खोजा, उनमें गूगल या गूगल समाचार का इस्तेमाल करने वालों की तुलना में बहुत ज़्यादा पूर्वाग्रह देखा गया.
रिसर्चर्स ने लिखा कि इंटरनेट पर तस्वीरों की लोकप्रियता बढ़ने से समाज को नुकसान पहुंच सकता है. उन्होंने कहा, "हमें मिले नतीजे काफी चिंताजनक हैं क्योंकि इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और टिकटॉक जैसी फोटोज़ आधारित सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की लोकप्रियता काफी बढ़ रही है. जहां बड़े पैमाने पर तस्वीरें अपलोड, तैयार और शेयर की जाती हैं."
इसी तरह से, गूगल जैसे लोकप्रिय सर्च इंजन भी तस्वीरों का इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा करने लगे हैं. उदाहरण के तौर पर जब आप कुछ खोजते हैं, तो आपको अक्सर टेक्स्ट के साथ तस्वीर भी देखने को मिलती है.
एआई भी है पूर्वाग्रहों का शिकार
दूसरा बड़ी समस्या यह है कि ऑनलाइन पर पहले से ही शेयर हो रही तस्वीरें किस तरह से एआई मॉडल में इस्तेमाल हो रही है. इस साल की शुरुआत में, मैंने ख़ुद इस पर प्रयोग किया. मैंने चैटजीपीटी से दर्जनों अलग-अलग जॉब की तस्वीरें बनाने को कहा.
इनमें डॉक्टर, वकील, वैज्ञानिक, कॉमेडियन, कवि, शिक्षक, न्यूट्रिशनिस्ट, थॉट लीडर, सीईओ और विशेषज्ञों जैसे पेशे शामिल थे. डेंटल, हाइजीनिस्ट, नर्स और हाउसकीपर जैसे दो या तीन नतीजों को छोड़कर, मुझे हर जगह पुरुष की तस्वीर देखने को मिली. उसमें भी 30 के आसपास की उम्र वाले एक पतले गोरे आदमी की तस्वीर दिखाई देती थी.
इसके बाद मैंने करियर पूर्वाग्रह से हटकर चैटजीपी से विभिन्न प्रकार के लोगों की तस्वीर को बनाने को कहा. जैसे कि एक बुद्धिमान व्यक्ति, एक सफल व्यक्ति, या कोई ख़ास शो देखने वाला व्यक्ति. हर बार मुझे चमकीले बालों में एक गोरा आदमी देखने को मिलता.
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चैट जीपीटी जैसे मॉडल पहले से मौजूद तस्वीरों की मदद से नतीजों को दिखाते हैं. इसके साथ ही एक ऐसे चक्र की शुरुआत हो जाती है, जिसे तोड़ना मुश्किल होता है.
एआई मॉडल जितनी ज्यादा पक्षपाती तस्वीरें दिखाते हैं, हम उतना ही ज़्यादा उन्हें देखते हैं. जितना ज़्यादा हम उन्हें देखते हैं, हम ख़ुद उतने ही ज़्यादा पक्षपाती बन जाते हैं. हम जितने अधिक पक्षपाती बनते जाते हैं, हम उतनी ही ज़्यादा पक्षपाती तस्वीरों को बनाते हैं और उन्हें अपलोड करते हैं.
समस्या का हल क्या है?

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तो इस समस्या के समाधान के लिए क्या किया जा सकता है?
इसमें सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी तकनीक और एआई कंपनियों की है. लेकिन जब इन कंपनियों के इरादे अच्छे भी होते हैं, तब भी इस समस्या का समाधान होते हुए नहीं दिखता.
उदाहरण के लिए, नस्लीय, लैंगिक और अन्य पूर्वाग्रहों को ठीक करने की कोशिश में, गूगल का एआई टूल जेमिनी कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा सुधार कर देता है.
इसने अमेरिका के फ़ाउंडिंग फ़ादर्स की एक तस्वीर बनाई जिसमें एक काला व्यक्ति शामिल था, जो ऐतिहासिक रूप से गलत है. वहीं, दूसरे विश्व युद्ध में जर्मन सैनिकों की तस्वीर दिखाते समय इसने एक काले व्यक्ति और एक एशियाई महिला को दिखा दिया, जो कि गलत है.
दरअसल, हम ऑनलाइन दुनिया में जो कुछ भी देखते हैं, उसका नियंत्रण अपने हाथ में लेना होगा. हम अक्सर इस बात को अनदेखा करते हैं कि हम कुछ हद तक अपने सोशल मीडिया फीड को ठीक कर सकते हैं.
हम सोशल मीडिया पर अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों या फ़ोटोग्राफ़रों को फॉलो कर सकते हैं. साथ ही, हम अपने सवाल को जिस तरह से ऑनलाइन लिखते हैं, उसे बदलकर हम मिलने वाले खोज परिणामों को बदल सकते हैं.
स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना
सबसे शानदार तरीका अपने समय को नियंत्रित करना है. कला उद्यमी मरीन टैंगुई की किताब 'द विज़ुअल डिटॉक्स: हाउ टू कंज्यूम मीडिया विदाउट लेटिंग इट कंज्यूम यू' के नाम से प्रसिद्ध "डिजिटल डिटॉक्स प्लान" में कुछ अच्छी बातों का ज़िक्र है.
जैसे कि हम स्क्रीन या अपने फ़ोन को देखने के समय को नियंत्रित कर सकते हैं. हम उन ऐप्स को हटा सकते हैं जिनका हम इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं. इसके अलावा बिना तकनीक की मदद के बाहर समय बिताकर हम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं.
मुझे हाल ही में पता चला कि मेरे पुराने फोन में भी ऐप्स के लिए एक टाइमर दिया गया है. आप हर एक ऐप के लिए एक सीमा को तय कर सकते हैं, और जब आप अपना समय पूरा कर लेंगे तो फोन आपको एक चेतावनी देगा.
हालांकि मैंने हमेशा चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन इससे मुझे अपने सोशल मीडिया इस्तेमाल के बारे में अधिक जागरूक होने और इसे कम करने में मदद मिली है.
सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात जागरूकता ही है. हम अक्सर इस बारे में नहीं सोचते कि हम हर दिन कितनी तस्वीरें देखते हैं, जिन्हें जानबूझकर हमारे लिए बनाया गया है और दिखाया गया है.
कई तस्वीरों को हमें चीज़ें खरीदने पर विवश करने के लिए बनाया जाता है. न ही हम इस बारे में सोचते हैं कि तस्वीरों का इस्तेमाल हाल के समय में बढ़ा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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