उत्तर कोरिया के मिसाइल प्रोग्राम से जुड़ा शख़्स जो दक्षिण कोरिया में सांसद बन गया

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- Author, फ्रांसिस माओ, सांगमी हान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पार्क चूंग-क्वोन जब नौजवान थे तो वे अपने देश उत्तर कोरिया के लिए परमाणु मिसाइल बनाने में मदद करते थे.
ये वही मिसाइल थे जिनका पश्चिमी देशों को धमकाने के लिए समय-समय पर उत्तर कोरिया परीक्षण किया करता था.
मौजूदा वक्त में वो अपने पड़ोसी देश में सासंद बन गए हैं. इसी सप्ताह दक्षिण कोरिया में हुए चुनावों में चूंग-क्वोन सांसद चुने गए हैं.
जब कोई व्यक्ति किसी तानाशाही शासन से बचकर किसी लोकतांत्रिक मुल्क की तरफ जाता है तो वो बेहतर ज़िंदगी और अच्छे मौक़ों की तलाश में होता है. लेकिन क्या एक शरणार्थी सांसद और फिर किसी दिन राष्ट्रपति बन सकता है? ये संभव है.
लेकिन उत्तर कोरिया से आए एक शख्स के लिए ये अभूतपूर्व है. 37 साल के पार्क चूंग-क्वोन चौथे ऐसे व्यक्ति हैं जो दक्षिण कोरिया में आने के बाद सत्ता के गलियारों तक पहुंचे हैं और सांसद बने हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "जब मैं दक्षिण कोरिया आया था मैं खाली हाथ था और अब मैं यहां की राजनीति के अखाड़े में कूद चुका हूं."
"मैं मानता हूं कि ये इसलिए संभव हुआ क्योंकि ये उदारवादी लोकतंत्र की ताकत है और यहां के नागरिकों ने ये कर दिखाया है. ये एक चमत्कार है और देखा जाए तो आशीर्वाद भी."
देश छोड़ने के बारे में माता-पिता तक को नहीं बताया

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उत्तर कोरिया से जुड़े मामलों पर नज़र रखने वालो के लिए ये विकास का संकेत है.
सैंन्ड्रा फाही ओटावा की कार्लटन यूनिवर्सिटी में एसोशिएट प्रोफ़ेसर हैं. उन्होंने उत्तर कोरिया के जीवन पर शोध किया है.
वो कहती हैं, "दसियों हज़ारों उत्तर कोरियाई हैं जिन्होंने इस सत्ता के ख़िलाफ़ जाकर वोट दिया है, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी की क़ीमत देकर यहां की दमनकारी सत्ता का विरोध किया है. कुछ लोगों ने अपनी जान दी है लेकिन कई यहां से बचकर भागे हैं और दुनिया उनसे फायदा ले रही है."
"लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व और राजनीति में शामिल होने का महत्व उनसे बेहतर कौन समझ सकता है जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा उस दुनिया में गुज़ारा है जहां इस पर पाबंदी है."
क़रीब 15 साल पहले पार्क उत्तर कोरिया से बचकर भाग आए थे. उस वक्त उनकी उम्र 23 साल थी. उन्होंने उत्तर कोरिया छोड़ने की अपनी योजना के बारे में न तो अपने माता-पिता को कुछ बताया और अपने परिवार के अन्य सदस्यों को.
वो कहते हैं कि ये बेहद जोखिम भरा था और अगर उनके परिवार को इस बारे में कोई जानकारी होती तो उनकी जान खतरे में पड़ सकती थी.
उत्तर कोरिया में बिताए अपने आख़िरी तीन साल में वो नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी में थे जहां वो उन छात्रों में शुमार थे जिनके कंधों पर उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों की तकनीक विकसित करने का भार था.

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उनका अधिकतर वक्त राजधानी प्योंगयांग में बीता था, हालांकि इससे पहले 1990 के दशक में उनका बचपन देश के उत्तरी हिस्से में बीता. ये वो वक्त था जब देश भीषण अकाल से जूझ रहा था और इस कारण यहां लाखों लोगों की मौत हुई. ऐसे वक्त में यहां कालाबाज़ारी ज़ोरों पर थी और लोग उस पर एक तरह से निर्भर थे.
लेकिन दुनिया के बारे में उनकी जानकारी और समझ दक्षिण कोरिया टेलिविज़न शोज़ के ज़रिए विकसित हुई जिन्हें तस्करी कर देश में लाया जाता था. चीन में पढ़ाई के दौरान भी उन्हें बाहरी दुनिया को समझने का मौक़ा मिला जहां नए विचारों के लिए उनकी आलोचना हुई.
जब तक वो यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएट हुए उन्होंने कोरियाई मीडिया से कहा कि उन्हें इस बात का अहसास हुआ है कि "उत्तर कोरियाई सत्ता किस कदर ग़लत है और भ्रष्टाचार के जाल में फंसी हुई है."
इसके बाद उन्होंने यहां से निकलने की योजना बनाई और इंतज़ार किया.
ये मौक़ा उन्हें साल 2009 के अप्रैल महीने के एक दिन मिला. उत्तर कोरिया ने उस दिन अपने पहले इंटरकॉन्टिनेन्टल बैलिस्टिक मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था. ये वही मिसाइल थी जिसके बनने में उन्होंने कई सालों का वक्त दिया था.
पूरा देश इस सफलता का "जश्न मना रहा था." उन्होंने इसमें मौक़ा देखा और अगले दिन सवेरे चोरी छिपे वहां से निकल भागे.
उत्तर कोरिया से बाहर निकलना भी अपने आप में सज़ा जैसा था. उन्होंने तेज़ी से भागने का महंगा रास्ता चुना, उन्होंने चीन से होते हुए जाने का फ़ैसला किया. इसके लिए उन्हें एक करोड़ वॉन कोरियाई मुद्रा (सात हज़ार 300 डॉलर) खर्च करने पड़े. इतनी बड़ी क़ीमत देने के बावजूद दलाल ने उन्हें जो जाली पासपोर्ट दिया था वो भी किसी घटिया सर्टिफ़ेकेट जैसा था.
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बीते साल एनके न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने उस वक्त को याद किया जब उन्होंने पहली बार महसूस किया कि वो आज़ाद हैं. उन्होंने बताया कि चीन की तरफ पड़ने वाले तूमेन नदी के किनारे की तरफ आगे बढ़ते हुए उन्हें आज़ाद होने और खोने का अहसास हुआ, उन्हें अहसास हुआ कि वो "अंतरराष्ट्रीय अनाथ" हैं.
उनके लिए एक और महत्वपूर्ण वक्त वो था जब उन्हें दक्षिण कोरिया का पासपोर्ट मिला. वो कहते हैं ये उनकी ज़िंदगी के सबसे खुशगवार पलों में से एक था.
1990 के वक्त से लेकर अब तक क़रीब 35 हज़ार उत्तर कोरियाई नागरिक अपने देश से भागकर दक्षिण कोरिया आ चुके हैं. लेकिन यहां आने वाले कई और नागरिकों की तुलना में पार्क जल्द ही अपनी नई ज़िंदगी में रम गए, ये एक चुनौती थी लेकिन संभ्रात परवार से होने और अच्छी शिक्षा के कारण उन्हें इसमें आसानी हुई.
उन्हें देश की सबसे जानीमानी युनिवर्सिटी, सोल नेशनल युनिवर्सिटी में दाखिला मिला जहां उन्होंने मटीरियल साइंस और इंजीनियरिंग में पीएचडी की पढ़ाई की. इसके बाद दक्षिण कोरिया के सबसे बड़ी कंपनी में से एक हून्डे स्टील में अच्छी नौकरी मिल गई.
इसके बाद एक दिन राष्ट्रपति की पार्टी के लोग उनसे मिलने आए.
पार्क ने बीबीसी को बताया उन्होंने राजनीति में कदम रखने के बारे में कभी सोचा नहीं था लेकिन जब पीपल पावर पार्टी के लोगों ने उनसे संपर्क किया तो उन्हें लगा कि वो समाज को वो लौटाना चाहेंगे जो उन्हें मिला.

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बुधवार को चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी के दूसरे नंबर के प्रतिनिधि की हैसियत से उनकी सीट पक्की हो गई थी. लेकिन आख़िर में जो नतीजे आए वो बेहद अलोकप्रिय राष्ट्रपति यून सुक-योल और उनकी सत्ताधारी पावर पार्टी के लिए अच्छे नहीं थे.
लेकिन पार्क सकारात्मक नज़रिया रखने वाले व्यक्ति हैं और अब एक चुने हुए सांसद के तौर पर उनकी अपनी बड़ी योजनाएं हैं.
इससे पहले दक्षिण कोरिया की सरकार ने उत्तर कोरिया से भागकर आए दो लोग बतौर नेता शामिल थे. इनमें से एक थे ते योंग-हो जो गैंगनम जिले का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. योंग-हो यूके के लिए उत्तर कोरिया के राजदूत थे और 2016 में अपने लंदन निवास के दौरान उन्होंने देश छोड़ने का फ़ैसला किया था.
एक और व्यक्ति थे जी सोंग-हो जिन्होंने 1996 में भूख से जूझते अपने परिवार के लिए ट्रेन से कोयला चुराने की कोशिश में अपना एक हाथ और एक पांव गंवा दिया था. वो भूख से बोहोश हो गए थे और ट्रेन के दो डिब्बों के बीच बनी जगह से नीचे पटरियों पर गिर गए थे. ट्रेन के पहिए उनके ऊपर से गुज़र गए थे. बाद में वो किसी तरह उत्तर कोरिया के बचकर निकलने में कामयाब हुए.
लंबे वक्त से इन प्रतिनिधियों की कोशिश है कि वो उत्तर कोरिया से जान बचाकर आने वालों के लिए हालात में सुधार करें.
कई लोगों का कहना है कि दक्षिण कोरिया आना उनके लिए नई ज़िंदगी की सांस लेना ज़रूर है लेकिन इसका भी अपना खामियाज़ा है. दक्षिण में उनके साथ दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार किया जाता है.
इसी कारण जी सोंग-हो ने 2020 में राजनीति में कदम रखने का फ़ैसला किया. उत्तर कोरिया से भागकर आए कुछ लोगों को दक्षिण कोरिया के अधिकारियों ने तस्करी के संदेह में वापिस डिपोर्ट कर दिया था. इसके बाद से वो दक्षिण आने वाले उत्तर कोरियाई नागरिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
'उत्तर-दक्षिण को एक करने की कोशिश करनी है'

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साल भर पहले उत्तर कोरिया से भागकर आई एक मां और उनकी बच्ची सोल में अपने घर में मृत पाई गई थीं. बताया जाता है कि दोनों की मौत भूख से हुई थी.
पार्क कहते हैं कि उनके पहला उद्देश्य है दक्षिण आने वाले उत्तर कोरिया नागरिकों के लिए मदद की व्यवस्था करना. वो उन्हें आजीवन पैकेज देने के हिमायती हैं. वो कहते हैं कि कोविड महामारी के कारण सीमाएं सील कर दी गईं और उत्तर कोरिया से नए लोग दक्षिण कोरिया नहीं आ सके, ऐसे में उत्तर से आने वालों के लिए बजट में दिए प्रावधान पर फिर से विचार किया जाना चाहिए.
वो कहते हैं कि उनकी इच्छा है कि उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच संबंधों को सुधारने की दिशा में वो कुछ कर सकें.
यही कारण है कि उत्तर कोरिया और मिसाइलें दाग़कर उकसाने की किम जोंग-उन की कार्रवाई से निपटने का राष्ट्रपति यून सुक-योल का तरीका उन्हें पसंद आया.
कुछ लोग कहते हैं कि यून सुक-योल अमेरिका और जापान से रिश्ते बढ़ा रहे हैं इससे नाराज़ होकर उत्तर कोरिया बार-बार इस तरह की प्रतिक्रिया दे रहा है. लेकिन पार्क इस दलील का खारिज करते हैं.
वो कहते हैं, "कुछ लोगों का मानना है कि यून के आने के बाद से युद्ध का ख़तरा बढ़ गया है. लेकिन ये सही नहीं है. अभी के मुक़ाबले इससे पहले की सरकार के दौरान उत्तर कोरिया का उकसावा अधिक था."

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पार्क कहते हैं कि पूर्व राष्ट्रपति मून जेई-इन की सरकार के दौरान उत्तर कोरिया के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने की कोशिशें हुईं लेकिन इसी दौरान उत्तर कोरिया के मिसाइल लॉन्च और हथियार बनाने के कार्यक्रम में इज़ाफा हुआ.
वो कहते हैं कि तुष्टीकरण का रास्ता अपनाना सही नहीं है. उनकी दलील है, "फिलहाल उत्तर कोरिया के उकसावे को रोकना सबसे बड़ी प्राथमिकता है और इससे युद्ध को ख़तरे को कम करने में मदद मिलेगी."
वो मानते हैं कि आज नहीं तो कम इलाक़े के ये दो देश फिर से एक हो जाएंगे. हालांकि इस साल उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग-उन ने इसकी संभावना ख़त्म करने के लिए कदम उठाए हैं. उन्होंने दक्षिण कोरिया को दुश्मन देश घोषित किया है, साथ ही राजधानी प्योंगयांग में बने भविष्य में दोनों कोरिया के साथ आने के प्रतीक आर्क ऑफ़ री-युनिफ़िकेशन को धमाके से उड़ा दिया.
लेकिन पार्क इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते. वो कहते हैं कि दक्षिण कोरिया सरकार में इसके लिए "एक ब्रिज के तौर पर" काम करने के लिए तैयार हैं.
वो कहते हैं, "मैं उत्तर कोरिया की सत्ता और वहां के आम लोगों के बारे में दक्षिण कोरिया के लोगों की समझ बनाना चाहता हूं ताकि आज नहीं तो कल दोनों के एक होने के रास्ता खुल सकें."
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)
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